Filter selection

Author
Price

novel

  • grid
  • Jeevan Hamara
    Bebi Kambley
    120 108

    Item Code: #KGP-2099

    Availability: In stock

    जीवन हमारा
    मराठी लेखिका बेबी कांबले दलित साहित्य की प्रतिनिधि हस्ताक्षर हैं । दलित लोगों के विपन्न, दयनीय और दलित जीवन को आधार बनाकर लिखे गए इस आत्मकथात्मक उपन्यास ने मराठी साहित्य में तहलका मचा दिया था। महाराष्ट्र के पिछडे इलाके के सुदूर गाँवों में अस्मृश्य माने जाने वाले आदिवासी समाज ने जो नारकीय, अमानवीय और लगभग घृणित जीवन का जहर घूँट-घूँट पिया उसका मर्मांतक  आख्यान है यह उपन्यास । शुरु से अंत तक लगभग सम्मोहन की तरह बाँधे रखने वाले इस उपन्यास में दलितो के जीवन में जड़ें जमा चुके अंधविश्वास पर तो प्रहार किया ही गया है, उस अंधविश्वास को सचेत रूप से उनके जीवन में प्रवेश दिलाने और सतत पनपाने वाले सवर्णो की साजिश का भी पर्दाफाश किया गया है । इस उपन्यास को पढ़ना महाराष्ट्र के डोम समाज ही नहीं वरन् समस्त पददलित जातियों के हाहाकार और विलाप को अपने रक्त में बजता अनुभव करना है । शोषण, दमन और रुदन का जीवंत दस्तावेज है यह उपन्यास, जो बेबी कांबले ने आत्मकथात्मक लहजे में रचा है ।


  • Anhad Naad
    Pratap Sehgal
    250 225

    Item Code: #KGP-35

    Availability: In stock


  • Tumhare Liye
    Himanshu Joshi
    280 210

    Item Code: #KGP-2030

    Availability: In stock

    तुम्हारे लिए
    आग की नदी!
    नहीं, नहीं, यह दर्द का दरिया भी है, मौन-मंथर गति से निरंतर प्रवाहित होता हुआ ।
    यह दो निश्छल, निरीह उगते तरुणों की सुकोमल स्नेह-गाथा ही नहीं, उभरते जीवन का स्वप्निल कटु यथार्थ भी है कहीं । वह यथार्थ, जो समय के विपरीत चलता हुआ भी, समय के साथ-साथ, समय का सच प्रस्तुत करता है ।
    मेहा-विराग यानी विराग-मेहा का पारदर्शी, निर्मल स्नेह इस कथा की भावभूमि बनकर, अनायास यह यक्ष-प्रश्न प्रस्तुत करता है-प्रणय क्या है? जीवन क्या है ? जीवन की सार्थकता किसमें है ? किसलिए ?
    ० 
    बहुआयामी इस जीवंत मर्मस्पर्शी कथा में अनेक कथाधाराएँ हैं। अनेक रूप हैं, अनेक रंग। पर ऐसा क्या है इसमें कि हर पाठक को इसके दर्पण में अपना प्रतिबिम्ब दीखने लगता है ?
    ० 
    हिंदी के बहुचर्चित उपन्यासों में, बहुचर्चित इस उपन्यास के अनेक संस्करण हूए । मराठी, पंजाबी, कन्नड़, तमिल, उर्दू, अंग्रेजी आदि अनेक भाषाओं में अनुवाद भी । दूरदर्शन से धारावाहिक रूप में प्रसारण भी हुआ । ब्रिटेन की एक कंपनी ने आडियो कैसेट भी तैयार किया, जो लाखों श्रोताओं द्वारा सराहा गया ।
  • Saakshi
    Bhairppa
    295 266

    Item Code: #KGP-875

    Availability: In stock

    यह उपन्यास 1986 की सर्वश्रेष्ठ कन्नड़ कृति के रूप में स्वीकृत होकर 'ग्रंथलोक' पुरस्कार से सम्मानित।
  • Toro Kara Toro-2 (Sadhna)
    Narendra Kohli
    500 425

    Item Code: #KGP-763

    Availability: In stock


  • Arddhnaarishwar
    Vishnu Prabhakar
    495 446

    Item Code: #KGP-2002

    Availability: In stock

    अर्द्धनारीश्वर 
    'अर्द्धनारीश्वर ' व्यक्तिमन, समाजमन एवं अंतर्मन के विविध स्तरों पर नारी और नर थे इन्हीं के एकमएक सुर और स्वर-मिलन की प्राप्ति का प्रयास है यह उपन्यास । वही जाति-पाति और धर्म को समस्या, वही विवाह, तलाक, बलात्कार की समस्या, वही नारी-शोषण, उत्पीडन, वही टूटते-बिखरतें जीवन की कहानी, किन्तु मुक्ति के लिए 'कोई तो' की प्रतीक्षा नहीं है । यहीं लेखक ने समाधान के रूप में एक वृहत्तर रूपरेखा की सर्जना की है ।
    'अर्द्धनारीश्वर ' का अभिप्रेत नारी और नर की समान सहभागिता को प्राप्त करना है । इसके लिए जरूरी है, एक-दूसरे को अपनी-अपनी दुर्बलताओं व सबलताओं के साथ स्वीकार करना तथा मान लेना कि रचना के लिए प्रकृति व पुरुष का मिलन भी जरूरी है ।
    मूल समस्या तो पुरुष की है, उसके पौरुषिक अहम् की, जो उसे 'बेचारा' बना देती है । सहज तो इसे ही बनाना है । इसी की असहजता से स्त्री बहुत-से बंधन तोड़कर आगे निकल आई है । लेकिन बंधनहीन होकर किसी उच्छ्रंखल को रचना करना लेखक का अभिप्रेत नहीं है, बल्कि बंधनो की जकड़न को समाप्त कर प्रत्येक सुर को उसका यथोचित स्थान देकर जीवन-राग का निर्माण करना है । अजित के शब्दों में लेखक कहता है :
    "मैं सुमिता को अपनी दासता से मुक्त कर दूँगा । मैं उसकी दासता से मुक्त हो जाऊँगा। तभी हम सचमुच पति-पत्नी हो सकेंगे।"
    इसी स्वयं की दासता से मुक्ति का नाम है, 'अर्द्धनारीश्वर'।
  • Kartaar Ki Taksaal
    H. Tipperudraswamy
    1100 825

    Item Code: #KGP-828

    Availability: In stock

    धर्म, राजकीय, सामाजिक आंदोलन तथा संघटन की दृष्टि से कर्नाटक प्रदेश के इतिहास में बारहवीं शताब्दी एक महत्त्वपूर्ण काल-खंड है। इन सारे अंशों ने एक-दूसरे से घुलमिलकर तत्कालीन आंदोलन को एक संकीर्ण रूप प्रदान किया है। वे जैसे व्यक्ति-कंेद्रित चिंतन थे, वैसे समुदाय-केंद्रित चिंतन भी थे। यही कारण है कि उसे समष्टि का समवेत स्वर भी कह सकते हैं। ऐसे एक समुदाय के समर्थ प्रतिनिधि के रूप में बसवण्णा जी दिखाई देते हैं। वैसे देखा जाए तो बसवण्णा पर लिखी गई सारी कृतियां तत्कालीन अन्य शरणों पर लिखी गई कृतियां ही बन जाती हैं।
    ऐसे एक अपूर्व उपन्यास का श्रीमती शशिकला सुब्बण्णा जी ने बहुत ही सशक्त रूप में हिंदी में अनुवाद किया है। इनके इस प्रयास पर हमें आश्चर्य है। एक सर्जनात्मक कृति का उसकी सारी भावसंपदा को समेटते हुए भाषा की हर ध्वनि के साथ अन्य भाषा में अनुवाद करना एक साहस का काम है।

  • Katha Kaho Kunti Mai
    Madhukar Singh
    100 90

    Item Code: #KGP-2021

    Availability: In stock

    कथा कहो कुंती माई
    "कितना खतरनाक होता है माई, मनुष्य के सपनों का मर जाना ?" सुमति ठाकुर ने सवाल की तरह पूछ लिया । "बहुत खतरनाक मेरे बेटे," छाती माई बोली, "सपने हैं तभी तो हमतुम जिंदा हैं, मनुष्य हैं। हम तभी तक जीवित है, जब तक सपने हैं । बेटे, हमारे सपने बहुत बड़े हैं, जो तुम बराबर कहते हो, या तो हम सभी ब्राह्मण होंगे या सभी हरिजन । श्रमिक-किसानों का राज होगा । लडाई बहुत लंबी है सुमति, और चौतरफा भी । हमारे सपनों के हत्यारे हमारे संग-संग जिंदा हैं। इन्हें भी नहीं छोडना है ।"
    कुन्ती माई ऊपर की और दोनो बाँहें फैलाए दिखाती हैं, "अभी भी क्यों नहीं जागते तुम लोग ? पुश्तैनी पीपल-गाछ पर गाज गिरने वाली है ।" "क्या बात है माई ?" एक साथ कई पंख फस्कढाते है । "मेरे गाँव के लोग मुर्दा हैं । सभी मरे हुए हैं । बाप-दादे की पुश्तैनी गाछ को कटवाने के लिए मुदई लोग कलक्टर को बुलवाए हैं। इन्हें किस प्रकार ज़गाऊँ ?" माई का कंठ अवरुद्ध होने लगता है ।
    पीपल के निकट आते ही जेली-साथी नारे लगाते हैं, "कुन्ती माई को, लाल सलाम, लाल सलाम । इंकलाब जिदाबाद । जिदाबाद !" 
    कुन्ती माई अपनी दोनों बाँहें फैलाए उनकी ओर दौड़ पड़ती है, जैसे ममता के समुद्र में डुबो लेना चाहती है । यह डबडबाई आँखें पोंछती हुई कहने लगती हैं, "मेरे बाल-गोपालो । जुल्म बढ़ता है तो प्रतिरोध भी तेज होता है । पुलिस-प्रशासन आपका नहीं है, उन्हीं की रक्षा के लिए है । पन्द्रह मार्च को पटना गांधी मैदान को संकल्प के साथ दस लाख जनता चाहिए । मरने का संकल्प लो, तभी जिंदा रहोगे। मठ की जमीन पर हम फिर चढ़ेंगे । इस बार हम रहेंगे या मठ रहेगा ।"
    [इसी उपन्यास से]

  • Jahaanoon
    Manorma Jafa
    240 216

    Item Code: #KGP-197

    Availability: In stock

    कॉलेज में रक्षाबंधन की छुट्टी थी। अनुराधा सुबह-सुबह ही तैयार होकर निकल गई। मैं उसे फाटक तक पहुँचाने गई। हरसिंगार के पेड़ के नीचे खड़ी थी। जमीन पर बिखरे फूल महक रहे थे। मुझसे रहा नहीं गया। मैंने फूल बीनकर अपने दुपट्टे के एक कोने में रखने शुरू कर दिए कि तभी एक मोटरसाइकिल बराबर में आकर रुक गई। मैंने मुड़कर देखा, अनुराधा के राजू भैया थे।

    "क्यों भई, किसके लिए फूल बीन रही हो?"

    मन में तो आया कह दूँ ‘आपके लिए।’ पर  जबान नहीं खुली।

    "अनुराधा को लेने आया था। आज रक्षाबंधन है। बुआ जी के यहाँ उसे मैं ही पहुँचा दूँगा।"

    "पर वह तो अभी-अभी वहीं चली गई।"

    "मैंने तो उससे कहा था कि मैं आऊँगा! बड़ी बेवकूफ है।"

    "भूल गई होगी।"

    "तुम्हारा क्या प्रोग्राम है? तुम भी उसके साथ क्यों नहीं चली गईं? रक्षाबंधन में सब लड़कियाँ बहनें और सब लड़के उनके भैया," और वह हँसने लगे।

    "क्या मतलब?"

    "मेरा कोई मतलब नहीं था। तुम चलो तो मैं तुम्हें भी अनुराधा की बुआ के यहाँ ले चलता हूँ।"

    "नहीं, मुझे पढ़ाई करनी है। यहीं रहूँगी।"
    —इसी उपन्यास से
  • Vidrohi
    Chander Shekhar Prem
    100 90

    Item Code: #KGP-9225

    Availability: In stock

    विद्रोही
    ‘‘जनता जनार्दन के रूप में मेरी आत्माओं! राजा विपुलवर्द्धन के साथ हमारी निजी या जाती तौर पर कोई दुश्मनी नहीं है। वह स्वतंत्रता देवी का शत्रु है और हम देवी के पुजारी। वह बिलासपुर रियासत की जनता को पुश्त-दर-पुश्त अपना दास बनाकर रखना चाहता है और हम लोग उसे आजाद कराना चाहते हैं। वह अपने आपको ईश्वर का भेजा हुआ फरिश्ता समझता है और हम उसे पुकार-पुकारकर कहते हैं कि विपुलवर्द्धन! तुम भी हमारी तरह एक आदमी हो। वह कहता है कि उसे खुदा ने हमारे और तुमारे ऊपर हुकूमत करने के लिए भेजा है और हम लोग कहते हैं कि वह सब कुछ उसका झूठा प्रपंच है। इस प्रकार दोस्तो! हमारे और राजा साहब के दरम्यान दीवारें खड़ी हैं, जिन्हें तोड़ना हम सबका मूल उद्देश्य है। वह गरीबों का शोषण करके अपन भंडार भरता आ रहा है, और इधर इन गरीब किसानों को देखिए जो जेठ की कड़कती धूप, सावन-भादों की घनघोर बरखा में तथा पोह-माघ की ठिठुराती हुई सर्दी में दिन-रात परिश्रम करते मर जाते हैं और वह खलिाहनों पर से अनाज उठवाकर ले जाता हे और ये बेचारे किसान मुश्किल से गुजर कर पाते हैं।’’
    —इसी उपन्यास से
  • Swastha Aswastha Log
    Hridyesh
    300 255

    Item Code: #KGP-9354

    Availability: In stock

    स्वस्थ अस्वस्थ लोग हृदयेश का बारहवां उपन्यास है। उपन्यास का असल मूल्यांकन तत्त्व उसकी काया का विस्तार या दीर्घता न होकर उसकी गहराई है जो प्रस्तुत उपन्यास में है—यथेष्ट है। हृदयेश अपने कथानक को अपने सुपरिचित परिवेश से उठाते ही नहीं हैं उसी के ताने-बाने से उसको बुनते, गूंथते और रचते हैं। इस उपन्यास में भी उनका अपना कस्बेनुमा शहर शाहजहांपुर है जो उनका धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र रहा है। सुविज्ञों की मान्यता है कि उपन्यास जहां और जिस समय की गाथा कहता है वही उसका देशकाल है। उपन्यास की विशिष्टता इसमें है कि वह क्या स्वस्थ है और क्या अस्वस्थ इसको विभिन्न कोणों व तमाम संभव रंगों व शेड्स के परिप्रेक्ष्य में देखता व परिभाषित करता हुआ मूल कथ्य के स्वर और संदेश का सफर दूर तक करता-कराता है, अपने देशकाल से भी परे जाकर।
    ‘मैला आंचल’ जैसे कालजयी उपन्यास के रचयिता रेणु का मानना था, ‘साहित्यकार को चाहिए कि वह अपने परिवेश को संपूर्णता और ईमानदारी से जिए। वह अपने परिवेश से हार्दिक प्रेम रखे क्योंकि इसी के द्वारा वह अपनी जरूरत के मुताबिक खाद प्राप्त करता है। इस प्रेम का मतलब यह कदापि नहीं है कि वह अपने संदर्भों की विषमताओं और असंगतियों पर दृष्टिपात न करे। वह परिवेश से प्रेम इसलिए करे कि वह उसके मूल्यों के साथ ही उसकी विषमताओं और असंगतियों से खुलकर और गहरा परिचय प्राप्त कर सके। दोनों प्रकार के चित्रण का औचित्य ही साहित्यिक ईमानदारी कहा जाएगा। लेखक के संप्रेषण में ईमानदारी है तो रचना सशक्त होगी ही होगी।’ संप्रेषण की इस ईमानदारी पर (विशेष संदर्भ कथ्य का भाग बना कवि सम्मेलन की फूहड़ता और भदेसपन) प्रस्तुत उपन्यास सौ टंच खरा उतरता है।
    उपन्यास की विशिष्टता यह भी है कि इसका अंत पूरे उपन्यास में सकारथ उजास भर देता है।
  • Aranyakaand
    Pranav Kumar Bandhopadhyaya
    250 225

    Item Code: #KGP-2012

    Availability: In stock

    अरण्यकाण्ड
    रामकथा के एक अंश पर आधारित आख्यान है अरण्यकाण्ड । आज के संदर्भ में । आज के समय की पूष्ट्रभूमि में जीवन की घटनाओं को जिस आदिकथा के आधार पर प्रस्तुत किया गया है, वह मनुष्य को
    निरंतर कुरेदती रहती । है यह यात्रा का एक पड़ाव मात्र । छोटा-सा । इस पड़ाव  में कई बार विराम तो आता है किंतु अंतत: यह अंत नहीं है ।
    प्रणव कुमार वंद्योपाध्याय की यह कथाकृति बारंबार पाठक को उद्वेलित करती है । यह कृति प्रस्तुत करती है मनुष्य की तात्कालिक पराजय और मनुष्य की ही जिजीविषा । लेखक की यह कथाकृति समय का एक असमाप्य संबोधन है ।
  • Mahasagar
    Himanshu Joshi
    160 144

    Item Code: #KGP-34

    Availability: In stock


  • Ve Devta Mar Gaye
    Mika Valtari
    250 225

    Item Code: #KGP-2102

    Availability: In stock

    वे देवता मर गये

    ०  विश्व साहित्य में अत्यन्त लोकप्रिय ऐतिहासिक उपन्यास ।

    ०  तीन हजार वर्ष पूर्व मिस्त्र के फ़राउन-साम्राज्य के अपार वैभव और विलास की धधकती हुई तस्वीर 

    ० महलों के षडयंत्रों और भीषण युद्धों की जीवन्त झाँकी ।

    ०  गरीबों और दासों पर अमानवीय जुल्मों और उनके आंसुओं से लिखी गई एक करुण कहानी ।

    ०  और नि:सन्देह ही एक समृद्ध, शक्तिशाली और शानदार ऐतिहासिक उपन्यास, इतिहास की प्रामाणिकता के साथ रोमांच और रोचकता से  भरपृऱ ।
  • Aadhaar
    Bhairppa
    190 171

    Item Code: #KGP-2096

    Availability: In stock

    कन्नड़ उपन्यास का हिंदी अनुवाद।
  • Sampurna Upnanayas : Himanshu Joshi ( 2Vols.)
    Himanshu Joshi
    2100 1365

    Item Code: #KGP-SUHJ HB

    Availability: In stock

    संपूर्ण उपन्यास: हिमांशु जोशी का संपादन दो भागों में चर्चित कथाकार और आलोचक महेश दर्पण ने किया है। उन्होंने सन् 1965 में प्रकाशित हिमांशु जोशी के पहले उपन्यास से लेकर सन् 1980 में प्रकाशित तीन लघु उपन्यासों तक की रचनाओं को दो खंडों में विभाजित किया है। पहले खंड में ‘अरण्य’, ‘महासागर’, ‘छाया मत छूना मन’ और ‘कगार की आग’ को एक साथ प्रस्तुत किया गया है। दूसरा खंड पांच उपन्यास लिए है-‘समय साक्षी है’, ‘तुम्हारे लिए’, ‘सुराज’, ‘अंधेरा और’ तथा ‘कांछा’। यह कहना अनिवार्य है कि ‘संपूर्ण उपन्यास: हिमांशु जोशी’ पढ़ते हुए पाठक आजादी के बाद के भारत की धड़कती हुई। तस्वीर से साक्षात्कार कर सकेंगे। 
  • TORO KARA TORO : PRASAR (6TH PART)
    Narendra Kohli
    560 504

    Item Code: #KGP-668

    Availability: In stock


  • Delhi
    Khushwant Singh
    400 340

    Item Code: #KGP-818

    Availability: In stock

    उपन्यास का नाम शहर के नाम से ! जी हाँ, यह दिल्ली की कहानी है। छह सौ साल पहले से लेकर आज तक की खुशवंत सिंह की अनुभवी कलम ने इतिहास के ढाँचे को अपनी रसिक कल्पना की शिराओं और मांस-मज्जा से भरा। यह शुरू होती है सन् 1265 के ग़यासुद्दीन बलबन के शासनकाल से तैमूर लंग, नादिरशाह, मीर तक़ी मीर, औरंगज़ेब, अमीर खुसरो, बहादुर शाह ज़फ़र आदि के प्रसंगों के साथ कहानी आधुनिक काल की दिल्ली तक पहुँचती है कैसे हुआ नयी दिल्ली का निर्माण ! और अंत होता है 1984 के दंगों के अवसानमय परिदृश्य में !

    कहानी का नायकमुख्य वाचक हैदिल्ली को तहेदिल से चाहने वाला एक व्यभिचारी किस्म का चरित्रजिसकी प्रेयसी भागमती कोई रूपगर्विता रईसज़ादी नहींवरन् एक कुरूप हिंजड़ा है।दिल्ली और भागमती दोनों से ही  नायक को समान रूप से प्यार है। देश-विदेश के सैर-सपाटों के बाद जिस तरह वह बार-बार अपनी चहेती दिल्ली के पास लौट-लौट आता हैवैसे ही देशी-विदेशीऔरतों के साथ खाक छानने के बाद वह फिर-फिर अपनी भागमती के लिए बेकरार हो उठता है। तेल चुपड़े बालों वालीचेचक के दागों से भरे चेहरे वालीपान से पीले पड़े दाँतों वाली भागमती केवास्तविक सौंदर्य को उसके साथ बिताए अंतरंग क्षणों में ही देखा-महसूसा जा सकता है। यही बात दिल्ली के साथ भी है। भागमती और दिल्ली दोनों ही ज़ाहिलों के हाथों रौंदी जाती रहीं। भागमतीको उसके गँवार ग्राहकों ने रौंदादिल्ली को बार-बार उजाड़ा विदेशी लुटेरों और आततायियों के आक्रमणों ने। भागमती की तरह दिल्ली भी बाँझ की बाँझ ही रही     
  • Ek Aur Chandrakanta : 1
    Kamleshwar
    245 221

    Item Code: #KGP-9040

    Availability: In stock

    एक और चन्द्रकान्ता-1
    भारतीय दूरदर्शन के इतिहास में 'चन्द्रकान्ता' सीरियल है जो लोकप्रियता का कीर्तिमान स्थापित किया है, इसका श्रेय हिन्दी के अग्रणी उपन्यासकार बाबू देवकीनंदन खत्री को जाता है क्योंकि 'चन्द्रकान्ता' सीरियल के सुप्रसिद्ध लेखक कमलेश्वर का मानना है कि इसकी प्रेरणा उन्होंने खत्री जी से ही ग्रहण की है । खत्रीजी की प्रेरणा के महादान से संपन्न इस शीर्ष कथाकार ने जिम प्रकार उपन्यास से सीरियल को अलग किया था, उसी तरह सीरियल से एक और चन्द्रकान्ता की इस महागाथा को अलग करके प्रस्तुत किया है ।
    'एक और चन्द्रकान्ता' के इस पाठ में हिन्दी पाठक एक बार फिर से अपनी भाषा तथा कथा के आदर्श तथा गौरवमयी अनुभव से गुजर सकेगा । कहा जा सकता है कि हिन्दी में यह रचना के स्तर पर एक प्रयोग भी है । लेखक के अनुसार यह “भाषायी स्तर पर एक विनम्र प्रयास है ताकि हिन्दी अधिकतम आम-फ़हम बन सके ।" हिन्दी कथा-परंपरा में किस्सागोई की मोहिनी को पुन: अवतरित करने में लेखक के भाषागत सरोकार और उपकार का यह औपन्यासिक वृत्तांत अनूठा उदाहरण प्रस्तुत करता है। 
    चमत्कार, ऐयारी, फंतासी, बाधाएँ, कर्तव्य, दोस्ती, युद्ध-पराक्रम, नमकहरामी, बगावत, प्रतिरोध, साजिश, मक्कारी, तांत्रिक एवं शैतानी शक्तियाँ, वासना, वफादारी तथा अंधसत्ता आदि को बखानती और परत-दर-परत खुलती-बंद होती अनेक कथा-उपकथाओं को इस उपन्यास-श्रृंखला ने मात्र प्यार-मोहब्बत की दास्तान को ही नहीं बखाना गया है बल्कि इस दास्तान के बहाने लेखक ने अपने देश और समाज की झाडा-तलाशी ली है ।  यही कारण है कि कुंवर  वीरेन्द्रसिंह और राजकुमारी चन्द्रकान्ता की उद्याम प्रेमकथा को बारंबार स्थगित करते हुए लेखक को दो देशों की परस्पर शत्रुता के बीच संधि की कोशिश को शिरोधार्य करता प्रतीत होता है तो वहीं भ्रष्टाचार, राष्ट्रद्रोह को प्रतिच्छाया वाली उपकथाओं के सृजन में व्यस्त दीखता है । समय के साथ निरंतर बहने भी रहने वालो 'एक और चन्द्रकान्ता' को इस महाकथा में महानायकों का चिरंतन संघर्ष यहाँ मौजूद है, उनका समाधान नहीं।  अर्थात यह एक अनंत कथा है जो यथार्थ और कल्पना की देह-आत्मा से सृजित और नवीकृत होती रहती है । कहना न होगा कि यह हिन्दी की एक समकालीन ऐसो 'तिलिस्मी' उपन्यास-श्रृंखला है जो हमारे अपने ही आविष्कृत रूप-स्वरूप को प्रत्यक्ष करती  है । इस उपन्यास-श्रृंखला  के सैकड़ों बयानों की अखण्ड पठनीयता लेखक की विदग्ध प्रतिभा का जीवंत साक्ष्य है ।
    यदि इस लेखक की सामाजिक प्रतिबद्धता क्रो बात पर ध्यान दें तो 'एक और चन्द्रकान्ता’ उसकी सम्यक लेखकीय 'जवाबदेही' का साहसिक उदाहरण है । अपने अग्रज-पूर्वज उपन्यासकारों का ऋण स्वीकार करते हुए, स्पर्धाहीन सर्जन की ऐसी बेजोड़ मिसाल आज अन्यत्र उपलब्ध नहीं है । दूसरे शब्दों में, कमलेश्वर का हिन्दी साहित्य में यह एक स्वतंत्रता संग्राम भी है जिसमें आम हिन्दी को सुराज सौंपने का सपना लक्षित है ।
  • Tantu
    Bhairppa
    695 626

    Item Code: #KGP-158

    Availability: In stock


  • Teen Tare
    Himanshu Joshi
    100 90

    Item Code: #KGP-1103

    Availability: In stock

    किशोर मन की उड़ानों के लिए सारा आकाश ही छोटा पड़ जाता है। किशारों की इस दुनिया में जड़ और जंगल, पशु और पक्षी सभी कुछ तो मनुष्यों के मित्र और सहायक होते हैं। इस मनोरंजक कहानी में गधे के दो नन्हे-मुन्ने बच्चे एक मानव किशोर के परम मित्र बनकर बड़ी ही रोमांचक और साहसपूर्ण यात्रा पर निकल पड़े हैं। पग-पग पर आपदाएं आती हैं। चोर-लुटेरे हैं, हिंसक जंतु और उनसे भी डरावने डाकू हैं। पर तीनों मित्र अपनी सूझ-बूण् और हिम्मत से सबको छकाते हुए अपना उद्धार करते हैं और दूसरे कई बालकों का उद्धार भी करते हैं। और इस बहुत बड़ी दुनिया में घूम-भटक कर घर लौट आते हैं। जिस शान से वे घर लौटे, अपनी यात्रा में जो ज्ञान और साहस उन्होंने संचित किया, आपदाओं की भट्ठी में मैत्री के सोने को उन्होंने कंचन बनाया, वह सभी किशोर पाठकों को भी प्राप्त हो।
  • Veshya
    Ajay Kumar Singh
    395 356

    Item Code: #KGP-1979

    Availability: In stock

    वेश्या
    अच्छे समाज के निर्माण की प्रक्रिया में स्वयं समाज को अनेक अंतर्विरोधों से जूझना पड़ता है। समाज का उत्थान हर व्यक्ति द्वारा व्यक्तिगत लाभों के त्याग द्वारा ही सुगम बनता है। मनुष्य का स्वार्थी होना स्वाभाविक गुण है, जो उसे सीमित करता है। वही त्याग का आदर्श है, जिससे निर्माण एवं सृजन की प्रक्रिया प्रारंभ होती है। समाज जब अपने वेश्यापन को छोड़ आदर्श की ओर बढ़ेगा तभी हम सभ्य समाज का निर्माण कर सकेंगे।
    आज के समय में समाज का बहुसंख्यक वर्ग निजी लाभ को समाज के लाभ से श्रेयस्कर समझता है। यह रीति ही हमें तृतीय विश्व के देशों का हिस्सा बनाती है। हमारी सोच प्रथम विश्व एवं द्वितीय विश्व के समाज के समान नहीं है। यही हमारा दुर्भाग्य है। ऐसे में कुछेक ऊँची सोच वाले लोग अंत में अपने को ठगा हुआ-सा महसूस करते हैं।
  • Hum Sab Gunahgar
    Mastram Kapoor
    350 315

    Item Code: #KGP-9027

    Availability: In stock

    हम सब गुनहगार
    लीक से हटकर सोचने वालों ने आशा को नहीं, निराशा को कर्म की प्रेरणा कहा है।
    डॉ. लोहिया ने निराश रहकर काम करते जाने को ही सबसे अच्छा कर्तव्य कहा है।
    फ्रांस के प्रसिद्ध लेखक एवं दार्शनिक ज्यांपाल सार्त्र ने भी सर्वोत्तम कर्मशक्ति डिस्पेयर की परिभाषा करते हुए कहा है, ‘दि एक्ट विदाउट होप।’
    ‘मा फलेषु कदाचन’ के कथन द्वारा गीता में भी इस सत्य को ही कहने की कोशिश की गई है...
    वर्तमान निराशा के धुँधलके में भविष्य को खोजने का लघु प्रयास यह पुस्तक स्वातंतत्र्योत्तर भारत की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक विसंगतियों का भविष्योन्मुख विवेचन है।
  • Kaagaz Ki Naav (Paperback)
    Nasera Sharma
    340 289

    Item Code: #KGP-KKN PB

    Availability: In stock

    "नवंबर,2019 में व्यास सम्मान से सम्मानित उपन्यास" 

    नासिरा शर्मा हिंदी कथा साहित्य में अपनी अनूठी रचनाओं के लिए सुप्रसिद्ध हैं। उनकी कथा रचनाएं समय और समाज की भीतरी तहों में छिपी सच्चाइयां प्रकट करने के लिए पढ़ी व सराही जाती हैं। ‘काग़ज़ की नाव’ नासिरा शर्मा का नया और विशिष्ट उपन्यास है। यह उपन्यास बिहार में रहने वाले उन परिवारों का वृत्तांत है, जिनके घर से कोई न कोई पुरुष खाड़ी मुल्कों में नौकरी करने गया हुआ है। वतन से दूर रहने वाले यहां छोड़ जाते हैं बुजुर्गों से लेकर बच्चों तक का भरा-पूरा संसार। खाड़ी मुल्कों से आने वाले रुपए...और रिश्तों के अंधेरे उजाले। ‘काग़ज़ की नाव’ शीर्षक एक रूपक बन जाता है, यानी ज़रूरतों और ज़िम्मेदारियों के समंदर को चंद रुपयों के सहारे पार करने की कोशिश।
    उपन्यास महजबीं और अमजद की बड़ी बेटी महलकष के पारिवारिक तनाव को केंद्र में रखकर विकसित हुआ है। महलकष के ससुर ज़हूर और ख़ाविन्द ज़ाकिर के बीच भावनाओं का जो चित्रण है वह पढ़ने योग्य है। मुख्य कथा के साथ भोलानाथ, कैलाश, बिंदू, सुधा, कांता, राजेश, त्रिसुलिया, क्रांति झा और मुक्ति झा आदि चरित्रों की बेहद मानीख़ेज़ उपकथाएं हैं।
    सबसे मार्मिक गाथा है मलकषनूर की। मलकषनूर यानी प्रकाश की देवी। मलकषनूर अपने अस्तित्व की रोशनी तलाश कर रही है, उन अंधेरों के बीच जो सदियों से औरत के नसीब का हिस्सा बने हुए हैं। मलकषनूर की इस तलाश का अंजाम क्या है, इसे लिखते हुए नासिरा शर्मा ने विमर्श और वृत्तांत की ऊंचाइयों को छू लिया है।
    नासिरा शर्मा यथार्थ के पथरीले परिदृश्य में उम्मीद की हरी दूब बखूबी पहचान लेती हैं। किस्सागोई उनका हुनर है। उनके पास बेहद रवां दवां भाषा है। सोने पर सुहागा यह कि इस उपन्यास में तो भोजपुरी भी खिली हुई है।
    ‘काग़ज़ की नाव’ ज़िंदगी और इनसानियत के प्रति हमारे यकीन को पुख़्ता करने वाला बेहद ख़ास उपन्यास है।
  • Ek Kiran : Sau Jhaniyan
    Acharya Janki Vallabh Shastri
    195 176

    Item Code: #KGP-676

    Availability: In stock


  • Gulloo Aur Ek Satrangi (Part 3)
    Shrinivas Vats
    280 224

    Item Code: #KGP-567

    Availability: In stock

    तीसरा खंड लिखते समय मुझे आनंद की विशेष अनुभूति हुई। कारण, चुलबुला विष्णु कर्णपुर जो लौट आया। इस खंड को पढ़ते हुए आपको भी ऐसा लगेगा कि विष्णु की उपस्थिति हमें आव्हादित करती है। मैंने विभिन्न विधाओं में अब तक लगभग तीन दर्जन पुस्तकें लिखी हैं, लेकिन इस किशोर उपन्यास से मुझे विशेष लगाव है। भला क्यों?
    आपके मम्मी-पापा की तरह मेरे पिताजी भी मुझे डाॅक्टर बनाना चाहते थे। मैंने विज्ञान पढ़ा भी। पर जीवित मेढक, खरगोश के ‘डाइसेक्शन’ मन खिन्न हो उठा। मैंने अपनी दिशा बदल ली। मेरी अलमारी में जीवविज्ञान की जगह कालिदास, शेक्सपियर, टैगोर, प्रेचंद की पुस्तकें आ गई। साहित्य पढ़ना और लिखना अच्छा लगने लगा। सोचता हूं, भले ही मैं डाॅक्टर न बन सका, लेकिन विज्ञान और कल्पना के बीच संतुलन बनाते हुए बालकों के लिए लिखना चिकित्सकीय अनुभव जैसा ही है। संभव है चिकित्सक बनकर बच्चों से उतना घुल-मिल न पाता, जितना उन्हें अब समझ पा रहा हूं।
    सतरंगी की चतुराई ने तो मेरा मन ही मोह लिया। डाॅक्टर बनने की राह आसान हो गई। पूछो, कैसे? पढ़िए चैथे खंड में।
    -श्रीनिवास वत्स
  • Is Daur Mein Hamsafar
    Amar Goswami
    350 315

    Item Code: #KGP-1999

    Availability: In stock

    इस दौर में हमसफ़र
    अमर गोस्वामी उन थोड़े से कथाकारों में से है जिनकी कहानियों पर उनका नाम न हो, तो भी आप यकीनन कह सकते है कि यह कहानी अमर गोस्वामी ही लिख सकते थे । आज के दौर में जबकि रचनाएँ ही नहीँ, लेखक भी एक-दूसरे की 'जेरोक्स कापियों' से तबदील हो रहे है, अमर गोस्वामी की यह पहचान और कूवत-या कहिए कि रचनात्मक सामर्थ्य काबिलेगौर है । इस सामर्थ्य के बूते ही अपनी लंबी कथा-यात्रा से कभी रचना पर उनका विश्वास डिगा नहीं और वे उन हड़बडिए लेखकों की पाँत में शामिल नहीं हुए, जो सिर्फ चर्चित होने के लिए लिखते है और अपने आसपास की हर चीज, हर संबंध को 'कैश' कर लेते के लिए उतावले दिखते है ।
    इन बातों की ओर ध्यान दिलाना इसलिए जरूरी लगा क्योंकि  अमर गोस्वामी का पहला उपन्यास ‘इस दौर में हमसफ़र' उनकी इस लंबी और धीरज-भरी यात्रा का ही स्वाभाविक फ़ल है-और  अमर जी का पहला उपन्यास होते हुए भी, गंभीर चर्चा और विश्लेषण की माँग करता है। ऊपर से देखने पर 'इस दौर में हमसफ़र' भले ही प्रेमचंदीय वर्णनात्पक शैली में लिखा उपन्यास नजर आए, पर थोडा भीतर उतरते ही समझ में आ जाता है फि यह सिर्फ एक उपन्यास ही नहीं, हमारे दौर की एक गहरी और स्तब्ध कर देने वाली 'एक्स-रे पड़ताल' भी है । यह दीगर बात है कि यह लिखा गया है इतनी जानदार भाषा और पुरलुत्फ अंदाज में कि जब तक आप इसे खत्म नहीं कर लेते, यह आपको चैन  नहीं लेने देता । बल्कि उपन्यास खत्म होने के बाद भी लंबे अरसे तक पाठकों का 'हमसफ़र' बना रहता है ।
    इसकी वजह शायद यह है कि एक उपन्यासकार के रूप में अमर गोस्वामी नई कथा-प्रविधियों के दास नहीं है और उन्हें उथले रूप से जैसे-तैसे जहाँ-तहाँ टाँक लेने को हरगिज पसंद नहीं करते । उनके यहाँ जो कुछ है, वह अपने ठेठ मौलिक अंदाज में है और अमर गोस्वामी का निहायत अपना है । इसीलिए वे बगैर दिखावटी स्त्री-विमर्श के शोर-शराबे के, अनन्या के रूप से हमें एक ऐसी विलक्षण और शक्तिशाली स्त्री से मिलवाते हैं जो अपनी बेबनाव शख्सियत से अति आधुनिक ही नहीं, 'नई पीढी की नई नारी’ लगती है, जिसकी धमक आगे आने वाले युगों में और ज्यादा साफ सुनी जा सकेगी । अनन्या के मित्र और सहयात्री के
    रूप में अनिरुद्ध बागची का 'विचलन' या हार, सिर्फ उसी की हार नहीं, आधुनिकता के उन तमाम नकली प्रत्ययों की हार भी है जो आधुनिकता को सिर्फ 'देह-भोग के सुख' तक सीमित कर देना चाहते हैं । अनन्या  के माई मधुसूदन के चेहरे में मुझे तो जगह-जगह स्वयं अमर गोस्वामी का दर्द से तिलपिलाता चेहरा नजर आया । यह दीगर बात है कि मधुसूदन की कहानी अपनी है, और वह अमर जी की नहीं, अपनी ही राह पर आगे बढ़ता दिखाई देता है ।
    ‘इस दौर में हमसफ़र' में आधुनिकता की 'विकृत' और 'रचनात्मक' दोनों ही शक्लें है और अपने पुरे विश्वसनीय रूप से है । इस लिहाज से यह एक ऐसा उपन्यास भी है जिसे कई किस्म के 'कंफ्यूज़न' और मतिभ्रम-भरे आज के समाज से सही दिशा की ओर  इशारा करने वाली एक पहल के रूप में भी देखा जा सकता है । हाँ, यह जरूर है कि अमर गोस्वामी कहीं-कहीं ज्यादा खुल गए है और जहाँ सिर्फ इशारों से काम चल सकता था, वहाँ भी 'रस' लेते नजर आते है । शायद महानगरीय समाज के 'रंगीन विकारों, की ओर ध्यानाकर्षण की यह उनकी अपनी शैली हो ।
    उपन्यास के अंत में मधुसूदन और हेमंती ही नहीं, शर्वाणी की चोट झेलकर अंतत: फिर से सागरिका की ओर मुड़ा शांतनु जिस नए समाज की नींव रखना चाहता है, उसमें मूल्यों के उपहास वाली 'मजावादी' दुष्टि नहीं, बल्कि विडंबनाओं को पहचानकर उनके  बीच से रास्ता खोजती 'मनुष्य की जय-यात्रा' का अगला पडाव नजर आ सकता है ।
    'इस दौर से हमसफ़र' में बेहद तीव्र गति और हलचल है तो विचारों का तेज संघर्ष भी । लेकिन ख़ुशी की बात यह है कि ये तेज बहसें दिल्ली से मीरजापुर और चुनार तक फैली उपन्यास की प्रदीर्घ कथा का एक सहज हिस्सा बनकर आती हैं । दिल्ली जैसे महानगरों की बनिस्बत छोटे शहरों, कस्बों में अब भी इंसानी संवेदना और आर्द्रता कैसे बनी हुई है, इसकी परख उपन्यासकार के रूप में अमर गोस्वामी जगह-जगह करवाते हैं । कोई हैरत की बात नहीं कि इसी कोशिश में वे डॉ० प्रशांत सिन्हा जैसे बड़े कद के इंसान से हमें रू-ब-रू होने का मौका देते हैं, जिनके आगे सारी महानगरीय भभ्भड़ और चमक-दमक फीकी लगती है ।
    अलबता अमर गोस्वामी 'इस दौर में हमसफ़र' को एक उपन्यास के साथ-साथ सहज ही बहुरंगी छवियों और गतियों वाले हमारे दौर का 'एक विशद समाजशास्त्रीय अध्ययन' भी बना सके-यह एक बडी सफलता है । अपने पहले ही उपन्यास से अमर गोस्वामी आज के महत्वपूर्ण रचनाकारों की पाँत में आ गए हैं, यह बात उनकी रचनात्मक सामर्थ्य के प्रति मन में 'आश्वस्ति' के साथ-साथ आदर भी पैदा करती है ।
  • Naav Na Baandho Aisi Thaur
    Dinesh Pathak
    315 284

    Item Code: #KGP-277

    Availability: In stock

    नाव न बाँधो ऐसी ठौर
    हिंदी के सुपरिचित कथाकार दिनेश पाठक के इस उपन्यास का केंद्रीय विषय है प्रेम।  यह विवाहेतर प्रेम है, जिसका अपना अलग रंग है और अलग संघर्ष भी। नारी-पुरुषजन्य आकर्षण प्रकृति का सहज स्वभाव है। यह स्वभाव इतना प्रबल है, इतना अदम्य कि बावजूद तमाम वर्जनाओं के इसकी धार सतत प्रवाहित रहती है। इस आकर्षण में न तो कोई उम्र होती है और न ही कोई शर्त। कब, कहाँ और कैसे दो विपरीत एक-दूसरे के प्रति आकृष्ट होकर साडी वर्जनाओं को चुनौती देने लगेंगे, कहना मुश्किल है। आज के दौर में जब स्त्री-पुरुष साथ-साथ काम कर रहे हैं, कंधे से कंधा मिलकर, तब इस आकर्षण की परिधि और व्यापक हो उठी है। साथ-साथ काम करते हुए कब दो प्राणी चुपके से एक-दूसरे की भावनाओं में भी शामिल हो जाते हैं, ज्ञात नहीं पद्त। और यदि वे दोनों ही पहले से विवाहित हों तो भावनाओ का यह ज्वार एक नयी समस्या को जन्म देता है - सामाजिक दृष्टि से कदाचित यह अवैध प्रेम है, एकदम वर्जित व निषिद्ध प्रेम, विवाह-व्यवस्था के नितांत विपरीता उपन्यास में एक साथ दो धुरियां हैं-एक में समाज के विखंडन का भय है, परंपरागत मान्यताओं-मूल्यों के साथ परिवारों के टूटने व समाज के अराजक होने का डर है तो दूसरे में व्यक्ति स्वातंत्र्य के आगे सामाजिक मूल्यों के प्रति अस्वीकार का भाव। प्रश्न है विवाहित स्त्री-पुरुष के बीच क्या यह विवाहेतर प्रेम-सम्बन्ध सही है ? निष्कर्ष पर तो पाठकों को पहुंचना है।
  • Huzoor Darbar
    Govind Mishra
    375 338

    Item Code: #KGP-315

    Availability: In stock

    उपन्यास के पात्रों को हम ऐतिहासिक मानें या न मानें, क्यांकि आखिर यह उपन्यास ही है, किंतु इसके पात्रों का सृजन ऐतिहासिक पात्रों के आधार पर हुआ है, यह सच है। आधुनिक युग का संत्रास इस उपन्यास में मूर्त हो उठा है। राजनीतिक क्रूरता की झाँकी उपन्यास में बड़े ही मार्मिक रूप में अंकित हुई है। लोकतंत्र में भी ‘हुज़ूर दरबार’ मौजूद है। इसे पहचानने की आवश्यकता है।
  • Naani
    Dronvir Kohli
    350 315

    Item Code: #KGP-522

    Availability: In stock

    नानी
    नई सदी में नई दुनिया की सुख-समृद्धि की पृष्ठभूमि में लिखा यह अद्भुत उपन्यास, यदि मिलान कुंदेरा के शब्द उधार लेकर कहें, तो ‘दुनियावी जंजाल में उलझे मानव-जीवन की तहकीकात या तलाश या तफतीश' की जीवंत रचना है ।
    निस्संदेह, ‘नानी' के यशस्वी लेखक ने अपने देश से लेकर नई दुनिया तक इस तलाश का बीड़ा उठाया है । प्रथमतः यह तहकीकात है विदेश में जाकर बसने वाले ऐसे भारतीय दंपतियों की जीवनशैली की, जहाँ अपने कामधंधे में वे इतने डूब जाते हैं। कि स्वदेश और स्वजनों से भी विमुख-से होते जाते हैं । मगर धनार्जन में दिन-रात खटते इन लोगों को तब चिंताएँ सताती हैं। जब इनके संतान होती है। तब नवजात शिशु को विदेशी 'नैनी' की संदिग्ध दया-ममता पर या किसी डे-केयर' में छोड़ने के अलावा उनके पास और कोई चारा नहीं रहता । ऐसे में अनायास ही उनकी प्रीति जगती है स्वदेश में माँ-बाप, दादा-दादी, नाना-नानी और दूसरे सगे-संबंधियों पर, जो अपनी संतान के प्रति कर्तव्य-भावना से अभिभूत होकर इस आड़े वक्त में उनके पास दौड़े जाते हैं । मगर शीघ्र ही पाते हैं कि बेटा-बेटी की गिरस्ती में ही उनका रुतबा एक महिमान्वित नैनी' से अधिक का नहीं है । और फिर विदेशी धरती पर किस तरह अकेलापन, अवमानना और संत्रास वे झेलते हैं और इस मीठी जेल से छुटकारा पाने को किस तरह छटपटाते हैं, उसी को मार्मिक वृत्तांत है नानी' ।
    इसी के साथ ही लेखक ने इस हृदयग्राही कथाभूमि में अमेरिकी समाज की विकृतियों-विसंगतियों को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया और यह बात बड़ी उत्कटता के साथ रेखांकित की है। कि दुनिया के धनाढ्यतम देश में अनंत भौतिक सुख-सुविधाओं के बावजूद वहाँ का जन-जन किस तरह पारिवारिक एवं संतान-सुख से वंचित होता जा रहा है ।
    'नानी' की प्रथम पृष्ठ की हास्य-विनोदपूर्ण स्थिति से लगाकर उसके अंतिम पृष्ठों की कारुणिक व्याख्या का विकास उसी प्रकार हुआ है, जिस प्रकार फूल-पत्तियाँ, वनस्पतियाँ और पेड़-पौधे शनैः-शनैः विकसित होते हैं ।

  • Yah Ant Naheen
    Mithileshwar
    500 450

    Item Code: #KGP-812

    Availability: In stock

    यह अंत नहीं

    अंतहीन बनती समस्याओं के खिलाफ मानवीय संघर्ष की विजयगाथा का जीवंत उपन्यास। जीवन की सकारात्मक चेतना और अपराजेय मानवीय जिजीविषा का सार्थक उद्घोष। ग्रामीण जीवन की जमीनी सच्चाई का बेबाक चित्रण। चुनिया और जोखन के रूप में अविस्मरणीय चरित्रों का सृजन। हिंसा, द्वेष और नफरत के विरुद्ध सहज मानवीय संबंधों की स्थापना। गहन मानवीय संवेदनाओं का दस्तावेज। हिंदी उपन्यास के समकालीन दौर में कलावाद और यथार्थवाद के द्वंद्व को पाटने वाला एक मजबूत सेतु। एक तरफ भाषा की रवानगी और खिलंदड़पन तो दूसरी तरफ जमीनी सच्चाइयों का अंकन। भाषा, शिल्प और कथ्य के स्तर पर एक सशक्त कृति। बीसवीं शताब्दी को एक स्तरीय और यादगार उपन्यास

  • Krantikari
    Roshan Premyogi
    260 234

    Item Code: #KGP-1943

    Availability: In stock

    क्रांतिकारी
    दलित परिवार में जन्म लेने के कारण सामाजिक अस्पृश्यता और उत्पीड़न का दंश मैंने भी सहा है, इसलिए ‘क्रांतिकारी’ को पढ़ते हुए यह सवाल मेरे मन में कई बार उठा कि जिस तरह इस उपन्यास में चंद्रशेखर और केवलानंद जैसे सचेत सवर्ण लड़के दलित रामकरन के साथ खड़े हैं, मेरे साथ क्यों नहीं खड़े हुए ?
    चंद्रशेखर मुख्य पात्र है, जो चाहता है कि इलाके के गाँवों में दलितों का जीवन-स्तर ऊँचा उठे, वे संगठित हों और बराबरी पर आने के लिए लड़ें। दलितों की लड़ाई में वह अपना एक हाथ गँवा बैठता है। अंत में उसके विचारों की विजय होती है। विजय इस तरह कि दो मेधावी युवा अपने-अपने गाँव यह सोचकर आए थे कि वे यहीं पर रोजगार करेंगे और अपने साथ दलित समाज का भी जीवन-स्तर ऊँचा उठाएँगे। उनकी राह में क्षेत्रीय विधायक काँटा बोते हैं, इसलिए कि यदि रामकरन जैसे हरिजन दलितों के सर्वमान्य नेता बन जाएँगे तो हम सवर्णों का वोट बैंक टूट जाएगा। उधर चंद्रशेखर और रामकरन मिलकर दलितों को यह अहसास कराते हैं कि यदि संगठित और शिक्षित बनोगे तो कोई भी तुम्हारा उत्पीड़न नहीं कर पाएगा।
    ईशावस्या, माला और संध्या जैसे स्त्री-पात्रों को उपन्यास में महत्त्व नहीं मिला है, लेकिन सबकी कमी पूरी कर देती हैं सुन्नरी देवी। उनका संघर्ष समूची दलित स्त्री जाति का संघर्ष है। वे किसी देवी की तरह समाजियों का नेतृत्व सँभालती हैं। दरअसल दलित क्रांति की मशक्कत तीन युवा मिलकर करते हैं, लेकिन जब क्रांति होती है तो वे युवा पीछे रह जाते हैं और सुन्नरी देवी विजय का परचम लहरा देती हैं।  

  • Saryu Didi
    Manorma Jafa
    175 158

    Item Code: #KGP-1956

    Availability: In stock

    सरयू दीदी
    मैंने फोन मिलाया। गोपाल जोशी सुनाकर सदके में आ गए, 'यह नहीं हो सकता। मैं अभी पता लगाता हूँ।' उन्होंने फोन रख दिया।
    'क्या करूं मनु?' दीदी की आवाज में बेबसी थी। वही तो सदा समझदार रहीं। वही तो हर प्रश्न का उत्तर और हर समस्या का हल ढूंढ़ लेती थीं। पर यहां वह किंकर्त्तव्यविमूढ़-सी थीं ।  वह उठकर कमरे में टहलने लगीं । 'अभी तो जीवन शुरू ही हुआ था मनु।' दीदी ने हाथ जोड़े ऊपर देखा, आंखें बंद कीं और जोर से बोली, 'हे ईश्वर आप ही माता है आप ही पिता हैं। हे ईश्वर आप ही सबकी रक्षा करने वाले हैं। हे ईश्वर मुझे ठीक सोचने-समझने की शक्ति दीजिए। मुझे बल दीजिए। हे ईश्वर मुझे बल दीजिए।' दो क्षण बाद दीदी की आंखें झरने लगीं। थोडी देर बाद दीदी में शक्ति लौटकर आ गई, 'मनु मैं यब कुछ सह लूंगी। भगवान महान हैं, दयालु हैं।' मेरी तरफ़ मुड़कर बोलीं, 'मनु। पापा से पूछो अजीत को लेकर प्लेन कब आ रहा है?' वह उठकर दराज़ में से कूछ खोजने लगीं।
    तभी फोन की घंटी बजी मैंने फ़ोन उठा लिया। उधर फोन पर मां थी, 'मनु अजीत को यहां अपने घर ले आते हैं। वही ठीक होगा। वहीं सरयूजी क्या करेंगी? '
    मैं दीदी से पूछती हूँ। हिम्मत करके मैंने दीदी से पूछा। दीदी ने कहा, 'मनु! अजीत का घर यहीं है, वह यहीं आयेंगे ।'
    मैंने जाकर मां को बता दिया।
    -(इसी उपन्यास से)
  • Ghanta
    Pandey Baichain Sharma 'Ugra'
    160 144

    Item Code: #KGP-425

    Availability: In stock

    पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ हिंदी के आरंभिक इतिहास के एक स्तंभ, एक मील का पत्थर रहे हैं! ‘उग्र’ अपने नाम के अनुकूल उग्रता और विद्रोह के प्रतीक, विचारों में उग्रता और समाज के अन्याय-अत्याचार शोषण के प्रति विद्रोह। यही कारण है कि वे समाज और साहित्य में अकेले रहे। सिद्धांत पथ पर निरंतर दृढ़चरण रहे। ‘उग्र’ ने विवाह नहीं किया था, अतः उनकी कोई संतान नहीं थी जो अन्यान्यों की तरह अपने पिता पर काम करते, न कोई शिष्य वर्ग तैयार किया जो उनकी रचनावली, ग्रंथावली तैयार करता। ‘उग्र’ को हिंदी संसार समझा ही नहीं, पचासों चर्चित विवादास्पद उपन्यास, नाटक, कहानी-संग्रह, कविता-संग्रह के लेखक, अनेक ख्यात-जब्त पत्र-पत्रिकाओं के जनक-संपादक ‘उग्र’ एक संगठित आंदोलन के शिकार हुए, उपेक्षित रहे।

    भीड़ से अलग रहने वाले उग्र जी जहां अपनी सबलता और सद्गुणों की सीमा से अपरिचित नहीं थे, वहीं अपनी दुर्बलता और दुर्गुणों की आत्मस्वीकृति में भी संकोच नहीं करते थेµनिश्छल-निर्मल हृदय, निष्पक्ष-निर्दलीय व्यक्तित्व और निर्भीक-निशि्ंचत चिंतन! वे विचारों की धुंध में कभी नहीं पड़े और न अपने मनोभावों को वाणी देने में किसी सामिष भंगिमा का ही कभी आश्रय लिया। वे मन, वचन और कर्म से एक थे, महात्मा थे : ‘मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं महात्मनाम्’।

    प्रथित पत्रकार पराड़कर जी को गुरु मानने वाले उग्र जी वाराणसी के दैनिक ‘आज’ में कंपोजिटर के नाते आए और आठ वर्ष तक उसमें ‘अष्टावक्र’ के नाम से लिखते रहे।

    सही मानों में वे स्वयंभू साहित्यकार थे : ‘कविर्मनीषी परिभूः स्वयंभूः’। हिंदी साहित्य में उग्र जी की प्रसिद्धि ‘चॉकलेट’ के कारण हुई। 

    पं. बनारसीदास चतुर्वेदी के सदृश वरिष्ठ पत्रकार ने उनके लेखन के ख़िलाफ ‘घासलेटी आंदोलन’ चलाया। उससे उग्र की उग्रता कम करने का षड्यंत्र हुआ, पर ‘उग्र’ इन छोटी-मोटी बातों से विचलित हो जाने वाले रचनाकार थे भी नहीं।

    अत्यधिक प्रसन्नता है कि आज 77 वर्ष बाद ‘उग्र’ का यह ऐतिहासिक उपन्यास फिर से मूल्यांकन, निष्कर्ष, आलोचना-समालोचना के लिए पाठकों, विद्वानों, समीक्षकों-अन्वेषकों के हाथों में समर्पित करने, संपादन करने का सौभाग्य मिलाµश्री राजशेखर व्यास को।

    ‘उग्र’ का यह उपन्यास अब दुष्प्राप्य-सा था। बड़ा श्रम-साध्य था उसे खोजना, उनके संपूर्ण साहित्य का आलोड़न-विलोड़न करना। उनका जीवनवृत्त और फिर ‘उग्र’ जैसे महारथी के उपन्यास पर ‘दो शब्द!’ लिखना।

    उग्र-साहित्य के समर्पित समाराधक राजशेखर व्यास के 35 वर्षों के अनवरत प्रयासों से आज ‘उग्र’ हिंदी में पुनर्जीवित हो उठे हैं।

  • SWAPNAPAASH
    Manisha Kulshreshtha
    240 216

    Item Code: #KGP-1572

    Availability: In stock

    'स्वप्नपाश' नृत्य और अभिनय से आजीविका-स्तर तक संबद्ध माँ-बाप की संतान गुलनाज फरीबा के मानसिक विदलन और अनोखे सृजनात्मक विकास व उपलब्धियों की कथा है । समकालीन सनसनियों में से एक से शुरु हुई यह कथा हमें एक बालिका, एक किशोरी और एक युवती के उस आरिम अरण्य में ले जाती है जहाँ 'नर्म' और 'गर्म' डिल्युजंस और हैल्युसिनैशरेन का वास्तविक मायालोक है। मायालोक और वास्तविक? जी हाँ, वास्तविक क्योंकि स्वप्न-दु:स्वप्न जिस पर बीतते है उसके लिए कुछ भी 'वर्चुअल' नहीं-न सुकून , न सितम । उस पीडा को सिर्फ कल्पना की जा सकती है कि खुली दुनिया में जीती-जागती काया की चेतना एक अमोघ पाश में आबद्ध हो जाए और अधिकांश अपने किसी सपने के पीछे भागते नज़र आएँ। पाश में बँधे व्यक्ति की मुक्ति तब तक संभव नहीं होती जब तक कोई और आकर खोल न दे। मगर जब एक सम-अनुभूति-संपन्न खोलने वाले की तलाशा त्रासद हो तो? दोतरफा यातना से गुज़रने के खाद अगर कोई मिले और वह भी हौलै-हौले एक नए पाश में बंध चले तो ? अनोखे रोमांसों से भरी इस कथा में एक नए तरह की रोमांचकता है जो एक ही बैठक में पढ़ जाने के लिए बाध्य कर देती है ।
    गुलनाज़ एक चित्रकार है और वह भी 'प्राडिजी'।  ऐसे  चरित्र का बाहरी और भीतरी संसार कला की चेतना और आलोचनात्मक समझ के बगैर नहीं रचा जा सकता था। कथा में पेंटिंग  की दुनिया के प्रासंगिक नमूने और ज्ञात-अल्पज्ञात नाम ऐसे आते हैं गोया वे रचनाकार के पुराने पड़ोसी हों। आश्चर्य तो तब होता है जब हम नायिका की सृजन-प्रविधि और उसको पेंटिग्स के चमत्कृत (कभी-कभी आतंकित) कर देने वाले विवरण से गुजरते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि मनीषा कुलश्रेष्ठ मूलत: चित्रकार हैं। उनकी रचनात्मक शोधपरकता का आलम यह है कि वे इसी क्रम में यह वैज्ञानिक तथ्य भी संप्रेषित कर जाती है कि स्किजोफ्रेनिया किसी को ग्रस्त भर करता है, उसे एक व्यक्ति के रूप में पूरी तरह खारिज नहीं करता ।
    स्किजोफ्रेनिया पर केंद्रीय यह उपन्यास ऐसे समय में  आया है जब वैश्वीकरण की अदम्यता और अपरिहार्यता के नगाड़े बज रहे हैं। स्थापित तथ्य है कि वैश्वीकरण अपने दो अनिवार्य घटकों-शहरीकरण और विस्थापन- के द्वारा परिवारिक ढाँचे को ध्वस्त करता है। मनोचिकित्सकीय शोधों के अनुसार शहरीकरण स्किजोफ्रेनिया के होने की दर को बढ़ाता है और पारिवारिक ढाँचे में टूट रोग से मुक्ति में बाधा पहुँचाती है। ध्यातव्य है कि गुलनाज पिछले ढाई दशकों में बने ग्लोबल गाँव की बेटी है । अस्तु, इस कथा को एक गंभीर चेतावनी की तरह भी पढे जाने की आवश्यकता है। आधुनिक जीवन, कला और मनोविज्ञान-मनोचिकित्सा की बारीरिज्यों को सहजता से चित्रित करती समर्थ और प्रवहमान भाया में लिखा यह उपन्यास बाध्यकारी विखंडनों से ग्रस्त समय में हर सजग पाठक के लिए एक अनिवार्य पाठ है ।
  • Aapki Pratiksha
    Shyam Vimal
    270 243

    Item Code: #KGP-555

    Availability: In stock

    आपकी प्रतीक्षा
    सच भी कई बार कल्पना को ओढ़कर नई भंगिमा अपनाकर कागज की पीठ पर सवार होने को आतुर हो उठता है। अथवा यूं भी कहा जा सकता है कि कल्पना कभी-कभी सच-सी भ्रमित करने लगती है और रिश्ते बदनाम होने लगते हैं।
    जैसे होता है न, मरे हुए कीट-पतिंगे को, गिरे हुए मिठाई के टुकड़े को समग्रतः घेरे हुए लाल चींटियां आक्रांत वस्तु की पहचान को भ्रमित कर देती हैं। यदि ऐसा भ्रम मृत कीट या मिठाई-सा इस रचना से बने तो समझ लो आपने रचना का मज़ा लूट लिया।
    उपन्यासकार को आश्वासन दिया गया था पत्रा का सिलसिला जारी रहने का इस वाक्य के साथ--
    ‘यह वह धारा है जो क्षीण हो सकती है, पर टूटेगी नहीं।
    परंतु वह सारस्वत धारा तो लुप्त हो गई!
    क्या प्रतीक्षा में रहते रहा जाए?
    अंजना की दूसरी जिंदगी कैसे निभ रही होगी?’
  • Gauri
    Ajeet Kaur
    125 113

    Item Code: #KGP-2050

    Availability: In stock

    गौरी धीरे-धीरे उठी। चावलों वाले कोठार के एकदम नीचे हाथ मारा और टोहकर एक छोटी-सी पोटली बाहर निकाल ली। धीरे-धीरे उसे मैले-से चिथड़े की गाँठें खोलीं। बीच में से दो बालियाद्द निकालीं, जिनमें एक-एक सुर्ख मोती लटक रहा था।
    उसने बालियाँ काँसे की एक रकाबी में रखकर चूल्हे पर रख दीं। जो भी सुबह रसोई का दरवाजा खोलेगा, उसे सबसे पहले वही दिखेंगी और उससे कहेंगी, ‘इस घर में से एक ही चीज मुझे मिली थी, तुझे पैदा करने का इनाम। तूने उस जन्म को अस्वीकार कर दिया है। तूने उसी कोख को गाली दी है, जिसने तुझे अपने सुरक्षित घेरे में लपेटकर और अपना लहू पिलाकर जीवन दिया। ले ये बालियाँ। ये मैं तुझे देती हूँ। ये गाली हैं, मेरे जन्म पर, तेरे जीवन पर। गाली भी और बद्दुआ भी। ले ले इन्हें, बेचकर दारू पी लेना। मेरे बाप को दे दिए। मुफ्त में दान में। ले मेरा दान और मेरी बद्दुआ, जो पृथ्वी के हर कोने तक तेरा पीछा करेगी।’
    गौरी ने अपनी छोटी-सी कपड़ों की पोटली भी चूल्हे के पास रख दी और बाहर निकल आई।
    पिछले आँगन का दरवाजा खोला और गली में बाहर निकल आईं।
    -इसी उपन्यास से
  • Nikka Nimana
    Sushil Kalra
    400 360

    Item Code: #KGP-550

    Availability: In stock

    ...आजादी के पैरोकार जो जमीन तैयार कर रहे थे उसकी उपजनिक्का निमाणा' के अतिरिक्त और हो ही क्या सकती थी। तिरस्कृत, लांछित, अपमानित चरित्र-एक ऐसा चरित्र जो भ्रष्ट आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक प्रक्रिया का कुल योग है।

    पंजाब का पिण्ड घोपलू उन लाखों गांवों में से एक है जो चीख रहे हैं-हमें पानी दो। खाद दो। बीज और बिजली दो। शिक्षा और संस्कार दो। भूरी, नंबर, मद्दी, वड्डी मां, निक्काया, मेंहदीरत्तो, चाचे कृष्णा, कहां नहीं हैं? भरे पड़े हैं सारे देश में संसद की जड़ों में खाद बनकर जी रहे हैं।

    दरियाई घोड़े की तरह मुंह फाड़े राजतंत्र, देह और दौलत की घोर अमानवीय अराजक परिणति के अतिरिक्त और कुछ नहीं। मूल्य ह्रास, नैतिक पतन, नारकीय जीवन को गांधी टोपी के नीचे छिपाए, जनता को लगातार रौंदता

    और भटकाता सत्ताधारी वर्ग औरत, शराब और पैसे की त्रिवेणी में सदा सर्वदा पवित्र है! जो इस कला में जितना पारंगत है, उतना ही ऊंचा पद, सत्ता में, उसके लिए सुरक्षित है। निक्का इसी गंगा का शालिग्राम है। लेकिन इस प्रतियोगिता में निक्का एक हद तक ही विजयी होता है। धीरे-धीरे डोर उसके हाथ से छूटती जाती है। वह महज एक मोहरा रह जाता है। उभरता है फिर एक अत्यंत क्रूर, अमानवीय, स्वार्थाध शासक वर्ग। लेकिन साथ-साथ ही एक नियामिका शक्ति भी उभरती है-जनता।

    यथार्थ की तहों तक पहुंचतासृजनात्मक प्रवहमान भाषा का माध्यम और सुस्पष्ट दृष्टि का प्रमाण देने वाला यह उपन्यास निश्चित ही अपने समय का दस्तावेज लगता है।    

  • Parv
    Bhairppa
    800 560

    Item Code: #kgp-147

    Availability: In stock

    पर्व
    भारतीय वाडमय में पंचम वेद के रूप में अधिष्टित महाभारत पर आधारित भैरप्पा की महान् औपन्यासिक कृति । इस उपन्यास में लेखक ने महाभारत के पात्रों, स्थितियों और घटनाओं का जो वस्तुनिष्ठ आलेखन प्रस्तुत किया है, वह अदभुत और अनुपम है । महापारतकालीन भारत की सामाजिक संरचना क्या तत्कालीन इतिहास और परंपराओं के लंबे अरसे तक अनुसंघान, व्यापक भ्रमण और अध्ययन पर आधारित यह उपन्यास भारतीय साहित्य की महान् उपलब्धि है । अतीतोन्मुखी भारतीय जनमानस के साथ जुडे महाभारत के पात्रों के अलंकरण और चमत्कारों एवं अतिशयोक्तियों की कैचुली उतारकर उन्हें मानवीय धरातल पर साधारण मनुष्य के रूप में प्रस्तुत करने के कारण यह उपन्यास वस्तुत: एक क्रांतिकारी जाते है । संक्षेप में इतना कहना ही शायद पर्याप्त हो कि 'पर्व' आधुनिक संदर्मों से जुडा महाभास्त का पुनराख्यान है ।
    'पर्व' का फलक भले ही महाभारत पर आधारित हो, लेकिन यह एक साहित्यिक कृति है-एक उपन्यास । पाठक इसे एक उपन्यास के रूप में ही स्वीकार करेंगे-ऐसा लेखक का अनुरोध है । 

  • Haitrik
    Rajesh Ahuja
    140 126

    Item Code: #KGP-1471

    Availability: In stock

    हर रात सोने से पहले कहानी सुनना ‘तारक’ का नियम था। सच कहूं तो कहानी सुनाए बिना मुझे भी चैन नहीं पड़ता था। कहानी सुनते हुए जितना मजा उसे आता था, उसके चेहरे के हाव-भाव और कौतूहल-भरी आंखें देखकर उससे भी अधिक सुख मुझे मिलता था। उस दिन कोई नई कहानी याद नहीं आ रही थी, सो मैंने उससे कहा, ‘कोई पुरानी कहानी सुना दूं?’ मैं कभी-कीाी ऐसी कहानियां सुनाकर उसे बहला दिया करता था, जो मैं उसे पहले कभी सुना चुका था। अकसर वह सुनी हुई कहानी दोबारा सुनने के लिए राजी हो जाता था; पर उस दिन वह नहीं माना। ‘एक ही कहानी को बार-बार सुनने में कोई मजा आता है?’ वह मुंह सुजाकर बैठ गया। मैंने बहुतसमझाया पर वह जिद पर अड़ा रहा। मेरा बड़ा बेटा ‘आकाश’ भी वहां बैठा था। उसने कहा, ‘आप इसे वही कहानी सुना दो न, जो आपने एक बार मुझे सुनाई थी ‘क्रिकेट वाली’।’
    इस कहानी अर्थात् उपन्यास में एक स्थान पर मैंने लिखा है, ‘कोई भी नया काम शुरू करते हुए मन में आशा, डर, संकोच आदि भाव एक साथ जागृत होते हैं।’ उपन्यास को लिखते समय यही स्थिति मेरी भी थी, किंतु उपन्यास के आगे बढ़ने के साथ-साथ, आशा का भाव आगे बढ़ता गया तथा डर और संकोच के भाव पीछे छूट गए।
    -लेखक
  • In Sabke Baavajood
    Manohar Bandhopadhyaya
    120 108

    Item Code: #KGP-545

    Availability: In stock

    इन सबके बावजूद
    प्राइवेट कॉलेज के असुरक्षित कार्य को छोड़कर अजय एक संपन्न व्यापारी की ‘भानजी’ रति को ट्यूशन पढ़ाता है। यहाँ उसे प्रॉपर्टी डीलिंग का भी काम मिल जाता है। इस व्यापार के दाँव-पेच सीख वह रति को हथियाकर धनवान बनने के स्वप्न देखता है। इस कोशिश में वह बुरी तरह पिटता ही नहीं, अपनी जान भी खतरे में डाल देता है। व्यापारी को उसके शोषण की फिक्र है और लड़की उसे झटककर किसी और की हो जाती है। हताश अजय तब रेनु की ओर मुड़ता है, जिसे वह किसी समय चाहने लगा था। 
    कहानी वर्तमान युग के नवयुवकों की त्रासदी को उजागर करती है, जिसमें वे वैवाहिक जीवन की जरूरतों को पूरा करने के लिए हर जोखिम-संघर्ष में स्वयं को झोंक देते हैं। यह मर्मस्पर्शी उपन्यास आज की अस्तित्ववादी वास्तविकता को समझने के लिए पाठकों को विवश करता है।
  • Seema
    Ramkrishna Sudhakar
    125 113

    Item Code: #KGP-9090

    Availability: In stock


  • Qaidi
    Shanta Kumar
    120 108

    Item Code: #KGP-1996

    Availability: In stock

    कैदी
    "राजीव ! इस देश में हर आदमी के
    माथे पर उसकी कीमत लिखी रहती है ।
    वह कीमत चुकाओ और उसे खरीद लो ।
    यहां बाज़ार में सरेआम इंसान
    नीलामी पर चढते है और जाहिर
    में भगवान बेचे जाते है ।
    बड़ा अनुभव है मुझे जिंदगी का ।
    जेल में वार्डर पैसे लेकर क्या नहीं
    ले आते ? बस, इतनी बात है कि
    दुगुना-तिगुना मूल्य चुकाना पड़ता है ।
    जब उन्हें पता चल गया कि मेरे पास
    धन है तब मेरो इज्जत होने लगी ।

    'मैंने कैद पूरी की । छूटकर बाहर आया,
    पर जाता कहाँ? फिर से वही धंधा,
    पुलिस और जेल । इसी प्रकार अब
    सातवीं बार यहाँ आया हूँ ।
    अब यह कैद समाप्त हो रही है
    तो फिर मेरे सामने सवाल
    खडा हो गया है कि बाहर जाकर
    कहाँ जाऊंगा व क्या  करूँगा ?
    जानता हूँ कि कुछ भी और
    नहीं कर सकता । यह जिंदगी अब
    जेल की ही हो गई है ।”
    [इसी उपन्यास से]
  • Hum Yahan The
    Madhu Kankria
    590 472

    Item Code: #KGP-9351

    Availability: In stock

    ‘जंगल कुमार! सफलता-असफलता कुछ नहीं होती। असली चीज होती है आपके जीवन का ताप कितनों तक पहुंचा। जीवन का अर्थ है अपने पीछे कुछ निशान छोड़ जाना।’ दीपशिखा वेफ ये वाक्य मधु कांकरिया के नवीनतम उपन्यास हम यहां थे की सैद्धांतिकी है। इस उपन्यास के दो केंद्रीय चरित्रा हैं–दीपशिखा और जंगल कुमार। दोनों अलग-अलग पृष्ठभूमि और अलग-अलग शहर से आए–लेकिन लक्ष्य की समानता उनको जीवन पथ पर अभिन्न बना देती है।
    ‘हम यहां थे’ जीवन में व्याप्त करुणा, प्रतिरोध, संघर्ष, स्वप्न, संकल्प और समर्पण का अनुसंधन है। किसी ने कहा था कि लक्ष्यहीन जीवन भ्रष्ट और दयनीय होता है। यह जीवन सत्य धीरे-धीरे उपन्यास की नायिका या केंद्रीय अस्मिता दीपशिखा के भीतर आकार लेता है। इसको वृत्तांत का रूप देने के लिए मधु कांकरिया ने डायरी का शिल्प अपनाया है। ‘दीपशिखा की डायरी: अपने अपने जंगल’ से ‘ओ जिंदगी! ओ प्राण!’ जैसे कई उपशीर्षकों में दीपशिखा के बहाने एक सामान्य स्त्री के भीषण संघर्ष और कोलकाता की सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक स्थितियों का वर्णन किया गया है। ‘उत्तराधर’ में जंगल कुमार के पक्ष से दीपशिखा के वृत्तांत को संपूर्ण किया गया है। अर्थात् आदिवासियों के बीच जाकर उनके संघर्ष में सहभागी बनकर दीपशिखा ‘कैदी नंबर 989’ बन गई। मधु कांकरिया ने अद्भुत ढंग से आदिवासी अस्मिता और संघर्ष को शब्द दिए हैं। प्रकृति और प्रकृतिसंतानों के साथ व्यवस्था और बाजार के सुलूक हृदय को विचलित कर देते हैं। जंगलों की अंधधुंध कटाई और जंगली जानवरों को बेघर होते देख जिस खतरे की ओर वे इशारा करती हैं उसकी अनदेखी कर भविष्य की ओर देखना संभव नहीं है। मानव मन के गहरे स्तरों को छूती यह कहानी जीवन के दर्द और सौंदर्य, प्रेम और उदासी को अद्भुत ढंग से रचती है। पूरे उपन्यास में भाषा के अनेक रचाव हैं, लेकिन जब दीपशिखा और जंगल कुमार का साहचर्य आता है तब भाषा सचमुच सहृदय हो उठती है।
    ‘हम यहां थे’ एक ऐसा उपन्यास है जो जीवन के कठोर सत्य को वर्तमान के तीखे प्रकाश में परिभाषित करता है।
  • Khabar
    Pranav Kumar Bandhopadhyaya
    1150 1035

    Item Code: #KGP-584

    Availability: In stock

    अपने कथ्य को कम शब्दों में रखना वंद्योपाध्याय की विशेषता है। वह अकारण शब्दों को विस्तृत नहीं होने देते। जब वह जगदंबा द्वारा पत्नी पर मार-काट सामने लाते हैं, जबान को बहुत फैलने नहीं देते। कथा में परेशान विनायक सामने आता है। उपन्यास में जब कथा आगे चलती है, अलग किस्म के अनेक पात्र सामने आ जाते हैं। उपन्यास में असंख्य पात्र हैं। इन्हीं से उपन्यास अपना आकार पाता है। कथा के असंख्य चरित्र आते और जाते हैं, और वे फिर आ जाते हैं। विनायक के बाद मुख्य चरित्र है नैना। दूसरे तमाम बिहारीपुर के लोगों के माफिक वह एक औरत है, जो सबसे अलग है। अंत में विनायक का एकदम चले जाना एक विराट् घटना है। हम महसूस करते हैं बिहारीपुर की हंसी अब हलकी हो गई। बस, बिहारीपुर फिर भी इसी तरह चलता रहता है।
    -द टाइम्स ऑफ इंडिया

    उपन्यास की घटनाएं रोचक ढंग से सामने आती हैं। ‘मालगुडी डेज़’ की तरह उपन्यास आगे और पीछे जाता रहता है। उपन्यास के तमाम पात्र अपने-अपने तरीके से सामने तो आते हैं, लेकिन कई बातें एकदम अलग हैं। उपन्यास के प्रत्येक अंश में कई बातें एकदम नहीं होतीं, जिससे कथा एकदम बदल जाती है। दूरदर्शन के धारावाहिक ‘नुक्कड़’ में भी इसी तरह बनती और टूटती है। 
    -इंडियन एक्सप्रेस

    खबर
     की तमाम बातें स्थानीय भाषा और लहजे पर सामने आती हैं। कथा में कुछ लोग तो मेहनतकश हैं, कुछ भंगी हैं, कुछ हैं स्थानीय गुंडे और शराबी। गरीबी की मार लोगों पर इतनी ज्यादा है कि वे चटपटी बातों के अलावा कुछ और देख या सुन नहीं पाते। उपन्यास के पात्र परशुराम वैद्य और मुरारी डॉक्टर अपने हिसाब से काम कर रहे हैं। विनायक के कर्म को छोटा करने के लिए वे जब तब मिलते और सोचते रहते हैं। उपन्यास का मुख्य पात्र विनायक जो एक श्रम संगठन का नेता है और होम्योपैथी का डॉक्टर। कोई ध्यान नहीं देता। विनायक का भद्र आचरण उसे बहुत दूर शायद ले नहीं जाता। वो बिहारीपुर के कौशल्या भवन के बीच अपने परिचय के साथ बहुत कुछ देखता रहता है। लेखक एक शहर के तमाम गरीबों पर अलग-अलग अनुभव प्राप्त करता रहता है। अपने अनुभव से वो देखता है एक नया संसार।
    -संडे

    इस उपन्यास के भीतर असंख्य चरित्र, तमाम घटनाएं और बिहारीपुर के ढेर सारे लोग और उनकी कथाएं हैं। इसके भीतर तमाम लोग किसी न किसी बहाने कथा में आते रहते हैं। कथा के बीच विद्यानिवास तिवारी जो एक प्राथमिक स्कूल का शिक्षक है और संभवतः एक ज्योतिषी भी। पात्र की बेटी जानकी एक शराबी के प्रेम में डूब जाती है। वह एक पहलवान भी है। नाम है लुक्का। जिस पर कोई न कोई जुड़ा हुआ है। उसमें कोई गांजे का दम भरता है। साथ हैं भोलानाथ गिरी। आगे है नौरंगीलाल अपने ढंग से चलने वाला ‘एडवोकेट साहिब’, जो एक जिले की कचहरी में एक छोटा-मोटा क्लर्क-भर है, जिसकी तमाम बातें घड़ी के पेंडुलम की तरह हिलती रहती हैं। इसका एक केंद्रीय चरित्र विनायक तमाम पात्रों और घटनाओं को देखता रहता है। और उसके बाद आती है नैना, मेम के चरित्र में जो उपन्यास को अपने ढंग से गढ़ती और तोड़ती रहती है। यह उपन्यास अलग-अलग घटनाओं को जिस प्रकार संजोता है वो एक अभूतपूर्व अनुभव है।           
    -इंडियन रिव्यू ऑफ बुक्स

  • Aisa Satyavrat Ne Nahin Chacha Tha
    Raj Kumar Gautam
    60 54

    Item Code: #KGP-2100

    Availability: In stock

    ऐसा सत्यव्रत ने नहीं चाहा था
    सदी के इस कठिन और जटिल समय में हिन्दी के जिन युवा लेखकों ने उपन्यास लिखे हैं उनके बीच राजकुमार गौतम की 'उपस्थिति' महत्वपूर्ण और 'निजी' ढंग से हुई है । अपनी सादगी, संवेदनशीलता और आयासहीन शिल्प के लिए चर्चित राजकुमार गौतम का कहानीकार 'ऐसा सत्यव्रत ने नहीं चाहा था' में एक प्रौढ़, अनुभवी लेकिन जोखिम उठने वाले मछुआरे की तरह उतरा है । प्रतिकूलताओं और असभ्य जीवन स्थितियों के उछाल मारते, सिर पटकते पागल समुद्र की अतल गहराई में दुबली आस्था और संघर्ष की जो 'मछली' राजकुमार ने पकड़ी है और अपने नायक सत्यव्रत को सौंपी है उसके लिए इस उपन्यास को बहुत देर तक और दूर तक एक चमत्कार की तरह याद किया जाएगा ।
    नामहीन-व्यक्तित्वहीन केंद्रीय चरित्रों के मौजूदा ममय में इस उपन्यास का 'सत्यव्रत’ वापसी है उस नामधारी व्यक्तित्व की जिसका लोप छठे दशक के उत्तरार्द्ध से आरंभ हुआ था । 'ऐसा सत्यव्रत ने नहीं चाहा था' में राजकुमार ने यथार्थ के स्तर-दर-स्तर उदघाटित करने के लिए जो अनेक आयामों वाली तीखी भाषा 'खोजी' है और प्रतिकुलताओं से लडते- भिड़ते लहूलुहान आदमी की गहरी त्रासदी, उदासी, करुणा और अंतर्द्वन्द्व को 'उभारने' के लिए जिस 'अंडरकरेंट' की तरह बहते 'सटायर' को चुना है वह मौजूदा समय में लिखी जा रही इकहरी और एकायामी रचनाओं के 'भब्भड़' में एक गहरा रचनात्मक सुख प्रदान करता है । भाषा के स्तर पर एक घटना के रूप में रेखांकित किया जा सकने वाला यह उपन्यास कथ्य के स्तर पर आज के आदमी की तकलीफदेह साँसो की गवाही तो है ही, यह गवाही है उसके टूटकर भी न टूटने की जिद और आकांक्षा की भी ।
  • Chandragiri Ke Kinare
    Sara Aboobkar
    75 68

    Item Code: #KGP-1958

    Availability: In stock


  • Dr. Siddharth
    Kavita Surabhi
    260 234

    Item Code: #KGP-1950

    Availability: In stock

    डॉ० सिद्धार्थ
    'डॉ० सिद्धार्थ' लेखिका का पहला उपन्यास है। उनकी दृढ मान्यता है कि जहाँ समाज में विडंबनाएं, विसंगतियां, अपराध, पीडा, विकृतियाँ और भोगवादी  राक्षसी अपसंस्कृति है, वहीं डॉ० सिद्धार्थ जैसी निर्मापाधर्मा शक्तियां भी हैं। सच्चे, निर्मल और सात्यिक जीवन में बहुत आकर्षण है; किंतु उसे अंगीकार करने का मूल्य असाधारण है । अत: एक शाश्वत प्रश्न हमारे सामने है कि क्या कोई व्यक्ति धर्म की राह पर चलकर भी सामाजिक दृष्टि से सफल हो सकता है ?
    शिष्या  के रूप से दामिनी, अपने गुरु के स्नेह का सुख पाती हे। समय के साथ डॉ० सिद्धार्थ की बौद्धिकता, उसकी प्रतिभा को ही नहीं, उसकी आत्मा को भी सँवारती है । वह समझ पाती है कि चमक और दिव्यता में अंतर होता है । लौकिक सफलताओं की चमक हमारी आँखों को चौंधियाती है और आत्मिक विकास हमें दिव्यता से भर देता है। अध्यापक की बुद्धि से उच्च है उसका विवेक, और विवेक से उच्चतर  है उसका आचरण । आचार्य वही है, जो आचरण को शुद्ध ही नहीं दिव्य भी कर दे । डॉ. सिद्धार्थ का चरित्र इन सिद्धांतों का मूर्तिमंत रूप है ।
  • Postmortem
    Ajeet Kaur
    160 144

    Item Code: #KGP-2048

    Availability: In stock


  • Ath Mooshak Uvaach
    Sudhakar Adib
    70 63

    Item Code: #KGP-9235

    Availability: In stock

    विहंगावलोकन और सिंहावलोकन के बाद अब मूषकावलोकन। इस प्रतीकात्मक व्यंग्यपरक उपन्यास का कथानायक का चूहा है। बीसवीं सदी के अंतिम दशक में इस चूहे ने अपनी खुली आंखों से जो कुछ देखा और जो कुछ कहना चाहा वही ‘अथ मूषक अवाच’ में अभिव्यक्त हुआ है। सांकेतिक दृष्टि के साथ-साथ गुदगुदी और चिंतन के संतुलित सम्मिश्रण ने इसके कथ्य को अनूठापन प्रदान कर दिया है। उपन्यास की कुछ पंक्तियां द्रष्टव्य हैंµ
    ‘‘यह पदयात्रा भी कितनी अजीब चीज है। इसमें पग-पग पर नित नए अनुभव होते हैं। मैं क्योंकि एक चूहा था, इसलिए नौ दिन में अढ़ाई कोस ही चल पाता था। ऊपर से मुझे चील-कउवों और कुत्ते-बिल्लियों का भी खतरा रहता था। इसलिए सीधी सड़क पर अथवा किसी राजमार्ग पर चलना मेरे लिए बहुत खतरनाक था।
    खतरे तो और भी बहुत से थे। मैं कोई राजनेता तो था नहीं, जिसके साथ-साथ चमचों की फौज चलती। न मैं कोई अभिनेता था, जिसके पीछे आॅटोग्राफ चाहने वालो की भीड़ दौड़ती। मैं कोई बड़ा अधिकारी भी नहीं था, जो कि अनेक चापलूस अधीनस्थों से हरदम घिरा रहता। अगर ऐसा होता तो मेरी सुरक्षा एवं सुविधा स्वयमेव सुनिश्चित हो जाती।
    मैं तो एक मरियल सा नादान चूहा था, जिसक मन में इस देश को नजदीक से देखने-समझने और महसूस करने का एक अरमान था।’’
  • Bhaykaal
    Ashok Gupta
    200 160

    Item Code: #KGP-483

    Availability: In stock

    अशोक गुप्ता का उपन्यास ‘भयकाल’ मूलतः सामाजिक उपन्यास है। कथाविन्यास को देखें तो यह मनोवैज्ञानिक और मनोविश्लेषणात्मक है। मनुष्य अपने संस्कार और रुचियों में ऐसी ग्रंथियां पाल लेता है कि वह अपने प्रिय परिवारजनों, यहां तक कि अपने वंशजों से भी भयाक्रांत रहता है और निरंतर अपनी दुर्गति की कल्पना से व्यथित रहता है। अशोक गुप्ता ने उपन्यास के एक चरित्र मिलकीत तनेजा के माध्यम से इस मनोवैज्ञानिक ग्रंथि के वैयक्तिक और पारिवारिक परिणाम का चित्रण किया है।
    दूसरी ओर, जानकी बल्लभ और भानुमती (भानुमती के कई नाम हैं। ये नाम परिस्थितियों और उसके चरित्र के घात-प्रतिघात से उसे मिल गए हैं। उसका एक नाम ‘करिया छबीली’ भी है) के साहसिक और संघर्षमय जीवन कथा के माध्यम से स्वातंत्र्योत्तर भारत के मानवीय और प्रगतिशील बदलाव या विकास का भी चित्रण किया गया है। दोनों प्रकार की कथाएं समांतर शैली में साथ-साथ चलती हैं। पात्र परस्पर टकराते भी हैं। इससे कथा रस का आस्वाद पाठकों को मिलता है और मोनोटोनी नहीं आने पाती है।
    गांवों में गैरजिम्मेदार और बिगड़ैल किशोर किस तरह के कुकृत्य करते हैं और कमजोर तबके के लोगों को सताते हैं इसका मार्मिक और मनोरंजक (भी) वर्णन है। समाज में बुरे लोग हैं तो अहेतु की सहायता करने वाले भी हैं।
    मुझे इस कथाकृति में यह बात विशेष रूप से अच्छी लगी कि आज जब हताशा और दिशाहारा प्रवृत्तियां हमारे साहित्य में आसन जमाए बैठी हैं, अशोक गुप्ता की यह रचना सामाजिक यथार्थ के आधार पर, रचनात्मकता से स्तर पर बने रहते हुए, प्रगतिशीलता और विकास की कथा कहती है।
    उपन्यास की भाषा और संवाद अपनी ताजगी से पढ़ने वालों और विचारकों का ध्यान आकर्षित करते हैं। अशोक गुप्ता मूलतः कहानीकार हैं और यह कृति उपन्यास होने के साथ बिखराव के बावजूद कहानी का भी रस देती है।
  • Mandra
    Bhairppa
    600 480

    Item Code: #KGP-221

    Availability: In stock


  • Radhika Mohan
    Manorma Jafa
    195 176

    Item Code: #KGP-1944

    Availability: In stock

    राधिका मोहन
    असमंजस में पड़े राधिका मोहन की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें ? एक तरफ प्रेमिका अलबा थी, तो दूसरी तरफ उनकी पत्नी सविता। कुछ भी समझ में नहीं आया तो दोनों की तुलना करने लगे : 
    ‘अलबा तन से तो परी है और सविता...उँह-उँह...कोई तुलना! अब रही खाने-पीने की...अलबा तो साथ में बैठकर बीयर पी लेती है। एक सविता जी हैं कि उनके मिज़ाज ही नहीं मिलते। यह व्रत, वह व्रत, और आज शाकाहारी खाने का दिन है वग़ैरह-वग़ैरह...और अपने करोड़ों देवी-देवता! बस, जिंदगी-भर उनके पीछे भागते रहो। पागलपन ही है। रही अलबा, उसको किसी चीज़ से कोई भी परहेज़ नहीं है। हमारी ये घरेलू लड़कियाँ पति को परमेश्वर मानकर लग गईं पति के पीछे पूँछ की तरह। बस, उन्हें बेमतलब की बातों पर रोना आता है। अगर कोई लिपट जाए, चुंबन दे दे तो क्या उसे धक्का दे दें ? और इनके पास जाओ तो कहेंगी, ‘क्या करते हो ?’ यह भी कोई बात हुई! आख़िर मैं ठहरा मर्द। भगवान् ने अपने हाथों से हमें रचा है। देखो ज़रा कृष्ण भगवान् को। जिस गोपी को चाहते थे, उसी के साथ हो लेते थे। वाह, क्या लाइफ़ थी उनकी! राधा-वाधा उन्हीं के पीछे भागीं और उनकी ब्याहता रुक्मिणी ने कृष्ण से कभी कोई प्रश्न नहीं किया। काश! मैं भी कृष्ण सरीखा होता। तो क्या हूँ नहीं ?’ राधिका मोहन ने अपनी शक्ल फिर शीशे में देखी। चेहरे पर मक्खी मूँछ थी। उन्होंने दोनों हाथों से दो बाल पकड़कर गर्व से ऐंठ लिए, ‘आख़िर हूँ तो मर्द ही। सारे धर्मों का रचयिता और सारे कर्मों का रचयिता। मनु की संतान।’
    -[इसी पुस्तक से]
  • Aagaami Ateet
    Kamleshwar
    150 135

    Item Code: #KGP-210

    Availability: In stock


  • Heeraman High School
    Kusum Kumar
    500 450

    Item Code: #KGP-577

    Availability: In stock


  • Asprishya
    Ajay Mahapatra
    180 162

    Item Code: #KGP-8003

    Availability: In stock

    ईश्वर की बनाई दुनिया में हर व्यक्ति समान है। सबमें परमात्मा का अंश है। सब उसी परमज्योति से आलोकित हैं। फिर यह असमानता, अन्याय, शोषण, भेदभाव, जातिवाद, नस्लवाद क्यों ! ये मनुष्य की बनाई अवधारणाएं हैं। इनके कारण जाने कितने व्यक्तिगत और सामाजिक संकट उत्पन्न होते रहते हैं। समय-समय पर इनका प्रतिरोध विभिन्न रूपों में सामने आता है। प्रतिवाद और प्रतिरोध का एक विशिष्ट स्वर अजय महापात्र के उपन्यास ‘अस्पृश्य’ में सुना जा सकता है।
    प्रस्तुत पुस्तक में मानवीय संवेदना का गहन प्रभाव है। लेखक ने कला-कौशल या शाब्दिक साहस के स्थान पर कथ्य को प्रमुखता दी है। यह समय को स्पष्ट और सतर्क ढंग से प्रस्तुत करने का रचनात्मक उपक्रम है। 
    ‘अस्पृश्य’ एक शब्द भर नहीं, मात्रा एक भाव संवेद नहीं; यह निरंतर सक्रिय समय का आख्यान है। इसमें समय और समाज के बहुतेरे बिंब देखे जा सकते हैं।
  • Hriday Ka Kaanta
    Tejrani Dixit
    300 255

    Item Code: #KGP-695

    Availability: In stock

    पंडित सूर्यनारायण जी दीक्षित, एम. ए., अपने जीवन के प्रभात-काल में हिंदी के प्रेमी रहे हैं। कुमारी तेजरानी जी उनकी सुपुत्री हैं। कुमारी जी की प्रतिभा का फल-स्वरूप ‘हृदय का कांटा’ हमारे सामने प्रस्तुत है।
    जहां तक हमें ज्ञात है कुमारी जी पहली स्त्री-रत्न हैं जिन्होंने राष्ट्रभाषा हिंदी में मौलिक उपन्यास लिखा है। आपसे हिंदी के पाठक एकदम अपरिचित नहीं हैं। समय-समय पर आपकी लिखी हुई कहानियां पाठकों के सामने आती रही हैं और पाठकों ने उनका आदर भी किया है। परंतु ‘हृदय का कांटा’ से कुमारी जी का स्थान साहित्य-जगत् से निश्चित और सुरक्षित हो जाता है।
    ‘हृदय का कांटा’ का प्लाट साधारण है। कई गार्हस्थ्य उपन्यासों से कथा मिलती-जुलती है। फिर भी हमें यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं है कि उपन्यास मौलिक है। इस प्रकार के अन्य उपन्यासों से इसमें एक विशेषता यह है कि जहां और उपन्यास आदि से लेकर अंत तक भाव-प्रधान हैं, वहां प्रस्तुत उपन्यास की धरा भाव के भंवर से कर्म के समुद्र की ओर बहती है।
    उपन्यास में सामाजिक कुरीतियों का प्रदर्शन भलीभांति किया गया है और यह दिखाने की चेष्टा की गई है कि गार्हस्थ्य जीवन की अनेक अशुभ घटनाओं का कारण सामाजिक कुरीतियां हैं।
    ‘प्रतिभा’ के चरित्र में अस्वाभाविकता की जरा सी झलक आ गई है। उसका कारण यह है कि कुमारी जी ने उपन्यास में हमारे सम्मुख स्त्री-जाति का आदर्श रखने का प्रयत्न किया है और इसी से स्त्री-जाति की अनेक मानवीय प्रवृत्तियों का दमन करना पड़ा है। परंतु जहां हम प्रतिभा के चरित्रा में कुछ अमानवीय देवीत्व पाते हैं, वहां ‘मालती’ और ‘महेश’ के संबंध का विकास और उसकी निस्सारता का चित्रण बहुत ही मर्मस्पर्शी, रोचक और स्वाभाविक है। कुमारी जी की प्रतिभा का वास्तविक परिचय हमें यहीं पर मिलता है।
    उपन्यास मंजी हुई लेखनी का लिखा हुआ न होने पर भी हमें कुमारी जी की प्रतिभा तथा वेदनापूर्ण सहृदयता का पर्याप्त परिचय कराता है। हमारा विचार है कि किसी भी लेखक या लेखिका का पहले-पहल ऐसा उपन्यास लिखना उसके लिए गौरव की बात होगी।
    हमें कुमारी जी से हिंदी साहित्य-सेवा की बहुत कुछ आशा है और विश्वास है कि आप निरंतर कुछ न कुछ लिखती रहेंगी।
    —बंशीधर, एम. ए.
    [सरस्वती (पत्रिका) : मार्च 1929 (फाल्गुन 1985), भाग 30, खंड 1, संख्या 3, पूर्ण संख्या 151, पृ. 346]
  • Toro Kara Toro-3 (Parivrajak)
    Narendra Kohli
    500 425

    Item Code: #Kgp-1575

    Availability: In stock


  • Tan Man
    Shivram Karant
    100 90

    Item Code: #KGP-2086

    Availability: In stock

    भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता शिवराम कारंत का अत्यन्त लोकप्रिय उपन्यास 'तन मन' कन्नड़ साहित्य की अनुपम कृति है ।
    चिरन्तन काल से विवाहेतर स्त्री-पुरुष सम्बन्ध विषयक प्रवृत्ति ने 'विश्व के सबसे पुराने पेशे' को जन्म दिया । यह पेशा आज भी जीवित है । पुरुष ने नारी को शब्दों में जितने सम्मान का नाटक रचा है, अपनी प्रवृति से उसे निरीह और भोग्य ही रखा है । कल की देवदासी और आज की मॉडल या सुन्दरियों का चुनाव क्या है ? इसी जीवन्त समस्या को लेखक ने काफी गहरे उतरकर अपने अनुपम शिल्प में बाँधा है । इसमें एक ही प्रधन-स्वर बार- बार ध्वनित होता है—आखिर यह कबतक, आखिर यह कब तक...?
  • Muhafiz
    VIJAY
    290 261

    Item Code: #KGP-245

    Availability: In stock


  • Maafiya
    Girish Pankaj
    175 158

    Item Code: #KGP-2041

    Availability: In stock

    माफिया
    जानते सब हैं, पर लिखते बहुत कम है कि राजनीति के समान साहित्य में भी दल ही दल हैं, तिकड़पबाजियाँ और सौदेबाजियाँ हैं, अवसरवाद और खिलाऊ-पिलाऊवद है, अफसरों और नेताओं के 'साहित्यिक' हथकंडे हैं और संपादकों तथा सम्मानों के बिकाऊ झंडे हैं । गिरीश पंकज ने इस उपन्यास में संगोष्टियों आदि के माध्यम से बिना 'लोक-लाज' के भय के इन सबके कपडे उतार दिए हैं । अब यह पाठकों पर निर्भर करता है कि वे इस 'नंगेपन' पर 'कैसी नजर डालते हैं! उपन्यास का प्रमुख कथ्य बहुरूपी साहित्य-माफिया है, जिसके बीच-बीच से शोध-माफिया, विज्ञापन-पुराण, छंद-हत्या, ठेका-लेखन आदि पर भी लटके-झटके सफाई किए गए है । दूसरी ओर, एक आदर्शवादी साहित्यकार की मनोव्यथा, आकांक्षाएं-अपेक्षाएं और सपने भी फूट-फूटकर निकले हैं।
    उपन्यास इस दृष्टि से अंकों का काफी ऊँचा प्रतिशत अर्जित करता है कि इसके दर्जनों अच्छे-बुरे पात्र ऐसे हैं, जिनसे हम रोज़ मिलते हैं, और इसका घटनाक्रम ऐसा है, जैसा हमारे सामने दिन-रात घटित होता रहता है। कथानक का यह सामाजिक सरोकार साहित्य पर हावी होते माफिया राज से जुड़कर आज शायद हर सही-गलत साहित्यकार के रास्ते को किसी न किसी तरह प्रभावित कर रहा है ।
    गिरीश पंकज साहित्य की धारा में काफी तैर चुके हैं, इसलिए इनकी भाषाभिव्यक्ति के प्रवाह में एक कुशल तैराक की गति है । तय समझिए कि यह उपन्यास साहित्यिक गतिविधियों से जुड़े हर स्तर के पाठकों को पसंद आएगा, क्योकि वे इसके किसी न किसी पात्र से अपना तादात्म्य स्थापित किए बिना नहीं रह सकेंगे
  • Ek Asamapta Katha
    Rama Singh
    200 180

    Item Code: #KGP-447

    Availability: In stock

    उपन्यास लिखते हुए कभी-कभी लगता था जैसे पात्रों के साथ मैं भी उन बीहड़ों में भटक रही हूं। कई एक सवाल थे जो मुझे कोंचते रहे। सबसे बड़ा सवाल कि ये विचारधारा मेरी समझ से परे लगी, जहां एक ओर गरीबों, बेसहारा और दलितों की आवाज बनकर नक्सली आंदोलन अस्तित्व में आया, वहीं निर्दोष अमीरों के खून से ही नहीं, गरीबों के खून से भी जमीन लाल होती रही। तभी कानू सान्याल नक्सल आंदोलन के जन्मदाता के निधन से एक बहुत बड़ा जन-समुदाय शोक-संतप्त था। उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए उमड़ी भीड़ को पढ़कर, सुनकर, देखकर मैं चकित रह गई। उन शोक-संतप्त लोगों की भीड़ को मैं पहचानना चाह रही थी...कानू सान्याल ने इनके लिए क्या किया था? क्या बीज-मंत्रा दिया था कि आज भी उनकी सोच में, उनके आचार-विचार में वह सब ध्वनित होता दिख रहा है।
    कुछ तो नक्सली आंदोलन में ऐसा रहा होगा कि आज भी उस लहर का असर खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। मेरे खयाल में अभावों की पराकाष्ठा, दूभर होती दिनचर्या के आक्रोश की आवाज एक ही होती है। वह कुछ कर गुजरने के आगे के औचित्य नहीं देखती है। ऐसे लोगों को कानू सान्याल या फिर चारु मजुमदार ने क्रांति का जो बीज-मंत्रा दिया होगा, वह उनकी दुखती रग पर हाथ रखने जैसा ही रहा होगा और राहत की उसी धुन में वे आगे बढ़ते गए। फिर तो बीहड़ों से वापस आना कहां संभव हो पाता है? मुझे मेरे सवाल का जवाब मिल गया था।
    -लेखिका
  • Paani Kera Budbudaa
    Susham Bedi
    300 270

    Item Code: #KGP-9310

    Availability: In stock

    ‘यही कहानी थी पिया की? यह कथन है या सवाल? नहीं, कथन नहीं हो सकता। ऐसे खत्म नहीं हो सकती यह कहानी! ...शायद जिंदगी का सच यही है। कुछ भी नहीं है वहां पर हम बहुत कुछ भरकर उसी को सच मान बैठते हैं। ...पिया के मन में विरक्ति-सी हुई। सच क्या हस्ती है हमारी? कबीर के ही लफ्जों में पानी के बुलबुले जैसी!’ ये पंक्तियां ‘पानी केरा बुदबुदा’ उपन्यास का सारांश सरीखी हैं। सुप्रसिद्ध लेखिका सुषम बेदी का यह नवीनतम उपन्यास—जीवन, प्रेम, विवाह, सुख, विराग आदि शब्दों को समकालीन संदर्भ देते हुए लिखा गया है। उपन्यास विदेशी पृष्ठभूमि में लिखा गया है, लेकिन इसकी बेचैनियां सार्वदेशिक हैं।
    पिया इस उपन्यास का केंद्रीय चरित्र है। उसका वैवाहिक जीवन, विवाह विच्छेद, तलाक के बाद प्रेम को फिर विवाह में बदलने की आकांक्षा, पुत्र और उसका पारिवारिक परिदृश्य—ऐसी अनेक बातों से मिलकर इस उपन्यास की कथावस्तु निर्मित हुई है। इस निर्मिति में निशांत, अनुराग, दामोदर, रोहन आदि बहुत दिलचस्प तरीके से शामिल हैं। पिया के लिए सेक्स कोई दुराग्रह नहीं है, पर वह ‘साथ’ चाहती है। विवाह इसीलिए उसे आश्वस्त और आकर्षित करता है। लेकिन नियति या मानव स्वभाव का निर्णय कुछ दूसरा है।
    सुषम बेदी कथानक को गतिशील रखते हुए जीवन की मूलभूत चिंताओं पर बात करती हैं। स्वाभाविक रूप से स्त्री-विमर्श भी आता है। पिया के बारे में लेखिका का कथन है, ‘अनुराग ने उसके फूलों की गुलाबी रंगत ही देखी थी। पर वहां खून के थक्के भी जमे हुए थे।’ ऐसी जाने कितनी विडंबनाएं इस उपन्यास को स्त्री-जीवन का मार्मिक दस्तावेज बना देती हैं। सुषम बेदी का लंबा जीवनानुभव और जनमनोविज्ञान समझने का ढंग भाषा के अनूठे स्वरूप में व्यक्त हुआ है। बेहद पठनीय और विचारोत्तेजक उपन्यास। 
  • Aranya-Tantra
    Govind Mishra
    300 270

    Item Code: #KGP-659

    Availability: In stock

    ”भारत का वह एक प्रान्त था, प्रान्त की वह राजधानी थी, राजधानी का वह क्लब था। देखें तो पूरा देश ही था... क्योंकि अफसर जो यहाँ आते थे, वे देश के कोने-कोने से थे।“...
    ”ये जो खेल रहे हैं...आला सर्विस के हैं, बाहर और यहाँ खेल में भी वे स्टार हैं। यहाँ से जाकर कुर्सी पर बैठ जायेंगे, सरकार हो जायेंगे। सरकारी खाल ओढ़े बैठे। उस खोल के भीतर सब छिपा रहता है, जो यहाँ खेल में झलक जाता है क्योंकि खेल में भीतर की प्रवृत्तियाँ बाहर आये बिना नहीं रहतीं।
    स्टार...जो ये खुद को लगाते हैं, या जंगल चर रहे जानवर, किसिम-किसिम के जानवर...ये क्या हैं...गधा सोच रहा था।“
    प्रशासन के इस जंगल में हाथी, हिरन, ऊँट, घोड़ा, खच्चर, तेंदुआ, रीछ, बायसन, बन्दर तो हैं ही, बारहसींगा, नीलगाय और शिपांजी भी हैं। सबसे ऊपर है शेर-सीनियर। वह जाल भी खूब दिखाई देता है जो उनकी उछलकूद अनायास ही बुनती होती है। यह है ‘अरण्य-तंत्र’, गोविन्द मिश्र का ग्यारहवाँ उपन्यास, जिसमें वे जैसे अपनी रूढ़ि (अगर उसे रूढ़ि कहा जा सकता है तो)-संवेदनात्मक गाम्भीर्य-को तोड़ व्यंग्य और खिलंदड़ेपन पर उतर आये दिखते हैं। यहाँ यथार्थ को देखा गया है तो हास्य की खिड़की से। फिर भी ‘अरण्य-तंत्र’ न व्यंग्य है, न व्यंग्यात्मक उपन्यास। अपनी मंशा में यह लेखक के दूसरे उपन्यासों की तरह ही बेहद गम्भीर है।
    ”बायीं तरफ़ की सिन्थैटिक कोर्ट-कोर्ट नं. 2 के ठीक ऊपर लॉन के किनारे कभी दो बड़े पेड़ थे, जिनमें से एक पहली कोर्ट बनाने के लिए जो खुदाई हुई थी उसके दौरान बलि चढ़ गया। दायीं तरफ़ की कोर्ट-कोर्ट नं. 1 के आखिरी छोर पर भी दो बड़े पेड़ थे-जुड़वाँ, एक हल्के गुलाबी रंग के फूलों वाला, एक हल्के बैगनी रंग के फूलों वाला। उनमें से एक कोर्ट नं. 1 के तैयार होने के बाद शेर-सीनियर की सनक और सियार-पाँड़े की चापलूसी में ढेर हो गया। तो बड़े पेड़ अब दो ही बचे थे...एक इस तरफ़, एक उस तरफ़...
    दो वे पेड़ अलग-थलग पड़े, अकेले थे, उदास...भयभीत भी।“ 
  • Kaali Dhar
    Mahesh Katare
    550 413

    Item Code: #KGP-KALI DHAR HB

    Availability: In stock

    जमादारिन की हवेली बीसियों साल से बंद थी। साल में एकाध बार उनका बेटा आगरा से आता। विशेषतः दीपावली से पहले आकर वह दो-चार दिन ठहरता। कलई-चूने से मंदिर की पुताई-सफाई करवाता और लौट जाता। अटारी आकर वह सेठ की हवेली में ही ठहरता। सेठ के लड़केपोते उससे छुआछूत वाला व्यवहार नहीं करते थे। अगली पीढ़ी को हवेली की आवश्यकता न थी। इस बीहड़ में कौन बसतातालों की चाबियाँ सेठ परिवार के पास थीं। हवेली में एक छोटा सा द्वार पीछे बीहड़ों की ओर भी खुलता थाजिसमें से होकर बागियों के गिरोह हफ्रतों हवेली में पड़े रहते और चौमासे अर्थात् बरसात में तो महीनों। सबको पता था। पुलिस की गश्त भी यदा-कदा सामने के द्वार पर जड़े ताले को देखती हुई निकल जाती थी। गिनती का पुलिस-दल डाकुओं से टकराने का खतरा कैसे उठाएबागी भी सामान्यजन को परेशान नहीं करते थे। उनके निशाने पर तो दुश्मनधनवान अथवा मुखबिर आता था। रसद लाने वाले को पूरा पैसा चुकाते थे बागी।

    लाला जी ने सेठ श्रीलाल के वंशजों से संपर्क किया। जमादारिन के पुत्र से अनुमति ली तो ठाकुर ने दाऊ मानसिंह को समस्या का पहलू समझाया। मानसिंह का गिरोह ही उस समय सबसे प्रभावशाली था। वह कड़ाई से बागी-धर्म के नैतिक नियमों का पालन करते थे। कुल मिलाकर आठ दिन में ऊपरी औपचारिकता पूरी हो गई एवं आठ दिन सफाई आदि के जरिये हवेली को बसने योग्य बनाने में लगे। इस तरह अम्मा ठाकुर जमादारिन की हवेली में रहवासी हो गईं। नवाब ठाकुर की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए लाला भभूती लाल ने कुछ विशेष व्यवस्था भी कर दी। 

    -इसी उपन्यास से। 

  • Toro Kara Toro-5 (Sandesh)
    Narendra Kohli
    500 425

    Item Code: #KGP-667

    Availability: In stock


  • G-male Express
    Alka Sinha
    300 240

    Item Code: #KGP-9376

    Availability: In stock

    बदलते समय के साथ वैचारिक मुठभेड़ करता यह उपन्यास पाठक को एक ऐसी दुनिया से रूबरू कराता है जो उसे चैंकाती है कि ये पात्र, ये परिवेश उसके लिए अपरिचित तो नहीं थे मगर वे उसे उस तरह से पहचान क्यों नहीं पाए? देवेन त्रिपाठी को मिली डायरी की तरह ही हमारी जिंदगी की किताब भी अनेक प्रकार के कोड्स से भरी है जिसे सभी अपनी-अपनी तरह से डिकोड करते हैं। इसीलिए उसे जानने और समझने का सिलसिला कभी खत्म नहीं होता। 
    स्कूल-काॅलेज की जिंदगी के बीच पनपते अबोध प्रेम की मासूमियत को चित्रित करता यह उपन्यास जब उसमें हो रही सौदेबाजी को उजागर करता है तब सारा तिलिस्म टूट जाता है और सवाल उठता है कि अगर दैहिक सुख के बिना प्रेम अधूरा है तो क्या यौन-सुख हासिल करना ही प्रेम की परिणति है? क्या स्त्री के लिए इस सुख की कामना करना अनैतिक है? सवाल यह भी है कि महज गर्भ धारण न करने से ही स्त्री की यौन-शुचिता प्रमाणित हो जाती है तो पुरुष की शुचिता कैसे प्रमाणित की जाए? पैसों की खातिर यौन-सुख देने वाली स्त्रियाँ अगर वेश्याएं हैं तो स्त्रियों को काम-संतुष्टि बेचने वाले पुरुषों को कौन सी संज्ञा दी जाए? इन सभी पहलुओं पर शोधपरक चिंतन करता यह उपन्यास स्त्रियों की काम-भावना की स्वीकृति का प्रश्न उठाने के साथ-साथ स्त्री-पुरुष की यौन-शुचिता को बराबरी पर विश्लेषित करने की भी मांग करता है क्योंकि बेलगाम संबंधों से पैदा हुई जटिलताओं को समझे बिना ‘आधुनिक’ होने का जोखिम नहीं उठाया जा सकता है।
    यह कृति निम्नतम से उच्चतम की एक ऐसी चेतना-यात्रा है जो बुद्धत्व अथवा महामानव में रूपांतरण का दावा करने के बदले पाठक को सही मायने में जाग्रत करती है।
  • Hamara Kshitij
    Sudhakar Adib
    180 162

    Item Code: #KGP-7841

    Availability: In stock


  • Kammi Or Nanda
    Amrita Pritam
    200 180

    Item Code: #KGP-7836

    Availability: In stock

    कम्मी और नन्दा
    नन्दा यूनिवर्सिटी की बाहरी दीवार के पास
    पहुँची ही थी कि उसने देखा कि दीवार
    के साथ  ढासना लगाकर खडी हुई एक
    औरत ने पैसे मांगने के लिए अपना हाथ
    आगे किया हुआ है—
    वह हाथ नन्दा की तरफ बढ़ता हुआ
    नन्दा की कमीज़ से छू गया... 
    नन्दा ने उस माँगने वाली औरत की तरफ
    देखा—उस औरत का चेहरा उजड़ा
    हुआ था, बाल खुश्क और माथे
    पर बिखरे हुए थे, सिर पर
    एक लीर-सा दुपट्टा थाµपर
    आँखों में एक अजीब सी चमक
    और हसरत थी-नक्श रुले हुए थे,
    बुरे नहीं थे—वह हाथ के नन्दा के
    आगे पसारकर-एकटक नन्दा के
    मुँह को देखे जा रही थी…
    नन्दा उकताई-सी तेज कदमों से घर
    जाने वाली बस क्रो तरफ़ चल दी ।
    लेकिन बस के पायदान पर
    एक पॉव रखा ही था कि
    अचानक नन्दा को खयाल आया—
    'कौन जाने यह माँगने वाली
    औरत ही मेरी माँ हो...'
    -नन्दा का एक सपना
  • Vikalp
    Sukhdev Prasad Dubey
    1100 825

    Item Code: #KGP-653

    Availability: In stock

    बीसवीं शताब्दी ने मनुष्य को आजादी दी, लेकिन उसकी आत्मा छीन ली। आत्मविहीन होकर मनुष्य अपना सब कुछ, जो आत्मीय था, को छोड़कर बाहर भागने लगा। ऐसा ही एक मध्यवर्गीय परिवार में जन्मा, अति महत्त्वाकांक्षी युवक बड़ा आदमी बनने के स्वप्न का पीछा करते हुए देश का सब कुछ बिसराकर अमेरिका भाग जाता है और वहीं का होकर रह जाता है। जैसा कि 70 के दशक में अनेक युवक करने लगे थे।
    15 वर्ष बाद अचानक, अपने पिता द्वारा आत्मदाह कर लेने की खबर उसे वहां का सब कुछ छोड़कर गांव ले आती है और वह फिर से यहां सबसे जुड़ने लगा था, जिसे वह छोड़कर गया था। तभी फिर अचानक विदेश से आई एक बुरी खबर, उसे विदेश ले जाती है। जहां उसकी पत्नी की विलासिता और लापरवाही से हुई पुत्र की मृत्यु, उसे इतना दुखित करती है कि वह अपनी पत्नी को ही 14 वर्ष जेल करवा के सदा के लिए यह सोचकर देश लौट आता है कि महान् देशों में भी महानता कहां मिलती है।
    और फिर शुरू होता है, उसके संघर्ष का एक लंबा सिलसिलाµघर, परिवार, गांव बस्ती, देश तथा उसके अपने प्रेम को, न्याय दिलवाने और उनकी गरिमा लौटाने की उसकी योग्यता को सिद्ध कर दिखाने की परीक्षा का-लेकिन विशृंखल समाज, भ्रष्ट सत्ता और संवेदनहीन अक्षम नौकरशाही उससे समर्पण कराने में लग जाते हैं। वह घबराकर विकल्पों के पीछे दौड़ता-भागता थक जाता है-क्या शैतान के समक्ष समर्पण कर दे? क्या इस अनिश्चितता, अराजकता और अंत के आतंक से वह हार मान ले? आधुनिक युग की अतिबुद्धिवादी पीढ़ियों के सामने यही सवाल है-क्या मनुष्यता को, जो अनंत का गुणांश है, चंद मनुष्यों के हाथों अंत हो जाने दें।
    विकल्प? क्रांति-न हिंसक, न अहिंसक-आत्मक्रांति!
    नर्मदांचल की प्रकृति और नियति के कोमल-कठोर प्रश्नों से गुंथी, एक अनुप्रेरक प्रेम-कथा जो मानवीय संबंधों के आदर्श एवं यथार्थ के अनछुए पक्षों को उजागर करती हुई, अनुभूत तथ्यों एवं कथ्यों से रोमांचित करती है रोष भी पैदा करती है, और होश भी जगाती है।
  • Mahabharat Ka Abhiyukti
    Rajendra Tyagi
    195 176

    Item Code: #KGP-1951

    Availability: In stock


  • Ek Na Ek Din
    Rajni Gupt
    600 480

    Item Code: #KGP-220

    Availability: In stock

    पिछले कुछ वर्षों में स्त्री-पुरुष संबंधों के असमंजन और असमंजसग्रस्त अवसाद का स्वरूप कुछ बदला है-विशेषकर शहरी मध्यवर्ग के उन परिवारों मेंजहाँ स्त्रियाँ शिक्षित हैंपरिवार के बाहर भी एक बंधु-परिवार (Family of Friends) जिनका है ! वहाँ एक कलाकारअफसरशिक्षक के रूप में इनकी मान्यता हैसम्मान भीनई कहानी के ज़माने की बीमार (‘परिंदे'), बेचारी (‘एक कमज़ोर लड़की की कहानी’, ‘जहाँ लक्ष्मी कैद है'), बिंदास (‘मचाचा') औरआसानी से बरगलाई जा सकने वाली टाइपिस्ट/पी०ए० (‘आधे-अधूरे’) बालाओं के ज़माने लदेअब जो कथा-नायिकाएँ हैं-कृति या अनन्या की पीढ़ी की-उनका अपना एक अलग प्रभामंडल है-एक प्रेमी का स्थानापन्न वहाँ कईप्रशंसक हो गए हैं। पर कभी-कभी वे चाहे-अनचाहे एक नई तरह की समस्या खड़ी कर जाते हैं-घर मेंऔर बाहर भीखब्तुलहवास पति के अहं पर चोट कर उसे और अधिक खूँखार बना देते हैंकई तरह की ठोस और फोकीअसुरक्षाएँ गढ़ते हैं उसके भीतरतरह-तरह के प्रवाद फैलाते हैंकई दफा अनुचित प्रस्तावों की मूक श्रृंखला से स्लो-पेस में बलात्कार की ऊभ-चूभ पैदा करते हैं और मुसीबत की घड़ी ऐसे गायब होते हैं जैसे गधे के सिर से सींग। चूँकि वे ‘दोस्त' (?) होते हैं या सहकर्मी यानी कि आस्तीन का साँप-उन्हें उस तरह झटका जाना संभव नहीं होता जैसे प्रकट दुश्मन को झटक सकते हैं। कुल मिलाकर स्थिति ‘तार से गिरेखजूर में अटकेवाली बनती है बेटे कुछ दिनों तकमाँ से सहानुभूति रखते हैंफिर उनकी अपनी एक दुनिया हो जाती है। हाँबेटियों का सखी-भाव अक्सर अंत तक बना रहता हैमित्रबहन या बेटी के रूप में स्त्री का अवलंब स्त्री ही बनती है या उसको खुद ही अपनी सहेली बनजीना होता है।

    तो घर-बाहर-दोनों जगह स्त्री के दुःख के टाँके महीन हुए हैंकई बार खुली आँख से दीखते भी नहींतभी लोग उन्हें ‘खाती-पीतीसुख से ऊबी और बेकार बेचैन महिलाओं का शगलकहते हैंरजनी एक स्त्री-लेंस लेकर सामने आती हैंऔर भूमंडलीकरण (नहींभूमंडीकरणके बाद की पीढ़ी के चौहान साहब और राजीव जैसे फर्राटेदारनो-नॉन्सेसरॉबटनुमा पुरुषों को भी आईना दिखाती हुई उनसे पूछना चाहती हैं कि रैट रेस जीतकर भी चूहा चूहा ही रह जाता है,आदमी तो नहीं हो जाताकंप्यूटर की दुनिया हो या कला-जगत्-स्त्रियों को अपने पाए का और किंचित् विशिष्ट ‘मनुष्यसमझे बिना पुरुष भी आधे मशीन और आधे पशु ही बने रहेंगेदोहरे मानदंड पूँछ की तरह कभी तो झड़ेंगे ही!

    जहाँ तक बच्चों का सवाल है, ‘आपका बंटीभी बड़ा हो गया हैतनावग्रस्त परिवारों में या अकेली माँओं के संरक्षण में पलते बच्चों का मानसिक धरातलउनकी परिपक्वता और (कभी-कभीकटुता भी प्रश्नविकल बंटियों से तोकाफी अधिक होने लगी है।

    पारिवारिक जीवन के इन सब ‘बड़ेकिंतु ‘सूक्ष्मपरिवर्तनों का सजग साक्ष्य वहन करती रजनी की सरल-सहज भाषा रिश्तों के बीच पसरी ‘कच्चे-पके आमों की खट्टी बास’ कई मांसल बिंबों और सूक्ष्म विवरणों में पकड़ती है।उपन्यास में ‘घोरबाइरे’ की बिमोला और ' डॉल्स हाउसकी नोरा के आत्मसंघर्ष का एक नया चरण आपके सामने खुलता चला जाता है...!!

    -अनामिका    
  • Narak Dar Narak
    Mamta Kalia
    200 180

    Item Code: #KGP-159

    Availability: In stock

    इस उपन्यास पर सबसे पहले मुझे अपने प्रिय रचनाकार यशपाल जी का पत्र मिला तो में कई दिनों तक रोमांचित रही। इस महान उपन्यासकार ने मेरे जैसी नई लेखिका की पुस्तक  सिर्फ पढ़ी, वरन उस पर पत्र लिखकर अपनीसराहना व्यक्त की, इस गर्व और सुख का बयान मैं शब्दों में नहीं कर सकती। यशपाल जी का पत्र मैंने प्रमाण-पत्र की तरह पिछले तीस वर्षों से सँभालकर रखा हुआ है। जब कभी लिखने का विश्वास डगमगाने लगता हैयह पत्रध्रुव तारे की तरह मुझे रास्ता दिखाता है। यशपाल जी के ही शब्दों में : ‘उपन्यास की भाषा संक्रमण काल के उफनते-खलबलाते जीवन की संवेदनाओं की अभिव्यक्ति के अनुरूप सरल-ओजस्वी लगी। विशेषकर उषा या माँ की सामाजिकता और आवरणरहित स्वाभाविकता। कथानक और उसके अनुषंग मर्मस्पर्श के साथ नए जीवन-संतुलन की चेतना को भी कुरेदते हैं।

    'नरक दर नरक नाम की चोट चौंकाकर ध्यान खींचती है, परंतु पाठक की यात्रा सहारा के नरक की वीरानगियों में दम छूट जाने से पहले ही बागे-अदन की संजीवनी वायु का आभास महसूसती जान पड़ती है। नरक दर नरक से घोर बचाव की आशा जगने लगती है। सफल रचना के लिए बधाई।' -यशपाल

  • Vrinda
    Shanta Kumar
    250 225

    Item Code: #KGP-91

    Availability: In stock

    वृन्दा
    "मैं वृन्दा के बिना अपने होने की कल्पना भी नहीं करता । अब कैसे जिऊँगा और क्यों जिऊँगा ? अब मुझे भी कोई रोक नहीं सकता---पर हाँ वृन्दा, जाने से पहले तुमसे एक बात पूछना चाहता हूँ--काना चाहता हूँ... "  शास्त्री जी कुछ संभलकर खडे हो गए ।
    सब उत्सुकता से उनकी और देखने लगे ।
    वृन्दा की ओर देखकर शास्त्री जी बोले--“मुझे जीवन के अंतिम क्षण तक एक दु:ख कचोटता रहेगा कि तुमने 'गीता' पढी तो सही, पर केवल शब्द ही पढे तुम 'गीता' को जीवन में जी न सकी । तुम हमेँ छोड़कर जा रही हो, यह आघात तो है ही; पर उससे भी बड़ा आघात मेरे लिए यह है कि मेरी वृन्दा 'गीता' पढ़ने का ढ़ोंग करती रही । जब युद्ध का सामना हुआ तो टिक न सकी । मुझें दु:ख है कि तुमने 'गीता' पढ़कर भी न पढी। वृन्दा ! 'गीता' सुनकर तो अर्जुन ने गांडीव उठा लिया था और तुम हमें छोड़कर, उस विद्यालय के उन नन्हे-मुन्ने बच्चों को छोड़कर यों भाग रहीं हो मुझे तुम पर इतना प्रबल विश्वास था ।  आज सारा चकनाचूर हो गया । ठीक है, तुम जाओ... जहाँ भी रहो, सुखी रहो...  सोच लूँगा, एक सपना था जो टूट गया ।"

    (इसी उपन्यास से)
  • Vansh Vriksha
    Bhairppa
    390 351

    Item Code: #KGP-103

    Availability: In stock

    कन्नड़ के विख्यात उपन्यासकार भैरप्पा ने प्रस्तुत उपन्यास में वंशावली के आदि और जटिल प्रश्नों पर आधारित जिस गहन एवं मर्मस्पर्शी कथा का ताना-बाना बुना है, वह भारतीय मनीषा की प्रश्नाकुलता की ऊर्जा है और हमारी वंशीय परंपरा का राग-अनुराग एवं विराग भी। जीवन के लिए निर्धारित लक्ष्यों को अर्जित कर लेना, अपने वंशको आगे बढ़ाने का स्वस्थ संकेत है, अथवा संतति के माध्यम से ही वंशीय परंपरा का वहन सहज संभव हो सकता हैअपने उपलक्ष्य में यह कृति इन प्रश्नों से जूझती है। वंशजों के रक्त-संबंधों की शुचिता की आशंकाएं तथा सरोकार भी इस कथा में जहां-तहां तैरते हुए नए भावबोध और अवधारणाओं से हमारा सामना कराते हैं।

    भैरप्पा के उपन्यासों के पाठक जानते हैं कि अपने पात्रें की बहुविध दुनिया का जैसा सजीव शब्दांकन वह करते हैं, वह विलक्षण है। वंशवृक्षके सभी पात्र स्वयं में संपूर्ण हैंमनुष्यगत अपूर्णताओं के साथ। वे परंपरा के एक साथ संवाहक और भंजक हैं तथा उनकी यही अनायासताउन्हें एक सच्चे और खरे आदमी के चरित्र में कायांतरित कर देती है। इसी कारण यह कृति-कथा हम सबकी देह और आत्मा को बारंबार छूकर निकलती है। इसमें वर्णित देह और नेह की फुहारों से आप-हम रोमांचित और संवेदनशील हो उठते हैं। लक्ष्यार्जजन के पश्चात् मृत्यु को जिस सहजता और क्रमिकता के साथ लेखक यहां अवतरित करता है, वह यमलीला सहज स्वीकार्य प्रतीत होती है इस उपन्यास में।

    एक अंचल विशेष का वर्णन होते हुए भी यह कृति अखिल भारतीय या कहें कि वैश्विक मनोजगत् की प्रतिनिधि रचना है जो जीवन के संबंधों, संयोगों और सहभावों से संरचित है। जीवनगत निर्णयों के उद्दाम स्रोतों से प्रस्फुटित कई जीवनलीलाओं के तटों को निर्धारित और ध्वस्त करती इस कथा में लेखक के द्वंद्वों को स्वर देने का काम उसके नायक करते हैं तथा मानो यह सब घटित होते हैं पाठक के साथ। कृति, कृतिकार और पाठक के त्रिकोण का यह अंतरंग संबंध वंशवृक्षकी एक अन्य तथा अन्यतम उपलब्धि है।

  • Vishay Purush
    Mastram Kapoor
    100 90

    Item Code: #KGP-2045

    Availability: In stock

    विषय-पुरुष 
    स्त्री और पुरुष दोनो स्वतंत्रचेता व्यक्ति होने के नाते कभी विषयी के रूप ने काम करते हैं तो कभी विषय बनते हैं । किसी से प्यार करते समय है विषयी होते है और प्यार किए जाने की चाह में वे विषय बनते हैं । किंतु विषयी अथवा विषय बनना उनकी स्वतंत्र चेतना का अधिकार हैं । भय या प्रलोभन से किसी पर यह भूमिका लादना अनैतिक ही नहीं, अश्लील भी है । दुर्भाग्य से मानव-समाज ने स्त्री को हमेशा विषय के रूप ने ही स्वीकार किया, उसे विषयी बनने के अधिकार से वंचित रखा और यह काम पुरुष-समाज ने किया भय और प्रलोभन दिखाकर जिसने धर्म का भय और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रलोभन भी शामिल है ।
    स्त्री-स्वतंत्रता के दमन की पुरुष-प्रवृति की प्रतिक्रिया ने लिखा गया यह उपन्यास सशक्त कहानी के साथ-साथ एक वैचारिक प्रयोग भी है । हमेशा विषयी की भूमिका निभाने वाले को (अथवा इसका वा करने वाले को) जब विषय बनना पाता है तो उसको क्या दशा होती है, यही इस उपन्यास का विषय है ।
  • Rangey Raghav Teen Charchit Upanyas
    Rangey Raghav
    550 495

    Item Code: #KGP-2005

    Availability: In stock

    रांगेय राघव हिंदी के उन विशिष्ट कथाकारों में हैं जिनकी रचनाएं अपने समय को लांघकर भी जीवित रहती हैं। रांगेय राघव के तीन उपन्यासों—‘आग की प्यास’, ‘छोटी सी बात’ और ‘दायरे’ को पाठकों की सुविधा के लिए यहां एक ही जिल्द में प्रस्तुत किया जा रहा है—
    ‘आग की प्यास’ रांगेय राघव का एक बहुचर्चित उपन्यास है, जिसकी कथावस्तु के केंद्र में ग्रामीण जीवन है—वहां की राजनीति, अर्थव्यवस्था और बदलता हुआ सामाजिक-धर्मिक परिवेश। लेकिन मुख्य कथावस्तु अर्थकेंद्रित है। समाज के कुछ इने-गिने लोगों की धन की प्यास कैसे वृहत्तर समुदाय का जीवन नारकीय बनाती जा रही है, यह इस उपन्यास में प्रभावशाली ढंग से चित्रित हुआ है।
    ‘छोटी सी बात’ रांगेय राघव का अत्यंत लोकप्रिय एवं पठनीय उपन्यास है। कलेवर में भले ही यह लघु है परंतु अपने कथ्य में अत्यंत विराट है। कुल मिलाकर यह उपन्यास एक जीवंत दस्तावेज है।
    ‘दायरे’ उपन्यास का केंद्र एक अवैध (?) बच्चे और उसकी मां की यातना है, लेकिन उसके माध्यम से लेखक ने स्त्री-पुरुष के संबंधों से लगाकर धर्म-संस्कृति तक को अपने दायरे में ले लिया है। एक तीव्र संवेदनात्मक तथा वैचारिक द्वंद्व उपन्यास में शुरू से आखिर तक चलता रहता है। रांगेय राघव ने हिंदी कथा साहित्य को रोजा, सत्यदेव, फादर तोलियाती के रूप में तीन अमर पात्र इस उपन्यास में दिए हैं...
  • Koi To
    Vishnu Prabhakar
    125 113

    Item Code: #KGP-9096

    Availability: In stock


  • Head Office Ke Girgit
    Arvind Tiwari
    300 255

    Item Code: #KGP-463

    Availability: In stock

    हेड ऑफिस के गिरगिट' वरिष्ठ व्यंग्यकार अरविन्द तिवारी का नया व्यंग्य उपन्यास है। उल्लेखनीय है कि इसकी पांडुलिपि पर उन्हें वर्ष 2014 का 'आर्य स्मृति साहित्य सम्मान प्राप्त हुआ है।

    यह उपन्यास शिक्षा, समाज और राजनीति के साथ व्यवस्था की संधियों-दुरभिसंधियों का आंतरिक यथार्थ उजागर करता है। भारतीय लोकतंत्र के विकास का एक बड़ा दायित्व शिक्षा व्यवस्था पर है। शिक्षा व्यवस्था जाने कैसे-कैसे निहितार्थों का भार वहन कर रही है। स्मरणीय है, वर्षों पहले कालजयी उपन्यास 'राग दरबारी' में श्रीलाल शुक्ल ने शिक्षा व्यवस्था पर बेहद तीखी टिप्पणी की थी। शिक्षा के सरोकारों या राष्ट्रीय उद्देश्यों को थोड़ी देर के लिए भूल भी जाएं तो भी प्रक्रिया, परिणाम व प्रभाव पर समयानुसार सवाल उठते रहे हैं। ऐसे ही बहुतेरे सवालों से मुठभेड़ करते हुए अरविन्द तिवारी ने यह महत्त्वपूर्ण उपन्यास लिखा है।

    शहर से आठ किलोमीटर दूर बियाबान में स्थित शिक्षा विभाग के एक आला दफ्तर' को केंद्र में रखकर लेखक ने कर्मचारियों की गतिविधियों का ‘एक्स-रे' किया है। लेखक के अनुसार, 'हेड ऑफिस की यह विशेषता है कि फील्ड में नाकारा साबित हुआ अधिकारी हेड ऑफिस में ड्यूटी ज्वाइन करते ही सबसे सक्षम अधिकारी बन जाता है।' अनेकानेक चरित्रों, घटनाओं, स्थितियों, मन:स्थितियों व विचारों को 'व्यंग्य विदग्ध' भाषा-शैली में उपस्थित करता 'हेड ऑफिस के गिरगिट' पाठकीय चेतना को प्रमुदित-आंदोलित करता है। प्रारंभ से अंत तक प्रफुल्लित भाषा में लिखी यह रचना हिंदी के व्यंग्य उपन्यासों में एक सुखद वृद्धि करती है।

    कथा, कौतूहल और कौतुक का सहमेल व्यंग्य उपन्यास की सबसे बड़ी कसौटी है। कहना न होगा कि यह उपन्यास इस कठिन कसौटी पर खरा उतरता है। अत्यंत पठनीय और संग्रहणीय कृति।


  • Sangyaheen
    P C K Prem
    50 45

    Item Code: #KGP-9226

    Availability: In stock

    संज्ञाहीन
    ‘‘जब आदमी अपने-आपको सही दृष्टि से नहीं देख सकता तभी कठिनाई पैदा होती है। बहुत वर्ष पहले जब मैं विधवा हुई थी, तब मैंने अनुभव किया था कि मुझे जीवन में अपना स्थान बनाकर रहना होगा।
    रिश्तों के भंवर में मीठा-कड़वा रस रचने लगा। दिनों के व्यतीत होते-होते पति की मृत्यु का दुःख कम होने लगा। विधवा होना कोई अनहोनी नहीं है; लेकिन खूबसूरत जवान स्त्री को अपना पथ बनाने नहीं देती। मैंने जेठ की नजरों से लेकर न जाने किस-किसकी नजरें देखी हैं। लेकिन एक बार जब लुटना स्वीकार हो गया तो फिर पीछे मुड़कर क्या देखना मैं जीती चली, मेरे पीछे चल पड़े मुखौटा पहने लोग-लेकिन मैंने चेहरे पर पर्दा नहीं डाला।’’
    —इसी पुस्तक से
  • Domnic Ki Vaapasi
    Vivek Mishra
    350 315

    Item Code: #KGP-9359

    Availability: In stock

    ‘डाॅमनिक की वापसी’ वर्ष 2015 के ‘आर्य स्मृति साहित्य सम्मान’ से अलंकृत उपन्यास है। इसके लेखक विवेक मिश्र समकालीन हिंदी कथा साहित्य के महत्त्वपूर्ण रचनाकार हैं। विवेक ने रचना के लिए सदा ऐसे कथानक चुने हैं जो समाज के किसी न किसी व्यापक सत्य को प्रकट करते हैं। इसीलिए वे लोकप्रिय रचना-पद्धतियों से अलग रास्ता तलाशते हैं। प्रस्तुत उपन्यास इसका प्रमाण है।

    इस उपन्यास के केंद्र में ‘डाॅमनिक की वापसी’ नामक नाटक है, डाॅमनिक का चरित्र निभाने वाला अभिनेता दीपांश इसका प्रेरक पात्र है। दीपांश यथार्थ और नियति के बीच झूलता अपना मार्ग तय करता है। वह उस समय रंगमंच से अदृश्य हो जाता है जब अभिनय के शीर्ष पर उसका नाम चमक रहा होता है। उपन्यास अभिनय में जीवन और जीवन में अभिनय का द्वंद्व उपस्थित करता है। प्रेम पर आधारित नाटक तो सफल होता है लेकिन जीवन में प्रेम पराजय की छायाओं से घिर जाता है।

    ‘डाॅमनिक की वापसी’ प्रेम, मानवीय संबंध, कला और जीवन की सघन बुनावट से निर्मित हुआ है। अनूठा कथानक, रचनात्मक भाषा, शिल्प सौष्ठव और दार्शनिक आभा इस रचना के उल्लेखनीय तत्त्व हैं। युवा पीढ़ी में उपन्यास रचना की सिद्धि के लिए इस उपन्यास को उदाहरणार्थ देखा जा सकता है। विश्वास है कथानक और कहन के आधार पर ‘डाॅमनिक की वापसी’ व्यापक पाठक समुदाय की प्रियता अर्जित करेगा।
  • Papa, Muskuraiye Na!
    Prahlad Shree Mali
    200 180

    Item Code: #KGP-9299

    Availability: In stock

    मुस्कुराते हुए पापा कितने हैंडसम लगते हैं क्या पापा को यह जानकारी है। कभी तो मम्मी ने उन्हें बताया होगा। कौन जाने मम्मी ने उन्हें मुस्कुराते हुए देखा भी है या नहीं। मम्मी से पूछूं औ वे उदास होकर टेंशन में आ गईं तो। तो मम्मी की शुगर बढ़ जाएगी। वह गंभीर हो जाता है। अपनी मम्मी से बहुत प्यार है उसे। जितना प्यार करता है, उससे ज्यादा श्रद्धा है मम्मी के प्रति। यूं तो हर कोई अपनी मम्मी को चाहता है। महान् मानता है। लेकिन मेरी मम्मी वाकई ग्रेट हैं। इस विश्वास का ठोस आधार है अनंतके पास।
    मम्मी बड़ी संवेदनशील हैं। उसकी भावनाओं का ध्यान रखती हैं। कहीं वह कमजोर पड़कर भटक न जाए। अतिरिक्त सावधानी बरतती हैं मम्मी। तभी तो उस दिन पापा का पक्ष लेते हुए विस्तार से बताया था, उनके ऐसे स्वभाव के बारे में। जिस दिन पापा ने छोटी-सी बात पर तुनककर उसे एक झन्नाटेदार थप्पड़ मार दिया था। कहीं पापा के प्रति उसके भावुक किशोर मन में नफरत घर न कर डाले। इसी चेतनावश मम्मी ने लाड़-दुलार से पास बिठाकर उसे समझाई थीं। मम्मी की इस जागरूकता से अभिभूत है अनंत। वाकई मम्मी यदि यह सब नहीं बतातीं तो पापा के प्रति उसके मन में कड़वाहट निरंतर बढ़ती जाती। यह मम्मी का उस पर बहुत बड़ा उपकार है।
    —इसी पुस्तक से
  • Aavaran
    Bhairppa
    600 480

    Item Code: #KGP-873

    Availability: In stock

    यह मेरा दूसरा ऐतिहासिक उपन्यास है। आठवीं शताब्दी के संधिकाल के अंतस्सत्त्व को ‘सार्थ’ में, उपन्यास के रूप में, आविष्कृत करने का और अब ‘सार्थ’ के समय के बाद के सत्य को ‘आवरण’ द्धउपन्यासऋ में चित्रित करने का मैंने प्रयास किया है। भारत के इतिहास के अत्यंत संकीर्ण इस अवधि के बारे में विपुल प्रमाण में सामग्री उपलब्ध होती है, लेकिन आवरण की शक्ति इस विपुलता के ऊपर विजृंभित हो रही है। ‘सार्थ’ की अवधि का इतिहास ज्यादातर आवरण-शक्ति के लिए आहुति बन नहीं पाया है। उनके बारे में निर्भीक रूप से सत्य को अंकित किया जा सकता है। लेकिन ‘आवरण’ की अवधि के इतिहास के बारे में यही बात नहीं कही जा सकती है। प्रत्येक सोपान में आवरण की शक्ति को बेधते हुए आगे बढ़ने की अपरिहार्यता सामने आती है। इसीलिए इस उपन्यास के स्वरूप और तंत्रें को उसके अनुकूल समायोजित कर लेना पड़ा।
       इस उपन्यास की ऐतिहासिकता के विषय में मेरा अपना कुछ भी नहीं है। प्रत्येक अंश या पग के लिए जो ऐतिहासिक आधार हैं उनको साहित्य की कलात्मकता जहाँ तक सँभाल पाती है वहाँ तक मैंने उपन्यास के अंदर ही शामिल कर लिया है। उपन्यास के तंत्र के विन्यास में यह अंश किस प्रकार प्रधान रूप में कार्यान्वित हुआ है, इसको सर्जनशील लेखक और दर्शनशील पाठक, दोनों पहचान सकते हैं। शेष आधारों को उपन्यास के अंदर के उपन्यास को रच डालने वाले चरित्र ने ही, अपनी क्रिया की आवश्यकता के रूप में, प्रस्तुत कर दिया है, न कि मैंने। इस पूरी वस्तु को जो अद्यतन रूप प्रदान किया है, उसमें ही मेरी मौलिकता है। इतिहास की सच्चाई में कला का भाव यदि चुआ है, तो वहाँ तक साहित्य के रूप में यह सफ़ल हुआ है, ऐसा मैं मानता हूँ।
    -भैरप्पा

  • Yogkshem
    Rajendra Tyagi
    540 432

    Item Code: #KGP-286

    Availability: In stock

    योगक्षेम
    काफी विचार करने के उपरान्त मैंने गीता को उपन्यास के रूप में प्रस्तुत करने का निर्णय लिया । इस सम्बन्ध में अनेक विद्वानों के साथ विचार-विमर्श किया । कुछ ने मेरे विचार की सराहना की तो कुछ ने यह कहते हुए कि गीता स्वयं ही एक उपन्यास है, मेरे विचार को नकार दिया । कुछ का मत था कि विचार तो उचित है, किन्तु रचना में मौलिकता का अभाव रहने का खतरा है। समझाया उनका आशय गीता के मूलपाठ की सुरक्षा से था । गीता के मूलपाठ के साथ यदि छेड़छाड़ की गई तो उसका मूल स्वरूप ही नष्ट हो जाएगा और यदि मूलपाठ के साथ छेड़छाड़ नहीं की तो उपन्यास में मौलिकता का अभाव रहने की पूरी सम्भावना है । इस प्रकार यह मौलिक कृति नहीं कहलाएगी । उनकी आशंका अपने स्थान पर उचित थी किन्तु मेरे लिए चुनौती । चुनौती स्वीकारते हुए मैंने गीता पर आधारित उपन्यास ही लिखने का अन्तिम निर्णय लिया ।
    लक्ष्यप्राप्ति के लिए मैं चिन्तन-मनन में व्यस्त हो गया और महत्त्वपूर्ण दो विचार मेरे चिन्तन में अवतरित हुए । प्रथम-गीता के विभिन्न श्लोकों के सम्बन्ध में व्याप्त भ्रान्तियों का निराकरण ।  द्वितीय—गीता में निहित शिक्षा का आधुनिक परिप्रेक्ष्य में विस्तृत व्याख्या । इसके अतिरिक्त एक प्रमुख विचार यह था कि जब तक कृष्ण और अर्जुन के मध्य वार्तालाप चलता रहा, तब तक कुरुक्षेत्र के मैदान में युद्ध के लिए तत्पर सेनानायक व सैनिक क्या करते रहे ! मुझे यह अनुभव हुआ कि प्रथम दो विचार तो गीता को सरल व सर्वग्रासी बनाने में सहायक सिद्ध होंगे और अन्तिम विचार गीता की रोचक प्रस्तुति में सहायक सिद्ध होगा ।
    इस प्रकार गीता के मूलपाठ से खिलवाड़ न करते हुए अर्जुन व धृतराष्ट्र के माध्यम से गीता को सर्वग्राही व उपन्यास का रूप और विस्तार प्रदान करने का प्रयास किया गया है । -लेखक
  • Ullanghan
    Bhairppa
    390 351

    Item Code: #KGP-810

    Availability: In stock

    कन्नड़ उपन्यास का हिंदी अनुवाद।
  • Safed Chaadar
    Jiyalal Arya
    125 113

    Item Code: #KGP-1994

    Availability: In stock

    सफेद चादर
    बहुपथीन प्रतिभा के धनी श्री जियालाल आर्य की  यह कथाकृति 'सफद चादर' अनेक संदर्भों में उपन्यास-जगत् की एक अनूठी उपलब्धि है ।
    इस उपन्यास में समष्टि-हित की व्यापक दृष्टि से संपन्न एक ऐसी सशक्त और सतत संघर्षशील ग्रामीण नारी की कथा है, जो नारी-मुक्ति की संभावनाओं को सहज सम्भाव्य बनाती है । घोर कायिक और मानसिक उत्पीड़न तथा अत्याचार के बावजूद श्री आर्य की नायिका की महती मानवीय संवेदना और सामाजिक संचेतना किंचित् काले नहीं होती, अपितु भांति-भांति की कुंरीतियों-कुत्साओं के विषदंश से विमूच्छित मनुष्यता को मर्मन्तुद जर्जरता को उन्मूलित करने का उसका उत्साह उत्तरोत्तर अदम्यतर होता जाता है । मानवता के प्रति उपन्यासकार की यह मांगलिक निष्ठा इस उपन्यास को एक श्रेष्ट कृति की कोटि में प्रतिष्ठित करती है ।
    प्रज्ञापटु कथाशिल्पी श्री जियालाल आर्य के इस उपन्यास में पाठकों को बाँध लेने की अदभुत क्षमता है । अपनी हर अगली पंक्ति के लिए पाठकों का औत्सुक्य अक्षुष्ण रखने की कला में कथाकोविद श्री आर्य को पूर्ण प्रवीणता प्राप्त है । जिसके साथ में यह उपन्यास जाएगा, वह इसे अथ से इति तक पढे बिना नहीं ही छोड़ेगा, यह मेरा अनुभूत अभिमत है ।
    -डॉ० कुणाल कुमार
  • Aakhet
    Jagdish Godbole
    125 113

    Item Code: #KGP-9072

    Availability: In stock


  • Chunauti
    Sudrashan Kumar Chetan
    150 135

    Item Code: #KGP-177

    Availability: In stock


  • Idannamam
    Maitreyi Pushpa
    550 440

    Item Code: #kgp-2003

    Availability: In stock

    इदन्नमम
    समकालीन कथा-लेखन में सक्रिय एक सशक्त हस्ताक्षर मैत्रेयी  पुष्पा की कलम से निकली औपन्यासिक कृति इदन्नमम से बुनी गई है तीन पीढियों की बेहद सहज और संवेदनशील कहानी । कहानी जो बऊ (दादी), प्रेम (माँ) और सदा (उपन्यास की नायिका)--तीनों को समानांतर रखने के साथ-साथ, एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा भी करती है । विरोधाभास की इस प्रतीति को लेखिका ने सक्षमता, सूक्ष्मता और पारदर्शी भाषाजाल से बुना है, जो अत्यंत पठनीय है और अपने स्वर में मौलिक भी।
    इदन्नमम के आँचल से छिपा है विंध्य का अंचल । विंध्य की पहाडियों से घिरे वर्णित गांव श्यामली और सोनपुरा के जन-जीवन की जीवंत धड़कनों को यह उपन्यास सांस-दर-सांस कहना है और पाठक को लगता है मानो यह पूरे अंचल में कदम-कदम चल रहा है । इन गाँवों में-अंचल से धूल है, नदी है, पर्व  है, गीत है, आहें-कराहें हैं, सत-असत है और है रूढियों और परंपराओं की भरी-पूरी दुनिया । उपन्यास के अंचल की इस दुनिया से आकांक्षा है, ईषर्या है और उन पर झपटते भेड़िये हैं, उन्हें त्यागते 'साधु' हैं तथा हैं हाढ़-मांस के सौ फीसदी पात्र ! शोषित होने से इंकार करते ये पात्र इस उपन्यास की अतिरिक्त विशेषता हैं ।
    वरिष्ट कथाकार राजेन्द्र यादव के शब्दों में कहें तो इदन्नमम में "मिट्ठी-पत्थर के ढोकों या उसी डालियों और खुरदुरी छाल के आसपास की सावधान छटाई करके सजीव आकृतियाँ उकेर लेने की अद्भुत निगाह हैं लगभग "रेणु" की याद दिलाती हुई ।"
    वास्तव में घनीभूत संवेदना और भावनात्मक लगाव से लिखी गई इदन्नमम की कहानी समकालीन हिंदी उपन्यास जगत् में एक घटना है, जिसका स्वागत किया जाना अभीष्ट है ।
  • Roma Putri Ke Naam
    Shyam Singh Shashi
    300 255

    Item Code: #KGP-9355

    Availability: In stock

    श्याम सिंह शशि ने अनेक विधाओं में महत्त्वपूर्ण लेखन किया है। उन्होंने विश्व के अनेक देशों की यात्रा की है। वहां की जीवन स्थिति, प्रकृति, संस्कृति और मनःस्थिति का गहन अध्ययन किया है। उन्होंने लगभग एक हजार वर्ष पूर्व भारत छोड़कर गए रोमा समुदाय पर विशेष लेखन किया है। तीन करोड़ यायावर भारतवंशी रोमा समुदायों की जीवन पद्धति का उनको विशेषज्ञ माना जाता है। रोमा पुत्री के नाम उनकी विशेषज्ञता का एक और रचनात्मक चरण है।
    आत्माख्यान-यायावरी उपन्यास ‘रोमा पुत्री के नाम’ 
    श्याम सिंह शशि की रचनाशीलता का नया आयाम है। लेखक के शब्दों में, "...यह यायावरी उपन्यास कलेवर में भले ही बहुत बड़ा न लगे किंतु इसमें एक अनूठी दुनिया है जो यथार्थ की अद्भुत यात्रा है। कला और साहित्य का सत्यं शिवं सुन्दरम् के रूप में यायावरी प्रस्तुतीकरण है। मेरे नए-पुराने यात्रा-विवरणों की अनकही कथा है।य् लेखक ने परम घुमक्कड़ महापंडित राहुल सांकृत्यायन का भी इस संदर्भ में स्मरण किया है। इस उपन्यास को मानवीय अधिकारों के लिए संघर्षरत भारतवंशी रोमा समाज का दस्तावेज भी कहा जा सकता है।
    यह उपन्यास रोमा पुत्री कैथी की मार्मिक और रोचक दास्तान है। यूक्रेन के कीव नगर में जन्मी, वारसा शहर में पली-बढ़ी, जर्मनी के बर्लिन महानगर में युवती हुई कैथी की दास्तान जो यायावर है और चित्रकार है। कैथी का जीवन उकेरते हुए लेखक ने विश्व के बीच रोमा समुदाय के आत्मसंघर्ष को अंकित किया है। इस समुदाय के मन में अपने प्रति हुए निरंतर अन्याय के लिए अत्यंत आक्रोश है। विशेषकर हिटलर के रक्तशुद्धता वाले कांड के लिए। रोमा भारत को ‘बारोथान’ कहते हैं—‘बड़ा स्थान’। यहां आते रहना उनको भाता है। फिर भी, उनका जीवन एक रहस्य है। कैथी के संदर्भ में लेखक कहता है, फ्रोमा पुत्री कितने मूड्स हैं तुम्हारी कला में, तुम्हारे जीवन में!"
    हिंदी में अपनी तरह का यह अन्यतम उपन्यास है। एक जीवित यायावर समुदाय के जीवन-समुद्र का अवगाहन करती एक अत्यंत पठनीय रचना।
  • Aise Hamaare Harda
    Pradeep Pant
    350 315

    Item Code: #KGP-587

    Availability: In stock


  • Zindagi Aur Jugaar
    Manohar Puri
    250 225

    Item Code: #KGP-9025

    Availability: In stock

    जिन्दगी और जुगाड़
    आपाधापी के इस युग में व्यक्ति को अपना अस्तित्व बचाने के लिए जुगाड़ का सहारा लेना ही पड़ रहा है। व्यक्तिगत, पारिवारिक अथवा सामाजिक जीवन में कोई भी गतिविधि बिना जुगाड़ के संपन्न करना निरंतर कठिन होता जा रहा है। आर्थिक, राजनीतिक और यहां तक कि शैक्षणिक जीवन भी जुगाड़ पर निर्भर होकर रह गया है। हर एक व्यक्ति दिन-भर किसी न किसी प्रकार से जुगाड़ करके अपने जीवन की गाड़ी को धकेलने का प्रयास कर रहा है। उसके चौबीसों घंटे किसी न किसी प्रकार का जुगाड़ करने में ही व्यतीत होते हैं। देश की अर्थव्यवस्था, राजनीति और अन्य सभी गतिविधियां जुगाड़ के बिना निरर्थक हैं। जिन्दगी का कोई पक्ष जुगाड़ से अछूता नहीं रहा, इसका अनुभव प्रायः हर व्यक्ति को प्रत्येक कदम पर होता है।
    इस उपन्यास में जीवन के कुछ ही पक्षों को छूना संभव हो पाया है। रोजमर्रा का पारिवारिक जीवन, हमारे परस्पर संबंध, राजनीति, शिक्षा, चिकित्सा और प्रशासन, समाज में निरंतर फैलता भ्रष्टाचार, नशे की दुनिया में डूबती हमारी नई पीढ़ी, धन की अंधाधुंध दौड़ के मोहजाल में फंसी वर्तमान पीढ़ी जल्दी से जल्दी वह सब प्राप्त कर लेना चाहती है, जो उसे वर्षों के परिश्रम के बाद भी ईमानदारी से मिलना संभव नहीं दिखाई देता। इसके लिए शॉर्टकट जरूरी है और यही शॉर्टकट जुगाड़ का मकड़जाल है। एक बार इसमें फंसा व्यक्ति लाख सिर पटक ले, इससे बाहर नहीं निकल पाता।
    इस उपन्यास में विश्वविद्यालयों में पनपते माफिया गिरोह और देह-व्यापार, अस्पतालों से होती मानव-अंगों की व्यापक स्तर पर तस्करी और राजनीति में लगातार पनप रहे भ्रष्ट गठजोड़ सरीखे कुछ पक्षों को ही मात्र छुआ जा सका है। ये समाज में फलने-फूलने वाले कैंसर की एक बानगी मात्र हैं। आप स्वयं इससे कहीं अधिक जानते हैं और प्रतिदिन उसे भोगने को अभिशप्त हैं। समाज के किसी एक व्यक्ति अथवा वर्ग ने इस उपन्यास से प्रेरणा लेकर विरोध का एक स्वर भी उछाला तो मैं अपने प्रयास को सार्थक समझूंगा। हां, इतना निश्चित है, जितना इसमें लिखा गया है, हालत उससे कहीं अधिक गंभीर है। समय रहते जाग जाना बहुत जरूरी है। जागो, कहीं बहुत देर न हो जाए।    
  • Theekare Ki Mangani
    Nasera Sharma
    300 270

    Item Code: #KGP-24

    Availability: In stock

    महरुख़ की जिंदगी में ठहराव था और बहुत सारे लोगों के साथ-साथ चलने की ताकत भी इसी सोच से उसने बाहर और भीतर के सच को पहचाना था।

    ठीकरे की मंगनी हुई थी महरुख़ के जन्म के साथ ही। तेज़ रफ्तार जिंदगी जीने वाले एक पुरुष की सत्ता को स्वीकारने के लिए मजबूर कर दिया गया था उसे। उसकी जिंदगी का सबसे बड़ाहादसा था यहपर महरुख़ उस साँचे में ढली हुई थीजिसे कोई तोड़ नहीं सकता। ठोस इरादे और नज़रिए ने उसे थोपी हुई सत्ता के ख़िलाफ़ खड़ा कर दिया।

    समकालीन लेखन की परिचित लेखिका नासिरा शर्मा का यह एक ऐसा उपन्यास हैजिसमें महरुख़ की दास्तान के माध्यम से दो खिड़कियाँ खुलती हैंजिनमें एक गाँव हैवहाँ का स्कूल हैगाँवके असहाय लोग हैंजिनके छोटे-छोटे दुखों से भी वह विचलित हो उठती है। दूसरी तरफ एक परम्परागत मुस्लिम ख़ानदान हैउसमें रह रहे लोगों के अपने-अपने सरोकार और टकराव हैं। इनदोनों ही परिवेशों से गुजरते हुए महरुख़ बदहवास दुनिया की सच्चे अर्थों में पड़ताल करती है और चुनती है अपने लिए उसे थरथराते सत्य कोजो उसे अकेला तो कर देता हैपर सशक्त ढंगसे खड़ा होना सिखा देता है। औरत को जैसा होना चाहिएउसी की कहानी यह उपन्यास कहता है।

    कथा-रचना की गठन अपने पूरे-पूरे आकार में उभरकरउद्वेलित करती है। ठीकरे की मंगनी वर्तमान कथा-साहित्य के बीच रेखांकित किया जाने वाला मार्मिक उपन्यास है।


  • Mataki Mataka Matkaina
    Dronvir Kohli
    100 90

    Item Code: #KGP-977

    Availability: In stock

    तुम यह जानना चाहोगे कि मैंने यह कहानी कैसे लिखी। वैसे, कुछ लेखक अपना भेद बताने से कतराते हैं। लेकिन मुझे कोई आपत्ति नहीं है सारी बात बताने में।
    मैं विदेश-भ्रमण करता रहता हूं। एक बार मैं एक देश के एक ऐसे नगर में गया जहां पतझड़ का मौसम था। सारे इलाके की शोभा देखते ही बनती थी। यह उस प्रदेश की विशेषता थी। पतझड़ के मौसम में वहां के गली-कूचे, सड़कें-पगडंडियों, घर-बाहर के लाॅन, पार्क और जंगल भांति-भांति के पेड़ों के झड़ते रंग-बिरंगे पत्तों से इस तरह ढक जाते थे कि सचमुच धरती दिखाई ही नहीं पड़ती थी। वहां के झड़ते सूखे पत्ते भी सुंदर लगते थे कि देख-देखकर हृदय बल्लियों उछलता था।
    इसके साथ ही वहां मैंने एक और अद्भुत बात देखी। वहां के रहने वाले लोग पतझड़ के पत्तों को जलाते नहीं थे क्योंकि इससे वायुमंडल दूषित होता है। वे करते यह थे कि सूखे पत्तों को बटोरकर सड़क के किनारे ढेर करते रहते थे। निश्चित दिन गाड़ी आती थी और पत्तों को समेटकर ले जाती थी।
    लेकिन इससे भी विचित्र बात वहां मैंने यह देखी कि ये सूखे पत्ते जब तक सड़क के किनारे पड़े रहते थे, तब तक बेचारी गिलहरियों की जान सांसत में आ जाती थी। सड़क के किनारे पड़े सूखे पत्तों के ऊंचे-ऊंचे अंबार फांदकर बेचारी गिहरियां आ-जा नहीं सकती थीं और गाड़ियों के नीचे आकर कुचली जाती थीं।
    संयोग से वहां मैं ऐसी बस्ती के एक घर में ठहरा था जो जंगल के सिरे पर स्थित था। मैं जब बाहर टहलने निकलता, तो सड़क पर दोनों तरफ टीलों की तरह लगे पत्तों के ढेर के साथ मरी हुई गिलहरियों को देखकर मन भारी हो जाता। बस, इन मृत गिलहरियों को देखकर ही मुझे यह कहानी लिखने की प्रेरणा मिली।
    सच पूछो तो, मैं उस शहर में न गया होता, और फिर जंगल के किनारे उस घर में न ठहरा होता, तो यह कहानी लिखी ही नहीं जा सकती थी। इसे लिखते समय मुझे अपार आनंद मिला।
    —द्रोणवीर कोहली
  • Pratidaan
    Virendra Jain
    60 54

    Item Code: #KGP-2093

    Availability: In stock

    प्रतिदान

    सुरेखा-पर्व की विद्या का विवाह माँ ने तय किया था । अच्छा घर-वर खोज़कर ।

    प्रतिदान को प्रभा को ससुराल के तमाम संबंधियों ने देख-परखकर पसंद किया था ।

    उसके हिस्से का विश्वास की कविता ने कबीर को स्वयं चुना था ।

    तीनों के पति अलग-अलग स्थान, परिवेश, पेशे से जूड़े थे । अलग-अलग प्रवृति के थे । फिर भी तीनों स्त्रियों  का दुख एक-सा क्योंकर हुआ?

    साथ न सहकर भी साथ सहे गए दुख का बयान करती वीरेन्द्र की तीन उपन्यासिकाएँ ।

    स्त्रियाँ ही स्त्रियों की कथा-व्यथा को संजीदगी से बयान कर सकती हैं, इस अवधारणा को झुठलाती तीन व्यथा-कथाएँ ।

    थोड़े में बहुत कह देने में समर्थ युवा कथाकार के आकार में लघु और कथ्य में बृहद् तीन लघु उपन्यास-सुरेखा-पर्व, प्रतिदान, उसके हिस्से का विश्वास ।
  • Ratana Aur Chetana
    Amrita Pritam
    240 192

    Item Code: #KGP-9051

    Availability: In stock


  • Jigyaasa
    Bhairppa
    250 225

    Item Code: #KGP-214

    Availability: In stock


  • Vaksh Shila
    Sunil Gangopadhyaya
    90 81

    Item Code: #KGP-2008

    Availability: In stock

    वक्ष-शिला
    'वक्ष-शिला' पढ़ने का अर्थ है एक पुरे इतिहास से गुजरना । सातवें दशक  में पश्चिम बंगाल, बिहार आदि राज्यों में नक्सलवाद की जो तीव्र आंधी, चली थी, उसमें जिस तरह हजारों युवकों को बलि चढी थी, उसका साक्षी इतिहास है और उस इतिहास का एक अंश है यह उपन्यास । प्रसिद्ध बांग्ला क्याकार सुनील गंगोपाध्याय ने उस समय को, उस काल की स्थितियों को, युवा मन की भावनाओं को, राजनीति को लेकर इस उपन्यास का जो रोचक ताना-बाना बुना है, वह अदभुत है । यह उपन्यास प्रमाणित करता है कि एक औपन्यासिक जाते के माध्यम से किसी विशेष कालखंड को कितनी गहनता से प्रस्तुत किया जा सकता है ।
    'नक्सलवाद' वैचारिक धरातल पर बहुत सारे प्रश्न छोड़ गया है, आज भी हम उन प्रश्नों के घेरे से बाहर नहीं निकले हैं, किंतु इस उपन्यास में अनेक प्रश्नों के उत्तर हमें मिल सबत्ते हैं जो उस आंदोलन को समझने में मदद करते हैं ।
    अनूठी शैली, रोचक भाषा और नये धरातल पर खडी कथा के कारण यह उपन्यास अपना एक विशिष्ट प्रभाव छोड़ता है ।
  • Manushkhor
    Ganga Prasad Vimal
    595 476

    Item Code: #KGP-405

    Availability: In stock

    मानुषखोर इतिहास के रास्ते मनुष्य के भविष्य की एक ऐसी यात्रा है जिसे समझदार लोग सभ्यताओं की टकराहट से जोड़ेंगे परंतु आदमी की छोटी-छोटी ज़रूरतों पर जैसे किसी दूसरी ही ताकतका कब्ज़ा है। इतिहास में उसे पराशक्ति कहकर आदमी के अशक्त और अकेले होने को दुर्निवार ठहराया गया था। हमारे वर्तमान में हम उसे राजनीतिक चालों की गाथा में टोहते हैं। अब धीरे-धीरे स्पष्ट हो रहा है कि कोई दुष्चक्र है जो दुनिया के ज्यादातर लोगों को दारुण स्थितियों में जीने के लिए विवश करता

    मानुषखोर इस लिहाज से एक सीधी-सादी कथा है पर अपनी बुनावट में वह उन जटिलताओं को व्यक्त करने से परहेज़ नहीं करती जिनकी वजह से सत्ताएं आदमी को बांटने, उसे तोड़ने तोड़ने के अपने अदृश्य अभियान में लगी रहती हैं।

    क्या हमारा वर्तमान सचमुच नरभक्षियों से पटा पड़ा है? राजनीतिक वर्चस्व मानुषखोर है। तमाम तरह की विनाशलीलाओं के लिए किसी दूसरे को ज़िम्मेदार ठहराकर अपनी भूमिकाओं से पल्ला झाड़ने वाली यह नई सांस्कृतिक बिरादरी किस तरह से पर्यावरण को क्षत-विक्षत कर समूची पीढ़ियों को मनोरुग्णता के धार्मिक धड़ों में शामिल होने के लिए मजबूर कर रही है?

    इतिहासपुराकथाएंलोकचर्याएं काल्पनिक लगने लगी हैं-सभ्यता के नए संतरण की दहलीज पर मानुषखोर अवतरित हो रहा है...

  • Ek Qatara Khoon
    Ismat Chugatai
    400 360

    Item Code: #KGP-694

    Availability: In stock

    उर्दू की प्रख्यात लेखिका इस्मत चुगताई द्वारा मुस्लिम इतिहास की उस महान् गाथा का कलमबंद बयान, जो विश्व की करुणतम मानवीय गाथाओं में विशिष्ट स्थान रखती है। यह गाथा है मानव के बुनियादी अधिकार के लिए अडिग संघर्ष, अदम्य शौर्य और अद्भुत बलिदान की-कर्बला ! पैगंबर हज़रत मुहम्मद साहब के नवासे और हज़रत अली के सुपुत्र इमाम हुसैन के सपरिवार जौहर और शहादत की हृदयद्रावक दास्तान। फ़र्ज़ और हक की सत्ता के विरुद्ध जद्दोजहद की एक महान् गाथा