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complete literary work

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  • Dushyant Kumar Rachanavali (Four Vols.)
    Vijay Bahadur Singh
    2250 1800

    Item Code: #KGP-834

    Availability: In stock

    Complete Set of 4 Volumes.
  • Daadoo Samgra (2 Vols.)
    Govind Rajnish
    1800 1440

    Item Code: #KGP-1584

    Availability: In stock

    दादू समग्र : 1
    भक्तिकाल के निर्गुण संप्रदाय में कबीर के पश्चात सबसे महत्त्वपूमृर्प सर्जनात्मक व्यक्तित्व संत दादू दयाल (दादू अवधूत जोग्यन्द्र) का है । पुरे भारत से सामाजिक, धार्मिक और दार्शनिक चेतना को जगाने तथर विराट सांस्कृतिक आंदोलन खड़ा करने में इनकी अग्रणी भूमिका रही है । इन्होंने मनुष्य के भीतर सोए हुए विराट अनुराग को जगाने तथा ज्ञानात्मक संवेदनाओं और आध्यात्मिक अनुभवों से संपन्न करने का प्रयास किया था। इनके 'न्रिपख' दर्शन ने हिंदू और मुसलमानों की कुरीतियों, बाह्याडंबरों, जड़ताओं, रूढियों और विसंगतियों की आलोचना करते हुए, धर्म और संप्रदाय से ऊपर उठने का संदेश दिया था ।
    दादू महान् संत, रचनाकार, नीतिज्ञ और उपदेशक ही नहीं थे, विश्व-बोध और मानवीयता से ओतप्रोत समाज-सुधारक भी थे । इन्होंने मजहब और जाति-भेद से ऊपर उठकर मानवीय भावों को परखकर विशाल मानवीय बोध जगाया था। इनकी साधना-भूमि, काव्य-भूमि एवं भाव-भूमि अत्यंत व्यापक और संवेदना जन-मन-स्पर्शिनी थी । इन्होंने भेदों से अभेद और नानात्व में एकता का संधान तथा आत्म-बोध और जगत्-बोध को एकाकार किया था । दादू का काव्य कबीर के वैचारिक क्षितिज को व्यापक किंतु धीर-गंभीर बनाने का उपक्रम है।
    दादू अपने सहज, निश्छल भगवत्प्रेम के सोपान से ब्रह्म-द्वार की उस सीमा तक पहुंचे, जहाँ परम तत्त्व के यथार्थ स्वरूप को पहचानने और पाने का मार्ग संसार को दिखा सके । इन्होंने ऐसे व्यक्ति और समाज की रचना का प्रयास किया था, जो सच्चाई, समता, प्रेम, भाईचारे और मानवीयता से ओतप्रोत था।
    अनेक प्राचीन पांडुलिपियों के आधार पर पहली बार इनकी समग्र रचनाओं का प्रामाणिक और पूर्ण वैज्ञानिक पाठ-संपादन करके तथा पुनरावृत्ति तथा भ्रमपूर्ण पाठों का निराकरण करते हुए, दादू की मूल रचना का पाठ प्रस्तुत किया गया है । विद्वतजनों के अतिरिक्त सामान्य पाठकों को इनका सृजन सहज बोधगम्य हो सके, इसके लिए भावार्थ और शब्दार्थ भी दिए गए हैं।

    दादू समग्र : 2
    महिमामय व्यक्तित्व और रचनात्मक प्रतिभा से संपन्न निर्गुणपंथी  कवियों में कबीर के पश्चात् दूसरा स्थान संत दादू दयाल का है । स्वयं सक्रिय रचनाशील रहते हुए अपने शिष्यों की रचनात्मक प्रतिभा को आगे बढाने वाले प्रेरक के रूप से उनका विशिष्ट महत्त्व रहा है । इसी कारण से मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के समस्त संप्रदायों में सर्वाधिक रचनाकार दादू-पंथ मेँ हुए थे।
    दादू दयाल की रचनाओं का समग्र एवं प्रामाणिक पाठ प्रस्तुत करना, अन्य कवियों की अपेक्षा जटिल, समय-साध्य एवं चुनौतीपूर्ण कार्य था। संत-काव्य-मर्मज्ञ डॉ० रजनीश ने 14 वर्षों की निरंतर साधना से विभिन्न स्थानों, दादू-द्वारों और सांस्थानों में जाकर, वहाँ से प्राप्त सर्वाधिक प्राचीन 29 पांडुलिपियों के आधार पर दादू-काव्य का पूर्णिया वैज्ञानिक, मूल एवं विश्वसनीय पाठ प्रस्तुत किया है।
    दादू 'जोग्यन्द्र' की अज्ञात, लुप्तप्राय और अपूर्व रचना 'आदि बोध-सिद्धांत-ग्रंथ' के साथ उनकी अन्य रचनाएँ पहली  बार इसमें दी जा रही हैं। 'समग्र' में समग्रत: पुनरावृत्ति और प्रक्षिप्त साखियों को छाँटकर पाद-टिप्पणियों या अतिरिक्त साखियों के अंतर्गत रखकर, कथ्य द्वार संदर्भ की दृष्टि से उनका उपयुक्त स्थान निर्धारित किया गया है ।
    ग्रंथ की विस्तृत भूमिका और यथार्थपरक विवेचना से अनेक लोक-प्रवादों और भ्रांत धाराओं का निराकरण करते हुए इस प्रस्तुति में दादू के जीवन और रचनाधर्मिता के बारे में नई दिशाएं दी गई हैं।
    जन-सामान्य को दादू दयाल की कविता का मर्म सहज ग्राह्य हो सके, इसके लिए साखियों और पदों के साथ भावार्थ और शब्दार्थ भी दिए गए है, जिससे यह ग्रंथ विद्वानों, सुधी पाठकों और जन-सामान्य के लिए समान रूप से उपयोगी हो गया है ।
  • Manjul Bhagat : Samagra Katha Sahitya-1
    Kamal Kishore Goyenka
    500 400

    Item Code: #KGP-57

    Availability: In stock

    मंजुल भगत : समग्र कथा-साहित्य (1)
    संपूर्ण उपन्यास
    हिंदी की प्रख्यात लेखिका मंजुल भगत को मैंने कुछ गोष्ठियों में बोलते सुना और संवाद भी किया तो पाया कि वे भारतीय स्त्री का प्रतिरूप है । उनमें भारतीय स्त्री के गहरे संस्कार थे । उनसे मिलना भारत की एक आधुनिक स्त्री से मिलना था । यह स्त्री भारत की संस्कृति और यहाँ  की मिट्टी की उपज थी, जिसमें गहरा अस्तित्व-बोध एवं  स्त्री-स्वातंत्र्य की चेतना थी । उन जैसी संस्कारवान, संकल्पशील, संघर्षरत और संवेदनाओ से परिपूर्ण लेखिका के संपूर्ण कथा-साहित्य के संकलन तथा संपादन का कार्य  करना मेरे लिए गौरव की बात है ।
    मजुल भगत की प्रमुख विधा कहानी है और इसी से वे साहित्य में प्रवेश करती हैं, परंतु उपन्यास के क्षेत्र मैं भी उन्होंने अपनी लेखन-प्रतिभा का परिचय दिया और 'अनारो' जैसे उपन्यास की रचना करके देश-विदेश में ख्याति प्राप्त की ।
    लेखिका के सभी उपन्यास-'टूटा हुआ इंद्रधनुष', 'लेडीज़ क्लब', 'अनारो', 'बेगाने घर में', 'खातुल', 'तिरछी बौछार’ तथा 'गंजी' के साथ-साथ उनके प्रकाशित कूल कहानी-संग्रहों में संकलित कहानियों को इस संकलन-द्वय से एक साथ प्रस्तुत किया गया है ।
    इस समग्र रचना-संसार को पढ़कर कहा जा सकता है  कि साहित्य के प्रति मंजुल भगत की गहरी आस्था थी । लेखिका का दृढ़ विश्वास था कि आने वाले समय में, तमाम अपसंस्कृति एवं अमानवीयकरण के बावजूद उनके उपन्यास और कहानियाँ अवश्य ही पढे जाएंगे । बीसवीं शताब्दी में भारतीय स्त्री को जानने और समझने के लिए मंजुल भगत का कथा-साहित्य एक प्रामाणिक दस्तावेज है
  • Avadh Narain Mudgal Samgra (2 Vols.)
    Mahesh Darpan
    745 633

    Item Code: #KGP-216

    Availability: In stock

    अवधनारायण मुद्गल समग्र (2 खण्डों में)
    'अवधनारायरए मुद्गल समग्र' में कवि-कथाकार  संपादक ही नहीं, एक सिद्धहस्त यात्रावृत्त लेखक, लघुकथाकार, साक्षात्कारकर्ता और अनुवादक के साथ-साथ श्री मुद्गल का विचारक रूप भी सामने आया है । आगरा, लखनऊ, मुंबई और दिल्ली जैसे शहरों में साहित्य और पत्रकारिता के रचनाकार- संपादक के अनुभव विविधरंगी रहे हैं । अपने समय की हलचल को बड़े संजीदा ढंग से देखने वाले\ श्री मुद्गल को समय के अनेक बड़े रचनाकारों व संपादकों का सान्निध्य तो मिला ही, वह उनके साथ रहते हुए भी स्वयं को उनसे अप्रभावित रख अपनी अलग राह बना सके । इस राह को पहचानना ही इस समग्र कृतित्व से होकर गुज़रना है। यहीं दैनिक जीवन के तनाव, इतिहास से मनुष्य का संबंध, देश-काल के भीतर और पार होती दृष्टि, सांस्कृतिक, राजनीतिक, सामाजिक व व्यक्तिगत प्रसंगों में भाषा का सहज आत्मीय स्वरूप और मिथकों के साथ-साथ दैनंदिन जीवन से आए प्रतीक एक नई रचना की दुनिया में ले जाते हैं, जो निरंतर  पास आने को आमंत्रित करती है । इस ग्रंथ का पाथ, एक तरह से एक विशिष्ट काल-खंड को तटस्थ दृष्टि से समझने का अवसर भी देता है । रचनाकार मुद्गल की यह सृष्टि विचार और विरार-सघर्ष की एक ऐसी दुनिया है, जिससे गुजरते हुए पाठक खुद को उसका एक सहयात्री पाता है ।

  • Naamdev Rachanavali
    Govind Rajnish
    320 272

    Item Code: #KGP-146

    Availability: In stock

    नामदेव रचनावली
    नामदेव ऐसे समर्थ और प्रतिभाशाली रचनाकार थे, जिन्होंने मराठी और हिंदी में समान रूप से रचनाएँ कीं। वे 54 वर्षों तक उत्तर भारत में रहे और हिंदी-संत-काव्य के लिए प्रेरक सिद्ध हुए। उनकी पद-शैली, भाव-बोध, दार्शनिक विचारों, बिम्बों, प्रतीकों और उपमानों का प्रभाव हिंदी के निर्मुणपंथी कवियों पर पडा ।
    स्वानुमूतिजन्य सत्यान्वेषण, सदगुरु के महत्त्व का प्रतिपादन, परम तत्त्व की सर्वव्यापकता, तन्मयमूलक भक्ति, नाम-स्मरण, कर्मकांड और पाखंडों का निषेध, आंतरिक शुचिता पर बल, बाह्याडंबरों की व्यर्थता और विषमता-विरोध ऐसे तत्त्व हैं, जो परवर्ती संत कवियों के काव्य में समान रूप से पाए जाते हैँ। इसीलिए समकालीन एवं परवर्ती संत कवियों ने उनका स्मरण श्रद्धा के साथ किया है।
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