Filter selection

Author
Price

education

  • grid
  • Gandhi Ko Samajhane Ka Yahi Samay
    Jagmohan Singh Rajput
    300 240

    Item Code: #KGP-GKSKYS

    Availability: In stock

    महात्मा गांधी वह महामानव हैं जिनकी प्रासंगिकता हर दौर में बनी रहेगी। व्यवस्थित जीवन जीने के लिए गांधी जी ने जो सूत्र दिएवे उनके व्यक्तित्व की भाँति आज भी उतनी महत्ता रखते हैं जितनी तत्कालीन समय में थी। जीवन के जिस भी क्षेत्र में उन्होंने जो भी अनुभव प्राप्त किएवही अनुभव उन्होंने साररूप में मानव जाति को प्रदान किए। वे जीवन के हर क्षेत्र-चाहे वह शैक्षिक हो या राजनीतिक-के प्रति बहुत गंभीर थे। उनका विचार था कि सामयिक क्रांति के पहले सुषुप्त समाज को जाग्रत करना जरूरी है और ऐसा तभी हो सकता है जब शिक्षा की प्रकाश-किरणें सब तक पहुँचें। इसके लिए उन्होंने वैचारिक चिंतन ही नहीं कियाअपितु व्यावहारिक प्रयोग भी किए।

    गांधी जी का मानना था कि शिक्षा वही उचित है जो बच्चों को उनके उत्तरदायित्व और कर्तव्य का बोध कराए। उनके अनुसार शिक्षा तो वही सही है जो चरित्र का उचित दिशा में निर्माण करे। प्रस्तुत पुस्तक गांधी को समझने का यही समय अपने में गांधी जी द्वारा प्रतिपादित चारित्रिकशैक्षिकसामाजिक एवं राजनीतिक मूल्यों को समाहित किए हुए है। इन मूल्यों में जो विकृति आई हैउसे दूर करने के लिए हमें गांधी को समझना होगा और गांधी को समझने का यही समय उपयुक्त है।

     

    स्वतंत्रता के बाद के सभी शिक्षा संबंधी अधिकांश दस्तावेजों में चरित्र निर्माण तथा मानव मूल्यों की शिक्षा पर बल दिया जाता रहा है। मगर स्थिति पहले से अधिक चिताजनक ही होती जा रही है। गांधी जी के जन्म के 150वें वर्ष में व्यक्तित्व-निर्माण और शिक्षा से व्यक्तित्व-विकास पर गहन विचार-विमर्श के द्वारा एक ऐसी रणनीति तैयार की जानी चाहिए जिसमें सभी की भागीदारी होजो शब्दों में नहींव्यवहार में पारदर्शिता के साथ समाज के अंतिम छोर पर अभी भी प्रतीक्षा कर रहे लोगों पर केंद्रित हो। साथ ही साथ देश इस पर भी बहस करे कि विशेषाधिकार प्राप्त करने की होड़ पर अंकुश कौन लगाएगायह विकृति कहाँ तक पहुँची हैइसका अंदाजा उस खबर से लगाया जा सकता है जिसमें उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों द्वारा अपने कार्यस्थल तक आने-जाने के लिए एक विशेष मार्ग की माँग की गई थी। एक राज्य सरकार केवल वीआईपीके लिए एक फ्रलाईओवर हवाई अड्डे तक बनाने जा रही थी जिसे जनता ने प्रतिरोध कर रोक दिया था। इस उदाहरण में समस्या की गंभीरता तथा उसके समाधान दोनों ही निहित हैं। यदि इसका सारतत्त्व समझ लिया जाए तो हम सिर उठाकर गांधी को याद करने लायक हो सकेंगे।

  • Swatantra Bharat Mein Proud Shiksha
    Hiralal Bachhotia
    225 191

    Item Code: #KGP-9361

    Availability: In stock

    अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक होना और सबसे बढ़कर लोकतंत्र में अपनी भूमिका को समझने में एक पढ़ा-लिखा नागरिक या कम से कम एक साक्षर व्यक्ति ही कामयाब हो सकता है। स्वाधीनता आंदोलन के आयामों में हिंदी प्रचार-प्रसार, स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग, भाईचारा आदि समान निरक्षरता को मिटाना भी एक रचनात्मक कार्यक्रम था। बुनियादी तालीम में कार्यानुभव या करके सीखना पर पर्याप्त जोर दिया गया। स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही साक्षरता समाज शिक्षा का अभिन्न अंग बन गया।
    स्वतंत्र भारत में समाज शिक्षा का विस्तार प्रौढ़ शिक्षा के रूप में हुआ और धीरे-धीरे प्रौढ़ शिक्षा ने एक आंदोलन का रूप ले लिया। इसमें कम से कम कुछ लोगों और समर्पित समूहों के योगदान के साथ पढ़ना सिखाने की परंपरित वर्णमाला पद्धति के स्थान पर नई वैज्ञानिक पद्धति—चित्रा-वर्ण-विधि का अनुसरण कर कम समय में साक्षर बनाने का विकल्प सर्वाधिक सफल रहा और पढ़ना-लिखना सीखने-सिखाने की क्रिया को रोचक गतिविधि बनाने का प्रयत्न किया गया। दुनिया के अन्य देशों में आंदोलन के रूप में ही निरक्षरता पर चोट की गई। क्यूबा आदि के उदाहरणों से हम परिचित ही हैं—भारत में भी कमोबेश यही वातावरण निर्मित हुआ और निरक्षरता से निपटने के अनेक आयाम उद्घाटित हुए। देश में एक सकारात्मक वातावरण बना। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय की 14 प्रतिशत साक्षरता केरल में तो शत-प्रतिशत ही हो गई। यह एक लंबी लड़ाई का परिणाम है जिसमें योजनाब; तरीके से आलोचनाओं के बावजूद उत्तरोत्तर उपलब्धियां प्राप्त करने में सफलता मिली। अब सभी जान गए हैं कि विकास सुफल प्राप्त करने, योजनाओं का लाभ लेने में साक्षरता का योगदान कितना जरूरी है। कमोबेश यही स्वतंत्र भारत में प्रौढ़ शिक्षा की उपलब्धता की कहानी है। इसका एक पहलू यह भी रहा कि आम आदमी साक्षरता के सहारे कुछ तो आगे बढ़ा और अपनी मंजिल को पहचान सका।
  • Ghareloo Hinsa : Vaishvik Sandarbh
    Vibha Devsare
    345 276

    Item Code: #KGP-559

    Availability: In stock

    महिलाओं और लड़कियों के विरुद्ध हिंसा एक ऐसी भूमंडलीय गंभीर समस्या है, जो शारीरिक, मानसिक, यौनाचार और आर्थिक रूप से उनकी हत्या करती है या उन्हें सताती है, या उन्हें अपांग बना देती है । मानव-अधिकारों का  सर्वाधिक व्यापक उल्लंघन है, जिसके द्वारा महिलाओं और लड़कियों को सुरक्षा, सम्मान, समानता, आत्मोत्कर्ष और बुनियादी आज़ादी के अधिकारों से वंचित रखा जाता है । महिलाओं के प्रति हिंसा आज हर देश में व्याप्त है । इसके विश्वव्यापी विस्तार के सामने संस्कृतियों, वर्गों, शिक्षा, आय, जातीयता और आयु की किसी भी सीमा का कोई महत्त्व नहीं होता । हालाँकि अधिकांश समाजों द्वारा महिलाओं के विरुद्ध हिंसा का निषेध किया गया है, लेकिन सच्चाई तो यह है कि उन समाजों में भी सांस्कृतिक परम्पराओं, मान्यताओं या धार्मिक सिद्धांतों की भ्रांत व्याख्या की ओट में महिलाओं के विरुद्ध हिंसा की स्वीकृति दी जाती है । इतना ही नहीं, जब यह हिंसा घर के अंदर होती है, जैसा की अधिकतर होता है, तो इस बुराई को राज्य तथा कानून-व्यवस्था के लिए जिम्मेदार शक्तियां अपने अव्यक्त मौन तथा उदासीनता के द्वारा प्रभावशाली ढंग से दबा देती हैं । 
  • Shiksha : Maanaviya Samvednayen Evam Sarokar
    Jagmohan Singh Rajput
    380 285

    Item Code: #KGP-729

    Availability: In stock

    ‘शिक्षा: मानवीय संवेदनाएँ एवं सरोकार’ में वर्ष 2011 के बाद विभिन्न आयामों पर लिखे गए लेख शामिल किए गए हैं। अधिकांश शिक्षा के विभिन्न पक्षों पर वर्तमान स्थिति तथा उसमें परिवर्तन की आवश्यकता तथा संभावित समाधानों की चर्चा करते हैं। इस संग्रह में ऐसे लेख भी रखे गए हैं जो सीधे-सीधे शिक्षा व्यवस्था से जुड़ते नहीं लगते थे। उन्हें रखा इसलिए गया था कि शिक्षा व्यवस्था को केवल विभागीय या मंत्रलय स्तर पर ही नहीं देखा जाना चाहिए। समाज के हर पक्ष तथा परिवर्तन का शिक्षा व्यवस्था से जीवंत जुड़ाव है। इसमें आर्थिक, सांस्कृतिक तथा नैतिकता के परिवर्तन भी प्रमुखता से आते हैं। राष्ट्रीयता तथा वैश्विकता के हर आयाम से शिक्षा स्पष्ट रूप से जुड़ती है। विकास और प्रगति की गति शिक्षा की गतिशीलता तथा परिपूर्णता पर ही निर्भर करती है। भारत की कृषि व्यवस्था में आई शिथिलता से लेकर सिलिकान वैली में युवा भारतीयों द्वारा नाम कमाया जाना शिक्षा की गुणवत्ता की श्रेष्ठता या कमजोरी से ही जुड़ते हैं। हिंसा, अविश्वास, शोषण, आतंकवाद, पंथिक उन्माद जैसी विभीषिकाओं ने विश्व में असुरक्षा की स्थिति पैदा की है। इसका समाधान भी शिक्षा की सुदृढ़ता, गुणवत्ता तथा नैतिकता को आत्मसात् कराने की क्षमता पर ही निर्भर करेगा।
    इसी पृष्ठभूमि में इस पुस्तक में लेखों को शामिल किया गया है। इसमें समस्याएँ वर्णित हैं, व्यक्तियों के योगदान भी निहित हैं, भाषा की बातें हैं, अध्यापकों पर विवेचन हैं, माता-पिता, संस्कारों, मूल्य शिक्षा, शिक्षा के मूल अधिकार अधिनियम के कार्यान्वयन की चर्चा है और प्रयास यह रहा है कि सभी महत्त्वपूर्ण पक्ष पाठक के सामने उभरकर आ जाएँ। वे अपेक्षाएँ भी उभरी हैं जो सामान्यजन की अवधारणा में शिक्षा को प्रभावित करती हैं। 
  • Shiksha Mein Moolyon Ke Sarokar
    Jagmohan Singh Rajput
    340 272

    Item Code: #KGP-896

    Availability: In stock

    प्रस्तुत पुस्तक में सामाजिक मूल्यों, मान्यताओं तथा संबंधों में हो रहे बदलाव को देखने और परखने के लिए आवश्यक दृष्टिकोण परिवर्तन क्यों और कैसे संभव है, इसे समझने का प्रयास किया गया है । इसके बाद शैक्षिक पाठ्यक्रम पर समग्रता से निगाह डालते हुए पाठ्यक्रम परिवर्तन की आवश्यकता तथा उसके मूल तत्त्वों पर चर्चा की गयी है । इसमें उस प्रकार की पाठ्यसामग्री के सम्बन्ध में भी चर्चा हैं, जो पाठ्यपुस्तकों में उपलब्ध है तथा जिसमें अन्य मूल्यों के साथ परिवार तथा पीढ़ियों के संबंधों के विभिन्न पक्षों पर विवेचना की जा सकती है – केवल उसे पहचानने तथा विद्यार्थियों को उचित समय पर तथा उचित विधि से इंगित करने की आवश्यकता होती है । यदि वह नहीं है या काम है तो अध्यापक कैसे तथा किन स्रोतों से उसे ढूंढ़ सकता है तथा शिक्षण में शामिल कर सकता है । 
  • Kyon Tanaavgrast Hai Shiksha-Vyavastha
    Jagmohan Singh Rajput
    250 225

    Item Code: #KGP-218

    Availability: In stock


  • Stri Srokaar
    Asha Rani Vhora
    125

    Item Code: #KGP-1343

    Availability: In stock

    ‘और ने जन्म दिया मरदों को, मरदों ने उसे बाजार दिया।’
    यहां बाजार का अर्थ सीमित था यानी वेश्या का कोठा। पर अब बाजार का अर्थ विस्तार पा गया है यानी उपभोक्ता बाजार में स्त्री या स्त्री का बाजार मूल्य। बदले समय में स्त्री अपनी भूमिका तलाशती कहां आ पहुंची है? ‘ग्लैमर’ के इस बाजार में खड़ी आज की स्त्री ने क्या पाया, क्या खोया। इसकी जांच-पड़ताल करनी होगी।
    -इसी पुस्तक से

    स्त्री की छवि हो या भूमिका, बात अधिकार की हो या सरोकार की, या दोनों के सामंजस्य से सफल, गर्वोन्नत जीवन जीने की। स्वतंत्रता कितनी सीमांत कहां? शोषण क्यों, उससे मुक्ति कैसे? स्त्री का सशक्तीकरण कैसे हो? मां के नाते पुरुष को संस्कारित कैसे करें? समाज की नियंता कैसे बनें? नई सदी को दी गई ‘महिला-युग’ की संज्ञा को साकार कैसे करें? आदि आधुनिक स्त्री के जीवन से जुड़े ऐसे ढेरों सवालों के उत्तर तलाशती और तनावमुक्त संतुलित जीवन के गुर सिखाती एक प्रेरक पुस्तक।
  • Shiksha Ki Gatisheelta : Avrodh, Navachar Evam Sambhavnayen
    Jagmohan Singh Rajput
    520 390

    Item Code: #KGP-426

    Availability: In stock

    शिक्षा की गतिशीलता : अवरोध, नवाचार एवं संभावनाएं 
    हमारा समाज शिक्षा से अनेक प्रकार की अपेक्षाएं रखता है, मुख्य रूप से यह की शिक्षा प्रत्येक व्यक्ति के जीवन की गुणवत्ता बढ़ा सकेगी - ऐसी इच्छा प्रत्येक व्यक्ति के मानल में सदा बनती है । आज यह सर्वमान्य है कि शिक्षा को सभी तक पहुंचना है, उसके लिए समाज तथा सरकार दोनों को लगातार प्रयास करना है और 21वीं सदी में कोई भी व्यक्ति शिक्षा के प्रभाव-क्षेत्र बाहर रहकर सामान्य जीवनयापन नहीं कर सकता । अब सामान्य परिवार भी यह समझने लगे हैं की शिक्षा व्यक्ति के मानवीय गुणों व मूल्यों के विकास में सबसे अधिक योगदान कर सकती है । 
    प्रस्तुत पुस्तक में सारे लेख सामान्यजन को ध्यान में रखकर लिखे गए हैं । ये लेखन के सरे देश में शिक्षाविदों से लेकर अध्यापकों, पालकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा बच्चों के साथ लगातार जारी रहे संवाद के आधार पर लिखे गए हैं । यह प्रयास लगातार रहा है कि शिक्षा में रुचि लेने वाला प्रत्येक व्यक्ति उन्हें पढ़कर चिन्तन-मनन कर सके और अपना विचार परिपक्व कर सके । 
  • Shiksha Ki Sarthakta
    Jagmohan Singh Rajput
    500 400

    Item Code: #KGP-SKS HB

    Availability: In stock

    प्रस्तुत पुस्तक शिक्षा की सार्थकता में उन सभी पक्षों को सम्मिलित किया गया है जो देश में वर्ष 2015-17 के बीच चर्चित होते रहे। लगभग हर स्तर पर मूल्यों के क्षरण तथा गुणवत्ता के ”ास और संस्थाओं की गिरती साख पर चिंता प्रकट की गई है।
    पुस्तक के विभिन्न लेखों में जिस भी पक्ष या संदर्भ को उठाया गया है, उसमें अध्यापकों, छात्रें तथा प्रशासकों का योगदान अवश्य दिखाई देगा क्योंकि इन्हें अनेक प्रकार की चर्चाओं तथा लेखक के व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर ही लिखा गया है। लेखक के अनेकानेक विद्यार्थी देश के विभिन्न भागों में स्कूलों से लेकर विश्वविद्यालयों तक शिक्षा दे रहे हैं। उनके साथ अनेक बार नई जानकारियाँ मिलती रहती हैं। उन सबके अनुभवों का भी इस पुस्तक के बनाने में विशेष योगदान है।
    अच्छी गुणवत्ता, कौशल तथा मानव-मूल्य देने वाली शिक्षा से अधिक प्रभावशाली अन्य कोई मार्ग मनुष्य को उपलब्ध नहीं है जो शांति, सद्भाव, समेकित विकास और प्रगति के रास्ते सभी के लिए खोल सके। अपेक्षा है कि सामान्य भाषा में परिचित संदर्भों को उठाने वाली यह पुस्तक शिक्षा जगत् में और गहन मनन और चिंतन को बढ़ाएगी और इस प्रकार शिक्षा की उपयोगिता बढ़ाने में अपना योगदान भी करेगी।



  • Shiksha : Lakshya Aur Siddhant
    Jagat Ram Arya
    60 54

    Item Code: #KGP-9128

    Availability: In stock

    भारत की आजादी के लिए लाखों लोग शहीद हुए। उनके मन में यही तमन्ना थी कि अपना राज्य आएगा और हम अपने ढंग से देश में शिक्षा-नीति का निर्धारण करेंगे, बाल एवं युवा शक्ति में चरित्र-निर्माण द्वारा नई जागृति पैदा करेंगे, राष्ट्रभाषा हिंदी को पूरा प्रोत्साहन देंगे और वैज्ञानिक एवं तकनीकी क्षेत्रों में हिंदी भाषा को लागू किया जाएगा ताकि हम अपनी ही राष्ट्रभाषा में इसे तैयार कर सकें। आजादी के लिए शहीद हुए लोगों के दिलों में तड़प भी कि हम अमीरी-गरीबी के भेदभाव को मिटाकर समान विद्यालय पद्धति को अपनाएंगे। सभी वर्गों के लोगों के लिए शिक्षा के समान अवसर दिए जाएंगे। हम अपनी धरोहर संपत्ति ‘वेदों’ से नए-नए आविष्कार करेंगे जैसाकि विदेशों में जर्मनी, इटली, फ्रांस इत्यादि देशों ने संस्कृत में लिखे वेदों में से कई खोजें कीं। जर्मनी, फ्रांस, चीन और जापान ने अपनी ही भाषा में विज्ञान एवं तकनीकी क्षेत्रा में उन्नति की है तो हम भी अपनी भाषा हिंदी में ही इस शिक्षा को अनिवार्य बनाएंगे और अपनी ही भाषा में वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली तैयार करके प्रत्येक क्षेत्र में अपनी ही भाषा द्वारा उन्नति करेंगे। लेकिन वर्तमान में ऐसा नहीं हुआ। शिक्षा के क्षेत्र में भविष्य के लिए हमारे पास न कोई ठोस लक्ष्य है और न कोई सिद्धांत है।
    प्रस्तुत पुस्तक में सरल व रुचिकर शैली में इन्हीं समकालीन समस्याओं का खुलासा तथा विश्लेषण किया गया है।
  • Shiksha Evam Itihas : Parivartan Ki Chunotiyan
    Jagmohan Singh Rajput
    250 225

    Item Code: #KGP-762

    Availability: In stock

    शिक्षा एवं इतिहास : परिवर्तन की चुनौतियाँ 
    प्रगति और विकास बीसवीं सदी में उपनिवेशवाद दस चंगुल  से मुक्त हुए देशों की राष्ट्रीय नीतियों के आवश्यक अंग बने । जनमानस ने इनमें जीवन की गुणवत्ता सुधारने के सुनहरे सपने देखे । बीसवीं शताब्दी में विश्वस्तर पर यह पहली बार सर्वमान्य हुआ कि शिक्षा सभी का मूलभूत मानवीय अधिकार  है तथा शिक्षा की व्यापकता तथा सर्वसुलभता ही मानव को प्रगति तथा विकास के मार्ग पर चलने के लिए तैयार कर सकती है । वस्तुतः शिक्षा ही उस मार्ग का निर्धारण करने में सर्वाधिक सहायता करती है । ये लक्ष्य शिक्षा द्वारा प्राप्त किया जाना तभी संभव हो सकता है जब शिक्षा स्वयं को सतत परिवर्तनशीलता तथा प्रगतिशीलता की लय में ढाल ले । साथ ही शिक्षा अपने पूर्ण परिवेश में समाज तथा राष्ट्र की संभावनाओं, अपेक्षाओं तथा आकांक्षाओं में लगातार हो रहे परिवर्तनों का समावेश करते हुए व्यक्ति के बहुमुखी विकास में सहायक होने में सक्षम बन सके । 
Scroll