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novel

  • grid
  • Dwidhaa
    Bhairppa
    575 460

    Item Code: #KGP-646

    Availability: In stock

    कन्नड़ भाषा के यशस्वी उपन्यासकार भैरप्पा की रचनाएं पाठकों के मन में एक विशेष स्थान बना चुकी हैं। उनके उपन्यास कथानक की दृष्टि से उल्लेखनीय होते हैं। वे सामाजिक संदर्भों से प्रेरित हों अथवा प्राचीन प्रसंगों को पुनः परिभाषित करते हों—अपने पाठकों को भाव व विचार की एक नई दुनिया में ले जाते हैं। भैरप्पा का नया उपन्यास ‘द्विधा’ को पढ़कर कुछ इसी प्रकार की अनुभूति होती है।
    प्रस्तुत उपन्यास स्त्री-पुरुष के मध्य मौजूद प्रश्नों व प्रसंगों से उद्वेलित है। देह, प्रेम, सहवास, गर्भ, गर्भपात, अधिकार, पत्नी, प्रेमिका, रखैल आदि जाने कितने ऐसे प्रश्न जिनको अनेक बार भिन्न-भिन्न तरीकों से कथा-साहित्य में प्रस्तुत किया जा चुका है। ...किंतु जिस सामाजिक धरातल पर भैरप्पा ने इन्हें ‘द्विधा’ में विस्तार दिया है वह अनूठा है। शारीरिक संपर्क और स्त्री-पुरुष प्रेम के विषय में उपन्यास का एक पात्र कहता है, 
    ‘...जिन्होंने शारीरिक संबंध की मृदुता का अनुभव किया हो, वे शारीरिक संबंध को तजकर, केवल मानसिक रूप से स्नेह-संबंध बनाए रखने का प्रयत्न करेंगे, तब भी स्नेह शुष्क हो जाता है।’ उपन्यास में ऐसे उन्मुक्त विवरण एक नई बहस छेड़ते हैं।
    यह उपन्यास ‘स्त्री मुक्ति’ की जटिल व सूक्ष्म व्याख्याओं में भी ले जाता है। क्या ‘स्त्री मुक्ति’ के आधार पर प्राप्त अधिकारों का दुरुपयोग नहीं होता, क्या इससे परिवार नाम की संस्था को कोई खतरा नहीं प्रतीत होता; ऐसे बहुत से ज्वलंत मुद्दे हैं जिनको भैरप्पा ने उपन्यास में शामिल किया है। मानवीय दुर्बलताओं और उनसे उत्पन्न संकटों/विसंगतियों/दुष्परिणामों को भलीभांति चित्रित किया है। कथानक विस्तृत है। लेखक ने विभिन्न चरित्रों के द्वारा समकालीन समाज की प्रवृत्तियों को रेखांकित किया है। समग्रतः एक ऐसा उपन्यास जो हमारे समय की सच्चाइयों व समस्याओं का आईना है।
  • Gulloo Aur Ek Satrangi : 1
    Shrinivas Vats
    240 216

    Item Code: #KGP-307

    Availability: In stock

    गुल्लू कर्णपुर गांव के किसान विजयपाल का बेटा है। उसका असली नाम गुलशन है, पर सब उसे प्यार से ‘गुल्लू’ ही कहते हैं। उसकी उम्र है लगभग बारह साल। उसकी एक छोटी बहन है राधा। उसकी उम्र आठ साल है। परंतु वह स्कूल नहीं जाती। कारण, उनके गांव में कोई स्कूल नहीं है। उनकी मां को मरे आठ साल हो गए। राधा को जन्म देने के बाद मां चल बसी थी।
    गुल्लू की मां की मृत्यु के बाद उनके पिता ने पास के गांव की सविता नामक एक महिला से पुनः विवाह कर लिया। सौतेली मां घर में आई तो गुल्लू खुश था। उसे भरोसा था कि उसे और उसकी छोटी बहन को मां का प्यार मिल जाएगा। पर सौतेली मां बहुत कठोर स्वभाव की थी। शुरू में कुछ दिन तो ठीक रहा, पर बाद में उसने बच्चों को पीटना शुरू कर दिया। बात-बात में भला-बुरा कहती। यद्यपि किसान के सामने वह लाड़-प्यार का नाटक करती, पर उसके खेत में जाते ही वह बच्चों को डांटना शुरू कर देती।

    -इसी पुस्तक से
  • Head Office Ke Girgit
    Arvind Tiwari
    300 255

    Item Code: #KGP-463

    Availability: In stock

    हेड ऑफिस के गिरगिट' वरिष्ठ व्यंग्यकार अरविन्द तिवारी का नया व्यंग्य उपन्यास है। उल्लेखनीय है कि इसकी पांडुलिपि पर उन्हें वर्ष 2014 का 'आर्य स्मृति साहित्य सम्मान प्राप्त हुआ है।

    यह उपन्यास शिक्षा, समाज और राजनीति के साथ व्यवस्था की संधियों-दुरभिसंधियों का आंतरिक यथार्थ उजागर करता है। भारतीय लोकतंत्र के विकास का एक बड़ा दायित्व शिक्षा व्यवस्था पर है। शिक्षा व्यवस्था जाने कैसे-कैसे निहितार्थों का भार वहन कर रही है। स्मरणीय है, वर्षों पहले कालजयी उपन्यास 'राग दरबारी' में श्रीलाल शुक्ल ने शिक्षा व्यवस्था पर बेहद तीखी टिप्पणी की थी। शिक्षा के सरोकारों या राष्ट्रीय उद्देश्यों को थोड़ी देर के लिए भूल भी जाएं तो भी प्रक्रिया, परिणाम व प्रभाव पर समयानुसार सवाल उठते रहे हैं। ऐसे ही बहुतेरे सवालों से मुठभेड़ करते हुए अरविन्द तिवारी ने यह महत्त्वपूर्ण उपन्यास लिखा है।

    शहर से आठ किलोमीटर दूर बियाबान में स्थित शिक्षा विभाग के एक आला दफ्तर' को केंद्र में रखकर लेखक ने कर्मचारियों की गतिविधियों का ‘एक्स-रे' किया है। लेखक के अनुसार, 'हेड ऑफिस की यह विशेषता है कि फील्ड में नाकारा साबित हुआ अधिकारी हेड ऑफिस में ड्यूटी ज्वाइन करते ही सबसे सक्षम अधिकारी बन जाता है।' अनेकानेक चरित्रों, घटनाओं, स्थितियों, मन:स्थितियों व विचारों को 'व्यंग्य विदग्ध' भाषा-शैली में उपस्थित करता 'हेड ऑफिस के गिरगिट' पाठकीय चेतना को प्रमुदित-आंदोलित करता है। प्रारंभ से अंत तक प्रफुल्लित भाषा में लिखी यह रचना हिंदी के व्यंग्य उपन्यासों में एक सुखद वृद्धि करती है।

    कथा, कौतूहल और कौतुक का सहमेल व्यंग्य उपन्यास की सबसे बड़ी कसौटी है। कहना न होगा कि यह उपन्यास इस कठिन कसौटी पर खरा उतरता है। अत्यंत पठनीय और संग्रहणीय कृति।


  • Ve Devta Mar Gaye
    Mika Valtari
    250 225

    Item Code: #KGP-2102

    Availability: In stock

    वे देवता मर गये

    ०  विश्व साहित्य में अत्यन्त लोकप्रिय ऐतिहासिक उपन्यास ।

    ०  तीन हजार वर्ष पूर्व मिस्त्र के फ़राउन-साम्राज्य के अपार वैभव और विलास की धधकती हुई तस्वीर 

    ० महलों के षडयंत्रों और भीषण युद्धों की जीवन्त झाँकी ।

    ०  गरीबों और दासों पर अमानवीय जुल्मों और उनके आंसुओं से लिखी गई एक करुण कहानी ।

    ०  और नि:सन्देह ही एक समृद्ध, शक्तिशाली और शानदार ऐतिहासिक उपन्यास, इतिहास की प्रामाणिकता के साथ रोमांच और रोचकता से  भरपृऱ ।
  • Tan Man
    Shivram Karant
    100 90

    Item Code: #KGP-2086

    Availability: In stock

    भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता शिवराम कारंत का अत्यन्त लोकप्रिय उपन्यास 'तन मन' कन्नड़ साहित्य की अनुपम कृति है ।
    चिरन्तन काल से विवाहेतर स्त्री-पुरुष सम्बन्ध विषयक प्रवृत्ति ने 'विश्व के सबसे पुराने पेशे' को जन्म दिया । यह पेशा आज भी जीवित है । पुरुष ने नारी को शब्दों में जितने सम्मान का नाटक रचा है, अपनी प्रवृति से उसे निरीह और भोग्य ही रखा है । कल की देवदासी और आज की मॉडल या सुन्दरियों का चुनाव क्या है ? इसी जीवन्त समस्या को लेखक ने काफी गहरे उतरकर अपने अनुपम शिल्प में बाँधा है । इसमें एक ही प्रधन-स्वर बार- बार ध्वनित होता है—आखिर यह कबतक, आखिर यह कब तक...?
  • Gai Jhulani Toot
    Usha Kiran Khan
    270 243

    Item Code: #KGP-9364

    Availability: In stock

    उषाकिरण खान हिंदी की ऐसी रचनाकार हैं जिन्हें असंख्य पाठकों का साथ मिला है। वे चालू फैशन की ओर या प्रायोजित विमर्श की ओर कभी नहीं जातीं। उनके  पास बेशुमार कहानियां हैं जो पाठकों को व्यापक संवेदना से जोड़ती हैं।
    उषाकिरण खान का यह नया उपन्यास गई झुलनी टूट उनकी प्रसिद्धि को एक कदम आगे लेकर जाता है। इसमें उन्होंने एक सीधा-सादा मगर मार्मिक सवाल उठाया है, 
    ‘...जीवन केवल संग-साथ नहीं है। संग-साथ है तो वंचना क्यों है?’ इस रचना में उन्होंने सामान्य भारतीय परिवेश में एक स्त्री की जीवन-दशा का मार्मिक चित्रण किया है। वे अपने अनुभवों का इतना विस्तार करती हैं जैसे पूरा उपन्यास उनके आसपास जीवित किसी पात्र की दास्तान है। वे धरती की ध्वनियों को सुनती हैं और जीवन की जय-पराजय महसूस करती हैं।
    अथाह संघर्षों के बीच भी उषाकिरण खान जिजीविषा का संदेश देती हैं, ‘किसी एक व्यक्ति के सुख से न तो खेतों में हरियाली छा जाती है, न उसके दुःख के ताप से खेत, नदियां, तालाब सूख जाते हैं। जब मन में पीड़ा का आलोड़न हिलोरें लेने लगता है तब भी चेहरे पर मुस्कान रखना पड़ता है सामने की पौध के लिए।’
    लोकजुड़ाव उषाकिरण खान की शक्ति है। यह उपन्यास सिद्ध करता है कि वे मैथिली और हिंदी की अद्वितीय कथाकार हैं। ऐसी कथाकार जिन्होंने नारी मन को पहचाना है और बिना स्त्री-विमर्श के कुलीन झंझट में पड़े उसके मन की सच्चाइयों को व्यक्त किया है। इसमें विशेषता यह है कि उपन्यास जीवन की सहजता को कहीं से खंडित नहीं करता और न ही यह लगता है कि अमुक कथा प्रसंग या पात्र गढ़कर पेश किया गया है। प्रस्तुत उपन्यास ‘भारतीय उपन्यास’ का एक प्रतिनिधि रूप है। इसमें जीवन-जगत् की अनुपम अनुगूंज है।
  • Safed Chaadar
    Jiyalal Arya
    125 113

    Item Code: #KGP-1994

    Availability: In stock

    सफेद चादर
    बहुपथीन प्रतिभा के धनी श्री जियालाल आर्य की  यह कथाकृति 'सफद चादर' अनेक संदर्भों में उपन्यास-जगत् की एक अनूठी उपलब्धि है ।
    इस उपन्यास में समष्टि-हित की व्यापक दृष्टि से संपन्न एक ऐसी सशक्त और सतत संघर्षशील ग्रामीण नारी की कथा है, जो नारी-मुक्ति की संभावनाओं को सहज सम्भाव्य बनाती है । घोर कायिक और मानसिक उत्पीड़न तथा अत्याचार के बावजूद श्री आर्य की नायिका की महती मानवीय संवेदना और सामाजिक संचेतना किंचित् काले नहीं होती, अपितु भांति-भांति की कुंरीतियों-कुत्साओं के विषदंश से विमूच्छित मनुष्यता को मर्मन्तुद जर्जरता को उन्मूलित करने का उसका उत्साह उत्तरोत्तर अदम्यतर होता जाता है । मानवता के प्रति उपन्यासकार की यह मांगलिक निष्ठा इस उपन्यास को एक श्रेष्ट कृति की कोटि में प्रतिष्ठित करती है ।
    प्रज्ञापटु कथाशिल्पी श्री जियालाल आर्य के इस उपन्यास में पाठकों को बाँध लेने की अदभुत क्षमता है । अपनी हर अगली पंक्ति के लिए पाठकों का औत्सुक्य अक्षुष्ण रखने की कला में कथाकोविद श्री आर्य को पूर्ण प्रवीणता प्राप्त है । जिसके साथ में यह उपन्यास जाएगा, वह इसे अथ से इति तक पढे बिना नहीं ही छोड़ेगा, यह मेरा अनुभूत अभिमत है ।
    -डॉ० कुणाल कुमार
  • Shesh Ant Mein
    Ashwani Kumar Dubey
    275 248

    Item Code: #KGP-2019

    Availability: In stock

    शेष अंत में
    'शेष अंत में' सामाजिक पूष्ट्रभूमि पर आधारित एक यथार्थवादी पारिवारिक उपन्यास है । सन् '42 के 'भारत छोडों’ अन्दोलन से लेकर बीसवीं सदी के अंत तक के समय को शिद्दत के साथ  पकड़ने और उसको जीवंत चित्रण की कोशिश इस उपन्यास में  हम पाते हैं  । बीजापुर गांव के एक संयुक्त परिवार की कथा के माध्यम से  मध्यवर्गीय जीवन के सरोकारों, आदर्शों, विडंबनाओं और परिणतियों से हमारा साक्षात्कार होता है । समकालीन उपन्यास लिखने के दौर में जहाँ एक ओर निम्नवर्गीय जीवन और उसकी आकांक्षाओं पर खूब लिखा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर उच्चवर्गीय जीवन के मृत्युबोद्य, काल्पनिक चिंतन और वायवीय क्षणों पर । इसके विपरीत यह उपन्यास इस अर्थ में विशिष्ट है कि मध्यवर्गीय जीवन को उसकी संपूर्ण विशेषताओं एवं असंगतियों के साथ चित्रित करता है । उपन्यास को पढ़ते हुए संयुक्त परिवार की इस विलक्षणता से हम रू-ब-रू होते है, जहाँ घर में छोटे-छोटे सुख भी बड़े लगते हैं और बड़े दुख भी राई जितने छोटे । संयुक्त परिवार के विघटन के बाद नई परेशानियों और स्थितियों का विस्तार हम इस उपन्यास में पाते  जहाँ सन् '42 से 2000 तक के समय और संयुक्त परिवार से अकेले होते परिवार की त्रासदी प्रश्न  बनकर उभरती है कि शताब्दी के अंत तक पहुंचते-पहुँचते हमने क्या पाया, क्या खोया ? 
    बीजापुर गांव के बब्बा जी के चार बेटों में संयुक्त परिवार के कपहैंधार बने गिरधर, उसके अन्य छोटे भाई मदन, श्याम और राधे के साथ गिरधर की पत्नी और भवहों (छोटे भाई की पत्नियां) के चरित्र विश्वसनीय रूप में उभरकर सामन जाते है, लेकिन सथा-नायक गिरधर और उसकी पत्नी के चरित्रांकन में अश्विनीकुमार दुबे को विशेष सफलता हाथ लगी हे। वे इस उपन्यास के यादगार चरित्र बन गए हैं । आर्थिक महत्वाकांक्षाओं और समय की राजनीतिक उथल-पुथल को यह उपन्यास अधिक कारगर ढंग से प्रस्तुत करता है । विकास के नाम पर अंधी दौड़  में टूटते और मिटते भारतीय जीवन-मूल्य हमें सोचने के लिए बाध्य करते  हैं ।
    उपन्यास की रोचक पाठकीयता, घटनाओं की विश्वसनीयता और भाषा की रवानगी से निर्मित हुई है । भाषा की जीवंतता और सजगता उल्लेखनीय है । आंचलिक शब्दों के स्थानीय स्पर्श  में गहराइयां हैं । लेखकीय संवेदना ने इसे एक यादगार उपन्यास बनाया है । -मिथिलेश्वर
  • Vrinda
    Shanta Kumar
    250 225

    Item Code: #KGP-91

    Availability: In stock

    वृन्दा
    "मैं वृन्दा के बिना अपने होने की कल्पना भी नहीं करता । अब कैसे जिऊँगा और क्यों जिऊँगा ? अब मुझे भी कोई रोक नहीं सकता---पर हाँ वृन्दा, जाने से पहले तुमसे एक बात पूछना चाहता हूँ--काना चाहता हूँ... "  शास्त्री जी कुछ संभलकर खडे हो गए ।
    सब उत्सुकता से उनकी और देखने लगे ।
    वृन्दा की ओर देखकर शास्त्री जी बोले--“मुझे जीवन के अंतिम क्षण तक एक दु:ख कचोटता रहेगा कि तुमने 'गीता' पढी तो सही, पर केवल शब्द ही पढे तुम 'गीता' को जीवन में जी न सकी । तुम हमेँ छोड़कर जा रही हो, यह आघात तो है ही; पर उससे भी बड़ा आघात मेरे लिए यह है कि मेरी वृन्दा 'गीता' पढ़ने का ढ़ोंग करती रही । जब युद्ध का सामना हुआ तो टिक न सकी । मुझें दु:ख है कि तुमने 'गीता' पढ़कर भी न पढी। वृन्दा ! 'गीता' सुनकर तो अर्जुन ने गांडीव उठा लिया था और तुम हमें छोड़कर, उस विद्यालय के उन नन्हे-मुन्ने बच्चों को छोड़कर यों भाग रहीं हो मुझे तुम पर इतना प्रबल विश्वास था ।  आज सारा चकनाचूर हो गया । ठीक है, तुम जाओ... जहाँ भी रहो, सुखी रहो...  सोच लूँगा, एक सपना था जो टूट गया ।"

    (इसी उपन्यास से)
  • Hum Yahan The
    Madhu Kankria
    590 472

    Item Code: #KGP-9351

    Availability: In stock

    ‘जंगल कुमार! सफलता-असफलता कुछ नहीं होती। असली चीज होती है आपके जीवन का ताप कितनों तक पहुंचा। जीवन का अर्थ है अपने पीछे कुछ निशान छोड़ जाना।’ दीपशिखा वेफ ये वाक्य मधु कांकरिया के नवीनतम उपन्यास हम यहां थे की सैद्धांतिकी है। इस उपन्यास के दो केंद्रीय चरित्रा हैं–दीपशिखा और जंगल कुमार। दोनों अलग-अलग पृष्ठभूमि और अलग-अलग शहर से आए–लेकिन लक्ष्य की समानता उनको जीवन पथ पर अभिन्न बना देती है।
    ‘हम यहां थे’ जीवन में व्याप्त करुणा, प्रतिरोध, संघर्ष, स्वप्न, संकल्प और समर्पण का अनुसंधन है। किसी ने कहा था कि लक्ष्यहीन जीवन भ्रष्ट और दयनीय होता है। यह जीवन सत्य धीरे-धीरे उपन्यास की नायिका या केंद्रीय अस्मिता दीपशिखा के भीतर आकार लेता है। इसको वृत्तांत का रूप देने के लिए मधु कांकरिया ने डायरी का शिल्प अपनाया है। ‘दीपशिखा की डायरी: अपने अपने जंगल’ से ‘ओ जिंदगी! ओ प्राण!’ जैसे कई उपशीर्षकों में दीपशिखा के बहाने एक सामान्य स्त्री के भीषण संघर्ष और कोलकाता की सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक स्थितियों का वर्णन किया गया है। ‘उत्तराधर’ में जंगल कुमार के पक्ष से दीपशिखा के वृत्तांत को संपूर्ण किया गया है। अर्थात् आदिवासियों के बीच जाकर उनके संघर्ष में सहभागी बनकर दीपशिखा ‘कैदी नंबर 989’ बन गई। मधु कांकरिया ने अद्भुत ढंग से आदिवासी अस्मिता और संघर्ष को शब्द दिए हैं। प्रकृति और प्रकृतिसंतानों के साथ व्यवस्था और बाजार के सुलूक हृदय को विचलित कर देते हैं। जंगलों की अंधधुंध कटाई और जंगली जानवरों को बेघर होते देख जिस खतरे की ओर वे इशारा करती हैं उसकी अनदेखी कर भविष्य की ओर देखना संभव नहीं है। मानव मन के गहरे स्तरों को छूती यह कहानी जीवन के दर्द और सौंदर्य, प्रेम और उदासी को अद्भुत ढंग से रचती है। पूरे उपन्यास में भाषा के अनेक रचाव हैं, लेकिन जब दीपशिखा और जंगल कुमार का साहचर्य आता है तब भाषा सचमुच सहृदय हो उठती है।
    ‘हम यहां थे’ एक ऐसा उपन्यास है जो जीवन के कठोर सत्य को वर्तमान के तीखे प्रकाश में परिभाषित करता है।
  • Mori Ki Int
    Madan Dikshit
    150 135

    Item Code: #KGP-9073

    Availability: In stock


  • Jaane-Anjaane Dukh
    Ashwani Kumar Dubey
    330 297

    Item Code: #KGP-484

    Availability: In stock

    अश्विनीकुमार दुबे का उपन्यास ‘जाने-अनजाने दुःख’ एक मध्यवर्गीय परिवार के मुख्य चरित्र जगदीश प्रसाद तथा उनके परिवार की अंतर्कथा  है। एक निम्न मध्यवर्गीय डाक कर्मचारी एवं कृषक के पुत्र जगदीश प्रसाद के जन्म, शिक्षा, शादी-ब्याह, काॅलेज शिक्षक से वाइस चांसलर बनने, इस बीच पुत्र-पुत्रियों के जन्म, उनके शादी-ब्याह और विकास के दौरान 70 वर्ष की अवस्था में उनके सेवानिवृत्त होकर अपने पुश्तैनी गांव पहुंचने की कथा को पूरी विश्वसनीयता एवं सशक्तता के साथ अश्विनीकुमार दुबे ने प्रस्तुत किया है।
    इस उपन्यास के माध्यम से अश्विनीकुमार दुबे ने जगदीश प्रसाद और उनकी पत्नी सुमन के चरित्र को आमने-सामने रखते हुए सुख-दुःख के प्रति उनकी अनुभूतियों की कलात्मक अभिव्यंजना की है।
    इस उपन्यास में अश्विनीकुमार दुबे की भाषा की पठनीयता और किस्सागोई ने इसे महत्त्वपूर्ण बनाया है। विश्वास है, हिंदी जगत् में इसका स्वागत होगा।
  • Ek Asamapta Katha
    Rama Singh
    200 180

    Item Code: #KGP-447

    Availability: In stock

    उपन्यास लिखते हुए कभी-कभी लगता था जैसे पात्रों के साथ मैं भी उन बीहड़ों में भटक रही हूं। कई एक सवाल थे जो मुझे कोंचते रहे। सबसे बड़ा सवाल कि ये विचारधारा मेरी समझ से परे लगी, जहां एक ओर गरीबों, बेसहारा और दलितों की आवाज बनकर नक्सली आंदोलन अस्तित्व में आया, वहीं निर्दोष अमीरों के खून से ही नहीं, गरीबों के खून से भी जमीन लाल होती रही। तभी कानू सान्याल नक्सल आंदोलन के जन्मदाता के निधन से एक बहुत बड़ा जन-समुदाय शोक-संतप्त था। उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए उमड़ी भीड़ को पढ़कर, सुनकर, देखकर मैं चकित रह गई। उन शोक-संतप्त लोगों की भीड़ को मैं पहचानना चाह रही थी...कानू सान्याल ने इनके लिए क्या किया था? क्या बीज-मंत्रा दिया था कि आज भी उनकी सोच में, उनके आचार-विचार में वह सब ध्वनित होता दिख रहा है।
    कुछ तो नक्सली आंदोलन में ऐसा रहा होगा कि आज भी उस लहर का असर खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। मेरे खयाल में अभावों की पराकाष्ठा, दूभर होती दिनचर्या के आक्रोश की आवाज एक ही होती है। वह कुछ कर गुजरने के आगे के औचित्य नहीं देखती है। ऐसे लोगों को कानू सान्याल या फिर चारु मजुमदार ने क्रांति का जो बीज-मंत्रा दिया होगा, वह उनकी दुखती रग पर हाथ रखने जैसा ही रहा होगा और राहत की उसी धुन में वे आगे बढ़ते गए। फिर तो बीहड़ों से वापस आना कहां संभव हो पाता है? मुझे मेरे सवाल का जवाब मिल गया था।
    -लेखिका
  • Heeraman High School
    Kusum Kumar
    500 450

    Item Code: #KGP-577

    Availability: In stock


  • Kaali Dhar
    Mahesh Katare
    550 413

    Item Code: #KGP-KALI DHAR HB

    Availability: In stock

    जमादारिन की हवेली बीसियों साल से बंद थी। साल में एकाध बार उनका बेटा आगरा से आता। विशेषतः दीपावली से पहले आकर वह दो-चार दिन ठहरता। कलई-चूने से मंदिर की पुताई-सफाई करवाता और लौट जाता। अटारी आकर वह सेठ की हवेली में ही ठहरता। सेठ के लड़केपोते उससे छुआछूत वाला व्यवहार नहीं करते थे। अगली पीढ़ी को हवेली की आवश्यकता न थी। इस बीहड़ में कौन बसतातालों की चाबियाँ सेठ परिवार के पास थीं। हवेली में एक छोटा सा द्वार पीछे बीहड़ों की ओर भी खुलता थाजिसमें से होकर बागियों के गिरोह हफ्रतों हवेली में पड़े रहते और चौमासे अर्थात् बरसात में तो महीनों। सबको पता था। पुलिस की गश्त भी यदा-कदा सामने के द्वार पर जड़े ताले को देखती हुई निकल जाती थी। गिनती का पुलिस-दल डाकुओं से टकराने का खतरा कैसे उठाएबागी भी सामान्यजन को परेशान नहीं करते थे। उनके निशाने पर तो दुश्मनधनवान अथवा मुखबिर आता था। रसद लाने वाले को पूरा पैसा चुकाते थे बागी।

    लाला जी ने सेठ श्रीलाल के वंशजों से संपर्क किया। जमादारिन के पुत्र से अनुमति ली तो ठाकुर ने दाऊ मानसिंह को समस्या का पहलू समझाया। मानसिंह का गिरोह ही उस समय सबसे प्रभावशाली था। वह कड़ाई से बागी-धर्म के नैतिक नियमों का पालन करते थे। कुल मिलाकर आठ दिन में ऊपरी औपचारिकता पूरी हो गई एवं आठ दिन सफाई आदि के जरिये हवेली को बसने योग्य बनाने में लगे। इस तरह अम्मा ठाकुर जमादारिन की हवेली में रहवासी हो गईं। नवाब ठाकुर की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए लाला भभूती लाल ने कुछ विशेष व्यवस्था भी कर दी। 

    -इसी उपन्यास से। 

  • Dohra Abhishaap
    Kaushlya Baisntari
    220 198

    Item Code: #KGP-2011

    Availability: In stock

    दोहरा अभिशाप
    दलित साहित्य के आम उपन्यासों की तरह बैसंत्री का यह उपन्यास भी आत्मकथात्मक है; लेकिन कई अन्य बातों में यह आम दलित साहित्य के उपन्यासों से भिन्न है । यह उपन्यास लेखिका के लंबे, संघर्षपूर्ण, कड़वे-मीठे अनुभवों से भरे जीवन के एक सिंहावलोकन के रूप में लिखा गया है अत: यह आत्मरति या आत्मपीड़न से उत्पन उन स्तब्धकारी प्रभावों से मुक्त है जो आम तौर पर दलित साहित्य की रचनाओं में पाए जाने हैं । इसमें ऐसे प्रसंग नहीं है कि पाठक क्रोध, घृणा और जुगुप्सा के भावों से भर जाए या दाँतों तले अंगुली दबाकर रह जाए । यह एक सीधी-सादी जीवन-कथा है जो हर प्रकार के साहित्यिक छलों से मुक्त है ।
    आत्मकथात्मक उपन्यासों (और आत्मकथाओँ में भी) में लेखक की प्रवृत्ति अपने अनुभवों को अनन्य बनाने को होती है अर्थात जो हमने भोगा और सहा है वह किसी और ने भोगा या सहा नहीं होगा । यह प्रवृत्ति उसे जीवन को एकांगी दृष्टि से लेने को विवश करती है और इसके साथ ही उस रचना में भी एकांगीपन और एकरसता आ जाती है । दलिन साहित्य में यह प्राय: देखने को मिलता है । इसका औचित्य सिद्ध करने के लिए यह तर्क दिया जा सकता है कि दलितों के जीवन में पीडा, घुटन और अपमान के सिवा और है क्या? लेकिन अगर इसके सिवा और कुछ नहीं होता तो आदमी
    जीता क्यों और कैसे है ? घोर-से-घोर  परिस्थितियों में भी आदमी अपने लिए एक सुरक्षित नीड़ का निर्माण का लेता है । आदमी ही क्यों, पशु-पक्षी भी अपने लिए नीड़ का निर्माण करते है जहाँ वे आस-पास के तमाम खतरों, दुखों और परेशानियों से मुक्ति का अहसास प्राप्त करते हैं । इस पीड़ का निर्माण वे प्रेम से कस्ते हैं—बच्चों का प्रेम, माता-पिता का प्रेम, मित्रों और परिवारजनों का प्रेम, अनजान व्यक्तियों का प्रेम और कुल मिलाकर जिंदगी से प्रेम । इस प्रेम के बिना कोई जी नहीं सकता । यह जिंदगी का कारण भी है और उसकी सार्थकता भी । यह मृत्यु से लड़ने और उस पर विजय प्राप्त करने की शक्ति आदमी को देता हैं । कोई भी जीवन प्रेम के बिना नहीं हो सकता, भले ही जीवन को स्थितियां कितनी ही विकट हों । इसलिए यह कहना कि दलितों के जीवन में और होता ही क्या है, इकतरफा और जल्दबाजी का वक्तव्य है ।
    कौसल्या बैसंत्री के इस उपन्यास में दलित जीवन का एक सम्यक् और सर्वागपूर्ण चित्र  प्रस्तुत किया गया है । इसमें पारिवारिक प्रेम, विशेषकर बच्चों के लिए माँ के संघर्ष का जो खूबसूरत चित्र है, वह इस उपन्यास को दलित साहित्य में विशिष्टता प्रदान करता है । छोटी-छोटी बातें, छोटे-छोटे सरोकार जिजीविषा के रस से सिंचित होकर जीवन में तथा उपन्यास में भी कितने महत्त्वपूर्ण हो जाते है यह बोध पाठक को यह उपन्यास पढ़ने के बाद हो सकता है ।
  • Toro Kara Toro-3 (Parivrajak)
    Narendra Kohli
    500 425

    Item Code: #Kgp-1575

    Availability: In stock


  • Sampurna Upnanayas : Himanshu Joshi ( 2Vols.)
    Himanshu Joshi
    2100 1365

    Item Code: #KGP-SUHJ HB

    Availability: In stock

    संपूर्ण उपन्यास: हिमांशु जोशी का संपादन दो भागों में चर्चित कथाकार और आलोचक महेश दर्पण ने किया है। उन्होंने सन् 1965 में प्रकाशित हिमांशु जोशी के पहले उपन्यास से लेकर सन् 1980 में प्रकाशित तीन लघु उपन्यासों तक की रचनाओं को दो खंडों में विभाजित किया है। पहले खंड में ‘अरण्य’, ‘महासागर’, ‘छाया मत छूना मन’ और ‘कगार की आग’ को एक साथ प्रस्तुत किया गया है। दूसरा खंड पांच उपन्यास लिए है-‘समय साक्षी है’, ‘तुम्हारे लिए’, ‘सुराज’, ‘अंधेरा और’ तथा ‘कांछा’। यह कहना अनिवार्य है कि ‘संपूर्ण उपन्यास: हिमांशु जोशी’ पढ़ते हुए पाठक आजादी के बाद के भारत की धड़कती हुई। तस्वीर से साक्षात्कार कर सकेंगे। 
  • Sant Ravidas Ki Ramkahani
    Devendra Deepak
    250 225

    Item Code: #KGP-732

    Availability: In stock

    'संत रविदास की रामकहानी' कवि देवेन्द्र दीपक की संत  रविदास के जीवन-दर्शन पर अपने किस्म की प्रथम औपन्यासिक रचना है । इसमें सृजन और अध्यात्प चेतना के आस्थाशील आयाम उदघाटित हुए हैं । लेखक ने रविदास के अंतत् से उतरने, उसके चिंतन के मर्म को उकेरने का सफल प्रयास किया है । इसमें संत के मन-आत्म की पारदर्शी निर्मलता तथा हाथ के श्रम के प्रति गहरी आस्था भी व्यक्त  हुई है । अपने समाज के श्रमशील उज्जवल समुदाय को दलित बना दिए जाने की पीडा के साथ भारतीय मूल्यों की पड़ताल करते हुए सामाजिक न्याय, समता, संवेदना की हितैषी स्थापनाएँ भी हुई है ।
    संत रविदास की वाणी से पौराणिक आख्यानों, भक्ति-ज्ञान-कर्म के योग विषयक विचारों, लोक में व्याप्त पारंपरिक इनके रंरा-रूपों को यथावश्यक प्रयुक्त करके देवेन्द्र दीपक ने एक बड़े अभाव की पूर्ति कर बड़ा काम किया है । भारतभूमि पर बहने वाली पुण्य-सलिला नदियों-गंगा, यमुना, सरस्वती को मानव शरीर से कार्यशील-इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना से जोड़कर योग-अध्यात्म को तथा राष्ट्रीयता के चिंतन-दर्शन को पुष्ट किया है ।
    वसुधैव कुटुंबकम के वैश्विक विचार को रविदास की समूची वाणी में लक्षित-रेखांकित कर भारतीय अस्मिता एवं लोक-आस्था के प्रति छीजती निष्ठा को पुनः सृजनात्मक आधार प्रदान किया है तो जात-पांत, ऊँच-नीच के सामाजिक संताप को मन और मनोरथ की स्पंदनशीलता, सुचिता, मानवीयता के समक्ष व्यर्थ एवं अमानवीय सिद्ध किया है । भारतीय समाज में फैले धार्मिक पाखंड को निरस्त करती एवं रविदास के ब्रह्मांड व्यापी राम तथा गुरु रामानंद की देशना को रूपायित करती यह रचना अपने काव्यात्मक ललित गद्य के कारण आकर्ष और पठनीय है ।
  • Uttar Ghaat Adhura
    Ramashankar Shrivastva
    65 59

    Item Code: #KGP-9069

    Availability: In stock


  • Upnivesh
    Narayan Gangopadhyaya
    125 113

    Item Code: #KGP-1942

    Availability: In stock

    उपनिवेश
    नदी-मातृक्र देश बंगाल-पश्चिम और पूर्व की  सीमाओं से मुक्ति-संयुक्त और सम्पूर्ण बंगाल के उस अछूते क्षेत्र विशेष-चर-इस्माइल की एक अदभुत गाथा जिसे पुर्तगाली ज़ल-टस्युओं। में बसाया था, नदी के मुहाने पर, सुन्दर वन से जुडा हुआ ।
    प्रकृति के साथ मनुष्य के संघर्ष की रोमांचपूर्ण जीवन-यात्रा की लोमहर्षक कहानी सभ्य और सहज के मानसिक द्वन्द्व भी वर्गगत संघर्ष का एक अनूठा दस्तावेज विभिन्न नस्लो के विविध चरित्रों को मनोमुग्धकारी मंजुषा आप इस उपन्यास में पायेंगे ।
    द्वितीय महायुद्ध में जमता त्रास और आत्म रक्षा के लिए एकता और संघर्ष भी गुहार की राष्ट्रीय तस्वीर की सजीव रूपरेखा वास्तव ये इस उपन्यास को बंगला उपन्यासों में क्लासिक का दर्जा सही ही प्राप्त है । 
    रहस्य, रोमांच, हास्य, करुणा, प्रेम वासना-क्या कुछ नहीँ है इसमें ।
  • Jakadan
    Mahashweta Devi
    125 113

    Item Code: #KGP-68

    Availability: In stock

    जकड़न
    पुलिस अफसर ने काफी सहनशील ढंग से और सहानुभूति-भरी नजर से एक बार देखा । विनय के साहित्य में पुलिस कितनी क्रूर, कुटिल, निर्मम है, लेकिन अभी उनको पुलिस से कितना सदभावपूर्ण व्यवहार मिल रहा है । हालाँकि बउआ की माँ ने कहा था—तुम लोगों के घर की बात है, इसीलिए इतना कुछ हो पा रहा है बहू जी ! हम लोगों के लिए होता ? कितना कुछ घटा, लेकिन मुए थाने ने सुना कभी? अफसर कहता है, मुझे लगता है इसलिए कह रहा हूँ मैं सरकारी तौर पर नहीं कह रहा हूँ, ऐसा लगता है कि उनमें किसी बात पर झगडा हो रहा होगा, अचानक गुस्से में आकर एक पीतल की ऐशट्रै फेंककर मारी, वह जाकर नस पर लगी, उससे आपकी बेटी बेहोश होकर गिर पडी, उसके बाद... 
    [इसी उपन्यास से]
  • Akshardveep
    Pranav Kumar Bandhopadhyaya
    425 383

    Item Code: #KGP-2013

    Availability: In stock

    अक्षरद्वीप
    अक्षरद्वीप’ आज के मूल्यों के अंतर्गत रामकथा के ‘सुंदरकांड’ का एक पुनर्पाठ है। इस उपन्यास में वैदेही, रावण और महावीर की भूमिकाएँ जिन सीमाओं तक संघातपूर्ण हैं, वे आज के अतिरिक्त अतीत की भी पहचान हैं। यह मनुष्य का निरंतर जारी एक असमाप्य प्रयास है। अगर आज हम ‘अक्षरद्वीप’ की कथाभूमि को कुछ सीमा तक व्याख्यायित कर पाए, कथाकार शायद किसी न किसी तरह पंक्ति-दो पंक्ति तक कुछ आगे निकल गया।
    प्रणव कुमार वंद्योपाध्याय आज के तमाम हिंदी कथाकारों में कहाँ खड़े हैं, कहना कठिन होगा। फिर भी, हम कह सकते हैं कि आज के परिप्रेक्ष्य में लेखक को मनुष्य और समय की पहचान किसी सीमा तक आकर खड़ी हो गई। कल की प्रतीक्षा में। संभवतः किसी न किसी प्रकार की लाग-लपेट के बिना कथाकार अपनी खोज से उस बिंदु तक पहुँच गया, जो है संसार का आदि आख्यान। असमाप्य भी।
    अक्षरद्वीप’ किसी हद तक मनुष्य की एक यात्रा भी है। यात्रा के अतिरिक्त पृथ्वी का एक अनकहा इतिहास भी, जो प्रतिक्षण अपना सब कुछ बदल रहा है।
  • Triya Hath
    Maitreyi Pushpa
    240 216

    Item Code: #KGP-82

    Availability: In stock


  • Hanzaad
    Manohar Shyam Joshi
    75 68

    Item Code: #KGP-9045

    Availability: In stock


  • Sabha Parv
    Badiuzamma
    300 270

    Item Code: #KGP-2040

    Availability: In stock

    सभापर्व 
    जो कहानी महाभारत के 'सभापर्व' से शुरू हुई वह आज भी पूरी नहीं हुई । छोटे-से शहर गया के एक मोहल्ले से शुरू होकर ये उपन्यास इतिहास का सैकडों साल का सफर तय करता है-वह इतिहास जो न चाहते हुए भी हममें जिदा है और हमारे दिले-दिमाग पर हावी है ; वह इतिहास जो बजाहिर तो बदलता है लेकिन दरअसल सिर्फ अपने-आप को दोहराता है । सतह के नीचे सब कुछ वैसा ही रहता है जैसा कि था । धर्म बदले, सिद्धान्त बदले, सत्ता के लिए जद्दोजहद के तरीके बदले लेकिन सत्ता का बुनियादी स्वरूप नही बदला । बनी हाशिम-बनी उमय्या; शीया-सुन्नी, हिन्दू-मुस्लिम, बौद्धधर्म-ब्राह्यणवाद…संघर्ष के मुखोटे बदलते रहते हैं, इंसानी प्रवृत्ति नहीं बदलती । सैकडों साल के सफ़र के दौरान ये उपन्यास समाज के विभिन्न वर्गों का एक जायजा लेता है । घर, कबीले और मुल्क के नक़्शे, और इंसानी ताल्लुकात का बनना- बिगडना न बदलने वाली मानसिकता की पहचान है । यह ऐसी मानसिकता है जिससे हजार साल की नफ़रत, लगाव, तजूर्बात परत-दर-परत जिन्दा हैं ।  इसमें श्रीकृष्ण के कालिय दमन, महात्मा बुद्ध की धर्म विजय और सूफियों के चमत्कार-सब की याद बाकी है । 'सभापर्व' इसी मानसिकता की खोज और पहचान है ।
  • Jigyaasa
    Bhairppa
    250 225

    Item Code: #KGP-214

    Availability: In stock


  • Goonj Uthin Thaliyan
    Dr. Kusum Meghwal
    590 443

    Item Code: #KGP-GUT HB

    Availability: In stock

    मेरी लगभग 60 पुस्तकें प्रकाशित होने के बाद मेरे जीवन का यह पहला उपन्यास है–‘गूँज उठीं थालियाँ’, जो कल्पना पर आधारित नहीं है बल्कि पूरी तरह सत्य घटना पर आधारित है। इतना ही नहीं, इससे जुड़ी हुई अन्य सभी घटनाएँ भी सत्य पर आधारित हैं। केवल पात्रों के नाम, स्थानों के नामों में परिवर्तन अवश्य किया गया है।

    यहाँ यह उल्लेखनीय है कि मेरी हर पुस्तक का जन्म किसी घटना के आधार पर ही हुआ है और यह उपन्यास भी उसका अपवाद नहीं है।

    इस उपन्यास का जन्म जिस घटना के आधार पर हुआ है, उसके पात्र ने तो आसमान की ऊँचाइयों को छू लिया है। उसने पूरी दुनिया को अपनी प्रतिभा का परिचय दे दिया है। वर्षों पूर्व उसे जिदा जमीन में गाड़ देने का फोटो तो मैं नहीं ले पाई, किंतु उसी घटना को पुनः दोहराने वाला फोटो मुझे उपलब्ध हो गया और तब से ही मेरे मस्तिष्क के गर्भ में पल रहे संबंधित विचारों को, उसके चित्रों को कोरे कागज पर उकेरने के लिए मेरी कलम उतावली हो गई तो उस घटना ने इस उपन्यास के रूप में जन्म लेकर अपने पाठकों तक पहुँचने का पक्का इरादा कर लिया।

    कोई भी काम अकारण नहीं होता। उसके करने के पीछे कोई न कोई कारण अवश्य होता है। इस पुरुषप्रधान अन्यायपरक, असमानतापरक समाज व्यवस्था के विरोध का कीड़ा तो मेरे दिमाग में बचपन से ही कुलबुलाने लग गया था, कितु उसे निकालने का काम अब कई वर्षों बाद अर्थात् मेरे जीवन के उत्तरार्द्ध में हो रहा है।

    वैसे तो अपनी खुद की समझ आने के बाद से अर्थात् लगभग पाँच वर्ष की उम्र से लड़की के पैदा होने से लेकर मरने तक के पूरे जीवन में कदम-कदम पर उसके साथ होने वाले भेदभाव, अन्याय, अत्याचार, उसके हर कदम पर लगाए गए प्रतिबंधों को मैंने न केवल पढ़ा और सुना है वरन् स्वयं भोगा भी है और वे सभी कष्ट, पीड़ाएँ एवं दर्द मेरी कहानियों, कविताओं के माध्यम से बह निकले, जिन्होंने हिंदी साहित्य के विशाल समुद्र में अपनी एक अलग पहचान बनाई है।

    यह उपन्यास भी नारी व्यथाओं तथा उसके कष्ट, दर्द, पीड़ाओं को अभिव्यक्ति देता हुआ नारी को क्रांतिकारी मार्ग पर चलने की प्रेरणा देने वाली मेरी कहानियों, कविताओं की श्रृंखला में एक और कड़ी के रूप में जुड़ गया है, जो मेरे पाठकों को मेरी पूर्व की पुस्तकों की तरह ही पसंद आएगा, ऐसी मेरी उम्मीद है।

    वैसे तो लेखक की हर रचना की सफलता-असफलता का निर्णायक पाठक वर्ग ही होता है, कितु अपने पाठक वर्ग की मानसिकता को पहचानते हुए मुझे यह लिखने में भी कोई अतिशयोक्ति नहीं लगती कि यह भी उन्हें पसंद ही आएगा।

    मेरे जीवन का यह प्रथम उपन्यास हिंदी उपन्यास जगत् में लाते हुए, अपने पाठकों के हाथों में सौंपते हुए मुझे अतीव हर्ष हो रहा है।

    मुझे यहाँ यह लिखने में भी कोई आपत्ति नहीं है कि हिंदी साहित्य जगत् के ठेकेदार, आलोचक व समालोचक इसे चाहे किसी भी दृष्टि से लें, किंतु अपने लेखकीय दायित्व को मैंने पूरी ईमानदारी से निभाया है, इसे कोई झुठला नहीं सकता। वैसे भी खरा-सच्चा लेखक, समाज की खरी-सच्ची बातें लिखने वाला लेखक किसी की आलोचना की परवाह नहीं करता। वह अपने जीवन के महान् लक्ष्य की प्राप्ति में लगा रहता है और मैं भी अपने जीवन के महान् लक्ष्य पुरुषों द्वारा नारी को भी एक इनसान मान लेने के लक्ष्य को पूरा करने में लगी हुई हूँ और आजीवन लगी रहूँगी। मुझे अपने इस दृढ़ निश्चय से कोई हटा नहीं सकता।

    मुझे आशा ही नहीं, पूरा विश्वास है कि अपने आपको इनसान के तराजू में तौलने और उस पर खरे उतरने वाले इनसानी पुरुषों की भागीदारी, उनका स्नेह, सहकार तथा प्रोत्साहन मुझे अवश्य मिलेगा।

    इसी उम्मीद के साथ---

    डॉ. कुसुम मेघवाल

  • Pratidaan
    Virendra Jain
    60 54

    Item Code: #KGP-2093

    Availability: In stock

    प्रतिदान

    सुरेखा-पर्व की विद्या का विवाह माँ ने तय किया था । अच्छा घर-वर खोज़कर ।

    प्रतिदान को प्रभा को ससुराल के तमाम संबंधियों ने देख-परखकर पसंद किया था ।

    उसके हिस्से का विश्वास की कविता ने कबीर को स्वयं चुना था ।

    तीनों के पति अलग-अलग स्थान, परिवेश, पेशे से जूड़े थे । अलग-अलग प्रवृति के थे । फिर भी तीनों स्त्रियों  का दुख एक-सा क्योंकर हुआ?

    साथ न सहकर भी साथ सहे गए दुख का बयान करती वीरेन्द्र की तीन उपन्यासिकाएँ ।

    स्त्रियाँ ही स्त्रियों की कथा-व्यथा को संजीदगी से बयान कर सकती हैं, इस अवधारणा को झुठलाती तीन व्यथा-कथाएँ ।

    थोड़े में बहुत कह देने में समर्थ युवा कथाकार के आकार में लघु और कथ्य में बृहद् तीन लघु उपन्यास-सुरेखा-पर्व, प्रतिदान, उसके हिस्से का विश्वास ।
  • Godhooli
    Bhairppa
    300 270

    Item Code: #KGP-669

    Availability: In stock

    कन्नड़ उपन्यास का हिंदी अनुवाद।
  • Vikalp
    Sukhdev Prasad Dubey
    1100 825

    Item Code: #KGP-653

    Availability: In stock

    बीसवीं शताब्दी ने मनुष्य को आजादी दी, लेकिन उसकी आत्मा छीन ली। आत्मविहीन होकर मनुष्य अपना सब कुछ, जो आत्मीय था, को छोड़कर बाहर भागने लगा। ऐसा ही एक मध्यवर्गीय परिवार में जन्मा, अति महत्त्वाकांक्षी युवक बड़ा आदमी बनने के स्वप्न का पीछा करते हुए देश का सब कुछ बिसराकर अमेरिका भाग जाता है और वहीं का होकर रह जाता है। जैसा कि 70 के दशक में अनेक युवक करने लगे थे।
    15 वर्ष बाद अचानक, अपने पिता द्वारा आत्मदाह कर लेने की खबर उसे वहां का सब कुछ छोड़कर गांव ले आती है और वह फिर से यहां सबसे जुड़ने लगा था, जिसे वह छोड़कर गया था। तभी फिर अचानक विदेश से आई एक बुरी खबर, उसे विदेश ले जाती है। जहां उसकी पत्नी की विलासिता और लापरवाही से हुई पुत्र की मृत्यु, उसे इतना दुखित करती है कि वह अपनी पत्नी को ही 14 वर्ष जेल करवा के सदा के लिए यह सोचकर देश लौट आता है कि महान् देशों में भी महानता कहां मिलती है।
    और फिर शुरू होता है, उसके संघर्ष का एक लंबा सिलसिलाµघर, परिवार, गांव बस्ती, देश तथा उसके अपने प्रेम को, न्याय दिलवाने और उनकी गरिमा लौटाने की उसकी योग्यता को सिद्ध कर दिखाने की परीक्षा का-लेकिन विशृंखल समाज, भ्रष्ट सत्ता और संवेदनहीन अक्षम नौकरशाही उससे समर्पण कराने में लग जाते हैं। वह घबराकर विकल्पों के पीछे दौड़ता-भागता थक जाता है-क्या शैतान के समक्ष समर्पण कर दे? क्या इस अनिश्चितता, अराजकता और अंत के आतंक से वह हार मान ले? आधुनिक युग की अतिबुद्धिवादी पीढ़ियों के सामने यही सवाल है-क्या मनुष्यता को, जो अनंत का गुणांश है, चंद मनुष्यों के हाथों अंत हो जाने दें।
    विकल्प? क्रांति-न हिंसक, न अहिंसक-आत्मक्रांति!
    नर्मदांचल की प्रकृति और नियति के कोमल-कठोर प्रश्नों से गुंथी, एक अनुप्रेरक प्रेम-कथा जो मानवीय संबंधों के आदर्श एवं यथार्थ के अनछुए पक्षों को उजागर करती हुई, अनुभूत तथ्यों एवं कथ्यों से रोमांचित करती है रोष भी पैदा करती है, और होश भी जगाती है।
  • Mandra
    Bhairppa
    600 480

    Item Code: #KGP-221

    Availability: In stock


  • Raag Viraag
    Shree Lal Shukla
    150 135

    Item Code: #KGP-42

    Availability: In stock


  • Vishaad Math
    Rangey Raghav
    300 270

    Item Code: #KGP-54

    Availability: In stock

    जब मुगलों का राज्य समाप्त होने पर आया था तब बंगाल की हरी-भरी धरती पर अकाल पड़ा था। उस समय बंकिमचंद्र चटर्जी नेआनंद मठ' लिखा था। जब अँगरेजों का राज्य समाप्त होने पर आया तब फिर बंगाल की हरी-भरी धरती पर अकाल पड़ा। उसका वर्णन करते हुए मैंने इसीलिए इस पुस्तक कोविषाद मठ' नाम दिया।

    प्रस्तुत उपन्यास तत्कालीन जनता का सच्चा इतिहास है। इसमें एक भी अत्युक्ति नहींकहीं भी जबर्दस्ती अकाल की भीषणता को गढ़ने के लिए कोई मनगढंत कहानी नहीं। जो कुछ हैयदिसामान्य रूप से दिमाग मेंबहुत अमानुषिक होने के कारणआसानी से नहीं बैठतातब भी अविश्वास की निर्बलता दिखाकर ही इतिहास को भी तो फुसलाया नहीं जा सकता।

    विषाद मठहमारे भारतीय साहित्य की महान् परंपरा की एक छोटी-सी कड़ी है। जीवन अपार हैअपार वेदना भी हैकिंतु यह शृंखला भी अपना स्थायी महत्त्व रखती है।

    -रांगेय राघव


  • Brahm Kamal
    Swati Tiwari
    300 270

    Item Code: #KGP-497

    Availability: In stock


  • Parda Baari
    Kusum Kumar
    190 171

    Item Code: #KGP-39

    Availability: In stock


  • NATOHAM
    Meenakshi Swamy
    500 450

    Item Code: #KGP-1555

    Availability: In stock

    लब्धप्रतिष्ठ रचनाकार मीनाक्षी स्वामी का बहुचर्चित उपन्यास 'नतोअहं ' भारतभूमि के वैभवशाली अतीत और वर्तमान गौरव के सम्मुख विश्व के नतमस्तक होने का साक्षी है। यह भारतीय संस्कृति की बाह्म जगत् से आंतरिक जगत् की विस्मयकारी यात्रा करवाने की सामर्थ्य के अनावरण का अद्भुत परिणाम है।
    भारतीय संस्कृति के विराटू वैभव का दर्शन होता है—संस्कृतिक नगरी उज्जयिनी में बारह वर्षों में होने वाले सिंहस्थ के विश्वस्तरीय आयोजन में। उज्जयिनी का केंद्र शिप्रा है। इसके किनारे होने वाले सिंहस्थ में देश भर के आध्यात्मिक रहस्य और सिद्धियां एकजुट हो जाती हैं। इन्हें देखने, जानने को विश्व भर के जिज्ञासु अपना दृष्टिकोण लिए यहां एकत्र हो जाते हैं। तब इस पवित्र धरती पर मन-प्राण में उपजने वाले सूक्ष्मतम भावों की सशक्त  अभिव्यक्ति है यह उपन्यास ।
    इसमें मंत्रमुग्ध करने वाली भारतीय संस्कृति व सनातन धर्म के सभी पहलुओं पर वैज्ञानिक चिंतन  है, भारतीय अध्यात्म के विभिन्न पहलुओं को खरेपन के साथ उकेरा गया है।
    उज्जयिनी अनवरत सांस्कृतिक प्रवाह की साही है। यह केवल धर्म नहीं, समूची संस्कृति है, जिसमें कलाएं हैं, साहित्य है, ज्ञान है, विज्ञान है, आस्था है,  परंपरा है और भी बहुत कुछ है। यात्रा वृत्तांत शैली के इस उपन्यास में उज्जयिनी के बहाने भारतीय दर्शन, परंपराओं और संस्कृति की खोज है जो सुदूर विदेशियों को भी आकर्षित करती है। उज्जयिनी के लोक जीवन को झांकी के साथ भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं का सतत आख्यान है जो पुरा मनीषियों की मेधा का महकता प्रतीक है।
    उपन्यास के विलक्षण कथा संसार को कुशल लेखिका ने अपनी लेखनी के संस्पर्श से अनन्य बना दिया है। नायक एल्विस के साथ पाठक शिप्रा के प्रवाह में प्रवाहित होता है, डुबकी लगाता है।
    'भूभल' जैसे सशक्त उपन्यास से कीर्ति पाने के बाद बहुचर्चित रचनाकार मीनाक्षी स्वामी का नवीनतम उपन्यास 'नतोअहं ' तथाकथित आधुनिकता से आक्रांत भारतीय जनमानस की अपनी जडों की ओर आकृष्ट करता है। भारतीय संस्कृति व अध्यात्म की खोज में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए अप्रतिम उपहार है।
  • Ardhavritt
    Mudra Rakshes
    795 557

    Item Code: #KGP-883

    Availability: In stock


  • Ek Aur Chandrakanta (2nd Part)
    Kamleshwar
    245 221

    Item Code: #KGP-900

    Availability: In stock


  • Polywood Ki Apsara
    Girish Pankaj
    225 203

    Item Code: #KGP-2049

    Availability: In stock

    पॉलिवुड की अप्सरा
    "पॉलीवुड की अप्सरा' उत्तर-आधुनिक मनुष्य के मोहभंग की तथा-कथा है, जिसमें गिरीश पंकज विशुद्ध व्यंग्यकार सिद्ध होते है । (जहाँ हास्य का हाशिए पर भी जगह नहीं है) तात्पर्य यह है कि इस उपन्यास में व्यंग्यकार ने  यथार्थ का पल्ला कहीं भी नहीं छोडा है, जिससे यह समझने में आसानी होती है कि व्यंग्य-लेखन ही सच्चा लेखन हो सकता है। जिस प्रकार 'हॉलीवुड' के सादृश्य पर 'बॉलीबुड' रखा गया, उसी प्रकार 'बॉलीबुड' कै सादृश्य पर 'पॉलीवुड' बना । 'पॉलीवुड की अप्सरा' भी बॉलीवुड की समांतर भूमि में अपने रूप, रस, गंध और स्पर्श के साथ प्रतिष्ठित है  ।
    शेक्सपियर ने कभी कहा था कि नास में क्या रखा है, परंतु इस उपन्यास में सार नाम इसीलिए सोद्देश्य एवं सार्थक हैं कि नाम सुनते या पढ़ते ही उनका 'चरित्तर' मूर्त हो उठता  है ।
    'अप्सरा' अपने जन्म से ही अभिशप्त रही है, जिस ‘स्वर्वेश्या' भी कहा गया है । बॉलीबुड की अप्सरा बनने का पावती का सपना अंत तक पूरा सच नहीं हो पाता । यह त्रासदी 'अप्सरा' में व्यंजित तथाकथित आभिजात्य की निस्सास्ता से और भी सटीक हो गई है, जो परी में नहीं है । 'पार्वती' का 'पैरी' में  रूपांतरण एक ऐसी चेतावनी है, जिससे वर्त्तमान एवं भावी पीढ़ी झूठी महत्वाकांक्षा की आग में न कूदे । दार्शनिक शब्दावली में कहें तो जो कुछ दिख रहा है, यह सब माया है, छलावा  है । लगता है, समकालीन परिस्थितियों ने ही कबीर जैसे युगचेता का 'आखिन देखी ' कहने के लिए विवश किया ।
    इस कृति में उत्तर-आधुनिक मनुष्य और उसकी क्रीत-कुँठा सफल व्यंग्यकार गिरीश पंकज की सारग्रही सूक्ष्म-दूष्टि से उजागर होकर एक ही निष्कर्ष पर पहुंचती है कि मनुष्य की सफलता मनुष्यता का पाने में है, खोने में नहीं ।
  • SWAPNAPAASH
    Manisha Kulshreshtha
    240 216

    Item Code: #KGP-1572

    Availability: In stock

    'स्वप्नपाश' नृत्य और अभिनय से आजीविका-स्तर तक संबद्ध माँ-बाप की संतान गुलनाज फरीबा के मानसिक विदलन और अनोखे सृजनात्मक विकास व उपलब्धियों की कथा है । समकालीन सनसनियों में से एक से शुरु हुई यह कथा हमें एक बालिका, एक किशोरी और एक युवती के उस आरिम अरण्य में ले जाती है जहाँ 'नर्म' और 'गर्म' डिल्युजंस और हैल्युसिनैशरेन का वास्तविक मायालोक है। मायालोक और वास्तविक? जी हाँ, वास्तविक क्योंकि स्वप्न-दु:स्वप्न जिस पर बीतते है उसके लिए कुछ भी 'वर्चुअल' नहीं-न सुकून , न सितम । उस पीडा को सिर्फ कल्पना की जा सकती है कि खुली दुनिया में जीती-जागती काया की चेतना एक अमोघ पाश में आबद्ध हो जाए और अधिकांश अपने किसी सपने के पीछे भागते नज़र आएँ। पाश में बँधे व्यक्ति की मुक्ति तब तक संभव नहीं होती जब तक कोई और आकर खोल न दे। मगर जब एक सम-अनुभूति-संपन्न खोलने वाले की तलाशा त्रासद हो तो? दोतरफा यातना से गुज़रने के खाद अगर कोई मिले और वह भी हौलै-हौले एक नए पाश में बंध चले तो ? अनोखे रोमांसों से भरी इस कथा में एक नए तरह की रोमांचकता है जो एक ही बैठक में पढ़ जाने के लिए बाध्य कर देती है ।
    गुलनाज़ एक चित्रकार है और वह भी 'प्राडिजी'।  ऐसे  चरित्र का बाहरी और भीतरी संसार कला की चेतना और आलोचनात्मक समझ के बगैर नहीं रचा जा सकता था। कथा में पेंटिंग  की दुनिया के प्रासंगिक नमूने और ज्ञात-अल्पज्ञात नाम ऐसे आते हैं गोया वे रचनाकार के पुराने पड़ोसी हों। आश्चर्य तो तब होता है जब हम नायिका की सृजन-प्रविधि और उसको पेंटिग्स के चमत्कृत (कभी-कभी आतंकित) कर देने वाले विवरण से गुजरते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि मनीषा कुलश्रेष्ठ मूलत: चित्रकार हैं। उनकी रचनात्मक शोधपरकता का आलम यह है कि वे इसी क्रम में यह वैज्ञानिक तथ्य भी संप्रेषित कर जाती है कि स्किजोफ्रेनिया किसी को ग्रस्त भर करता है, उसे एक व्यक्ति के रूप में पूरी तरह खारिज नहीं करता ।
    स्किजोफ्रेनिया पर केंद्रीय यह उपन्यास ऐसे समय में  आया है जब वैश्वीकरण की अदम्यता और अपरिहार्यता के नगाड़े बज रहे हैं। स्थापित तथ्य है कि वैश्वीकरण अपने दो अनिवार्य घटकों-शहरीकरण और विस्थापन- के द्वारा परिवारिक ढाँचे को ध्वस्त करता है। मनोचिकित्सकीय शोधों के अनुसार शहरीकरण स्किजोफ्रेनिया के होने की दर को बढ़ाता है और पारिवारिक ढाँचे में टूट रोग से मुक्ति में बाधा पहुँचाती है। ध्यातव्य है कि गुलनाज पिछले ढाई दशकों में बने ग्लोबल गाँव की बेटी है । अस्तु, इस कथा को एक गंभीर चेतावनी की तरह भी पढे जाने की आवश्यकता है। आधुनिक जीवन, कला और मनोविज्ञान-मनोचिकित्सा की बारीरिज्यों को सहजता से चित्रित करती समर्थ और प्रवहमान भाया में लिखा यह उपन्यास बाध्यकारी विखंडनों से ग्रस्त समय में हर सजग पाठक के लिए एक अनिवार्य पाठ है ।
  • Vansh Vriksha
    Bhairppa
    390 351

    Item Code: #KGP-103

    Availability: In stock

    कन्नड़ के विख्यात उपन्यासकार भैरप्पा ने प्रस्तुत उपन्यास में वंशावली के आदि और जटिल प्रश्नों पर आधारित जिस गहन एवं मर्मस्पर्शी कथा का ताना-बाना बुना है, वह भारतीय मनीषा की प्रश्नाकुलता की ऊर्जा है और हमारी वंशीय परंपरा का राग-अनुराग एवं विराग भी। जीवन के लिए निर्धारित लक्ष्यों को अर्जित कर लेना, अपने वंशको आगे बढ़ाने का स्वस्थ संकेत है, अथवा संतति के माध्यम से ही वंशीय परंपरा का वहन सहज संभव हो सकता हैअपने उपलक्ष्य में यह कृति इन प्रश्नों से जूझती है। वंशजों के रक्त-संबंधों की शुचिता की आशंकाएं तथा सरोकार भी इस कथा में जहां-तहां तैरते हुए नए भावबोध और अवधारणाओं से हमारा सामना कराते हैं।

    भैरप्पा के उपन्यासों के पाठक जानते हैं कि अपने पात्रें की बहुविध दुनिया का जैसा सजीव शब्दांकन वह करते हैं, वह विलक्षण है। वंशवृक्षके सभी पात्र स्वयं में संपूर्ण हैंमनुष्यगत अपूर्णताओं के साथ। वे परंपरा के एक साथ संवाहक और भंजक हैं तथा उनकी यही अनायासताउन्हें एक सच्चे और खरे आदमी के चरित्र में कायांतरित कर देती है। इसी कारण यह कृति-कथा हम सबकी देह और आत्मा को बारंबार छूकर निकलती है। इसमें वर्णित देह और नेह की फुहारों से आप-हम रोमांचित और संवेदनशील हो उठते हैं। लक्ष्यार्जजन के पश्चात् मृत्यु को जिस सहजता और क्रमिकता के साथ लेखक यहां अवतरित करता है, वह यमलीला सहज स्वीकार्य प्रतीत होती है इस उपन्यास में।

    एक अंचल विशेष का वर्णन होते हुए भी यह कृति अखिल भारतीय या कहें कि वैश्विक मनोजगत् की प्रतिनिधि रचना है जो जीवन के संबंधों, संयोगों और सहभावों से संरचित है। जीवनगत निर्णयों के उद्दाम स्रोतों से प्रस्फुटित कई जीवनलीलाओं के तटों को निर्धारित और ध्वस्त करती इस कथा में लेखक के द्वंद्वों को स्वर देने का काम उसके नायक करते हैं तथा मानो यह सब घटित होते हैं पाठक के साथ। कृति, कृतिकार और पाठक के त्रिकोण का यह अंतरंग संबंध वंशवृक्षकी एक अन्य तथा अन्यतम उपलब्धि है।

  • Abhi Shesh Hai
    Mahip Singh
    350 315

    Item Code: #KGP-746

    Availability: In stock

    स्वातंत्र्योत्तर भारत के इतिहास का वह एक ऐसा कालखंड था, जब निकट अतीत की व्यक्तिवादी, भ्रष्ट एवं सर्वसत्तावादी निरंकुश प्रवृत्तियाँ चरम पर पहुँच गई थीं और लोकतंत्र आधी रात को किसी भी दरवाजे पर पड़ने वाली दस्तक के आतंक से सहमा हुआ था।

    उस दौर में कुछ आवाजें बिना बोले भी बहुत कुछ कह रही थीं।

    ...और कैसे जी रहा था देश का आम आदमी ?

    ...वह आम आदमीजो देश के विभाजन की भयावह स्मृतियाँ लिए द्विभाजित मानसिकता में जीने को अभिशप्त था।

    ...और वह आम आदमी, जो पाश्चात्य देशों को स्वर्ग मान बैठा था।

    महाकाव्यात्मक आयाम लिए उस कालखंड के भारतीय समाज की कथाजिसमें इतिहास के साथ-साथ भविष्यदृष्टि भी विद्यमान है।

  • Preeti Katha
    Narendra Kohli
    120 108

    Item Code: #KGP-2052

    Availability: In stock

    प्रीति-कथा 
    नरेन्द्र कोहली की प्रत्येक नई कृति उनके लेखकीय व्यक्तित्व का एक नया आयाम उदघाटित करती है । जब तक पाठक उन्हें किसी एक वर्ग अथवा धारा से जोड़कर, किसी एक घेरे  में घेरकर, देखने का अभ्यस्त होने लगता है, तब तक वे उन घेरों को तोड़कर आगे बढ जाते हैं और कुछ नया तथा मौलिक लिखने लगते है । सृज़नधर्मा व्यक्ति प्रयोग और वैविध्य की चुनौती को स्वीकार करता ही है ।
    प्रीति-कथा नरेन्द्र कोहली का नया उपन्यास है । यह एक प्रेम-कथा है । नरेन्द्र कोहली ने  प्रेम-कथा  लिखी है, यह सूचना कुछ लोगों के लिए विस्मयकारिणी भी हो सकती है; किन्तु अधिक विस्मयकारी तथ्य तो यह है कि यह प्रेमाख्यानक उपन्यास, जीवन के कुछ मूलभूत सत्यों का स्वरूप स्पष्ट करता है । कुछ लोग इसे चिंतन-प्रधान ही नहीं, दार्शनिक उपन्यास भी कहना चाहेंगे । प्रेम का विश्लेषण करते-करते ही, मनुष्य अपनी प्रकृति और ईश्वर के स्वरूप तक को पहचान पाया है । किसी भी वर्ग में रखें, किन्तु है यह उपन्यास ही, पहले से भिन्न, नया, ताजा और आकर्षक ।
  • Ek Nirvasit Maharaja
    Navtej Sarna
    425 383

    Item Code: #KGP-642

    Availability: In stock

    एक निर्वासित महाराजा
    हिंदुस्तान के महानतम शासकों में से एक, पंजाब के महाराजा रंजीत सिंह का सन् 1839 में देहांत हो गया और उनका विस्तृत साम्राज्य अराजकता में डूब गया । अभी एक दशक भी नहीं हुआ था कि गृहकलहपूर्ण प्रतिद्वन्द्विता और षड़यंत्रों के चलते पंजाब अंग्रेजों के प्रतीक्षारत हाथों में चला गया । जिस शासक ने साम्राज्य के अधिग्रहण की शर्तों पर दस्तखत किए और मशहूर कोहिनूर हीरे सहित लाहौर का तोशकखाना अंग्रेजी को सौंपा, यह एक ग्यारह साल का बच्चा था, महाराजा रंजीत सिंह का सबसे छोटा पुत्र, दलीप सिंह ।
    इस सटीक और मर्मस्पर्शी उपन्यास में, जो सच्ची घटनाओं पर आधारित है, नवतेज सरना पंजाब के आखिरी महाराजा की असाधारण कहानी बखानते हैं । साम्राज्य के अधिग्रहण के साथ ही दलीप को उनकी माँ और प्रजा से अलग-थलग कर दिया जाता है । ब्रिटिश सरकार उन्हें अपने संरक्षण में  लेकर, उनका धर्मांतरण का उन्हें ईसाई बना देती है । सोलह साल की उम्र में उन्हें एक देशीय दरबारी का जीवन जीने के लिए इंग्लैड भेज दिया जाता है । यह एक ऐसा निर्वासन था, जिसके लिए उन्हें अभ्यस्त कराया गया था कि वे खुद इसकी मांग करें; लेकिन अपने साथ होने वाले व्यवहार के कारण जब उनका मोहभंग  हुआ और देर से ही सही, जब उन्हें अपनी सोई हुई विरासत का अहसास हुआ, तब वे विद्रोही वन गए । वे फिर से सिख बन गए और हिंदुस्तान वापस लौटने और अपने लोगों का नेतृत्व करने के लिए मचल उठे, लेकिन उनके इस प्रयास ने उन्हें उन्नीसवीं सदी के यूरोप की गंदी राजनीति से फँसा दिया, जिसने उन्हें रिक्त कर दिया । वे धोखे और उपहास क पात्र बन गए । अंतत: पेरिस के एक सस्ते होटल में वे एक अकेले और हारे हुए आदमी के रूप से मृत्यु को प्राप्त हुए ।
    दलीप सिंह के अपने ही स्वर में और उनकें पाँच समकालीनों की आवाज में कहा गया यह उपन्यास न सिर्फ सिख-इतिहास, वरन् पुरे हिंदुस्तान के इतिहास के एक वेहद कारुणिक व्यक्तित्व की रोचक और भीतर तक हिला देने वाली तस्वीर पेश करता से । साथ ही यह ब्रिटिशा साम्राज्यवाद छोर उसको बढावा देने वाले भारतीय राजा-महाराजाओं के लालच और अदूरदर्शिता की भी बेबाक पाताल है ।
  • Vishay Purush
    Mastram Kapoor
    100 90

    Item Code: #KGP-2045

    Availability: In stock

    विषय-पुरुष 
    स्त्री और पुरुष दोनो स्वतंत्रचेता व्यक्ति होने के नाते कभी विषयी के रूप ने काम करते हैं तो कभी विषय बनते हैं । किसी से प्यार करते समय है विषयी होते है और प्यार किए जाने की चाह में वे विषय बनते हैं । किंतु विषयी अथवा विषय बनना उनकी स्वतंत्र चेतना का अधिकार हैं । भय या प्रलोभन से किसी पर यह भूमिका लादना अनैतिक ही नहीं, अश्लील भी है । दुर्भाग्य से मानव-समाज ने स्त्री को हमेशा विषय के रूप ने ही स्वीकार किया, उसे विषयी बनने के अधिकार से वंचित रखा और यह काम पुरुष-समाज ने किया भय और प्रलोभन दिखाकर जिसने धर्म का भय और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रलोभन भी शामिल है ।
    स्त्री-स्वतंत्रता के दमन की पुरुष-प्रवृति की प्रतिक्रिया ने लिखा गया यह उपन्यास सशक्त कहानी के साथ-साथ एक वैचारिक प्रयोग भी है । हमेशा विषयी की भूमिका निभाने वाले को (अथवा इसका वा करने वाले को) जब विषय बनना पाता है तो उसको क्या दशा होती है, यही इस उपन्यास का विषय है ।
  • Hum Sab Gunahgar
    Mastram Kapoor
    350 315

    Item Code: #KGP-9027

    Availability: In stock

    हम सब गुनहगार
    लीक से हटकर सोचने वालों ने आशा को नहीं, निराशा को कर्म की प्रेरणा कहा है।
    डॉ. लोहिया ने निराश रहकर काम करते जाने को ही सबसे अच्छा कर्तव्य कहा है।
    फ्रांस के प्रसिद्ध लेखक एवं दार्शनिक ज्यांपाल सार्त्र ने भी सर्वोत्तम कर्मशक्ति डिस्पेयर की परिभाषा करते हुए कहा है, ‘दि एक्ट विदाउट होप।’
    ‘मा फलेषु कदाचन’ के कथन द्वारा गीता में भी इस सत्य को ही कहने की कोशिश की गई है...
    वर्तमान निराशा के धुँधलके में भविष्य को खोजने का लघु प्रयास यह पुस्तक स्वातंतत्र्योत्तर भारत की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक विसंगतियों का भविष्योन्मुख विवेचन है।
  • Domnic Ki Vaapasi
    Vivek Mishra
    350 315

    Item Code: #KGP-9359

    Availability: In stock

    ‘डाॅमनिक की वापसी’ वर्ष 2015 के ‘आर्य स्मृति साहित्य सम्मान’ से अलंकृत उपन्यास है। इसके लेखक विवेक मिश्र समकालीन हिंदी कथा साहित्य के महत्त्वपूर्ण रचनाकार हैं। विवेक ने रचना के लिए सदा ऐसे कथानक चुने हैं जो समाज के किसी न किसी व्यापक सत्य को प्रकट करते हैं। इसीलिए वे लोकप्रिय रचना-पद्धतियों से अलग रास्ता तलाशते हैं। प्रस्तुत उपन्यास इसका प्रमाण है।

    इस उपन्यास के केंद्र में ‘डाॅमनिक की वापसी’ नामक नाटक है, डाॅमनिक का चरित्र निभाने वाला अभिनेता दीपांश इसका प्रेरक पात्र है। दीपांश यथार्थ और नियति के बीच झूलता अपना मार्ग तय करता है। वह उस समय रंगमंच से अदृश्य हो जाता है जब अभिनय के शीर्ष पर उसका नाम चमक रहा होता है। उपन्यास अभिनय में जीवन और जीवन में अभिनय का द्वंद्व उपस्थित करता है। प्रेम पर आधारित नाटक तो सफल होता है लेकिन जीवन में प्रेम पराजय की छायाओं से घिर जाता है।

    ‘डाॅमनिक की वापसी’ प्रेम, मानवीय संबंध, कला और जीवन की सघन बुनावट से निर्मित हुआ है। अनूठा कथानक, रचनात्मक भाषा, शिल्प सौष्ठव और दार्शनिक आभा इस रचना के उल्लेखनीय तत्त्व हैं। युवा पीढ़ी में उपन्यास रचना की सिद्धि के लिए इस उपन्यास को उदाहरणार्थ देखा जा सकता है। विश्वास है कथानक और कहन के आधार पर ‘डाॅमनिक की वापसी’ व्यापक पाठक समुदाय की प्रियता अर्जित करेगा।
  • Delhi
    Khushwant Singh
    400 340

    Item Code: #KGP-818

    Availability: In stock

    उपन्यास का नाम शहर के नाम से ! जी हाँ, यह दिल्ली की कहानी है। छह सौ साल पहले से लेकर आज तक की खुशवंत सिंह की अनुभवी कलम ने इतिहास के ढाँचे को अपनी रसिक कल्पना की शिराओं और मांस-मज्जा से भरा। यह शुरू होती है सन् 1265 के ग़यासुद्दीन बलबन के शासनकाल से तैमूर लंग, नादिरशाह, मीर तक़ी मीर, औरंगज़ेब, अमीर खुसरो, बहादुर शाह ज़फ़र आदि के प्रसंगों के साथ कहानी आधुनिक काल की दिल्ली तक पहुँचती है कैसे हुआ नयी दिल्ली का निर्माण ! और अंत होता है 1984 के दंगों के अवसानमय परिदृश्य में !

    कहानी का नायकमुख्य वाचक हैदिल्ली को तहेदिल से चाहने वाला एक व्यभिचारी किस्म का चरित्रजिसकी प्रेयसी भागमती कोई रूपगर्विता रईसज़ादी नहींवरन् एक कुरूप हिंजड़ा है।दिल्ली और भागमती दोनों से ही  नायक को समान रूप से प्यार है। देश-विदेश के सैर-सपाटों के बाद जिस तरह वह बार-बार अपनी चहेती दिल्ली के पास लौट-लौट आता हैवैसे ही देशी-विदेशीऔरतों के साथ खाक छानने के बाद वह फिर-फिर अपनी भागमती के लिए बेकरार हो उठता है। तेल चुपड़े बालों वालीचेचक के दागों से भरे चेहरे वालीपान से पीले पड़े दाँतों वाली भागमती केवास्तविक सौंदर्य को उसके साथ बिताए अंतरंग क्षणों में ही देखा-महसूसा जा सकता है। यही बात दिल्ली के साथ भी है। भागमती और दिल्ली दोनों ही ज़ाहिलों के हाथों रौंदी जाती रहीं। भागमतीको उसके गँवार ग्राहकों ने रौंदादिल्ली को बार-बार उजाड़ा विदेशी लुटेरों और आततायियों के आक्रमणों ने। भागमती की तरह दिल्ली भी बाँझ की बाँझ ही रही     
  • Ukaav
    Kshitij Sharma
    250 225

    Item Code: #KGP-765

    Availability: In stock

    उकाव
    'उकाव' पहाडी जिंदगी की गाथा है। एक मायने में उपन्यास की कथा पुरुष-नियंत्रण समाज द्वारा नारी पर थोपे गए उत्पीडक नियमों की भर्त्सना है । नैतिकता के इकहरे मानदंडों के कारण किन्हीं कमजोर क्षणों में हुई एक तथाकथित 'गलती' के प्रतिकार में श्यामा किस तरह सारा जीवन होम कर देती है, लेखक ने इस संघर्ष को इतने मार्मिक और प्रामाणिक ढंग से चित्रित किया है कि यह पहाडी औरत की जिंदगी का ही दस्तावेज बन गया है । कुमाऊँ के पहाडों का ग्रामीण जीवन जितनी अंतरंगता  और विविधता में इस उपन्यास में चित्रित हुआ है, यह बरबस रेणु और शैलेश मटियानी की याद दिला देता है । संभवत: किसी रचना का आंचलिक बनना इस बात पर निर्भर है कि वह किसी स्थान विशेष के लोगों का चित्रण करते हुए यहीं की भौगोलिक ही नहीं वक्ति सांस्कृतिक और मूल्यगत विशिष्टताओं को कितनी उत्कटता व सघनता से अभिव्यक्त करती है । इस संदर्भ में देखें तो 'उकाव' निश्चित ही एक आंचलिक रचना है, पर तब दुनिया की कौन-प्ती ऐसी रचना है जो इस बात से न पहचानी जाती हो कि उसमें कितनी गहराई और मजबूती से अपने समय और स्थान की पहचान छिपी है ?
    सही मायनों में देखा जाए तो प्रेम, प्रतिकार, बलिदान और संघर्ष की यह गाथा अपनी भौगोलिक और सांस्कृतिक सीमाओं का अतिक्रमण करती हुई पहाडी औरत के ही नहीं बल्कि संपूर्ण भारतीय नारी के बहुआयामी व विराट, स्वरूप का दर्शन कराती है । और यही लेखक की सृजनात्मकता की कसौटी है ।
    यह इत्तफाक नहीं है कि क्षितिज शर्मा लेखन की उस परंपरा के अधिक निकट पड़ते है जिसका स्रोत शैलेश मटियानी है । मटियानी जी की रचनाओं में पहाडी जीवन की झाँकी सबसे ज्यादा वास्तविक और प्रामाणिक ढंग से नजर जाती है । क्षितिज शर्मा उस परंपरा को आगे बताते हुए पहाडी गाँवों के संघर्षमय जीवन को जिस तरह से चित्रित करते है, वह मुझ जैसे तथाकथित पहाडियों के लिए भी एक 'रिबिलेशना से कम नहीं है ।
    -पंकज बिष्ट
  • Toro Kara Toro-5 (Sandesh)
    Narendra Kohli
    500 425

    Item Code: #KGP-667

    Availability: In stock


  • Dek Par Andhera
    Hira Lal Nagar
    400 360

    Item Code: #KGP-402

    Availability: In stock


  • Arddhnaarishwar
    Vishnu Prabhakar
    495 446

    Item Code: #KGP-2002

    Availability: In stock

    अर्द्धनारीश्वर 
    'अर्द्धनारीश्वर ' व्यक्तिमन, समाजमन एवं अंतर्मन के विविध स्तरों पर नारी और नर थे इन्हीं के एकमएक सुर और स्वर-मिलन की प्राप्ति का प्रयास है यह उपन्यास । वही जाति-पाति और धर्म को समस्या, वही विवाह, तलाक, बलात्कार की समस्या, वही नारी-शोषण, उत्पीडन, वही टूटते-बिखरतें जीवन की कहानी, किन्तु मुक्ति के लिए 'कोई तो' की प्रतीक्षा नहीं है । यहीं लेखक ने समाधान के रूप में एक वृहत्तर रूपरेखा की सर्जना की है ।
    'अर्द्धनारीश्वर ' का अभिप्रेत नारी और नर की समान सहभागिता को प्राप्त करना है । इसके लिए जरूरी है, एक-दूसरे को अपनी-अपनी दुर्बलताओं व सबलताओं के साथ स्वीकार करना तथा मान लेना कि रचना के लिए प्रकृति व पुरुष का मिलन भी जरूरी है ।
    मूल समस्या तो पुरुष की है, उसके पौरुषिक अहम् की, जो उसे 'बेचारा' बना देती है । सहज तो इसे ही बनाना है । इसी की असहजता से स्त्री बहुत-से बंधन तोड़कर आगे निकल आई है । लेकिन बंधनहीन होकर किसी उच्छ्रंखल को रचना करना लेखक का अभिप्रेत नहीं है, बल्कि बंधनो की जकड़न को समाप्त कर प्रत्येक सुर को उसका यथोचित स्थान देकर जीवन-राग का निर्माण करना है । अजित के शब्दों में लेखक कहता है :
    "मैं सुमिता को अपनी दासता से मुक्त कर दूँगा । मैं उसकी दासता से मुक्त हो जाऊँगा। तभी हम सचमुच पति-पत्नी हो सकेंगे।"
    इसी स्वयं की दासता से मुक्ति का नाम है, 'अर्द्धनारीश्वर'।
  • Naav Na Baandho Aisi Thaur
    Dinesh Pathak
    315 284

    Item Code: #KGP-277

    Availability: In stock

    नाव न बाँधो ऐसी ठौर
    हिंदी के सुपरिचित कथाकार दिनेश पाठक के इस उपन्यास का केंद्रीय विषय है प्रेम।  यह विवाहेतर प्रेम है, जिसका अपना अलग रंग है और अलग संघर्ष भी। नारी-पुरुषजन्य आकर्षण प्रकृति का सहज स्वभाव है। यह स्वभाव इतना प्रबल है, इतना अदम्य कि बावजूद तमाम वर्जनाओं के इसकी धार सतत प्रवाहित रहती है। इस आकर्षण में न तो कोई उम्र होती है और न ही कोई शर्त। कब, कहाँ और कैसे दो विपरीत एक-दूसरे के प्रति आकृष्ट होकर साडी वर्जनाओं को चुनौती देने लगेंगे, कहना मुश्किल है। आज के दौर में जब स्त्री-पुरुष साथ-साथ काम कर रहे हैं, कंधे से कंधा मिलकर, तब इस आकर्षण की परिधि और व्यापक हो उठी है। साथ-साथ काम करते हुए कब दो प्राणी चुपके से एक-दूसरे की भावनाओं में भी शामिल हो जाते हैं, ज्ञात नहीं पद्त। और यदि वे दोनों ही पहले से विवाहित हों तो भावनाओ का यह ज्वार एक नयी समस्या को जन्म देता है - सामाजिक दृष्टि से कदाचित यह अवैध प्रेम है, एकदम वर्जित व निषिद्ध प्रेम, विवाह-व्यवस्था के नितांत विपरीता उपन्यास में एक साथ दो धुरियां हैं-एक में समाज के विखंडन का भय है, परंपरागत मान्यताओं-मूल्यों के साथ परिवारों के टूटने व समाज के अराजक होने का डर है तो दूसरे में व्यक्ति स्वातंत्र्य के आगे सामाजिक मूल्यों के प्रति अस्वीकार का भाव। प्रश्न है विवाहित स्त्री-पुरुष के बीच क्या यह विवाहेतर प्रेम-सम्बन्ध सही है ? निष्कर्ष पर तो पाठकों को पहुंचना है।
  • Ek Qatara Khoon
    Ismat Chugatai
    400 360

    Item Code: #KGP-694

    Availability: In stock

    उर्दू की प्रख्यात लेखिका इस्मत चुगताई द्वारा मुस्लिम इतिहास की उस महान् गाथा का कलमबंद बयान, जो विश्व की करुणतम मानवीय गाथाओं में विशिष्ट स्थान रखती है। यह गाथा है मानव के बुनियादी अधिकार के लिए अडिग संघर्ष, अदम्य शौर्य और अद्भुत बलिदान की-कर्बला ! पैगंबर हज़रत मुहम्मद साहब के नवासे और हज़रत अली के सुपुत्र इमाम हुसैन के सपरिवार जौहर और शहादत की हृदयद्रावक दास्तान। फ़र्ज़ और हक की सत्ता के विरुद्ध जद्दोजहद की एक महान् गाथा ! इसी दास्तान ने उर्दू साहित्य की बेमिसाल धरोहर-अनीस और दबीर के मर्सियों को जन्म दिया। ये मर्सिये केवल उर्दू बल्कि भारतीय करुण काव्य की महान् निधि हैं। यह वही दास्तान है, जिसका स्मरण अकीदत के साथ मुहर्रम में किया जाता है। इस्मत चुगताई की इस महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक कृति को हिंदी प्रकाशन की एक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करते हुए हम गौरव अनुभव करते हैं। हमने इस पुस्तक को उर्दू से अनूदित करवाकर केवल लिप्यंतरण के साथ प्रस्तुत किया है ताकि उर्दू भाषा का मौलिक रसास्वादन पाठकों को उपलब्ध हो। कठिन शब्दों का अनुवाद फुटनोट्स में मौजूद है। हमें विश्वास है कि हिंदी जगत् में इस कृति को समुचित सत्कार प्राप्त होगा।
  • Aisa Satyavrat Ne Nahin Chacha Tha
    Raj Kumar Gautam
    60 54

    Item Code: #KGP-2100

    Availability: In stock

    ऐसा सत्यव्रत ने नहीं चाहा था
    सदी के इस कठिन और जटिल समय में हिन्दी के जिन युवा लेखकों ने उपन्यास लिखे हैं उनके बीच राजकुमार गौतम की 'उपस्थिति' महत्वपूर्ण और 'निजी' ढंग से हुई है । अपनी सादगी, संवेदनशीलता और आयासहीन शिल्प के लिए चर्चित राजकुमार गौतम का कहानीकार 'ऐसा सत्यव्रत ने नहीं चाहा था' में एक प्रौढ़, अनुभवी लेकिन जोखिम उठने वाले मछुआरे की तरह उतरा है । प्रतिकूलताओं और असभ्य जीवन स्थितियों के उछाल मारते, सिर पटकते पागल समुद्र की अतल गहराई में दुबली आस्था और संघर्ष की जो 'मछली' राजकुमार ने पकड़ी है और अपने नायक सत्यव्रत को सौंपी है उसके लिए इस उपन्यास को बहुत देर तक और दूर तक एक चमत्कार की तरह याद किया जाएगा ।
    नामहीन-व्यक्तित्वहीन केंद्रीय चरित्रों के मौजूदा ममय में इस उपन्यास का 'सत्यव्रत’ वापसी है उस नामधारी व्यक्तित्व की जिसका लोप छठे दशक के उत्तरार्द्ध से आरंभ हुआ था । 'ऐसा सत्यव्रत ने नहीं चाहा था' में राजकुमार ने यथार्थ के स्तर-दर-स्तर उदघाटित करने के लिए जो अनेक आयामों वाली तीखी भाषा 'खोजी' है और प्रतिकुलताओं से लडते- भिड़ते लहूलुहान आदमी की गहरी त्रासदी, उदासी, करुणा और अंतर्द्वन्द्व को 'उभारने' के लिए जिस 'अंडरकरेंट' की तरह बहते 'सटायर' को चुना है वह मौजूदा समय में लिखी जा रही इकहरी और एकायामी रचनाओं के 'भब्भड़' में एक गहरा रचनात्मक सुख प्रदान करता है । भाषा के स्तर पर एक घटना के रूप में रेखांकित किया जा सकने वाला यह उपन्यास कथ्य के स्तर पर आज के आदमी की तकलीफदेह साँसो की गवाही तो है ही, यह गवाही है उसके टूटकर भी न टूटने की जिद और आकांक्षा की भी ।
  • Vidrohi
    Chander Shekhar Prem
    100 90

    Item Code: #KGP-9225

    Availability: In stock

    विद्रोही
    ‘‘जनता जनार्दन के रूप में मेरी आत्माओं! राजा विपुलवर्द्धन के साथ हमारी निजी या जाती तौर पर कोई दुश्मनी नहीं है। वह स्वतंत्रता देवी का शत्रु है और हम देवी के पुजारी। वह बिलासपुर रियासत की जनता को पुश्त-दर-पुश्त अपना दास बनाकर रखना चाहता है और हम लोग उसे आजाद कराना चाहते हैं। वह अपने आपको ईश्वर का भेजा हुआ फरिश्ता समझता है और हम उसे पुकार-पुकारकर कहते हैं कि विपुलवर्द्धन! तुम भी हमारी तरह एक आदमी हो। वह कहता है कि उसे खुदा ने हमारे और तुमारे ऊपर हुकूमत करने के लिए भेजा है और हम लोग कहते हैं कि वह सब कुछ उसका झूठा प्रपंच है। इस प्रकार दोस्तो! हमारे और राजा साहब के दरम्यान दीवारें खड़ी हैं, जिन्हें तोड़ना हम सबका मूल उद्देश्य है। वह गरीबों का शोषण करके अपन भंडार भरता आ रहा है, और इधर इन गरीब किसानों को देखिए जो जेठ की कड़कती धूप, सावन-भादों की घनघोर बरखा में तथा पोह-माघ की ठिठुराती हुई सर्दी में दिन-रात परिश्रम करते मर जाते हैं और वह खलिाहनों पर से अनाज उठवाकर ले जाता हे और ये बेचारे किसान मुश्किल से गुजर कर पाते हैं।’’
    —इसी उपन्यास से
  • Aagaami Ateet
    Kamleshwar
    150 135

    Item Code: #KGP-210

    Availability: In stock


  • Jodadighi Ke Choudhary
    Pramath Nath Vishi
    125 113

    Item Code: #KGP-2010

    Availability: In stock

    जोड़ादीघी के चौधरी
    बंगला के लब्धप्रतिष्ठ ठषप्यासकार प्रमथनाथ  विशी के इम उपन्याम को बंगला साहित्य में  विशिष्ट स्थान प्राप्त  ।
    इम ऐतिहासिक उपन्याम में लेखन ने ईस्ट  इंडिया कम्पनी के दौर से बंगाल के जमीदारों  की जघन्यताओं का हृदय-द्रावक चिंब प्रस्तुत किया है । पारम्परिक हिंसा-प्रतिहिंसा, प्रतिशोध  एवं पलासी के युद्ध में बंगाल की दारुण अंतरंग  व्यवस्था की रोमांचपूर्ण गाथा इस उपन्याम्र का आधार है.... 
    आज के सन्दर्भ में यह उपन्यास इसलिए भी, महत्वपूर्ण  कि इसमें उस शास्त्रग्राही बंगाल के अतीत की वह झाँकी मिलती है जो हम आज प्रत्यश्न बंगला देश की मुक्तिवाहिनी में  देख रहे  है ।
  • Laajo
    Shanta Kumar
    100 90

    Item Code: #KGP-1968

    Availability: In stock


  • Papa, Muskuraiye Na!
    Prahlad Shree Mali
    200 180

    Item Code: #KGP-9299

    Availability: In stock

    मुस्कुराते हुए पापा कितने हैंडसम लगते हैं क्या पापा को यह जानकारी है। कभी तो मम्मी ने उन्हें बताया होगा। कौन जाने मम्मी ने उन्हें मुस्कुराते हुए देखा भी है या नहीं। मम्मी से पूछूं औ वे उदास होकर टेंशन में आ गईं तो। तो मम्मी की शुगर बढ़ जाएगी। वह गंभीर हो जाता है। अपनी मम्मी से बहुत प्यार है उसे। जितना प्यार करता है, उससे ज्यादा श्रद्धा है मम्मी के प्रति। यूं तो हर कोई अपनी मम्मी को चाहता है। महान् मानता है। लेकिन मेरी मम्मी वाकई ग्रेट हैं। इस विश्वास का ठोस आधार है अनंतके पास।
    मम्मी बड़ी संवेदनशील हैं। उसकी भावनाओं का ध्यान रखती हैं। कहीं वह कमजोर पड़कर भटक न जाए। अतिरिक्त सावधानी बरतती हैं मम्मी। तभी तो उस दिन पापा का पक्ष लेते हुए विस्तार से बताया था, उनके ऐसे स्वभाव के बारे में। जिस दिन पापा ने छोटी-सी बात पर तुनककर उसे एक झन्नाटेदार थप्पड़ मार दिया था। कहीं पापा के प्रति उसके भावुक किशोर मन में नफरत घर न कर डाले। इसी चेतनावश मम्मी ने लाड़-दुलार से पास बिठाकर उसे समझाई थीं। मम्मी की इस जागरूकता से अभिभूत है अनंत। वाकई मम्मी यदि यह सब नहीं बतातीं तो पापा के प्रति उसके मन में कड़वाहट निरंतर बढ़ती जाती। यह मम्मी का उस पर बहुत बड़ा उपकार है।
    —इसी पुस्तक से
  • Dharmkshetre Kurukshetre
    Shanker Shesh
    70 63

    Item Code: #KGP-2014

    Availability: In stock

    धर्मक्षेत्रे-कुरुक्षेत्रे 
    धृतराष्ट्र का विवाह! अंधे को चतुर्भुज बनाना ! कोण देगा अनंत अँधेरे को अपनी कन्या ? कौन करेगा अपंग जीवन का वरण ? प्रश्न टेढा था । सत्यवती दबाव डाल रही यी। लगातार पडी थी  मेरे पीछे ।
    माँ को तो एक बार समझा भी लो, दादी को समझाना कठिन होता है । पौत्र चाहे लूला हो, लँगडा हो, अपाहिज हो, लेकिन उसका ब्याह होना बहुत जरूरी है । आज़ तक समझ में नहीं आया, मौका पाते ही एक स्त्री दूसरी स्त्री पर अत्याचार क्यों करने लगती है । सत्यवती क्यों नहीं सोचती ।  अंधे से ब्याह करने वाली लड़की को आजन्म कारावास भोगना पडेगा । सारी जिदगी अंधे की पत्नी कहाना होया । राजघराने का आदमी हुआ तो क्या हुआ, अंधा तो अंधा है,  रहेगा । लेकिन सत्यवती को समझाता कौन ! मेरा पिता तो उसे समझा नहीं सका, फिर मैं किस खेत की मूली था !
    इच्छा  हुई अपना उदाहरण सामने क्यों न रखूँ। आखिर मैं भी पूरे जीवन बिना स्वी के रह सका या नहीं । सशक्त ददेवपुत्र-सा दिखाई देन वाला में । तो यह 'अंधा क्यों नहीं रह सकता । मेरे मामले में  सत्यवती इतनी कठोर क्यों हो गई थी और अब पौत्र  के मामले में। (इसी उपन्यास से)
  • Parv
    Bhairppa
    800 720

    Item Code: #kgp-147

    Availability: In stock

    पर्व
    भारतीय वाडमय में पंचम वेद के रूप में अधिष्टित महाभारत पर आधारित भैरप्पा की महान् औपन्यासिक कृति । इस उपन्यास में लेखक ने महाभारत के पात्रों, स्थितियों और घटनाओं का जो वस्तुनिष्ठ आलेखन प्रस्तुत किया है, वह अदभुत और अनुपम है । महापारतकालीन भारत की सामाजिक संरचना क्या तत्कालीन इतिहास और परंपराओं के लंबे अरसे तक अनुसंघान, व्यापक भ्रमण और अध्ययन पर आधारित यह उपन्यास भारतीय साहित्य की महान् उपलब्धि है । अतीतोन्मुखी भारतीय जनमानस के साथ जुडे महाभारत के पात्रों के अलंकरण और चमत्कारों एवं अतिशयोक्तियों की कैचुली उतारकर उन्हें मानवीय धरातल पर साधारण मनुष्य के रूप में प्रस्तुत करने के कारण यह उपन्यास वस्तुत: एक क्रांतिकारी जाते है । संक्षेप में इतना कहना ही शायद पर्याप्त हो कि 'पर्व' आधुनिक संदर्मों से जुडा महाभास्त का पुनराख्यान है ।
    'पर्व' का फलक भले ही महाभारत पर आधारित हो, लेकिन यह एक साहित्यिक कृति है-एक उपन्यास । पाठक इसे एक उपन्यास के रूप में ही स्वीकार करेंगे-ऐसा लेखक का अनुरोध है । 

  • Bhaykaal
    Ashok Gupta
    200 160

    Item Code: #KGP-483

    Availability: In stock

    अशोक गुप्ता का उपन्यास ‘भयकाल’ मूलतः सामाजिक उपन्यास है। कथाविन्यास को देखें तो यह मनोवैज्ञानिक और मनोविश्लेषणात्मक है। मनुष्य अपने संस्कार और रुचियों में ऐसी ग्रंथियां पाल लेता है कि वह अपने प्रिय परिवारजनों, यहां तक कि अपने वंशजों से भी भयाक्रांत रहता है और निरंतर अपनी दुर्गति की कल्पना से व्यथित रहता है। अशोक गुप्ता ने उपन्यास के एक चरित्र मिलकीत तनेजा के माध्यम से इस मनोवैज्ञानिक ग्रंथि के वैयक्तिक और पारिवारिक परिणाम का चित्रण किया है।
    दूसरी ओर, जानकी बल्लभ और भानुमती (भानुमती के कई नाम हैं। ये नाम परिस्थितियों और उसके चरित्र के घात-प्रतिघात से उसे मिल गए हैं। उसका एक नाम ‘करिया छबीली’ भी है) के साहसिक और संघर्षमय जीवन कथा के माध्यम से स्वातंत्र्योत्तर भारत के मानवीय और प्रगतिशील बदलाव या विकास का भी चित्रण किया गया है। दोनों प्रकार की कथाएं समांतर शैली में साथ-साथ चलती हैं। पात्र परस्पर टकराते भी हैं। इससे कथा रस का आस्वाद पाठकों को मिलता है और मोनोटोनी नहीं आने पाती है।
    गांवों में गैरजिम्मेदार और बिगड़ैल किशोर किस तरह के कुकृत्य करते हैं और कमजोर तबके के लोगों को सताते हैं इसका मार्मिक और मनोरंजक (भी) वर्णन है। समाज में बुरे लोग हैं तो अहेतु की सहायता करने वाले भी हैं।
    मुझे इस कथाकृति में यह बात विशेष रूप से अच्छी लगी कि आज जब हताशा और दिशाहारा प्रवृत्तियां हमारे साहित्य में आसन जमाए बैठी हैं, अशोक गुप्ता की यह रचना सामाजिक यथार्थ के आधार पर, रचनात्मकता से स्तर पर बने रहते हुए, प्रगतिशीलता और विकास की कथा कहती है।
    उपन्यास की भाषा और संवाद अपनी ताजगी से पढ़ने वालों और विचारकों का ध्यान आकर्षित करते हैं। अशोक गुप्ता मूलतः कहानीकार हैं और यह कृति उपन्यास होने के साथ बिखराव के बावजूद कहानी का भी रस देती है।
  • Roma Putri Ke Naam
    Shyam Singh Shashi
    300 255

    Item Code: #KGP-9355

    Availability: In stock

    श्याम सिंह शशि ने अनेक विधाओं में महत्त्वपूर्ण लेखन किया है। उन्होंने विश्व के अनेक देशों की यात्रा की है। वहां की जीवन स्थिति, प्रकृति, संस्कृति और मनःस्थिति का गहन अध्ययन किया है। उन्होंने लगभग एक हजार वर्ष पूर्व भारत छोड़कर गए रोमा समुदाय पर विशेष लेखन किया है। तीन करोड़ यायावर भारतवंशी रोमा समुदायों की जीवन पद्धति का उनको विशेषज्ञ माना जाता है। रोमा पुत्री के नाम उनकी विशेषज्ञता का एक और रचनात्मक चरण है।
    आत्माख्यान-यायावरी उपन्यास ‘रोमा पुत्री के नाम’ 
    श्याम सिंह शशि की रचनाशीलता का नया आयाम है। लेखक के शब्दों में, "...यह यायावरी उपन्यास कलेवर में भले ही बहुत बड़ा न लगे किंतु इसमें एक अनूठी दुनिया है जो यथार्थ की अद्भुत यात्रा है। कला और साहित्य का सत्यं शिवं सुन्दरम् के रूप में यायावरी प्रस्तुतीकरण है। मेरे नए-पुराने यात्रा-विवरणों की अनकही कथा है।य् लेखक ने परम घुमक्कड़ महापंडित राहुल सांकृत्यायन का भी इस संदर्भ में स्मरण किया है। इस उपन्यास को मानवीय अधिकारों के लिए संघर्षरत भारतवंशी रोमा समाज का दस्तावेज भी कहा जा सकता है।
    यह उपन्यास रोमा पुत्री कैथी की मार्मिक और रोचक दास्तान है। यूक्रेन के कीव नगर में जन्मी, वारसा शहर में पली-बढ़ी, जर्मनी के बर्लिन महानगर में युवती हुई कैथी की दास्तान जो यायावर है और चित्रकार है। कैथी का जीवन उकेरते हुए लेखक ने विश्व के बीच रोमा समुदाय के आत्मसंघर्ष को अंकित किया है। इस समुदाय के मन में अपने प्रति हुए निरंतर अन्याय के लिए अत्यंत आक्रोश है। विशेषकर हिटलर के रक्तशुद्धता वाले कांड के लिए। रोमा भारत को ‘बारोथान’ कहते हैं—‘बड़ा स्थान’। यहां आते रहना उनको भाता है। फिर भी, उनका जीवन एक रहस्य है। कैथी के संदर्भ में लेखक कहता है, फ्रोमा पुत्री कितने मूड्स हैं तुम्हारी कला में, तुम्हारे जीवन में!"
    हिंदी में अपनी तरह का यह अन्यतम उपन्यास है। एक जीवित यायावर समुदाय के जीवन-समुद्र का अवगाहन करती एक अत्यंत पठनीय रचना।
  • Anhad Naad
    Pratap Sehgal
    250 225

    Item Code: #KGP-35

    Availability: In stock


  • Postmortem
    Ajeet Kaur
    160 144

    Item Code: #KGP-2048

    Availability: In stock


  • Jahaanoon
    Manorma Jafa
    240 216

    Item Code: #KGP-197

    Availability: In stock

    कॉलेज में रक्षाबंधन की छुट्टी थी। अनुराधा सुबह-सुबह ही तैयार होकर निकल गई। मैं उसे फाटक तक पहुँचाने गई। हरसिंगार के पेड़ के नीचे खड़ी थी। जमीन पर बिखरे फूल महक रहे थे। मुझसे रहा नहीं गया। मैंने फूल बीनकर अपने दुपट्टे के एक कोने में रखने शुरू कर दिए कि तभी एक मोटरसाइकिल बराबर में आकर रुक गई। मैंने मुड़कर देखा, अनुराधा के राजू भैया थे।

    "क्यों भई, किसके लिए फूल बीन रही हो?"

    मन में तो आया कह दूँ ‘आपके लिए।’ पर  जबान नहीं खुली।

    "अनुराधा को लेने आया था। आज रक्षाबंधन है। बुआ जी के यहाँ उसे मैं ही पहुँचा दूँगा।"

    "पर वह तो अभी-अभी वहीं चली गई।"

    "मैंने तो उससे कहा था कि मैं आऊँगा! बड़ी बेवकूफ है।"

    "भूल गई होगी।"

    "तुम्हारा क्या प्रोग्राम है? तुम भी उसके साथ क्यों नहीं चली गईं? रक्षाबंधन में सब लड़कियाँ बहनें और सब लड़के उनके भैया," और वह हँसने लगे।

    "क्या मतलब?"

    "मेरा कोई मतलब नहीं था। तुम चलो तो मैं तुम्हें भी अनुराधा की बुआ के यहाँ ले चलता हूँ।"

    "नहीं, मुझे पढ़ाई करनी है। यहीं रहूँगी।"
    —इसी उपन्यास से
  • Toro Kara Toro-1 (Nirman)
    Narendra Kohli
    500 425

    Item Code: #KGP-1574

    Availability: In stock


  • Maafiya
    Girish Pankaj
    175 158

    Item Code: #KGP-2041

    Availability: In stock

    माफिया
    जानते सब हैं, पर लिखते बहुत कम है कि राजनीति के समान साहित्य में भी दल ही दल हैं, तिकड़पबाजियाँ और सौदेबाजियाँ हैं, अवसरवाद और खिलाऊ-पिलाऊवद है, अफसरों और नेताओं के 'साहित्यिक' हथकंडे हैं और संपादकों तथा सम्मानों के बिकाऊ झंडे हैं । गिरीश पंकज ने इस उपन्यास में संगोष्टियों आदि के माध्यम से बिना 'लोक-लाज' के भय के इन सबके कपडे उतार दिए हैं । अब यह पाठकों पर निर्भर करता है कि वे इस 'नंगेपन' पर 'कैसी नजर डालते हैं! उपन्यास का प्रमुख कथ्य बहुरूपी साहित्य-माफिया है, जिसके बीच-बीच से शोध-माफिया, विज्ञापन-पुराण, छंद-हत्या, ठेका-लेखन आदि पर भी लटके-झटके सफाई किए गए है । दूसरी ओर, एक आदर्शवादी साहित्यकार की मनोव्यथा, आकांक्षाएं-अपेक्षाएं और सपने भी फूट-फूटकर निकले हैं।
    उपन्यास इस दृष्टि से अंकों का काफी ऊँचा प्रतिशत अर्जित करता है कि इसके दर्जनों अच्छे-बुरे पात्र ऐसे हैं, जिनसे हम रोज़ मिलते हैं, और इसका घटनाक्रम ऐसा है, जैसा हमारे सामने दिन-रात घटित होता रहता है। कथानक का यह सामाजिक सरोकार साहित्य पर हावी होते माफिया राज से जुड़कर आज शायद हर सही-गलत साहित्यकार के रास्ते को किसी न किसी तरह प्रभावित कर रहा है ।
    गिरीश पंकज साहित्य की धारा में काफी तैर चुके हैं, इसलिए इनकी भाषाभिव्यक्ति के प्रवाह में एक कुशल तैराक की गति है । तय समझिए कि यह उपन्यास साहित्यिक गतिविधियों से जुड़े हर स्तर के पाठकों को पसंद आएगा, क्योकि वे इसके किसी न किसी पात्र से अपना तादात्म्य स्थापित किए बिना नहीं रह सकेंगे
  • Manushkhor
    Ganga Prasad Vimal
    595 476

    Item Code: #KGP-405

    Availability: In stock

    मानुषखोर इतिहास के रास्ते मनुष्य के भविष्य की एक ऐसी यात्रा है जिसे समझदार लोग सभ्यताओं की टकराहट से जोड़ेंगे परंतु आदमी की छोटी-छोटी ज़रूरतों पर जैसे किसी दूसरी ही ताकतका कब्ज़ा है। इतिहास में उसे पराशक्ति कहकर आदमी के अशक्त और अकेले होने को दुर्निवार ठहराया गया था। हमारे वर्तमान में हम उसे राजनीतिक चालों की गाथा में टोहते हैं। अब धीरे-धीरे स्पष्ट हो रहा है कि कोई दुष्चक्र है जो दुनिया के ज्यादातर लोगों को दारुण स्थितियों में जीने के लिए विवश करता

    मानुषखोर इस लिहाज से एक सीधी-सादी कथा है पर अपनी बुनावट में वह उन जटिलताओं को व्यक्त करने से परहेज़ नहीं करती जिनकी वजह से सत्ताएं आदमी को बांटने, उसे तोड़ने तोड़ने के अपने अदृश्य अभियान में लगी रहती हैं।

    क्या हमारा वर्तमान सचमुच नरभक्षियों से पटा पड़ा है? राजनीतिक वर्चस्व मानुषखोर है। तमाम तरह की विनाशलीलाओं के लिए किसी दूसरे को ज़िम्मेदार ठहराकर अपनी भूमिकाओं से पल्ला झाड़ने वाली यह नई सांस्कृतिक बिरादरी किस तरह से पर्यावरण को क्षत-विक्षत कर समूची पीढ़ियों को मनोरुग्णता के धार्मिक धड़ों में शामिल होने के लिए मजबूर कर रही है?

    इतिहासपुराकथाएंलोकचर्याएं काल्पनिक लगने लगी हैं-सभ्यता के नए संतरण की दहलीज पर मानुषखोर अवतरित हो रहा है...

  • G-male Express
    Alka Sinha
    300 270

    Item Code: #KGP-9376

    Availability: In stock

    बदलते समय के साथ वैचारिक मुठभेड़ करता यह उपन्यास पाठक को एक ऐसी दुनिया से रूबरू कराता है जो उसे चैंकाती है कि ये पात्र, ये परिवेश उसके लिए अपरिचित तो नहीं थे मगर वे उसे उस तरह से पहचान क्यों नहीं पाए? देवेन त्रिपाठी को मिली डायरी की तरह ही हमारी जिंदगी की किताब भी अनेक प्रकार के कोड्स से भरी है जिसे सभी अपनी-अपनी तरह से डिकोड करते हैं। इसीलिए उसे जानने और समझने का सिलसिला कभी खत्म नहीं होता। 
    स्कूल-काॅलेज की जिंदगी के बीच पनपते अबोध प्रेम की मासूमियत को चित्रित करता यह उपन्यास जब उसमें हो रही सौदेबाजी को उजागर करता है तब सारा तिलिस्म टूट जाता है और सवाल उठता है कि अगर दैहिक सुख के बिना प्रेम अधूरा है तो क्या यौन-सुख हासिल करना ही प्रेम की परिणति है? क्या स्त्री के लिए इस सुख की कामना करना अनैतिक है? सवाल यह भी है कि महज गर्भ धारण न करने से ही स्त्री की यौन-शुचिता प्रमाणित हो जाती है तो पुरुष की शुचिता कैसे प्रमाणित की जाए? पैसों की खातिर यौन-सुख देने वाली स्त्रियाँ अगर वेश्याएं हैं तो स्त्रियों को काम-संतुष्टि बेचने वाले पुरुषों को कौन सी संज्ञा दी जाए? इन सभी पहलुओं पर शोधपरक चिंतन करता यह उपन्यास स्त्रियों की काम-भावना की स्वीकृति का प्रश्न उठाने के साथ-साथ स्त्री-पुरुष की यौन-शुचिता को बराबरी पर विश्लेषित करने की भी मांग करता है क्योंकि बेलगाम संबंधों से पैदा हुई जटिलताओं को समझे बिना ‘आधुनिक’ होने का जोखिम नहीं उठाया जा सकता है।
    यह कृति निम्नतम से उच्चतम की एक ऐसी चेतना-यात्रा है जो बुद्धत्व अथवा महामानव में रूपांतरण का दावा करने के बदले पाठक को सही मायने में जाग्रत करती है।
  • Ushakaal
    Hari Narayan Aapte
    200 180

    Item Code: #KGP-2000

    Availability: In stock

    उषाकाल
    जिस वस्तु को प्राप्त करने की अभिलाषा मन से है वह मिले नहीं, बल्कि उसका महत्त्व दिन-प्रतिदिन और अधिक बढ़ता नजर आए तो ऐसी स्थिति में उस वस्तु को प्राप्त करने की कितनी उत्सुक्ता बढ़ जाती है, इसका अनुभव हर मनुष्य को है ही । राजा की भी कुछ ऐसी ही स्थिति थी । उसके मन में स्वामी रामदास के दर्शनों की उत्कट इच्छा थी । इधर बीजापुर से कोई समाचार न आया देखकर राजा का मन काफी उद्विग्न था । यह देखकर एक बार समर्थ के यहाँ परली जाने की चर्चा छेडी । राजा को स्वामी की बात पसंद आई और वे दोनों परली के पर्वतों की और चल पड़े ।
    चलते-चलते स्वामी जी ने अपना अनेक वर्षों का अनुभव राजा को बताया । दोनों एक गाँव के पास पहुंचे । गर्मी के दिन थे। धूप काफी थी, इसलिए दोनों ने मालदेव जी के मंदिर में अपना डेरा डाला । पिछली रात राजा को ज्वर काफी था । अत: डेरा डालते ही वे आराम करने लगे । मंदिर के पास ही एक नदी थी और उसके पार भी एक मंदिर था । राजा की वृष्टि उस मंदिर और उस नदी के तट की ओर गई। उन्हें एक विचित्र दृश्य देखने को मिला । यह देखते ही राजा के  क्रोध की सीमा न रही। वे एकदम अपनी जगह से उठे, मानो उनको इस बात का ज्ञान ही नहीं रहा कि पिछली रात को उन्हें ज्वर आया था । अपने कपडे उतारे और अपनी तलवार मुँह से पकड़कर पानी में कूद पड़े । [इसी उपन्यास से]

  • Paani Kera Budbudaa
    Susham Bedi
    300 270

    Item Code: #KGP-9310

    Availability: In stock

    ‘यही कहानी थी पिया की? यह कथन है या सवाल? नहीं, कथन नहीं हो सकता। ऐसे खत्म नहीं हो सकती यह कहानी! ...शायद जिंदगी का सच यही है। कुछ भी नहीं है वहां पर हम बहुत कुछ भरकर उसी को सच मान बैठते हैं। ...पिया के मन में विरक्ति-सी हुई। सच क्या हस्ती है हमारी? कबीर के ही लफ्जों में पानी के बुलबुले जैसी!’ ये पंक्तियां ‘पानी केरा बुदबुदा’ उपन्यास का सारांश सरीखी हैं। सुप्रसिद्ध लेखिका सुषम बेदी का यह नवीनतम उपन्यास—जीवन, प्रेम, विवाह, सुख, विराग आदि शब्दों को समकालीन संदर्भ देते हुए लिखा गया है। उपन्यास विदेशी पृष्ठभूमि में लिखा गया है, लेकिन इसकी बेचैनियां सार्वदेशिक हैं।
    पिया इस उपन्यास का केंद्रीय चरित्र है। उसका वैवाहिक जीवन, विवाह विच्छेद, तलाक के बाद प्रेम को फिर विवाह में बदलने की आकांक्षा, पुत्र और उसका पारिवारिक परिदृश्य—ऐसी अनेक बातों से मिलकर इस उपन्यास की कथावस्तु निर्मित हुई है। इस निर्मिति में निशांत, अनुराग, दामोदर, रोहन आदि बहुत दिलचस्प तरीके से शामिल हैं। पिया के लिए सेक्स कोई दुराग्रह नहीं है, पर वह ‘साथ’ चाहती है। विवाह इसीलिए उसे आश्वस्त और आकर्षित करता है। लेकिन नियति या मानव स्वभाव का निर्णय कुछ दूसरा है।
    सुषम बेदी कथानक को गतिशील रखते हुए जीवन की मूलभूत चिंताओं पर बात करती हैं। स्वाभाविक रूप से स्त्री-विमर्श भी आता है। पिया के बारे में लेखिका का कथन है, ‘अनुराग ने उसके फूलों की गुलाबी रंगत ही देखी थी। पर वहां खून के थक्के भी जमे हुए थे।’ ऐसी जाने कितनी विडंबनाएं इस उपन्यास को स्त्री-जीवन का मार्मिक दस्तावेज बना देती हैं। सुषम बेदी का लंबा जीवनानुभव और जनमनोविज्ञान समझने का ढंग भाषा के अनूठे स्वरूप में व्यक्त हुआ है। बेहद पठनीय और विचारोत्तेजक उपन्यास। 
  • Su-Raaj
    Himanshu Joshi
    80 72

    Item Code: #KGP-2105

    Availability: In stock

    सु-राज
    तीन अलग-अलग उपन्यासिकाएँ होने के बावजूद, कहीं ये एक ही तसवीर में समाई तीन अलग-अलग तसवीरें हैं। रूप, रंग, भावभूमि और निरूपण, सब अलग- अलग हैं। अलग-अलग हैं इनकी पृष्ठभूमियाँ । हिमालय का कुमाऊँनी क्षेत्र है, तराई की अभिशप्त धरा और पश्चिमी नेपाल का अत्यंत पिछड़ा अंचल । अनेक अंतर्विरोध हैं, परन्तु इन भिन्नताओं के बावजूद भी कहीं घोर अभिन्नता । यों अभाव, अन्याय से उपजा मानव-मात्र का संत्रास सम्पूर्ण विश्व में सर्वत्र समान है । यंत्रणाएँ समान हैं ! रूप और आकार में अंतर हो सकता है, परन्तु मनुष्य, सर्वत्र मनुष्य ही है, उसकी वेदना भी सर्वत्र उसी की वेदना है । उसे देश, काल, रूप, रंग, धर्म, भाषा से विभाजित नहीं किया जा सकता ।
    संघर्षरत 'सु-राज' के गांगि 'का हों, या अन्याय की आग में धधकता 'अंधेरा और' का परसिया या 'काँछा' उपन्यासिका का नायक सुदूर नेपाल का अनाथ श्रमिक शिशु काँछा, अपने अस्तित्व के लिए जूझते ये पात्र, मात्र पात्र ही नहीं, तिल-तिल मरकर कहीं अपने समय के 'काल-पात्र' भी हैं ।
    साहित्य में हिमांशु जोशी ने नए-नए प्रयोग किए हैं, उनका एक उदाहरण है यह कृति, जो अतिशय द्रावक ही नहीं, दाहक भी है।
  • Kashmkash
    Manoj Singh
    520 468

    Item Code: #KGP-846

    Availability: In stock


  • Kahin Kuchh Aur
    Ganga Prasad Vimal
    200 180

    Item Code: #KGP-9067

    Availability: In stock


  • Idannamam
    Maitreyi Pushpa
    550 440

    Item Code: #kgp-2003

    Availability: In stock

    इदन्नमम
    समकालीन कथा-लेखन में सक्रिय एक सशक्त हस्ताक्षर मैत्रेयी  पुष्पा की कलम से निकली औपन्यासिक कृति इदन्नमम से बुनी गई है तीन पीढियों की बेहद सहज और संवेदनशील कहानी । कहानी जो बऊ (दादी), प्रेम (माँ) और सदा (उपन्यास की नायिका)--तीनों को समानांतर रखने के साथ-साथ, एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा भी करती है । विरोधाभास की इस प्रतीति को लेखिका ने सक्षमता, सूक्ष्मता और पारदर्शी भाषाजाल से बुना है, जो अत्यंत पठनीय है और अपने स्वर में मौलिक भी।
    इदन्नमम के आँचल से छिपा है विंध्य का अंचल । विंध्य की पहाडियों से घिरे वर्णित गांव श्यामली और सोनपुरा के जन-जीवन की जीवंत धड़कनों को यह उपन्यास सांस-दर-सांस कहना है और पाठक को लगता है मानो यह पूरे अंचल में कदम-कदम चल रहा है । इन गाँवों में-अंचल से धूल है, नदी है, पर्व  है, गीत है, आहें-कराहें हैं, सत-असत है और है रूढियों और परंपराओं की भरी-पूरी दुनिया । उपन्यास के अंचल की इस दुनिया से आकांक्षा है, ईषर्या है और उन पर झपटते भेड़िये हैं, उन्हें त्यागते 'साधु' हैं तथा हैं हाढ़-मांस के सौ फीसदी पात्र ! शोषित होने से इंकार करते ये पात्र इस उपन्यास की अतिरिक्त विशेषता हैं ।
    वरिष्ट कथाकार राजेन्द्र यादव के शब्दों में कहें तो इदन्नमम में "मिट्ठी-पत्थर के ढोकों या उसी डालियों और खुरदुरी छाल के आसपास की सावधान छटाई करके सजीव आकृतियाँ उकेर लेने की अद्भुत निगाह हैं लगभग "रेणु" की याद दिलाती हुई ।"
    वास्तव में घनीभूत संवेदना और भावनात्मक लगाव से लिखी गई इदन्नमम की कहानी समकालीन हिंदी उपन्यास जगत् में एक घटना है, जिसका स्वागत किया जाना अभीष्ट है ।
  • Lohit
    Anita Sabharwal
    400 360

    Item Code: #KGP-9375

    Availability: In stock

    ‘लोहित’ उपन्यास विचारोत्तेजक कथानक और उत्कृष्ट भाषा-शैली वेफ कारण समकालीन कथा साहित्य में अनूठी संवेदना के साथ अभिव्यक्त होता है। लेखिका अनिता सभरवाल ने देश और व्यक्ति की नियति का जो सघन चित्राण प्रस्तुत किया है वह अद्भुत है। उपन्यास की कथावस्तु असम प्रदेश के परंपरागत जीवन प्रवाह के साथ वर्तमान राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक परिवेश को आत्मसात् कर विकसित हुई है। असम की सामाजिक कुरीतियों (विशेषकर जातिवाद) के कारण उत्पन्न पीढ़ी-संघर्ष का ज्वलंत वर्णन किया गया है। युवा वर्ग के भटकाव का यथार्थस्वरूप रचनाकार ने वहां रहते हुए देखा, अनुभव किया। हितेन और जोयमती जैसे मुख्य चरित्रों के द्वारा लेखिका ने उस रोशनी की तलाश की है जो तनाव, अवसाद, विघटन, हताशा और मोहभंग के घने अंधकार में न्याय, समानता, एकता की उम्मीद जगाती है।
    उल्लेखनीय है कि असम के जन्म से लेकर आज तक उसके प्रत्येक स्पंदन का साक्षी ब्रह्मपुत्र नद इस उपन्यास का केंद्रीय पात्र है। इसे लोहित, लौहित्य, दिहांग, सियांग जैसे नामों से भी पुकारा जाता है। पौराणिक अवधारणाओं व वर्तमान वैचारिक सक्रियताओं को लोहित कथा एवं आत्मसंवाद के सहमेल से प्रस्तुत करता है। लोहित का आत्मस्वीकार है, ‘मैं क्या करूं? मैं तो कहीं जा भी नहीं सकता। ...यहां के दुःख भी मेरे, सुख भी मेरे। फर्क बस इतना है कि मेरे दुःख किसी को दिखाई नहीं देते।’ अगोचर दुःखों और संघर्षों का पठनीय वर्णन पाठकों के हृदय को छू लेगा, यह विश्वास है। यह मानो ‘असम की आत्मकथा’ ही है।
  • Manohar Shyam Joshi Ke Teen Upanyas
    Manohar Shyam Joshi
    350 263

    Item Code: #KGP-819

    Availability: In stock

    मनोहर श्याम जोशी के तीन उपन्यास

    हरिया हरक्यूलीज़ की हैरानी: ‘कुरु-कुरु स्वाहा’ और ‘कसप’ उपन्यासों से मनोहर श्याम जोशी ने उत्तर आधुनिक शिल्प और चिंतन की प्रतिष्ठा करने का जो सिलसिला शुरू किया था उसी को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने इस उपन्यास में कथा को ही कथानक बनाते हुए सत्य और गल्प की सीमा-रेखा को संशय के रंग में रँग दिया है।
    ० 
    ट-टा प्रोफेसर: इस उपन्यास में मनोहर श्याम जोशी ने एक साधारण पात्र को महानायक और महामूढ़ के मिथकीय फ्रेम में मढ़ दिखाने वाले अपने कथा-कौशल का प्रभावशाली प्रदर्शन किया है। विशिष्ट बनने के प्रयास में मामूली लोगों की दुनिया में गैर-मामूली ढंग से हास्यास्पद प्रतीत होने वाले मामूली प्रोफेसर ट-टा की हास्यास्पद लगने वाली मामूली प्रेम-कहानी में भी लेखक अमर प्रेम-कहानी के तत्त्व देखता और दिखाता है।
    ० 
    हमज़ाद: मनोहर श्याम जोशी की पिछली कथाकृतियों की ही तरह यह उपन्यास भी कथ्य और शिल्प की दृष्टि से हिंदी कथा-संसार में एक नयी सड़क बनाता है। भाषा की बहुरंगी नोक-पलक पर अपने सर्वविदित अधिकार को भी फिर प्रमाणित करते हुए उन्होंने इस बार घटिया शाइर तख़तराम का भेस बनाकर ऐसा गद्य लिखा है जो निश्चय ही उर्दू को हिंदी की ही शैली मानने वाले हिंदी-प्रेमियों को और देवनागरी में फ़ारसी सही लिखने का आग्रह करने वाले उर्दूपरस्तों को समान रूप से सुखी-दुखी करेगा।
  • Aalaap-Vilaap
    Rajendra Laharia
    150 135

    Item Code: #KGP-298

    Availability: In stock

    आलाप-विलाप
    कथाकार राजेन्द्र लहरिया के उपन्यास अपने समय से मुठभेड़ करते कथ्य के साथ ही मर्म को छुने वाले होते हैं और उनका शिल्प भी नव्यता से भरा और पाठकीय जिज्ञासा को उकसाने वाला होता है । वे अपने उपन्यासों को 'कहानी' की तरह साधते हैं, जहाँ कुछ भी फालतू होने  (लिखने) की गुंजाइश नहीं होती । 'आलाप-विलाप' भी इसका अपवाद नहीं है । बकौल लेखक, 'सकेतों की 'भाषा मनुष्य हमेशा से समझता आया है । कोई कहानी या उपन्यास लिखते वक्त मेरा ध्यान इस बात पर हमेशा बना रहता है कि मेरा काम यदि एक शब्द लिखने से चलता है तो अनावश्यक दस शब्द क्यों लिखूं! शब्दों की फिजूलख़र्ची तो कई तरह के नुकसान करती है... 
    'आलाप-विलाप' के बारे में एक सुधी पाठक की राय द्रष्टव्य है : 'कथाकार राजेन्द्र लहरिया का लपन्यास 'आलाप-विलाप' मार्मिकता से भरा व मूलत: राजनीतिक, प्रशासनिक और सांस्कृतिक छदमों को उदूघाटित करता है। जीवन की भयावह स्थितियों इस उपन्यास को जीवंत कथ्य देती है । छोटे-छोटे उपकथानकों में परिवेश की  पीड़ाओं के झकझोरने वाले वर्णन इसके प्रभाव को सघन करते हैं। हमारे समय की एक प्रमुख समस्या नक्सलवाद के उभार और उसकी वजहों को भी इस उपन्यास में देखा-पहचाना और समझा जा सकता है । प्रशासनिक और सांस्कृतिक-साहित्यिक छदमों और पाखंडों की लीलाएँ गरीब, कमजोर और संवेदनशील व्यक्तियों तथा तबकों को क्या-क्या नचाती हैं, इसका-दिलचस्प और बेधक दिग्दर्शन इस उपन्यास में है। और खास बात यह है कि  अँधेरे समय और स्याह चरित्रों के बीच भी उम्मीद की  कौंध से भरे कुछ ऐसे उजले चरित्र यह उपन्यास हमें देता  है, जो लड़ाई को बेहद कठिन समझते हुए भी अविचल  रूप से संघर्ष करते है, और इसलिए उनकी हार भी हमें  निराशावाद की ओर नहीं ले जाती । वह इस छोटे से उपन्यास  की बड़ी खुबी है... 
    कहा जा सकता है कि 'आलाप-विलाप' आकार से लघु, मगर सरोकार में बडा उपन्यास है ।
  • Hamara Kshitij
    Sudhakar Adib
    180 162

    Item Code: #KGP-7841

    Availability: In stock


  • Uttar Kand (Paperback)
    Bhairppa
    300 240

    Item Code: #UK pb

    Availability: In stock

    वाल्मीकि के ‘रामायण’ का अध्ययन करते समय हमें चरित्रें की दृष्टि से, चरित्र-चित्रण की दृष्टि से, घटनाओं की स्वाभाविकता की दृष्टि से, वर्णनों के औचित्य की दृष्टि से और चरित्रें के मनोवैज्ञानिक विश्लेषण की दृष्टि से जो कमियाँ नजर आती हैं, उन सभी का समाधान उत्तर कांड नामक इस उपन्यास में मिलता है। जैसा कि ‘पर्व’ में किया गया था, ‘उत्तर कांड’ में भी चरित्रें और घटनाओं को मिथकीकरण से मुक्त करके, स्वाभाविक परिवेश में प्रस्तुत कर दिया गया है। इसलिए इसको आधुनिक गद्य-महाकाव्य होने की प्रतिष्ठा भी मिली है। इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है 
  • Mein Bhi Aurat Hoon
    Ansuya Tyagi
    245 196

    Item Code: #KGP-183

    Availability: In stock

    मैं भी औरत हूँ
    ‘हे भगवान् ! ओंकार चुप क्यों हो गया है ? क्या अब वापस वही स्थिति आ पहुँची है, जिससे मैं अब तक डरती आई हूँ ? जिस सच्चाई को जानकर पिछले दो पुरुष--नकुल व सौरभ--मुझे छोड़कर चले गए थे--एक प्रकार से मुझे ठुकराकर--बल्कि सौरभ ने तो अपनी पौरुष की कमी ही मेरे सिर पर थोप दी थी, मुझे ही दोषी ठहरा दिया था--पर ओंकार तो मुझसे शादी कर चुका है। क्या वह अब मुझसे तलाक लेने की सोचेगा ? कितनी जगहँसाई होगी, यदि कोर्ट में यह केस गया तो। सब मुझ पर कितना हँसेंगे ! कहेंगे, अरे, जब भगवान् ने ही तुझे इस लायक नहीं बनाया तो क्यों इच्छा रखती है वैवाहिक जीवन जीने की ! क्या संन्यासिनें इस दुनिया में नहीं रहतीं ? विधवाएँ नहीं रहतीं ? क्या कामक्रीड़ा इतनी अधिक महती आवश्यकता बन गई, जो इसने पूरी सच्चाई अपने होने वाले जीवनसाथी को भी नहीं बताई ? क्या पता, मीडिया इस बात को बहुत अधिक उछाल दे ! आखिर उन्हें तो एक चटपटा मसाला चाहिए लोगों को आकर्षित करने का। जिस बात को मैं इतने वर्षों से छुपाती आई हूँ, वही दुनिया के सामने मुझे नंगा कर देगी। इस नग्न सच्चाई को जानकर लोग मेरे माता-पिता को कितनी दयनीय दृष्टि से देखेंगे ! ओह ! इस वृद्धावस्था में क्या मेरे पापा, मेरे दादा जी ऐसी बातें सहन कर पाएँगे ?’
    (इसी पुस्तक से)
  • Aranya-Tantra
    Govind Mishra
    300 270

    Item Code: #KGP-659

    Availability: In stock

    ”भारत का वह एक प्रान्त था, प्रान्त की वह राजधानी थी, राजधानी का वह क्लब था। देखें तो पूरा देश ही था... क्योंकि अफसर जो यहाँ आते थे, वे देश के कोने-कोने से थे।“...
    ”ये जो खेल रहे हैं...आला सर्विस के हैं, बाहर और यहाँ खेल में भी वे स्टार हैं। यहाँ से जाकर कुर्सी पर बैठ जायेंगे, सरकार हो जायेंगे। सरकारी खाल ओढ़े बैठे। उस खोल के भीतर सब छिपा रहता है, जो यहाँ खेल में झलक जाता है क्योंकि खेल में भीतर की प्रवृत्तियाँ बाहर आये बिना नहीं रहतीं।
    स्टार...जो ये खुद को लगाते हैं, या जंगल चर रहे जानवर, किसिम-किसिम के जानवर...ये क्या हैं...गधा सोच रहा था।“
    प्रशासन के इस जंगल में हाथी, हिरन, ऊँट, घोड़ा, खच्चर, तेंदुआ, रीछ, बायसन, बन्दर तो हैं ही, बारहसींगा, नीलगाय और शिपांजी भी हैं। सबसे ऊपर है शेर-सीनियर। वह जाल भी खूब दिखाई देता है जो उनकी उछलकूद अनायास ही बुनती होती है। यह है ‘अरण्य-तंत्र’, गोविन्द मिश्र का ग्यारहवाँ उपन्यास, जिसमें वे जैसे अपनी रूढ़ि (अगर उसे रूढ़ि कहा जा सकता है तो)-संवेदनात्मक गाम्भीर्य-को तोड़ व्यंग्य और खिलंदड़ेपन पर उतर आये दिखते हैं। यहाँ यथार्थ को देखा गया है तो हास्य की खिड़की से। फिर भी ‘अरण्य-तंत्र’ न व्यंग्य है, न व्यंग्यात्मक उपन्यास। अपनी मंशा में यह लेखक के दूसरे उपन्यासों की तरह ही बेहद गम्भीर है।
    ”बायीं तरफ़ की सिन्थैटिक कोर्ट-कोर्ट नं. 2 के ठीक ऊपर लॉन के किनारे कभी दो बड़े पेड़ थे, जिनमें से एक पहली कोर्ट बनाने के लिए जो खुदाई हुई थी उसके दौरान बलि चढ़ गया। दायीं तरफ़ की कोर्ट-कोर्ट नं. 1 के आखिरी छोर पर भी दो बड़े पेड़ थे-जुड़वाँ, एक हल्के गुलाबी रंग के फूलों वाला, एक हल्के बैगनी रंग के फूलों वाला। उनमें से एक कोर्ट नं. 1 के तैयार होने के बाद शेर-सीनियर की सनक और सियार-पाँड़े की चापलूसी में ढेर हो गया। तो बड़े पेड़ अब दो ही बचे थे...एक इस तरफ़, एक उस तरफ़...
    दो वे पेड़ अलग-थलग पड़े, अकेले थे, उदास...भयभीत भी।“ 
  • Rangey Raghav Teen Charchit Upanyas
    Rangey Raghav
    550 495

    Item Code: #KGP-2005

    Availability: In stock

    रांगेय राघव हिंदी के उन विशिष्ट कथाकारों में हैं जिनकी रचनाएं अपने समय को लांघकर भी जीवित रहती हैं। रांगेय राघव के तीन उपन्यासों—‘आग की प्यास’, ‘छोटी सी बात’ और ‘दायरे’ को पाठकों की सुविधा के लिए यहां एक ही जिल्द में प्रस्तुत किया जा रहा है—
    ‘आग की प्यास’ रांगेय राघव का एक बहुचर्चित उपन्यास है, जिसकी कथावस्तु के केंद्र में ग्रामीण जीवन है—वहां की राजनीति, अर्थव्यवस्था और बदलता हुआ सामाजिक-धर्मिक परिवेश। लेकिन मुख्य कथावस्तु अर्थकेंद्रित है। समाज के कुछ इने-गिने लोगों की धन की प्यास कैसे वृहत्तर समुदाय का जीवन नारकीय बनाती जा रही है, यह इस उपन्यास में प्रभावशाली ढंग से चित्रित हुआ है।
    ‘छोटी सी बात’ रांगेय राघव का अत्यंत लोकप्रिय एवं पठनीय उपन्यास है। कलेवर में भले ही यह लघु है परंतु अपने कथ्य में अत्यंत विराट है। कुल मिलाकर यह उपन्यास एक जीवंत दस्तावेज है।
    ‘दायरे’ उपन्यास का केंद्र एक अवैध (?) बच्चे और उसकी मां की यातना है, लेकिन उसके माध्यम से लेखक ने स्त्री-पुरुष के संबंधों से लगाकर धर्म-संस्कृति तक को अपने दायरे में ले लिया है। एक तीव्र संवेदनात्मक तथा वैचारिक द्वंद्व उपन्यास में शुरू से आखिर तक चलता रहता है। रांगेय राघव ने हिंदी कथा साहित्य को रोजा, सत्यदेव, फादर तोलियाती के रूप में तीन अमर पात्र इस उपन्यास में दिए हैं...
  • Aranyakaand
    Pranav Kumar Bandhopadhyaya
    250 225

    Item Code: #KGP-2012

    Availability: In stock

    अरण्यकाण्ड
    रामकथा के एक अंश पर आधारित आख्यान है अरण्यकाण्ड । आज के संदर्भ में । आज के समय की पूष्ट्रभूमि में जीवन की घटनाओं को जिस आदिकथा के आधार पर प्रस्तुत किया गया है, वह मनुष्य को
    निरंतर कुरेदती रहती । है यह यात्रा का एक पड़ाव मात्र । छोटा-सा । इस पड़ाव  में कई बार विराम तो आता है किंतु अंतत: यह अंत नहीं है ।
    प्रणव कुमार वंद्योपाध्याय की यह कथाकृति बारंबार पाठक को उद्वेलित करती है । यह कृति प्रस्तुत करती है मनुष्य की तात्कालिक पराजय और मनुष्य की ही जिजीविषा । लेखक की यह कथाकृति समय का एक असमाप्य संबोधन है ।
  • Shaam Ki Jhilmil
    Govind Mishra
    300 270

    Item Code: #KGP-9309

    Availability: In stock

    बुढ़ापे में अकेले हो जाने पर, फिर जी भर जी लेने की उद्दाम इच्छा, उसे साकार करने के प्रयत्न, एक-पर-एक...कुछ हास्यास्पद, कुछ गंभीर, कुछ बेहद गंभीर कि जीवन इहलोक और परलोक में इस पार से उस पार बार-बार बह जाता हो....कोई सीमारेखा नहीं। हताशा, जीने की मजबूरी, कुछ नया लाने की कोशिश...दरम्यान उठते जीवन सम्बन्ध मूलभूत प्रश्न
    गोविन्द मिश्र का यह बारहवाँ उपन्यास वृद्धावस्था के अकेलेपन और जिजीविषा के द्वन्द और टकराहट पर लिखा गया संभवतः हिंदी का पहला उपन्यास है।
  • Na Radha Na Rukamani
    Amrita Pritam
    140 126

    Item Code: #KGP-2103

    Availability: In stock

    आज हरकृष्ण को अपना वह सपना याद आया तो लगा—इंसान ने सचमुच कभी इन्सान लफ़ज़ के अर्थ के नहीं जाना, और न उसने कभी धर्म लफ़ज़ के अर्थ को जाना है—
    और उसी सांस में हरकृष्ण को अहसास हुआ कि इंसान ने अभी तक रिश्ता लफ़ज़ की भी  थाह नाते पाई है... 
    रिश्ता लहू के कौन-कौन से तार से जुड़ता है, लोगों को सगा कर जाता है, और कौन-कौन से तार से उखड़कर लोगों को पराया कर जाता है, कुछ भी हरकृष्ण  की पकड़ में नहीं आया । लेकिन जिंदगी को सुनी हुई और भुगती हुई कुछ हकीकतें थी जो उसके सामने एक खुली किताब की तरह थीं—

    -इसी उपन्यास से
  • Sunanda Ki Dairy
    Raj Kishore
    390 351

    Item Code: #KGP-374

    Availability: In stock

    एक थी सुनंदा 
    संपन्न परिवार की लड़की । मित्र से पति बने मलय के  साथ नहीं बनी, तो वह किसी नीहारिका की तरह शून्य में विचरण करने लगी । कभी इस शहर में, कभी  उस शहर में  । उसने कई नौकरियाँ कीं, परंतु स्वतंत्रता की उसकी चेतना ने उसे कहीं भी टिकने नहीं दिया । यह एक अदृश्य बेचैनी का शिकार थी । उसके मन में कई तरह के सवाल उमड़ते-घुमड़ते रहते थे, पर किसी भी उत्तर से उसे संतोष नहीं होता था । उसकी यह खोज ही उसे नैनीताल ले आई, जहाँ वह कुछ दिनों तक विश्राम करना चाहती थी, ताकि आगे की जिंदगी की कोई रूपरेखा उभर सके ।

    एक था सुमित ।
    मस्त, फक्कड़ और विचारशील । माँ-बाप नहीं रहे, तो पारिवारिक संपत्ति को अपने गाँव के कल्याण के लिए समर्पित कर वह आवारगी करने लगा । उसकी एक अंतरंग मित्र मंडली थी, जिसके आर्थिक सहयोग से वह अपनी मनचाही जिंदगी बिता रहा था । उसकी जिंदगी में किताब, शराब और सिगरेट के अलावा और कुछ नहीं था । घुमते-फिरते वह भी नैनीत्ताल आ गया । संयोग से यह उसी गेस्ट हाउस में ठहरा जहाँ सुनंदा ठहरी हुई थी ।

    दोनों की मुलाकात दोनों  के ही लिए एक अविस्मरणीय घटना बन गई । सुनंदा और सुमित विभिन्न विषयों पर बातचीत करने लगे, जैसे ईश्वर, धर्म, नैतिकता, प्रेम, विवाह, स्त्री, लोकतंत्र, मानव अधिकार आदि । इसके साथ ही, दोनों के हृदय अनुराग की आभा से भरते चले गए । लेकिन परिपाक की ऐश्वर्यमयी रात के तुरंत बाद जुदाई का मुहूर्त आ पहुंचा - दोनों की जिंदगी को एक नई दिशा प्रदान करने के लिए ।

    'सुनंदा की डायरी' विचार-विमर्श के इन्हें घटनापूर्ण दिनों का दिलचस्प दस्तावेज है ।
  • Suraj Kiran Ki Chhanv
    Rajendra Avasthi
    100 90

    Item Code: #KGP-SKCM

    Availability: In stock


  • Khilafat
    Govind Mishra
    430 366

    Item Code: #KGP-9374

    Availability: In stock

    ‘‘अब्बा हुजूर! हम पढ़े-लिखे लोग हैं, तो कभी मज़हबी नज़रिये से थोड़ा अलग हटकर भी हमें देखना चाहिए, अपने गिरेबान में झाँकना चाहिए। दुनिया में मुसलमान जो इस वक्त एक तरह के तूफान में फँसा हुआ है, उसमें हम मुसलमानों ने ही खुद को डाला है...मिडिल ईस्ट की पाक ज़मीं पर इस्लाम के  कितने फिरके  आपस में लड़-झगड़ रहे हैं, मुसलमान ही मुसलमानों को मार रहे हैं...
    हिन्दुस्तान में जिहादी, हमारे अशरफ जैसे एक-दो ही हुए। यह इसलिए कि यहाँ कितने मज़हब, कितनी जातियाँ, कितने खयालात...कितने-कितने सालों...पहले तो साथ रहने को मजबूर हुए, फिर रहने लगे, रहते-रहते एक दूसरे से लेने-देने सीखने लगे। सदियों की इस ‘चर्निंग’ को हमें पहचानना चाहिए... 
    सऊदी इस्लाम की जगह हिन्दुस्तानी इस्लाम क्यों नहीं...जो हिन्दुस्तान में कुदरतन ईजाद हो चुका है...जिस तरह इतने मज़हब यहाँ साथ रहते हैं, वैसे ही इस्लाम के मुख्तलिफ फिरके मिडिल ईस्ट या कहीं भी क्यों नहीं रह सकते...’’
    इस्लामिक स्टेट...अबूबकर बगदादी की ‘खिलाफत’ के परिवेश पर लिखा गया हिन्दी का पहला उपन्यास...आई.एस. सम्बन्धी विस्तृत जानकारियों के बीच, यहाँ कई अहं सवालों को उठाया गया है, जैसे कि आज अगर इस्लाम को दुनिया अपने सामने खड़ी सबसे बड़ी चुनौती को रूप में देख रही है तो क्यों...इस्लाम अमन का मज़हब है या कि जंग का...दूसरे मज़हबों की तरह वक्त के साथ-साथ इस्लाम भी क्यों नहीं बदलता या खुद को बदलने देता... नौजवानों की जि़न्दगी बेहतर बनाने की बजाय वह उन्हें जिहाद की आग में क्यों झोंक देता है, लड़कियों की शिक्षा, आज़ादी...और इस सबके नीचे अन्डरकरैन्ट की तरह कश्मीर की समस्या। 
    कश्मीर की शिया लड़की, सुन्नी लड़का...दोनों में बचपन से प्रेम, उनके निष्कलुष सपने...उल्टी बहती हवा उन्हें किस तरह अपनी जद में ले लेती है और वे किस तरह बाहर निकलने की कोशिश करते हैं...अबूबकर की खिलाफत के खिलाफ उनकी खिलाफत क्या शक्ल इख्तियार करती है... 
    हर बार की तरह गोविन्द मिश्र अपने इस नये उपन्यास में फिर नये परिवेश, नये विषय के साथ प्रस्तुत हैं।
  • Khabar
    Pranav Kumar Bandhopadhyaya
    1150 1035

    Item Code: #KGP-584

    Availability: In stock

    अपने कथ्य को कम शब्दों में रखना वंद्योपाध्याय की विशेषता है। वह अकारण शब्दों को विस्तृत नहीं होने देते। जब वह जगदंबा द्वारा पत्नी पर मार-काट सामने लाते हैं, जबान को बहुत फैलने नहीं देते। कथा में परेशान विनायक सामने आता है। उपन्यास में जब कथा आगे चलती है, अलग किस्म के अनेक पात्र सामने आ जाते हैं। उपन्यास में असंख्य पात्र हैं। इन्हीं से उपन्यास अपना आकार पाता है। कथा के असंख्य चरित्र आते और जाते हैं, और वे फिर आ जाते हैं। विनायक के बाद मुख्य चरित्र है नैना। दूसरे तमाम बिहारीपुर के लोगों के माफिक वह एक औरत है, जो सबसे अलग है। अंत में विनायक का एकदम चले जाना एक विराट् घटना है। हम महसूस करते हैं बिहारीपुर की हंसी अब हलकी हो गई। बस, बिहारीपुर फिर भी इसी तरह चलता रहता है।
    -द टाइम्स ऑफ इंडिया

    उपन्यास की घटनाएं रोचक ढंग से सामने आती हैं। ‘मालगुडी डेज़’ की तरह उपन्यास आगे और पीछे जाता रहता है। उपन्यास के तमाम पात्र अपने-अपने तरीके से सामने तो आते हैं, लेकिन कई बातें एकदम अलग हैं। उपन्यास के प्रत्येक अंश में कई बातें एकदम नहीं होतीं, जिससे कथा एकदम बदल जाती है। दूरदर्शन के धारावाहिक ‘नुक्कड़’ में भी इसी तरह बनती और टूटती है। 
    -इंडियन एक्सप्रेस

    खबर
     की तमाम बातें स्थानीय भाषा और लहजे पर सामने आती हैं। कथा में कुछ लोग तो मेहनतकश हैं, कुछ भंगी हैं, कुछ हैं स्थानीय गुंडे और शराबी। गरीबी की मार लोगों पर इतनी ज्यादा है कि वे चटपटी बातों के अलावा कुछ और देख या सुन नहीं पाते। उपन्यास के पात्र परशुराम वैद्य और मुरारी डॉक्टर अपने हिसाब से काम कर रहे हैं। विनायक के कर्म को छोटा करने के लिए वे जब तब मिलते और सोचते रहते हैं। उपन्यास का मुख्य पात्र विनायक जो एक श्रम संगठन का नेता है और होम्योपैथी का डॉक्टर। कोई ध्यान नहीं देता। विनायक का भद्र आचरण उसे बहुत दूर शायद ले नहीं जाता। वो बिहारीपुर के कौशल्या भवन के बीच अपने परिचय के साथ बहुत कुछ देखता रहता है। लेखक एक शहर के तमाम गरीबों पर अलग-अलग अनुभव प्राप्त करता रहता है। अपने अनुभव से वो देखता है एक नया संसार।
    -संडे

    इस उपन्यास के भीतर असंख्य चरित्र, तमाम घटनाएं और बिहारीपुर के ढेर सारे लोग और उनकी कथाएं हैं। इसके भीतर तमाम लोग किसी न किसी बहाने कथा में आते रहते हैं। कथा के बीच विद्यानिवास तिवारी जो एक प्राथमिक स्कूल का शिक्षक है और संभवतः एक ज्योतिषी भी। पात्र की बेटी जानकी एक शराबी के प्रेम में डूब जाती है। वह एक पहलवान भी है। नाम है लुक्का। जिस पर कोई न कोई जुड़ा हुआ है। उसमें कोई गांजे का दम भरता है। साथ हैं भोलानाथ गिरी। आगे है नौरंगीलाल अपने ढंग से चलने वाला ‘एडवोकेट साहिब’, जो एक जिले की कचहरी में एक छोटा-मोटा क्लर्क-भर है, जिसकी तमाम बातें घड़ी के पेंडुलम की तरह हिलती रहती हैं। इसका एक केंद्रीय चरित्र विनायक तमाम पात्रों और घटनाओं को देखता रहता है। और उसके बाद आती है नैना, मेम के चरित्र में जो उपन्यास को अपने ढंग से गढ़ती और तोड़ती रहती है। यह उपन्यास अलग-अलग घटनाओं को जिस प्रकार संजोता है वो एक अभूतपूर्व अनुभव है।           
    -इंडियन रिव्यू ऑफ बुक्स

  • Huzoor Darbar
    Govind Mishra
    375 338

    Item Code: #KGP-315

    Availability: In stock

    उपन्यास के पात्रों को हम ऐतिहासिक मानें या न मानें, क्यांकि आखिर यह उपन्यास ही है, किंतु इसके पात्रों का सृजन ऐतिहासिक पात्रों के आधार पर हुआ है, यह सच है। आधुनिक युग का संत्रास इस उपन्यास में मूर्त हो उठा है। राजनीतिक क्रूरता की झाँकी उपन्यास में बड़े ही मार्मिक रूप में अंकित हुई है। लोकतंत्र में भी ‘हुज़ूर दरबार’ मौजूद है। इसे पहचानने की आवश्यकता है।
  • Swastha Aswastha Log
    Hridyesh
    300 255

    Item Code: #KGP-9354

    Availability: In stock

    स्वस्थ अस्वस्थ लोग हृदयेश का बारहवां उपन्यास है। उपन्यास का असल मूल्यांकन तत्त्व उसकी काया का विस्तार या दीर्घता न होकर उसकी गहराई है जो प्रस्तुत उपन्यास में है—यथेष्ट है। हृदयेश अपने कथानक को अपने सुपरिचित परिवेश से उठाते ही नहीं हैं उसी के ताने-बाने से उसको बुनते, गूंथते और रचते हैं। इस उपन्यास में भी उनका अपना कस्बेनुमा शहर शाहजहांपुर है जो उनका धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र रहा है। सुविज्ञों की मान्यता है कि उपन्यास जहां और जिस समय की गाथा कहता है वही उसका देशकाल है। उपन्यास की विशिष्टता इसमें है कि वह क्या स्वस्थ है और क्या अस्वस्थ इसको विभिन्न कोणों व तमाम संभव रंगों व शेड्स के परिप्रेक्ष्य में देखता व परिभाषित करता हुआ मूल कथ्य के स्वर और संदेश का सफर दूर तक करता-कराता है, अपने देशकाल से भी परे जाकर।
    ‘मैला आंचल’ जैसे कालजयी उपन्यास के रचयिता रेणु का मानना था, ‘साहित्यकार को चाहिए कि वह अपने परिवेश को संपूर्णता और ईमानदारी से जिए। वह अपने परिवेश से हार्दिक प्रेम रखे क्योंकि इसी के द्वारा वह अपनी जरूरत के मुताबिक खाद प्राप्त करता है। इस प्रेम का मतलब यह कदापि नहीं है कि वह अपने संदर्भों की विषमताओं और असंगतियों पर दृष्टिपात न करे। वह परिवेश से प्रेम इसलिए करे कि वह उसके मूल्यों के साथ ही उसकी विषमताओं और असंगतियों से खुलकर और गहरा परिचय प्राप्त कर सके। दोनों प्रकार के चित्रण का औचित्य ही साहित्यिक ईमानदारी कहा जाएगा। लेखक के संप्रेषण में ईमानदारी है तो रचना सशक्त होगी ही होगी।’ संप्रेषण की इस ईमानदारी पर (विशेष संदर्भ कथ्य का भाग बना कवि सम्मेलन की फूहड़ता और भदेसपन) प्रस्तुत उपन्यास सौ टंच खरा उतरता है।
    उपन्यास की विशिष्टता यह भी है कि इसका अंत पूरे उपन्यास में सकारथ उजास भर देता है।
  • Aakhet
    Jagdish Godbole
    125 113

    Item Code: #KGP-9072

    Availability: In stock


  • Paheli
    Meera Sikri
    200 180

    Item Code: #KGP-9332

    Availability: In stock

    पहेली प्रसिद्ध  रचनाकार मीरा सीकरी का अत्यंत विचारोत्तेजक और रोचक उपन्यास है। लेखिका ने मनोविज्ञान की सूक्ष्मता के साथ स्त्राी-पुरुष संबंधों  को विश्लेषित किया है, फिर ये रिश्ते मां-बेटा, भाई-बहन, पति-पत्नी कैसे भी हों। जीत और वरयाम भाई-बहन हैं, उनके बीच कोई ऐसा ‘मेंटल ब्लाक’ है जिसके कारण उनकी जिंदगी की ‘आयरनी’ आकार लेती है। ...यही पहेली है जिसे मीरा सीकरी ने बेहद पठनीय कथा विन्यास में सुलझाया है। उपन्यास के खत्म होते-होते इसका एक जिंदादिल पात्रा आर. पी. कहता है, ‘...जिन भाई-बहन के असामान्य से दिखते संबंधें को न समझ पाने के कारण तुम इतना परेशान हो रही हो, ऐसे संबंधों  की विविध छायाएं, जैसे—लेस्बियन, गेयज पौराणिक काल से लेकर आज तक मिल जाएंगी। हमें उनकी उपेक्षा और अवज्ञा न कर उन्हें सहानुभूतिपूर्ण दृष्टि से समझने की कोशिश करनी चाहिए।’ ...कहना न होगा कि मीरा सीकरी ने पूरी सहानुभूति के साथ पात्रों को चित्रित किया है। कोई पात्र नकारात्मक नहीं लगता। सब मनःस्थिति और परिस्थिति के दायरों में सांस ले रहे हैं।
    जाहिर है, उपन्यास में एक ‘मनोवैज्ञानिक तनाव’ व्याप्त है। इसके बावजूद रोचकता, उत्फुललता  और पठनीयता से भरपूर यह रचना एक ही बैठक में पढ़े जाने के लिए विवश करती है। जब जटिल को सरल या बोधम्य बनाना हो तो रचनाकार के पास सशक्त, बिंबधर्मी, पारदर्शी भाषा का होना जरूरी है। ‘अपरिपक्व उम्र की धुंधली स्मृतियों के अपूर्ण आभासों और अनुमान के आधर पर बीत गई (मृत कहने का मन नहीं होता उसका) जीत के व्यक्तित्व की गरिमा को खंडित करने का उसे कोई अधिकार नहीं।’ ...ऐसे अर्थपूर्ण विषय पर लिखने वाली लेखिका मीरा सीकरी ने इस उपन्यास में अंतर्मन के रहस्यों में विद्यमान ग्रंथियों को रेखांकित किया है।
  • Kartaar Ki Taksaal
    H. Tipperudraswamy
    1100 825

    Item Code: #KGP-828

    Availability: In stock

    धर्म, राजकीय, सामाजिक आंदोलन तथा संघटन की दृष्टि से कर्नाटक प्रदेश के इतिहास में बारहवीं शताब्दी एक महत्त्वपूर्ण काल-खंड है। इन सारे अंशों ने एक-दूसरे से घुलमिलकर तत्कालीन आंदोलन को एक संकीर्ण रूप प्रदान किया है। वे जैसे व्यक्ति-कंेद्रित चिंतन थे, वैसे समुदाय-केंद्रित चिंतन भी थे। यही कारण है कि उसे समष्टि का समवेत स्वर भी कह सकते हैं। ऐसे एक समुदाय के समर्थ प्रतिनिधि के रूप में बसवण्णा जी दिखाई देते हैं। वैसे देखा जाए तो बसवण्णा पर लिखी गई सारी कृतियां तत्कालीन अन्य शरणों पर लिखी गई कृतियां ही बन जाती हैं।
    ऐसे एक अपूर्व उपन्यास का श्रीमती शशिकला सुब्बण्णा जी ने बहुत ही सशक्त रूप में हिंदी में अनुवाद किया है। इनके इस प्रयास पर हमें आश्चर्य है। एक सर्जनात्मक कृति का उसकी सारी भावसंपदा को समेटते हुए भाषा की हर ध्वनि के साथ अन्य भाषा में अनुवाद करना एक साहस का काम है।

  • Aag-Paani Aakaash
    Ramdhari Singh Diwakar
    280 252

    Item Code: #KGP-796

    Availability: In stock


  • Kaagaz Ki Naav
    Nasera Sharma
    340 289

    Item Code: #KGP-472

    Availability: In stock

    नासिरा शर्मा हिंदी कथा साहित्य में अपनी अनूठी रचनाओं के लिए सुप्रसिद्ध हैं। उनकी कथा रचनाएं समय और समाज की भीतरी तहों में छिपी सच्चाइयां प्रकट करने के लिए पढ़ी व सराही जाती हैं। ‘काग़ज़ की नाव’ नासिरा शर्मा का नया और विशिष्ट उपन्यास है। यह उपन्यास बिहार में रहने वाले उन परिवारों का वृत्तांत है, जिनके घर से कोई न कोई पुरुष खाड़ी मुल्कों में नौकरी करने गया हुआ है। वतन से दूर रहने वाले यहां छोड़ जाते हैं बुजुर्गों से लेकर बच्चों तक का भरा-पूरा संसार। खाड़ी मुल्कों से आने वाले रुपए...और रिश्तों के अंधेरे उजाले। ‘काग़ज़ की नाव’ शीर्षक एक रूपक बन जाता है, यानी ज़रूरतों और ज़िम्मेदारियों के समंदर को चंद रुपयों के सहारे पार करने की कोशिश।
    उपन्यास महजबीं और अमजद की बड़ी बेटी महलकष के पारिवारिक तनाव को केंद्र में रखकर विकसित हुआ है। महलकष के ससुर ज़हूर और ख़ाविन्द ज़ाकिर के बीच भावनाओं का जो चित्रण है वह पढ़ने योग्य है। मुख्य कथा के साथ भोलानाथ, कैलाश, बिंदू, सुधा, कांता, राजेश, त्रिसुलिया, क्रांति झा और मुक्ति झा आदि चरित्रों की बेहद मानीख़ेज़ उपकथाएं हैं।
    सबसे मार्मिक गाथा है मलकषनूर की। मलकषनूर यानी प्रकाश की देवी। मलकषनूर अपने अस्तित्व की रोशनी तलाश कर रही है, उन अंधेरों के बीच जो सदियों से औरत के नसीब का हिस्सा बने हुए हैं। मलकषनूर की इस तलाश का अंजाम क्या है, इसे लिखते हुए नासिरा शर्मा ने विमर्श और वृत्तांत की ऊंचाइयों को छू लिया है।
    नासिरा शर्मा यथार्थ के पथरीले परिदृश्य में उम्मीद की हरी दूब बखूबी पहचान लेती हैं। किस्सागोई उनका हुनर है। उनके पास बेहद रवां दवां भाषा है। सोने पर सुहागा यह कि इस उपन्यास में तो भोजपुरी भी खिली हुई है।
    ‘काग़ज़ की नाव’ ज़िंदगी और इनसानियत के प्रति हमारे यकीन को पुख़्ता करने वाला बेहद ख़ास उपन्यास है।
  • Teen Laghu Upanyas : Mamta Kalia
    Mamta Kalia
    245 221

    Item Code: #KGP-9080

    Availability: In stock


  • Betava Bahati Rahee
    Maitreyi Pushpa
    250 225

    Item Code: #KGP-2004

    Availability: In stock

    बेतवा बहती रही
    एक बेतवा! एक मीरा ! एक उर्वशी !
    नही-नहीं, यह अनेक उर्वशियों, अनेक मीराओं, अनेक बेतवाओं की कहानी है ।
    बेतवा के किनारे जंगल की तरह उगी मैली बस्तियों । भाग्य पर भरोसा रखने वाले दीन-हीन किसान । शोषण के सतत प्रवाह में डूबा समाज । एक अनोखा समाज, अनेक प्रश्नों, प्रश्नचिन्हों से घिरा ।
    प्राचीन रूढियां है जहाँ सनातन । अंधविश्वास हैं अंतहीन । अशिक्षा का गहरा अंधियारा । शताब्दियों से चली आ रही अमानवीय यंत्रणाएँ । फिर जीने के लिए कोई किंचित ठौर खोजे भी तो कहाँ ! हाँ, इन अंधेरी खोहों और खाइयों में कभी-कभी मुट्ठी-भर किरणों के प्रतिबिंब का अहसास भी कितना कुछ नहीं दे जाता ।
    उर्वशी का दु:ख है कि वह उर्वशी है । साधारण में भी असाधारण । इसीलिए सब तरह से अभिशप्त रही । तिल-तिल मिटती रही चुपचाप ।
    प्रेम, वासना, हिंसा, घृणा से भरी एक हृदयद्रावक अछूती कहानी ! पूरे एक अंचल को व्यथा-कथा ।
  • Theekare Ki Mangani
    Nasera Sharma
    300 270

    Item Code: #KGP-24

    Availability: In stock

    महरुख़ की जिंदगी में ठहराव था और बहुत सारे लोगों के साथ-साथ चलने की ताकत भी इसी सोच से उसने बाहर और भीतर के सच को पहचाना था।

    ठीकरे की मंगनी हुई थी महरुख़ के जन्म के साथ ही। तेज़ रफ्तार जिंदगी जीने वाले एक पुरुष की सत्ता को स्वीकारने के लिए मजबूर कर दिया गया था उसे। उसकी जिंदगी का सबसे बड़ाहादसा था यहपर महरुख़ उस साँचे में ढली हुई थीजिसे कोई तोड़ नहीं सकता। ठोस इरादे और नज़रिए ने उसे थोपी हुई सत्ता के ख़िलाफ़ खड़ा कर दिया।

    समकालीन लेखन की परिचित लेखिका नासिरा शर्मा का यह एक ऐसा उपन्यास हैजिसमें महरुख़ की दास्तान के माध्यम से दो खिड़कियाँ खुलती हैंजिनमें एक गाँव हैवहाँ का स्कूल हैगाँवके असहाय लोग हैंजिनके छोटे-छोटे दुखों से भी वह विचलित हो उठती है। दूसरी तरफ एक परम्परागत मुस्लिम ख़ानदान हैउसमें रह रहे लोगों के अपने-अपने सरोकार और टकराव हैं। इनदोनों ही परिवेशों से गुजरते हुए महरुख़ बदहवास दुनिया की सच्चे अर्थों में पड़ताल करती है और चुनती है अपने लिए उसे थरथराते सत्य कोजो उसे अकेला तो कर देता हैपर सशक्त ढंगसे खड़ा होना सिखा देता है। औरत को जैसा होना चाहिएउसी की कहानी यह उपन्यास कहता है।

    कथा-रचना की गठन अपने पूरे-पूरे आकार में उभरकरउद्वेलित करती है। ठीकरे की मंगनी वर्तमान कथा-साहित्य के बीच रेखांकित किया जाने वाला मार्मिक उपन्यास है।


  • Kaalchiti
    Shekhar Mallik
    350 315

    Item Code: #KGP-9320

    Availability: In stock

    यह उपन्यास है...
    उस हौसले और हिम्मत के लिए, 
    जो अपने हक के लिए लड़ती है...
    उस आदिम, जीवट, 
    अथक संघर्षशीलता के लिए...
    उस इनकलाबी भावना के लिए, 
    जो हर दौर में जिंदा होती है...
    सत्ता पोषित हिंसा के खिलाफ...
    जन-विमुख, भ्रष्ट सत्ता और 
    काॅरपोरेट गठबंधन के खिलाफ...
    उस आततायी सत्ता के खिलाफ...
    जो सोनी सोरी जैसों के खिलाफ 
    घृणित षड्यंत्र रचती है!
    निर्धन, निहत्थे, शांतिप्रिय आदिम 
    मनुष्यों का संहार करने वाली
    राजनीति के खिलाफ...!

    प्रस्तुत उपन्यास अर्ध गल्प और अर्ध समकालीन यथार्थ! क्योंकि चाहे कथा और पात्रा काल्पनिक हों, कुछ घटनाएँ वास्तविकता पर आधारित हैं। पहाड़-पानी और वन एवं भूमि सहित सामान्य मनुष्यों पर बलपूर्वक अधिकार करना अनैतिक है। केवल आम जन के समसामयिक उत्पीड़न को व्यक्त करना और ऐसे हिंड्ड कृत्यों की निंदा करना ही इस रचना का एकमात्र ध्येय है। जनजातीय समुदायों, मूलवासियों और आदिम संस्कृतियों पर इस दौर में हो रहे सत्ता-पोषित दमन का प्रतिवाद करना प्रत्येक विवेकशील नागरिक का कर्तव्य है। यह गद्य-पुस्तक सर्वमान्य मानवाधिकारों, सच्चे लोकतंत्र के पक्ष में और मनुष्य की स्वतंत्रता के हनन के सभी प्रकार के कृत्यों के विरुद्ध है।
  • Ratana Aur Chetana
    Amrita Pritam
    240 192

    Item Code: #KGP-9051

    Availability: In stock


  • Saryu Didi
    Manorma Jafa
    175 158

    Item Code: #KGP-1956

    Availability: In stock

    सरयू दीदी
    मैंने फोन मिलाया। गोपाल जोशी सुनाकर सदके में आ गए, 'यह नहीं हो सकता। मैं अभी पता लगाता हूँ।' उन्होंने फोन रख दिया।
    'क्या करूं मनु?' दीदी की आवाज में बेबसी थी। वही तो सदा समझदार रहीं। वही तो हर प्रश्न का उत्तर और हर समस्या का हल ढूंढ़ लेती थीं। पर यहां वह किंकर्त्तव्यविमूढ़-सी थीं ।  वह उठकर कमरे में टहलने लगीं । 'अभी तो जीवन शुरू ही हुआ था मनु।' दीदी ने हाथ जोड़े ऊपर देखा, आंखें बंद कीं और जोर से बोली, 'हे ईश्वर आप ही माता है आप ही पिता हैं। हे ईश्वर आप ही सबकी रक्षा करने वाले हैं। हे ईश्वर मुझे ठीक सोचने-समझने की शक्ति दीजिए। मुझे बल दीजिए। हे ईश्वर मुझे बल दीजिए।' दो क्षण बाद दीदी की आंखें झरने लगीं। थोडी देर बाद दीदी में शक्ति लौटकर आ गई, 'मनु मैं यब कुछ सह लूंगी। भगवान महान हैं, दयालु हैं।' मेरी तरफ़ मुड़कर बोलीं, 'मनु। पापा से पूछो अजीत को लेकर प्लेन कब आ रहा है?' वह उठकर दराज़ में से कूछ खोजने लगीं।
    तभी फोन की घंटी बजी मैंने फ़ोन उठा लिया। उधर फोन पर मां थी, 'मनु अजीत को यहां अपने घर ले आते हैं। वही ठीक होगा। वहीं सरयूजी क्या करेंगी? '
    मैं दीदी से पूछती हूँ। हिम्मत करके मैंने दीदी से पूछा। दीदी ने कहा, 'मनु! अजीत का घर यहीं है, वह यहीं आयेंगे ।'
    मैंने जाकर मां को बता दिया।
    -(इसी उपन्यास से)
  • Aavaran
    Bhairppa
    600 480

    Item Code: #KGP-873

    Availability: In stock

    यह मेरा दूसरा ऐतिहासिक उपन्यास है। आठवीं शताब्दी के संधिकाल के अंतस्सत्त्व को ‘सार्थ’ में, उपन्यास के रूप में, आविष्कृत करने का और अब ‘सार्थ’ के समय के बाद के सत्य को ‘आवरण’ द्धउपन्यासऋ में चित्रित करने का मैंने प्रयास किया है। भारत के इतिहास के अत्यंत संकीर्ण इस अवधि के बारे में विपुल प्रमाण में सामग्री उपलब्ध होती है, लेकिन आवरण की शक्ति इस विपुलता के ऊपर विजृंभित हो रही है। ‘सार्थ’ की अवधि का इतिहास ज्यादातर आवरण-शक्ति के लिए आहुति बन नहीं पाया है। उनके बारे में निर्भीक रूप से सत्य को अंकित किया जा सकता है। लेकिन ‘आवरण’ की अवधि के इतिहास के बारे में यही बात नहीं कही जा सकती है। प्रत्येक सोपान में आवरण की शक्ति को बेधते हुए आगे बढ़ने की अपरिहार्यता सामने आती है। इसीलिए इस उपन्यास के स्वरूप और तंत्रें को उसके अनुकूल समायोजित कर लेना पड़ा।
       इस उपन्यास की ऐतिहासिकता के विषय में मेरा अपना कुछ भी नहीं है। प्रत्येक अंश या पग के लिए जो ऐतिहासिक आधार हैं उनको साहित्य की कलात्मकता जहाँ तक सँभाल पाती है वहाँ तक मैंने उपन्यास के अंदर ही शामिल कर लिया है। उपन्यास के तंत्र के विन्यास में यह अंश किस प्रकार प्रधान रूप में कार्यान्वित हुआ है, इसको सर्जनशील लेखक और दर्शनशील पाठक, दोनों पहचान सकते हैं। शेष आधारों को उपन्यास के अंदर के उपन्यास को रच डालने वाले चरित्र ने ही, अपनी क्रिया की आवश्यकता के रूप में, प्रस्तुत कर दिया है, न कि मैंने। इस पूरी वस्तु को जो अद्यतन रूप प्रदान किया है, उसमें ही मेरी मौलिकता है। इतिहास की सच्चाई में कला का भाव यदि चुआ है, तो वहाँ तक साहित्य के रूप में यह सफ़ल हुआ है, ऐसा मैं मानता हूँ।
    -भैरप्पा

  • Shalmali
    Nasera Sharma
    350 315

    Item Code: #KGP-2006

    Availability: In stock

    शाल्मली
    ० 'शाल्मली' नासिरा शर्मा का एक ऐसा विशिष्ट उपन्यास है, जिसकी जमीन पर नारी का एक अलग और नया ही रूप उभरा है । 'शाल्मली' इसमें परंपरागत नायिका नहीं है, बल्कि यह अपनी मौजूदगी से यह अहसास जगाती है कि परिस्थितियों के साथ व्यक्ति का सरोकार चाहे जितना गहरा हो, पर उसे तोड़ दिए जाने के प्रति मौन स्वीकार नहीं होना चाहिए । 
    ० 'शाल्मली' सेमल के दरख्त की तरह है, जिसका अंश-अंश संसर्ग में आने वाले को जीवन-दान करता है; लेकिन उसका पति नरेश इस सच को स्वीकार करने की जगह अपनी कुंठाओं में जीता है, अपने स्वार्थों को शाल्मली के यथार्थ आचरण से ऊपर समझता है । यह हिसाबी-किताबी जीव है; लेकिन जिंदगी की सच्चाई के साथ इसका समीकरण गलत है ।
    ० 'शाल्मली' एक बडी अफसर है। बावजूद इसके वह बेहद सामान्य है । पति, माता-पिता और सास के साथ उसके रिश्ते सच के नज़दीक है । यहीं उसकी खूबी है कि वह 'नौकरशाह' होते हुए भी, उस वर्ग से कटी हुई है और एक आम भारतीय नारी के यथार्थ को जीती है ।
    ० लेकिन 'शाल्मली' दया और करुणा से डूबी अश्रु बहाने वाली उस नारी का प्रतीक भी नहीं है, जिसे पुरुष-सत्ता की गुलामी में सब कुछ खो देना पड़ता है । वह सामान्य होते हुए भी असाधारण है और चुनौती के तेवर रखती है ।
    ० नासिरा शर्मा ने निश्चय ही यह उपन्यास बडी मेहनत से लिखा है । इसकी भाषा में कविता की लय और दिवार में निरंतरता को उन्होंने बडी खूबी से संवारा है ।
  • Angaaron Main Phool
    Santosh Shelja
    140 126

    Item Code: #KGP-1981

    Availability: In stock

    अंगारों में फूल
    माँ का अडिग साहस देख तिलक विस्मित थे । आज पहली बार मां व बाबा को अपने दु:ख का संवेदनशील श्रोता मिला था । इस लंबी वार्ता में तीनों की आँखें कईं बार गीली हुई और कई बार गर्व से छाती फूल उठी । जाने से पहले लोकमान्य ने झुककर माँ व बाबा के चरण स्पर्श किए और रुँधे कंठ से कहने लगे,  गौरवशाली बलिदान का श्रेय न मुझे है न उन्हें है-बल्कि सचमुच में इसका श्रेय आपको और आपकी बहुओं को है । गीता पढ़ना सरल है मां, पर उसे वास्तविक जीवन में उतारना बहुत ही कठिन है । एक बार मरना संभव है, किन्तु इस प्रकार मरण  को हृदय से लगाए हुए जिंदा रहना बहुत असंभव है । पर अपने वही कर दिखाया... धन्य है आप!'
    [इसी पुस्तक से]
  • Dhoop Dhalne Ke Baad
    Mahip Singh
    225 203

    Item Code: #KGP-627

    Availability: In stock

    सूरज उगता हैमध्याह्न होता है और फिर ढलना प्रारंभ हो जाता है। मनुष्य जीवनपर्यंत इन स्थितियों से गुजरता रहता है।विभिन्न प्रवृत्तियांपरिवर्तित होती मान्यताएं और अनुभव संपन्नताउसे बहुआयामी बनाती रहती हैं। कभी वह संन्यासी हो जाता हैकभी गृहस्थ।

    संन्यास में महत्त्वाकांक्षा सम्मिलित हो जाती है चुपके से और उसे सामान्य संसारी मनुष्य के स्तर से नीचे खींचती हुई पतन की अतल गहराइयों में ले जाती है। जहां संन्यासी अपराधी बन जाताहै।

    गृहस्थ जीवन में जब सबके सुख एवं हित की भावना जुड़ती है तो सामान्य व्यक्ति सारे सांसारिक कार्यकलाप के बीच भी संत ही होता है। और वे लोग जो सदियों से किसी विशेष जाति में पैदाहोने के कारण मनुष्य से निम्नतर माने जाते रहे हैंजब अपने स्व को पहचानने लगते हैंकैसी छटपटाहट भर जाती है उनमें और कैसे हिंसक परिणाम झेलने पड़ते हैं उन्हें।

    मानव जाति का आधा हिस्सा यानी स्त्री जो अभी तक मनुष्य नहीं मानी जातीअब अपना स्थान और अधिकार पहचानने लगी है और उसके लिए आग्रहशील हो गई है तो कैसे-कैसे उद्वेलनों सेगुजरना पड़ता है उसे।

    इन सब बिंदुओं को समेटता और अपने परिचित परिवेश को एक नए कोण से प्रस्तुत करता है उपन्यास। प्रख्यात कथाकार महीप सिंह की त्रयी का तीसरा उपन्यास है-धूप ढलने के बाद'

  • Mahabharat Ka Abhiyukti
    Rajendra Tyagi
    195 176

    Item Code: #KGP-1951

    Availability: In stock


  • Aise Hamaare Harda
    Pradeep Pant
    350 315

    Item Code: #KGP-587

    Availability: In stock


  • Yogkshem
    Rajendra Tyagi
    540 432

    Item Code: #KGP-286

    Availability: In stock

    योगक्षेम
    काफी विचार करने के उपरान्त मैंने गीता को उपन्यास के रूप में प्रस्तुत करने का निर्णय लिया । इस सम्बन्ध में अनेक विद्वानों के साथ विचार-विमर्श किया । कुछ ने मेरे विचार की सराहना की तो कुछ ने यह कहते हुए कि गीता स्वयं ही एक उपन्यास है, मेरे विचार को नकार दिया । कुछ का मत था कि विचार तो उचित है, किन्तु रचना में मौलिकता का अभाव रहने का खतरा है। समझाया उनका आशय गीता के मूलपाठ की सुरक्षा से था । गीता के मूलपाठ के साथ यदि छेड़छाड़ की गई तो उसका मूल स्वरूप ही नष्ट हो जाएगा और यदि मूलपाठ के साथ छेड़छाड़ नहीं की तो उपन्यास में मौलिकता का अभाव रहने की पूरी सम्भावना है । इस प्रकार यह मौलिक कृति नहीं कहलाएगी । उनकी आशंका अपने स्थान पर उचित थी किन्तु मेरे लिए चुनौती । चुनौती स्वीकारते हुए मैंने गीता पर आधारित उपन्यास ही लिखने का अन्तिम निर्णय लिया ।
    लक्ष्यप्राप्ति के लिए मैं चिन्तन-मनन में व्यस्त हो गया और महत्त्वपूर्ण दो विचार मेरे चिन्तन में अवतरित हुए । प्रथम-गीता के विभिन्न श्लोकों के सम्बन्ध में व्याप्त भ्रान्तियों का निराकरण ।  द्वितीय—गीता में निहित शिक्षा का आधुनिक परिप्रेक्ष्य में विस्तृत व्याख्या । इसके अतिरिक्त एक प्रमुख विचार यह था कि जब तक कृष्ण और अर्जुन के मध्य वार्तालाप चलता रहा, तब तक कुरुक्षेत्र के मैदान में युद्ध के लिए तत्पर सेनानायक व सैनिक क्या करते रहे ! मुझे यह अनुभव हुआ कि प्रथम दो विचार तो गीता को सरल व सर्वग्रासी बनाने में सहायक सिद्ध होंगे और अन्तिम विचार गीता की रोचक प्रस्तुति में सहायक सिद्ध होगा ।
    इस प्रकार गीता के मूलपाठ से खिलवाड़ न करते हुए अर्जुन व धृतराष्ट्र के माध्यम से गीता को सर्वग्राही व उपन्यास का रूप और विस्तार प्रदान करने का प्रयास किया गया है । -लेखक