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  • Ped Khaali Nahin Hai
    Narendra Nagdev
    380 285

    Item Code: #KGP-9323

    Availability: In stock

    प्रतिष्ठित कथाकार नरेन्द्र नागदेव हर कहानी के फलक पर अपने पूरे कलामय व्यक्तित्व के साथ मौजूद होते हैं, वह भी पूरी एकाग्रता के साथ, कहानी दर कहानी बदलती हुई तस्वीरों में एक स्थायी लय की तरह। उनकी कहानियों की संरचना में तीनों स्वर साथ-साथ चलते हैं—मूल्यों के अंकन की जिद, उनके विघटन का यथार्थ और इन्हें सतत देखती अंतरात्मा की आंख, जिसे कथाकार की केंद्रीय दृष्टि भी कहा जा सकता है।
    उनकी कहानियां वर्तमान और अतीत, कल्पना और यथार्थ, सही और गलत तथा मन के अंधेरों और उजालों के बीच झूलती हुई सी चलती हैं। वे अपनी आत्मीयता, संवेदनशीलता, और स्मृति संपन्नता के प्राचुर्य के साथ अपनी सहज उपस्थिति दर्ज कराती हैं।
    रचनाओं की मोहक भाषा, शिल्प की महीन बुनावट तथा प्रस्तुतीकरण में निजता का स्पर्श उन्हें अलग पहचान देते हैं।
    इन कहानियों का फलक विस्तृत है। एक ओर वे एक अराजक समय की चपेट में आए व्यक्ति के अंतद्र्वंद्व और मनोविज्ञान को वैयक्तिक स्पर्श के साथ उकेरते हैं, तो वहीं दूसरी ओर बाह्य विडंबनाओं को भी प्रतीकात्मक तथा सृजनात्मक ऊर्जा के साथ प्रस्तुत करते हैं। मानवीय मूल्यों को खंगालते हुए वे कभी वर्तमान के परिदृश्य को पकड़ते हैं, तो कभी सदियों के आर-पार इतिहास के पन्नों तक पहुंच जाते हैं।
    ‘पेड़ खाली नहीं है’ नरेन्द्र नागदेव की विगत आठ-दस वर्षों में प्रकाशित-चर्चित कहानियों का संग्रह है, जिसमें वे तमाम विशेषताएं विद्यमान हैं, जो उन्हें समकालीन साहित्य में एक विशिष्ट स्थान प्रदान करती हैं।
  • Kahani Samagra : Nasera Sharma(3Vols.)
    Nasera Sharma
    2100 1680

    Item Code: #KGP-375

    Availability: In stock

    प्रख्यात कथा-लेखिका नासिरा शर्मा की कहानियाँ  समकालीन स्त्री रचनाकारों की कहानियों से कई मायनों में अलग और सर्वथा नई परिभाषा गढ़ती हुई नजर आती हैं । उनके यहाँ इनसानी रिश्ते केवल खून से ही नहीं, संवेदनाओं के उन तंतुओं से निर्मित होते हैं, जो इनसानियत के वजूद को बचाए रखने के लिए जारी हैं ।
    पहले खंड की कहानियाँ परिवार, देश-समाज की सीमा को लाँघते हुए ईरान तक की यात्रा कराती हैं । ईरान के अपने प्रवास काल के दौरान लेखिका ने जिस शिद्दत से वहाँ की जीवनशैली, संस्कृति को आत्मसात् किया, उसको बहुत प्रभावी ढंग से उन्होंने इन कहानियों में अभिव्यक्त भी किया है ।  इस बहाने भारत और ईरान के प्राचीन रिश्तों की भी लेखिका शिनाख्त करती हैँ। इस खंड की कई कहानियों में लेखिका अपने अतीत के पन्ने उलटते हुए उन क्षणों को वर्तमान संदर्भों से पुन: जीवंत करने का प्रयत्न करती है, जिन पर समय की बेशुमार परतें चढ़ चुकी हैं । दरअसल इन कहानियों के जरिए लेखिका अपने अतीत में घटित उन सामाजिक-राजनीतिक घटनाओँ की पड़ताल बदले हुए समय में करती हैं, जिनका संबंध वर्तमान से विच्छेद नहीं हुआ है ।
    दूसरे खंड की कहानियाँ इनसान के भीतर मौजूद शैतान को बाहर खींच निकालती हैं। सत्तालोलुपता की हवस में इनसान के हैवान में रूपांतरण की ये कहानियाँ अनेक सवालों को उठाती हैं। धर्म-स्थापना के नाम पर किसी भी प्रकार के अधार्मिक और अमानवीय क्रियाकलापों को जायज़ ठहराने वाली बीमार मानसिकता को भी ये कहानियाँ अनावृत करती हैं। इन कहानियों में समाज के निचले तबके के उन लोगों के दारुण यथार्थ की तस्वीर भी मौजूद है, जो अपना सब कुछ न्योछावर करके किसी भी देश-समाज की सांस्कृतिक नींव तैयार करते हैं। बावजूद इसके शक्तिसंपन्न और सामंती मानसिकता के लोग उनका शोषण करना अपना अधिकार समझते हैं।
    तीसरे खंड में लेखिका द्वारा पिछले तीन दशक में लिखी गई कहानियाँ सम्मिलित हैं । इनमें कुछ लंबी और कुछ लघु कथाएँ भी हैं । कथानक और घटनाक्रम के आधार पर इस खंड की कहानियाँ पूर्ववर्ती दो खंडों की कहानियों से कूछ अलग नजर आती हैं । इसका कारण यह है कि इस खंड की कहानियों में लेखिका ने अपनी दृष्टि के  विस्तार को थोड़ा संघनित किया है । यही वजह है कि इनमें देश-समाज-राजनीति-इतिहास से जुड़ी कहानियों के स्थान पर इनसानी नस्ल की प्रवृतियों पर आधारित कहानियाँ पढ़ने को मिलती हैं । बहुत कम लेखक ऐसे होते हैं, जिनकी आँखें बारीक़ से बारीक रेशे को पकड़ती हैं, जिनके कान महीन से महीन आवाज को सुनते हैं और नाक हलकी से हलकी गंध ग्रहण करती है । ऐसे लेखकों को हम सहस्राक्षी लेखक भी कह सकते हैं । नासिरा शर्मा भी ऐसी ही लेखिका ।
    इनसानी मनोविज्ञान का गहन विश्लेषण करती ये कहानियाँ लेखिका के भाषा-प्रवाह और ट्रीटमेंट के प्रति सजगता को भी प्रमाणित करती हैं ।
  • Sharat Ka Katha Sahitya
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    595 476

    Item Code: #KGP-889

    Availability: In stock

    बाँग्ला के अमर कथाशिल्पी शरत् चन्द्र चट्टोपाध्याय प्रायः सभी भारतीय भाषाओं में पढ़े जाने वाले शीर्षस्थ उपन्यासकार हैं। उनके कथा-साहित्य की प्रस्तुति जिस रूप-स्वरूप में भी हुई, लोकप्रियता के तत्त्व ने उसके पाठकीय आस्वाद में वृद्धि ही की। सम्भवतः वह अकेले ऐसे भारतीय कथाकार भी हैं, जिनकी अधिकांश कालजयी कृतियों पर फिल्में बनीं तथा अनेक धारावाहिक सीरियल भी। ‘देवदास’, ‘चरित्रहीन’ और ‘श्रीकान्त’ के साथ तो यह बारम्बार घटित हुआ है। 
    अपने विपुल लेखन के माध्यम से शरत् बाबू ने मनुष्य को उसकी मर्यादा सौंपी और समाज की उन तथाकथित ‘परम्पराओं’ को ध्वस्त किया, जिनके अन्तर्गत नारी की आँखें अनिच्छित आँसुओं से हमेशा छलछलाई रहती हैं। समाज द्वारा अनसुनी रह गई वंचितों की बिलख-चीख और आर्तनाद को उन्होंने परखा तथा गहरे पैठकर यह जाना कि जाति, वंश और धर्म आदि के नाम पर एक बड़े वर्ग को मनुष्य की श्रेणी से ही अपदस्थ किया जा रहा है। इस षड्यन्त्र के अन्तर्गत पनप रही तथाकथित सामाजिक ‘आम सहमति’ पर उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से रचनात्मक हस्तक्षेप किया, जिसके चलते वह लाखों-करोड़ों पाठकों के चहेते शब्दकार बने। नारी और अन्य शोषित समाजों के धूसर जीवन का उन्होंने चित्रण ही नहीं किया, बल्कि उनके आम जीवन में आच्छादित इन्द्रधनुषी रंगों की छटा भी बिखेरी। प्रेम को आध्यात्मिकता तक ले जाने में शरत् का विरल योगदान है। शरत्-साहित्य आम आदमी के जीवन को जीवंत करने में सहायक जड़ी-बूटी सिद्ध हुआ है। 
    हिन्दी के एक विनम्र प्रकाशक होने के नाते हमारा यह उत्तरदायित्व बनता ही था कि शरत्-साहित्य को उसके मूलतम ‘पाठ’ के अन्तर्गत अलंकृत करके पाठकों को सौंप सकें, अतः अब यह प्रस्तुति आपके हाथों में है। 
  • Pracheen Prem Aur Neeti Ki Kahaniyan
    Rangey Raghav
    400 320

    Item Code: #KGP-01

    Availability: In stock

    प्राचीन प्रेम और नीति की कहानियाँ
    रामायण, महाभारत तथा अन्य पौराणिक ग्रंथों के लोकप्रिय आख्यानों पर आधारित प्रेम एवं नीति विषयक कहानियों का बृहत् संग्रह ।
  • Shatabdi Ki Kaaljayi Kahaniyan (Vol.-3)
    Kamleshwar
    625 500

    Item Code: #KGP-1578

    Availability: In stock


  • Bayaan
    Kamleshwar
    200

    Item Code: #KGP-684

    Availability: In stock

    बयान

    इस संग्रह में ‘बयान के साथ कमलेश्वर की वे सभी कहानियाँ संगृहीत हैंजिन्हें कहानीकार की विशिष्ट उपलब्धियों के रूप में सभी ने स्वीकारा और सराहा है।

    नई कहानी आंदोलनके प्रमुख प्रवर्तक और प्रखर प्रवक्ता एवं ‘समांतर लेखन’ आंदोलन के प्रथम पुरुष के रूप में कमलेश्वर ने आम आदमी के साथ अपने लेखन को जोड़ा और अपनी रचनाओं में उसे सशक्त अभिव्यक्ति दी।

    आज़ादी मुबारक’, ‘दस प्रतिनिधि कहानियाँ’, ‘राजा निरबंसिया’, ‘मांस का दरिया’, ‘कस्बे का आदमी’, ‘खोई हुई दिशाएँ’, ‘जार्ज पंचम की नाक’, ‘मेरी प्रिय कहानियाँ’, ‘इतने अच्छे दिन', ‘रावल की रेल’, ‘कोहरा’, ‘समग्र कहानियाँके बाद ‘बयानकमलेश्वर द्वारा आम आदमी की अभिव्यक्ति की सशक्त सनद है।    

  • Qabra Tatha Anya Kahaniyan
    Raj Kumar Gautam
    150

    Item Code: #KGP-1845

    Availability: In stock


  • Million Dollar Note Tatha Anya Kahaniyan
    Malti Joshi
    125

    Item Code: #KGP-283

    Availability: In stock

    मिलियन डॉलर नोट तथा अन्य कहानियां
    अम्मा ने जैसे ही पाउच आगे बढाया, मीनू ने एक झटके से हाथ हटा लिया, जैसे उसे बिजली का करंट लग गया हो, "नहीं अम्मा । अब मैं यह हार नहीं लूंगी ।"
    "क्यों? मेरी चीज है । मैं दे रही हूँ।"
    "हाँ, पर इस हार को लेकर तुम पता नहीं क्या-क्या सोच गई थीं। तुमने तो भाभी को भी कठघरे में खडा कर दिया था । कल को भाभी भी ऐसा कर सकती है । भाभी तो यही सोचेगी कि यह चीज तीन साल पाले ही तुमने मुझे दे दी होगी और किसी को बताया तक नहीं । वह तो सोचेंगी कि इस तरह तुमने और भी बहुत कुछ दिया होगा, जिसका उसे पता नहीं है । मैं तो शर्म के मारे भैया के सामने खडी भी न हो सकूंगी।  "
    "इसमें शर्म की क्या बात हैं ! क्या मुझे इतना भी हक नहीं है ?”
    "अम्मा, तुम्हारे हक से भी महत्त्वपूर्ण है भैया-भाभी का विश्वास, जो मैं तोड़ना नहीं चाहती । रिश्ते नाजुक होते हैं अम्मा, दर्पण की तरह । एक बार दरक गए तो किसी मतलब के नहीं रहते । और मैं इन रिश्तों को सहेजना चाहती हूँ। मैं चाहती हूं कि तुम्हारे जाने के बाद भी इस घर में मेरा दाना-पानी बना रहे । मैं जब-जब भारत आऊं, इस घर के दरवाजे मुझे खुले मिले ताकि मैं तुम्हारी यादों को फिर से जी सकूं । कल को मेरे बच्चों की शादियां हों तो मैं हक के साथ भात मांगने आ सकूं । ये मेरे पीहर की देहरी है अम्मा । मेरे लिए किसी भी हार से ज्यादा कीमती है । प्लीज, इसे मुझसे मत छीनो ।" और यह बात कहते- कहते मीनू का गला भर आया । आंखें छलछला आईं ।
    अम्मा ने आगे बढ़कर उसे गले से लगा लिया और उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए बोली, "अरे वाह, मेरी लाडो तो मुझसे भी ज्यादा समझदार हो गई है ।" और यह कहते हुए उनकी भी आवाज भीग गई थी। 
    -(इसी संग्रह की कहानी 'चंद्रहार' से)
  • Lakeer Tatha Anya Kahaniyan
    Urmila Shirish
    250 213

    Item Code: #KGP-242

    Availability: In stock

    लकीर तथा अन्य कहानियाँ
    उर्मिला शिरीष की कथाभूमि उनका परिवेश, समाज और वह पर्यावरण है, जिनमें वे एक साथ तीन तत्त्वों का समावेश करती हैं। एक है पात्र या मनुष्य, जो उनकी संवेदना का अस्तित्व है; दूसरा है उनकी विषयवस्तु, जो एक कथा में कथा की उपस्थिति की तरह है और तीसरा है उनका शिल्प, जो उनकी भाषा-चेतना और शब्द-सत्ता से निर्मित होकर जीवन-संबोधी बनता है।
    उर्मिला की ये दस कहानियाँ मृत्यु-पर्व से शुरू होती हैं तो पाठक को एक प्रकार के सदमे में ले जाती हैं, लेकिन मृत्यु का पर्व या जश्न संवेदना के कितने धरातल एक साथ हिला देता है, यह कहानी की आंतरिक काया से प्रकट होता है। एक बहुत ही ध्यातव्य तथ्य इन कहानियों के बारे में यह है कि कथाकार के आग्रह, पूर्वग्रह या दुराग्रह कहीं नहीं हैं--न यथार्थ के स्तर पर, न शिल्प और भाषा के स्तर पर। जीवन के सारे सामान्य, सामान्य की तरह ही हर कहानी में मौजूद हैं, लेकिन जब उनके मर्म की मृदुलता में उतरते हैं तो कहानी हमें अंदर तक भिगो देती है।
    ‘अग्निरेखा’ से ‘लकीर’ तक की ये कहानियाँ घटनाओं की न होकर घटित होते जीवन की कहानियाँ हैं। यह भी दावा नहीं है कि कथाकार कथा की कोई कारीगरी कर रही हो। कहानियाँ कहीं विडंबना में बोलती हैं, कहीं व्यथा में, कहीं व्यंग्य में तो कहीं विषमतागत व्यग्रता में। इसलिए कहा जा सकता है कि इन कहानियों के अंदर एक ऐसी अनुभूति है, जो एक तरफ पाठक को कहानी से जोड़ती है, तो दूसरी ओर अपने ऐसे जीवन-क्षणों, स्पंदनों और संवेदनों से, जो पराये भी नहीं लगते और निजी बनाने की कोशिश में निजत्व से भी पृथक् हो जाते हैं।
    कहानियों में रचा गया जो संसार है, वह एक कथाकार की व्याकुलता से भरा-भरा है, इसलिए ये कहानियाँ पाठक के मन को अपनी ओर खींचने और अपने अंदर टिकाए रहने की कोशिशभरी कोशिश की तरह हैं।

  • Naye Sire Se
    Govind Mishra
    195

    Item Code: #KGP-723

    Availability: In stock

    नये सिरे से
    गोविन्द मिश्र की पहली कहानी ‘नये पुराने मां-बाप' ‘माध्यम' (इलाहाबाद : संपादक बालकृष्ण राव), 1965 में प्रकाशित हुई थी। लिख वे इसके पहले से रहे थे। इस तरह कहानियां लिखते हुए गोविन्द मिश्र को लगभग पचास वर्ष होने को आ रहे हैं। प्रस्तुत संग्रह में उनकी 2010 तक की नई कहानियां हैं, जो पिछले किसी संग्रह में नहीं आई हैं। यहां वे जैसे कहानी को नये सिरे से पकड़ने चले हैं। पहले जो लेखक कभी कोई जीवन-स्थिति, व्यक्ति की भीतरी जटिलता, समाज के नासूर, जीवन के खूबसूरत रंग जैसी चीजों से कहानी पकड़ता दिखा था, वह यहां बिलकुल फर्क ढंग से चला है। पिछले इतने सारे वर्षों में अर्जित परिपक्वता में, जैसे-कला, शिल्प, भाषायी सौष्ठव जैसी चीजें ही घुलकर खो गई हैं। कहा भी जाता है कि सर्वोच्च कला वह है जहां कला ही तिरोहित हो जाती है। रह जाती है तो सिर्फ स्वाभाविकता, जिसके रास्ते जीवन कला में सरक जाता है; कलाकृति जीवन की आकृति नहीं, साक्षात् जीवन दीखती है।
    करीब-करीब इन सभी कहानियों में दर्द की एक खिड़की है, जिसके पार जीवन है, अपनी गति से पल-पल सरकता हुआ।...उस खिड़की से उदासीन जिसके रास्ते जीवन दिखाई देता है। जीवन जो है, वह बदलता नहीं...लेकिन दर्द से उठतीं कुलबुलाहटें हैं उसे बदलने की। और तेज आवाज है स्त्रियों की, जिनमें कछ नया कर गुज़रने, कोई रास्ता ढूंढ़ने और दिखाने की बेचैनी है चाहे वह ‘तुम हो' कि सुषमा हो या ‘छाया', ‘मोहलत’ और ‘प्रेमसंतान' की ‘वह'। गोविन्द मिश्र जो अकसर अपने पात्रों को ‘यह' या ‘वह' कहकर अनाम छोड़ देते हैं तो शायद इस आशय से कि भले ही दर्द की वह दास्तान खास हो, पर वह है आम ही...और यह तार फिर उसी स्वाभाविकता से जुड़ता है, जहां कलाहीनता ही सर्वोच्च कला है।
  • Piya Peer Na Jaani
    Malti Joshi
    200

    Item Code: #KGP-1982

    Availability: In stock

    पिया पीर न जानी
    इक्कीसवीं सदी के मुहाने पर खडे होकर, स्वाधीनना की पचासवीं वर्षगाँठ मनाते हुए भी यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता कि भारतीय नारी पूर्णरूपेण स्वतंत्र है ।
    परम्यरा की, रूढियों की, सनातन संस्कारों को अर्गलाएँ आज भी उसके पाँवों को घेरे हुए है । आर्थिक स्वातंत्र्य का झाँसा देकर उसे अर्थार्जन में भी झोंक दिया गया है । अब वह घर और बाहर दोनों तरफ पिसती है--दो-दो हुक्मरानों के आदेशों पर नाचती है । इस मायने में वह सोलहवीं सदी की नारी से भी जादा शोषित और असहाय हो गई है ।
    पर हाँ, इधर कुछ वर्षो में छटपटाने लायक ऊर्जा उसने अपने में भर ली है । इसीलिए कभी-कभी इन बंधनों को तोड़ने में भी वह सफल हो जाती है ।


  • Goma Hansti Hai
    Maitreyi Pushpa
    250 225

    Item Code: #KGP-1991

    Availability: In stock

    गोमा हंसती है
    शहरी मध्यवर्ग के सीमित कथा-संसार में मैत्रीय पुष्पा का कहानियाँ उन लोगों को लेकर आई हैं, जिन्हें आज समाजशास्त्री 'हाशिए के लोग' कहते है । वे अपनी 'कहन' और 'कथन' में ही अलग नहीं हैं, भाषा और मुहावरे में भी ‘मिट्टी की गंध' समेटे हैं ।
    'गोमा हंसती है' की कहानियों के केंद्र में है नारी, और वह अपन सुख-दु:खों, यंत्रणाओं और यातनाओं में तपकर अपनी स्वतंत्र पहचान माँग रही है । उसका अपने प्रति ईमानदार होना ही 'बोल्ड' होना है, हालाँकि यह बिलकुल नहीँ जानती कि वह क्या है, जिसे 'बोल्ड होने' का नाम दिया जाता है । नारी-चेतना की यह पहचान या उसके सिर उठाकर खड़े होने में ही समाज की पुरुषवादी मर्यादाएं या महादेवी वर्मा के शब्दों में 'श्रृंखला की कडियाँ' चटकने-टूटने लगती है । वे औरत को लेकर बनाई गई शील और नैतिकता पर पुनर्विचार की मजबूरी पैदा करती है । 'गोमा हंसती है' की कहानियों की नारी अनैतिक नहीं, नई नैतिकता को रेखांकित करती है ।
    इन साधारण और छोटी-छोटी कथाओं को 'साइलैंट रिवोल्ट' (निश्शब्द विद्रोह) की कहानियाँ भी कहा जा सकता है क्योंकि नारीवादी घोषणाएँ इनसे कहीं नहीं है । ये वे अनुभव-खंड है जो स्वयं 'विचार' नहीं हैं, मगर उन्हीं के आधार पर 'विचार' का स्वरूप बनता है ।
    कलात्मकता की शर्तों के साथ बेहद पठनीय ये कहानियाँ निश्चय ही पाठको को फिर-फिर अपने साथ बॉंधेंगी, क्योंकि  इनमें हमारी जानी-पहचानी दुनिया का वह 'अलग' और 'अविस्मरणीय' भी है जो हमारी दृष्टि को माँजता है।
    इन कहानियों की भावनात्मक नाटकीयता निस्संदेह हमें चकित भी करेगी और मुग्ध भी। ये सरल बनावट की जटिल कहानियां है ।

    'गोमा हँसती है' सिर्फ एक कहानी नही, कथा-जगत्की एक 'घटना' भी है । -राजेन्द्र यादव

  • Sansaar Ki Pracheen Kahaniyan
    Rangey Raghav
    300 255

    Item Code: #KGP-637

    Availability: In stock

    संसार की प्राचीन कहानियाँ
    विश्व के विभिन्न देशों के प्राचीनतम रीति-रिवाजों तथा  आचार-व्यवहार आदि का चित्र प्रस्तुत करने वाली कहानियों का संग्रह ।
  • Pyar Botsavana Kee Baarish Jaisa Hey (African Stories)
    Urmila Jain
    350 298

    Item Code: #KGP-9028

    Availability: In stock

    ‘प्यार बोत्सवाना की बारिश जैसा है’ अत्यंत संवेदनशील अफ्रीकी कहानियों का हिंदी अनुवाद है। अनुवाद और संपादन उर्मिला जैन ने किया है। वे देशी और विदेशी साहित्य की मर्मज्ञ हैं। पाठक के रूप में जिन रचनाओं ने उनके हृदय को छुआ उन्हें व्यापक पाठक वर्ग के लिए वे इस संकलन में प्रस्तुत कर रही हैं। अनूदित रचनाओं की लोकप्रियता के बावजूद हिंदी में अफ्रीकी कहानियां बहुत कम उपलब्ध हैं। विश्व का यह भाग अपनी संघर्षपूर्ण अभिव्यक्ति के लिए रेखांकित किया जाता है। केन्या, गांबिया, गिनी, नाइज़ीरिया, सेनेगल, बोत्सवाना आदि की रचनाशीलता से उर्मिला जैन ने बारह कहानियां चुनी हैं।
    ये कहानियां बताती हैं कि भाषा, देश, पहनावा, आचार, परंपरा आदि की भिन्नताओं के बाद भी मूलभूत समस्याएं और संवेदनाएं तो एक जैसी हैं। अभाव, उपेक्षा, गुलामी, अपमान, निराशा से हर जगह मनुष्य जूझ रहा है। व्यक्ति के भीतर छिपे पाखंड भी हर स्थान पर लगभग समान हैं। संकलन की शीर्षक कहानी के वाक्य हैं, ‘मैंने अपनी पोशाक सावधानी से चुनी थी। अपने भय को सम्मानित रूप में ढका था।’ अनुवाद करते समय उर्मिला जैन ने मूल भाषा के प्रवाह और आशय को भली-भांति संप्रेषित किया है। ‘काली लड़की’ कहानी की डिऔआना का संताप इन पंक्तियों में प्रकट हुआ है, ‘उस रात उसने अपना सूटकेस खोला। उसके अंदर की चीजों को देखा और रोई। किसी ने परवाह नहीं की। फिर भी वह उसी प्रवाह में बहती रही और दूसरों से वैसे ही दूर रही जैसे उसके गांव कासामांस में समुद्र किनारे घोंघे पड़े रहते हैं।’
    अपनी प्रखर कथाभूमि और मार्मिक अभिव्यक्ति के कारण ये कहानियां पाठकों को खूब अच्छी लगेंगी। ऐसा लगेगा जैसे वे अपने ही समाज या देश का वृत्तांत पढ़ रहे हैं। ये रचनाएं विचार और संवेदना के वैश्विक सूत्र प्रदान करती हैं।
  • Shyamlal Ka Akelapan
    Sanjay Kundan
    300 249

    Item Code: #KGP-686

    Availability: In stock

    संजय कुंदन ने अपनी कथारचनाओं से पाठकों और आलोचकों का ध्यान समान रूप से आकृष्ट किया है। ‘श्यामलाल का अकेलापन’ उनकी कहानियों का नवीनतम संग्रह है। संग्रह में मौजूद कहानियों से कुछ बातें उभरकर सामने आती हैं। संजय सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया को बिना किसी ‘सीमित पक्षधरता’ के विश्लेषित करते हैं। इस विश्लेषण में वे उस मनुष्य को केंद्र में रखते हैं जिससे समाज बनता है और कहानी भी।
    यह कहना मुनासिब होगा कि संजय  कुंदन एक अद्भुत किस्सागो हैं। ‘कहन’ की परंपरागत विशेषताओं से वे लाभ उठाते हैं और उसे नवीनतम उत्सुकताओं से जोड़ते हैं। वे कस्बों, छोटे शहरों और महानगरों से विषयवस्तु जुटाते हैं। फिर भी, एक अदद ‘देसी मन’ हमेशा सक्रिय रहता है।
    इस संग्रह की 11 कहानियों में लेखक ने उन प्रत्यक्ष- अप्रत्यक्ष बंदिशों, साजिशों, ख्वाहिशों को उद्घाटित किया है जिनसे वर्तमान समाज संचालित है। यह कहना अधिक उचित होता कि समाज जिनकी गिरफ्त में है। साधारण आदमी जहां असहज हो जाता है, अपना मूल स्वभाव बिसार बैठता है और जड़ों से कटने लगता है। ‘श्यामलाल का अकेलापन’ कहानी का प्रारंभ इस प्रकार होता है, ‘क्या इनसान और होर्डिंग में कोई समानता हो सकती है? भले ही यह एक बेतुका सवाल लगे पर श्यामलाल का मानना था कि आज हर आदमी होर्डिंग में बदलता जा रहा है, एक ऐसी विशाल होर्डिंग जिस पर किसी प्रोडक्ट का विज्ञापन चमक रहा हो। आदमी ज्यों ही मुंह खोलता है कोई उत्पाद उसके मुंह से चीखने-चिल्लाने लगता है।’ यह दरअसल मायावी बाजार की विचित्र प्रतिक्रियाओं का असर है, जिसे लेखक स्पष्ट करता है।
    इन कहानियों में एक नैतिक संशय है तो परिवर्तन की सकारात्मक पहल भी है। पीढ़ियों के बीच द्वंद्व है तो विश्वास के नए इलाके भी हैं। इन्हें पढ़कर पाठक अपने परिवेश में एक नई तैयारी के साथ प्रवेश करता है। संजय  कुंदन अतिरेकी प्रयोगों में भरोसा नहीं करते। वे विचार, संवेदना, भाषा और शैली में नई चमक पैदा करने वाले कहानीकार हैं।
  • Uski Bhee Suno
    Bharti Gore
    320 288

    Item Code: #KGP-471

    Availability: In stock

    ‘उसकी भी सुनो’ पुस्तक की कहानियां सामाजिक रूढ़ियों, पुरुष-प्रधान व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाती हैं। इसमें समाज के सभी तबकों की स्त्रिायों की समस्याओं का गंभीर विवेचन है। सफेदपोश समाज में जीती स्त्री, बाहर से अमीर और सुखासीन लगने वाली स्त्री की अस्तित्वहीन स्थिति के साथ-साथ दलित और आदिवासी स्त्री के सदैव उपेक्षित अस्तित्व की चर्चा है। इन कहानियों की नायिकाओं की विशेषता यह है कि वे कभी हार नहीं मानतीं।
    प्रस्तुत पुस्तक की हर कहानी अपने आप में समाज में महिलाओं के प्रति घटने वाली हर घटना को या कहिए हर आयाम को बड़े ही सटीक अंदाज में पेश करती है। साहित्य ने हमेशा से हर आंदोलन को प्रभावित किया है और जन आंदोलनों ने भी हमेशा साहित्य को प्रभावित किया है। चाहे वह आजादी का आंदोलन हो या आजादी के बाद के आंदोलन, साहित्य ने कहानी, कविताओं, गीतों के जरिए हमेशा आम जनता के आंदोलनों को एक बेहतर आवाज दी है। साहित्य के बिना समाज अधूरा है। और अगर साहित्य महिलाओं द्वारा रचा जाए तो उसकी बात ही निराली है।
    धार्मिक उन्माद का शिकार सबसे ज्यादा महिलाएं ही होती हैं। दलित, आदिवासी एवं अल्पसंख्यक महिलाओं के ऊपर तो इनकी दोहरी मार पड़ती है। नारी-मुक्ति की इस मुहिम को समाज के अन्य हिस्सों को साथ लेकर एक नए बदलाव की तरफ बढ़ना होगा। समाज के बदलाव में साहित्य इसी कड़ी में महिलाओं के लिए एक सशक्त रास्ता है।
  • Dekhana Ek Din
    Dinesh Pathak
    240 216

    Item Code: #KGP-491

    Availability: In stock

    साहित्य में प्रचलित नारों और विमर्शों के शोर-शराबे से अलग अपने एकांत में रचनारत दिनेश पाठक की अधिकांश कहानियां मानव संबंधों व विभिन्न कारणों से उनमें  बनते-बदलते सरोकारों की पड़ताल करती हैं।  
    ‘देखना एक दिन’ संग्रह की कहानियों का मूल स्वर भी इसी भावभूमि के इर्द-गिर्द हैं। इस संग्रह की अधिकतर कहानियां एक विशेष परिवेश से जुड़ी दिखने के बावजूद संपूर्ण भारतीय समाज के अंतर्संबंधों को प्रस्तुत करती हैं। बहुआयामी धरातल की इन कहानियों में गांव व कस्बे का जीवन तो है ही, साथ ही उनका संघर्ष, उनका जुझारूपन, उनके सुख-दुःख, उनकी आशा-निराशा, उनके बनते- ध्वस्त होते सपने तथा मूल्य संक्रमण के कारण उत्पन्न मानसिक विचलन और इन सबसे इतर जीवन के प्रति उनकी गहन आस्था व गहरी जिजीविषा है। यही कारण है कि वे पराजित नहीं होते, पराजय के बीच से फिर-फिर उठ खड़े होते हैं। यहां ठेठ ग्रामीण जीवन से निकले पात्र भी हैं जिनके लिए जीवन सदा सोद्देश्य है, आधुनिक जीवनशैली व चकाचौंध के प्रति आसक्त चरित्र भी हैं, राजनीतिज्ञों के दुश्चक्र में फंसकर सामाजिक सरोकारों के योद्धा रूप में विकसित होते-होते अपनी संभावनाओं से भटक जाने वाले व्यक्ति भी हैं तो यहां अपनी अस्मिता को तलाशती और उसके लिए जूझती ऐसी स्त्रियां भी हैं जो अंततः विद्रोह की हद तक जा सकती हैं। 
    प्रस्तुत पुस्तक में कथाकार ने भाषा को किसी उलझाव में डाले बिना अत्यंत सहज-सरल भाषा-शैली में कथ्य को, परिवेश को, चरित्रों को और परिवेशगत बेचैनी व छटपटाहट को पूरी विश्वसनीयता, प्रामाणिकता तथा गहरी संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया है। यही कारण है कि ये कहानियां आदि से अंत तक न केवल अपने पाठकों को बांधे चलती हैं बल्कि उन्हें झकझोरने से भी नहीं चूकतीं।

  • Manjul Bhagat : Samagra Katha Sahitya-2
    Kamal Kishore Goyenka
    950 760

    Item Code: #KGP-58

    Availability: In stock


  • Prati Shurti
    Shree Naresh Mehta
    350 291

    Item Code: #KGP-1955

    Availability: In stock

    प्रति श्रुति : श्रीनरेश मेहता की समय कहानियाँ 
    श्रीनरेश मेहता का कथा-गद्य, जैनेंद्र और अज्ञेय की परंपरा मेँ रखकर देखा जाए तो समाज और अध्यात्म, राष्ट्र और राजनीति, जीवन और दर्शन से संपृक्त वाद्य है । वे न तो जैनेंद्र का प्रतिबिंब बने और न ही अज्ञेय की छाया । उन्होंने सर्वथा स्वायत्त और स्वाधीन कथा साहित्य लिखा जिसमें काव्यात्मक रस भी है और जिसका आस्वाद हमारे सामाजिक और संस्कृतिक भाव-बौधों को प्रगल्भ भी बनाता है। श्री मेहता जी की भाव-दृष्टि, अंतर्दृष्टि और जीवन-दृष्टि उनके कथा-गद्य में जिस प्रकार प्रकट हुई है उससे लगता है कि श्रीनरेश जी ने नई कथा-भाषा रचकर हिंदी को एक सांस्कृतिक शक्ति का लोक संस्करण सौंपा है। भाषा अपनी सर्जनात्मक शक्ति में जब सार्थक होती है तो वह स्वयं ही समाज और संस्कृति को अपने में समा लेती है । श्रीनरेश जी ने अपने कथा-शिल्प से भाषा की संभावनाओं को विराट बनाया, गद्य की एक नई शैली विकसित की और यह सिद्ध किया कि एक जीवंत भाषा और सजीव भाषा किस पवार अपनी सांस्कृतिकता और आंचलिक नास्टिलजिया को एक साथ एकाकार कर सकती है । श्रीनरेश जी का समूचा गद्य-साहित्य और विशेष रूप से कथा-साहित्य अपने ऐतिहासिक और आधुनिक दोनों ही परिप्रेक्ष्यों में गहन शोध और विमर्श की माँग करता है । एक कवि और सर्जक को मात्र 'वैष्णव' कहकर ब्रांड नाम से सज्जित कर देना पर्याप्त नहीं है बल्कि उनकी वैष्णवता के पीडालोक को किसी गांधी की तरह बाहर निकाल नरसिंह मेहता के गीत 'वैष्णव जन' की तरह लोकव्यापी बनाना होगा । श्रीनरेश मेहता जैसा सर्जक अतीत की इतिहास-वस्तु बनकर, वर्तमान की संज्ञा से पृथक नहीं किया जा सकता और इसीलिए उनकी सर्जन-यात्रा की सार्थकता तभी सिद्ध होगी जब हिंदी मानस उनमें निहित समस्त संभावनाओं को समय स्मृति और अवकाश तीनो में रखकर एक ऐसे श्रीनरेश मेहता का अन्वेषण करे जो हिंदी साहित्य की चेतना का नरेश हो, सृजन की उस्कृष्टता का प्रतिमान हो और अपनी सांस्कृतिक सामाजिकता का अद्वितीय उदाहरण हो ।
  • Kahani Samgra : Govind Mishra (3rd Part)
    Govind Mishra
    750 600

    Item Code: #KGP-1583

    Availability: In stock


  • KUCH SAMAY BAAD
    Devendra Chaubey
    180 162

    Item Code: #KGP-1563

    Availability: In stock

    कुछ समय बाद
    पहले कहानी-संग्रह से ही देवेन्द्र चौबे इस रूप में आश्वस्त करते नजर आते है कि वह मूलतः मानवीय संवेदनाओं के कथाकार हैं । 'कुछ समय बाद’ की अधिकांश रचनाएं पाठक को विभ्रम से निकालकर यथार्थ से जोड़ने का काम करती हैं। 'उत्तर-कथा' के नेपाली के हों या 'छोटे-छोटे सपने' के करीमना के, कहानीकार पात्रों के जीवनानुभवों को समझते हुए उनके मन में उतर जाने की सामर्थ्य रखता है । कहीं वह मन की शांति की सच्ची खोज करता है तो कहीं व्यक्ति के सपनों के दरकने के कारणों की खोज करता नजर आता है ।
    शहर और गाँव के बीच प्रभावित होते जीवन को तो देवेन्द्र अपनी कहानियों में  लाते ही हैं, सामूहिक राजनीतिक चेतना का विवेकशील स्फुरण भी यहीं मौजूद है, जो स्थानीय हितों को अदेखा नहीं करता । चरित्रों, स्थितियों और जीवन के विविध ऐसे प्रसंगों से कहानी की जमीन अपनी ही भाषा से तलाशना देवेन्द्र को भाता है, जो व्यक्ति के अनुभव को समृद्ध करते हुए उसे और अधिक संवेदनशील बनाते हैं । उनकी रचनाओं की यह सहज विशेषता है कि वे समाज के कोनों-अंतरों में चल रहे छोटे-छोटे महायुद्धों की टोह लेती नजर आती हैं । जीवन की सहजता यहाँ उसकी विसंगतियों के साथ मौजूद है ।
    अव्यवस्थित और मनुष्य-विरोधी व्यवस्था पर कहानियों के जरिए कमेंट करना देवेन्द्र चौबे के कथाकार को अच्छा लगता है । अपनी पहली कहानी से ही जनतांत्रिक मूल्यों के प्रति आस्था लिए यह कथाकार जब 'सजा' जैसी बड़ी कहानी पर पहुंचता है तो यह संकेत भी दे जाता है कि यथार्थ को पकड़ने के लिए दूरी भी कभी-कभी सहायक साबित होती है । सोवियत संघ के विघटन के बहाने लिखी गई यह कहानी गौरतलब तो है ही, गंभीर बहस भी आमंत्रित करती है ।
  • Snehbandh Tatha Anya Kahaniyan
    Malti Joshi
    250 225

    Item Code: #KGP-1997

    Availability: In stock

    वरिष्ठ रचनाकार मालती जोशी असंख्य पाठकों की प्रिय कहानीकार हैं। आज जब अनेक तर्क देकर यह कहा जा रहा है कि साहित्य के पाठक सिमटते जा रहे हैं तब पाठकों को मालती जोशी की हृदयस्पर्शी कहानियों की प्रतीक्षा रहती है। ‘स्नेहबंध तथा अन्य कहानियां’ में उनकी ऐसी ही रचनाएं हैं। उनकी लोकप्रिय रचनाशीलता का रहस्य लेखन की सहजता में छिपा है। कथानक का चयन, भाषा, पात्रों का अंतरद्वंद्व और अभिव्यक्ति प्रणाली—सबमें एक सहजता अनुभव की जा सकती है। मालती जोशी छोटी-छोटी घटनाओं या अनुभूतियों से रचना का निर्माण करती हैं। उनका ध्यान व्यक्ति और समाज की मानसिकता पर रहता है। बाहरी हलचल से अधिक वे मन की सक्रियता अंकित करती हैं। उनकी कहानियों के पात्र भावुक, विचारशील, निर्णय संपन्न और व्यावहारिक होते हैं। आदर्श के मार्ग पर चलते हुए वे कोरी भावुकता में नहीं जीते। एक अजब पारिवारिकता उनकी रचनाओं में महकती रहती है। संवाद मालती जोशी की पहचान हैं। छोटे-छोटे वाक्य, संकेतों से भरे शब्द और संवेदना की अपार ध्वनियां—इन गुणों से भरे संवाद पाठक के मन में उतर जाते हैं। किस्सागोई और विवरणशीलता का बहुत अच्छा उपयोग इन कहानियों में मिलता है। परिस्थिति और संयोग के माध्यम से प्रसंगों को गति मिलती है।
    इस संग्रह की सारी कहानियां स्त्री-मन की गहराई व सच्चाई को पूरी विश्वसनीयता के साथ व्यक्त करती हैं। यहां प्रचलित विमर्श नहीं, जीवन की समझ से उत्पन्न विवेक है। निश्चित रूप से ‘स्नेहबंध तथा अन्य कहानियां’ की सभी कहानियां पाठकों की प्रशंसा प्राप्त करेंगी।
  • Kahani Samgra : Govind Mishra (1st Part)
    Govind Mishra
    750 600

    Item Code: #KGP-1581

    Availability: In stock


  • Naari Hirdaya Tatha Anya Kahaniyan
    Subhadra Kumari Chauhan
    300 255

    Item Code: #KGP-9001

    Availability: In stock

    नारी हृदय तथा अन्य कहानियाँ 
    'खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी' कविता की धार पंक्तियों से पूरा देश आजादी की लड़ाई के लिए उद्वेलित हो गया था। ऐसे कई रचनाकार हुए हैं जिनकी एक ही रचना इतनी ज्यादा लोकप्रिय हुई कि उसकी आगे की दूसरी रचनाएँ गौण हो गई, जिनमें सुभद्राकुमारी भी एक है ।
    इस एक कविता के अलावा बच्चों के लिए लिखी उनकी कविताएं भी हिंदी में बाल कविता का नया अध्याय लिखती है । उनकी कहानियाँ भी नारी स्वातंत्र्य का नया उदूघोष करती है । उनके जैसी उपेक्षित कवयित्री के समग्र मूल्यग्रेकन के लिए नया इतिहास लिखने की जरूरत है । सुभद्राकुमारी चौहान सिर्फ एक कवयित्री ही नहीं थीं, देश के स्वतंत्रता संग्राम में भी उनका अमूल्य योगदान रहा है । उत्तर भारत के राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक जीवन में सुभद्रा जी के व्यक्तित्व की गाजी छाप रही है ।
    समाज की अनीतियों से उत्पन्न जिस पीड़ा को वे व्यक्त करना चाहती थीं उसकी अभिव्यक्ति का उचित माध्यम गद्य ही हो सकता था, अत: सुभद्रा जी ने कहानियाँ लिखी । उनकी कहानियों में देश-पेस के  साथ-साथ समाज को, अपने व्यक्तित्व को प्रतिष्ठित करने के लिए संघर्षरत नारी की पीड़ा और विद्रोह का स्वर मिलता है ।
  • Shatabdi Ki Kaaljayi Kahaniyan (Vol.-4)
    Kamleshwar
    625 500

    Item Code: #KGP-1579

    Availability: In stock


  • Mujhse Kaisa Neh
    Alka Sinha
    200 180

    Item Code: #KGP-395

    Availability: In stock

    मुझसे कैसा नेह
    बहुचर्चित कहानीकार अलका सिन्हा ने अपने पहले ही कहानी-संग्रह 'सुरक्षित पंखों की उडान' की टेक्नोलिटररी कहानियों से अपनी अलग पहचान बनाई । इस संग्रह के लगातार प्रकाशित हो रहे संस्करणों और इस पर संपन्न शोध-कार्य आदि पाठकों की पुरजोर स्वीकृति के प्रमाण हैं ।
    अलका सिन्हा का दूसरा कहानी-संग्रह 'मुझसे कैसा नेह' भूमंडलीकरण और बाजारवाद के दौर में आधुनिक संदर्भों  और बदलते समीकरणों का खुलासा करता है, बहुत कुछ हासिल कर चुकने के बाद भी भीतर से रिक्त होते जा रहे व्यक्ति की पहचान कराता है । आज के जटिल यथार्थ से उपजे संघर्ष, तनाव और एकाकीपन के धरातल पर खडी ये कहानियां घर-परिवार के बीच से निकलती हुई वैश्विक परिदृश्य की साक्षी बन जाती हैं ।
    मानवीय मूल्यों की पक्षधर इन कहानियों के पात्र तयशुदा ढर्रे से हटकर नए विकल्पों की खोज करते हैं । बेहतरी के नाम पर ये अपने देशकाल या परिस्थितियों से पलायन नहीं करते, न ही अपने स्त्री-पात्रों को जबरन 'बोल्ड' बनाकर स्त्री-विमर्श का झंडा उठाते हैं । दैहिक विमर्श से आगे अपनी अस्मिता के प्रति चेतना संपन्न ये स्त्रियां आधुनिकता की ओट में अमर्यादित नहीं होती तथा उच्छ्रंखल  और उन्मुक्त हुए बिना भी स्त्री मुक्ति की अवधारणा को संपुष्ट करती हैं ।
    स्फीति से बचती दूश्य-प्रधान भाषा-शैली पाठक को एक नई दुनिया का हिस्सा बना देती है और वह सहज ही इन पात्रों से तादात्म्य स्थापित कर लेता है । भाव प्रवणता के साथ-साथ वैचारिक चिंतन से दीप्त ये कहानियाँ साधारण व्यक्ति की असाधारण भूमिका की संस्तुति करती हैं और अपने यथार्थ को कोसने के बदले अभिनव संकल्पनाओं की जमीन तोड़ती हैं ।
  • Katha Ki Afwah
    Chaitanya Trivedi
    280 224

    Item Code: #KKA

    Availability: In stock

    ‘उल्लास’ संग्रह की ‘खुलता बंद घर’ एवं ‘जूते और कालीन’ के जरिए चैतन्य त्रिवेदी के लघुकथा सृजन की नई ऊचाइयों पर बात कर सकते हैं। कविता, कहानी और व्यंग्य को फेंटकर चैतन्य अपनी लघु कथाओं को सबसे अलग खड़ा कर लेते हैं।  इन कथाओं में एक व्यक्ति, अपनी स्वतंत्र चेतना के साथ निरंतर निरुपाय परिस्थितियों का सामना करता जान पड़ता है। पाठक को एक अतिरिक्त आस्वाद के साथ आत्ममनोरंजन भी प्राप्त हो सके ऐसा प्रयास करती हैं ये लघुकथाएँ। सार्थक साहित्य का पैमाना भी यही है कि वह कागज पर संपन्न होने के बाद पाठक के मन में फिर से शुरू हो और कुछ नया रचे। कुछ ऐसा ही चैतन्य के इस नए लघुकथा संग्रह कथा की अफवाह में पाएंगे। 
  • Afrika Road Tatha Anya Kahaniyan
    Urmila Jain
    300 249

    Item Code: #KGP-610

    Availability: In stock

    अफ्रीका रोड तथा अन्य कहानियां 
    अफ्रीकी देशों से प्रवास के दौरान, फिर लंदन में अफ्रीकी लेखकों और उनकी कहानियों से रूबरू होती रही, पड़ती रही । वे इतनी क्यों कि दिल हुआ वे हिंदी पाठकों तक पहुंचें । रास्ता था अनुवाद । और अनुवाद में आसानी इसलिए हुई कि लगभग सभी कहानियां मूल अंग्रेजी में ही लिखी गई है ।
    -उर्मिता जैन
  • Nanhe Haath Khoj Mahan
    Hari Krishna Devsare
    190

    Item Code: #KGP-109

    Availability: In stock

    एक पुरानी कहावत है कि होनहार बिरवान के होत चीकने पात। विज्ञान के आविष्कारों में अनेक ऐसी कथाएं छिपी हुई हैं, जिनके बीज बचपन में ही पड़ गए थे। उन वैज्ञानिकों के बचपन में ही कुछ ऐसा हुआ था, जिसने आगे चलकर एक महान आविष्कार, अनुसंधान या खोज का रूप लिया। इस पुस्तक में कुछ ऐसी ही विशिष्ट कथाएं दी गई हैं, जो बाल-पाठकों को प्रेरणा देंगी कि उनका हर काम महत्वपूर्ण है। कौन जाने, उनका कौन-सा काम बड़े होने पर प्रेरणा देगा और उन्हें महानता की सीढ़ियों पर चढ़ाकर विशिष्ट बना देगा। ये कहानियां रोचक हें, ज्ञानवर्धक हैं और प्रेरक हैं। आशा है, सभी आयु के पाठक इनसे प्रेरणा लेंगे।
    —हरिकृष्ण देवसरे
  • Akbar-Beerbal Ki Praamaanik Kahaniyan
    Hari Krishna Devsare
    290 247

    Item Code: #KGP-194

    Availability: In stock

    अकबर-बीरबल की प्रामाणिक कहानियां 
    अकबर-बीरबल की इन कहानियों में केवल मनोरंजक, हाजिरजवाबी और चतुराई की घटनाएं नहीं हैं, बल्कि इनमें भारतीय इतिहास की दो महान् विभूतियों के व्यक्तित्व के विविध गुणों और विशेषताओं के भी दर्शन होते हैं । इन कहानियों में विद्वानों-गुणी  ज़नों का आदर है, कुशल प्रशासन है, न्याय की तराजू पर किए गए फैसले और सामान्य जनता के कल्याण हेतु कार्यों जैसे पहलू भी उजागर होते हैं ।
    यों तो अकबर-बीरबल के किस्सों में काफी मिलावट हुई है, फिर भी उससे बचकर कुछ ऐसी चुनिंदा कहानियां ही यहाँ प्रस्तुत हैं, जो इतिहास की इन दोनों महान् विभूतियों की गरिमामयी छवि प्रस्तुत कर  सकें । आशा है, पाठक इन्हें रुचिकर पाएंगे ।
  • Shatabdi Ki Kaaljayi Kahaniyan (Vol.-2)
    Kamleshwar
    625 500

    Item Code: #KGP-1577

    Availability: In stock


  • Betva Ki Lehrein
    Shanta Kumar
    250 225

    Item Code: #KGP-400

    Availability: In stock


  • Mushkil Kaam
    Asghar Wajahat
    160

    Item Code: #KGP-1829

    Availability: In stock

    मुश्किल काम
    लघुकथा के संबंध में फैली भ्रांतियों को तोड़ती असग़र वजाहत की लघुकथाएँ अपनी विशिष्ट शैलियों तथा व्यापक कथ्य प्रयोगों के कारण चर्चा में रही हैं। वे पिछले पैंतीस साल से लघुकथाएँ लिख रहे हैं। उनकी लघुकथाएँ इन अर्थों में अन्य लघुकथाओं से भिन्न हैं कि उनकी लघुकथाएँ  किसी विशेष शैली के सामने समर्पण नहीं करती है। पंचतंत्र की शैली से लेकर अत्याधुनिक अमूर्तन शैलियों की परिधि को अपने अंदर समेटे असग़र वजाहत की लघुकथाएँ पाठक का व्यापक अनुभव जगत् से साक्षात्कार कराती हैं। प्रस्तुत लघुकथाएँ सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक विषयों तक फैली हुई हैं। सामाजिक प्रतिबद्धता इन लघुकथाओं की एक विशेषता है, जो किसी प्रकार के अतिरिक्त आग्रह से मुक्त है। इन लघुकथाओं के माध्यम से मानवीय संबंधों, सामाजिक विषमताओं और राजनीतिक ऊहापोह को सामने लाया गया है।
    निश्चित रूप से प्रस्तुत लघुकथाएँ हिंदी लघुकथा की विकास-प्रक्रिया को समझने में भी सहायक सिद्ध होती हैं।
  • Tremontana
    Urmila Jain
    320 262

    Item Code: #KGP-9371

    Availability: In stock

    गैबरील गार्सिया मार्कवेज की कहानियों के अनुवाद का संग्रह ट्रेमोण्टाना उत्सवी तथा जीवन की विलक्षणताओं से भरपूर है। ये कहानियां मार्कवेज की उदारता तथा पात्रों को महसूस करने से अपनी ताकत बटोरती हैं जो अच्छी भी हैं, खराब भी और अशिष्ट भी पर निर्दोष हैं। तभी तो मार्कवेज की गणना शताब्दी के स्मरणीय लेखकों में की जाती है और उन्हें किसी भी भाषा का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण लेखक माना जाता है। उन्हें 1982 में नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया था। पाठक निश्चित ही इन कहानियों को पढ़कर प्रमुदित होंगे।
  • Samgra Kahaniyan : Ab Tak
    Maitreyi Pushpa
    900 720

    Item Code: #KGP-271

    Availability: In stock

    समग्र कहानियाँ: अब तक
    आँधी की तरह अपने उपन्यासों से पाठकों को झकझोर देने वाली मैत्रेयी पुष्पा ने स्त्री के अपने फैसलों की विचारोत्तेजक कहानियाँ-उपन्यास लिखे हैं। शहरी मध्यवर्गीय कहानियों के संसार को गाँव के उभरते मेहनतकश समाज से जोड़ा है, जहाँ अपनी परंपराएँ हैं, रूढ़ियाँ हैं और सबसे ऊपर है ‘खानदान की नाक’ और सब कुछ टिका है स्त्री के कंधों पर--जमीन और स्त्री ही उलझनों के केंद्र हैं और दोनों के ‘उत्पादन’ आपस में गुँथे हैं। सब मालिक की कृपा पर साँस लेते हैं। मैत्रेयी की स्त्रियों की सारी शिकायतें इसी मालिक से हैं कि वह साथी और हमसफर क्यों नहीं हो सकता--क्यों मालिक बनकर ढोर-डंगर की तरह औरत को ही हाँके रखता है। 
    स्त्री का अपनी नियति को अस्वीकार करना ही सामाजिक मर्यादाओं का टूटना है।
    स्त्री के उत्थान और सबलीकरण की ये कहानियाँ यथास्थिति से विद्रोह ही नहीं, भविष्य की दृष्टि से समाज-परिवर्तन की ध्वजवाहिनी भी हैं। मैत्रेयी ने कहानियाँ शहरी जीवन को लेकर भी लिखी हैं, मगर जिस आत्मीयता और गहराई से उन्होंने गाँव के जीवन को देखा है वह हिंदी में प्रेमचंद और रेणु 
    के सिवा शायद ही किसी को नजर आया हो। ये बेजुबानी स्त्री की यातनाओं, उसके संघर्षों और सपनों के बेआवाज विद्रोह की दस्तावेज हैं।
  • Mousi Ne Kahi Kahani
    Varsha Das
    140 126

    Item Code: #KGP-9303

    Availability: In stock


  • Kahani Samgra : Govind Mishra (2nd Part)
    Govind Mishra
    850 638

    Item Code: #KGP-1582

    Availability: In stock


  • Chaar Lambi Kahaniyan
    Aruna Sitesh
    200 180

    Item Code: #KGP-9156

    Availability: In stock

    इस संग्रह में प्रस्तुत हैं डॉ. अरुणा सीतेश की चार बहुचर्चित कहानियां, जो धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, सारिका आदि में लंबी कहानी अथवा लघु उपन्यास के रूप में प्रकाशित एवं प्रशंसित होकर उनके विभिन्न संग्रहों में सम्मिलित हैं । 
  • Katha Ek Naami Gharaane Ki
    Hridyesh
    200 180

    Item Code: #KGP-769

    Availability: In stock

    हृदयेश की कहानियां जिंदगी से, खासकर उस जिंदगी से, जिसमें मुक्तिबोध के मुहावरे के अनुसार आदमी जमीन में धंसकर भी जीने की कोशिश करता है, पैदा हुई हैं। कुछ लेखक सीधे जमीन फोड़कर निकलते हैं। उसी में अपनी जड़ों का विस्तार करते हैं और नम्र भाव से अपने रेशे-रेशे से उस जमीन से ही अपनी शक्ति खाद-पानी लेकर बढ़ते हैं और अपने तथा जमीन के बीच आसमान को नहीं आने देते हैं। वे इस सत्य को बखूबी समझते हैं कि आसमान जितना भी ऊंचा हो, उस पर किसी के पांव नहीं टिकते। औंध लटका हुआ बिरवा तो किसी को छाया तक नहीं दे सकता। हृदयेश् कलम से लिखते हैं तो भी लगता है जैसे कोई जमीन पर धूल बिछाकर उसपर अपनी उंगली घुमाता हुआ कोई तस्वीर बना रहा है। उनकी उंगलियों के स्पर्श में ही कुछ होगा कि आंघियां तक वहां आकर विराम करने लगती हैं और उनकी लिखत, जिसने भाड लेख होने तक का भ्रम नहीं पाला था, शिलालेख बनने के करीब आ जाती है।
    हृदयेश ने बीच-बीच में आने वाले तमाम साहित्यिक आंदोलनों व फैशनों को गुजर जाने दिया बिना अपने लेखकीय तेवर या प्रकृति में बदलाव लाए हुए। वह चुनाव पूर्वक अपनी जमीन पर टिके रहे–न दैन्यं न पलायनम्। वह एक साथ कई परंपराओं से जुड़ते हैं क्योंकि प्रत्येक रचनाकार अपने वरिष्ठों, समवयस्कों, यहां तक कि अल्पवयस्कों की कृतियों के प्रभाव को अपनी अनवधनता में सोख लेता है, जैसे पौधें की जड़ें खाद के रस को सोख लेती हैं।
  • Encounter-E-Love Story Tatha Anya Prem Kahaniyan
    Shyam Sakha 'Shyam'
    200 180

    Item Code: #KGP-1843

    Availability: In stock

    एनकाउंटर-ए-लव स्टोरी तथा अन्य प्रेम कहानियां
    डॉ. श्याम सखा 'श्याम' की कहानियां, देह में आती-जाती ठहरती-बिछलती सांसों की तरह हैं। इनमें आशाओं की ऊष्मा है, निराशा की ठंडक है, उत्साह और आत्मविश्वास की आंच हैं। इन कहानियों का आकार भी सांसों की ही तरह लघु-दीर्घ और मदमय है, सब कुछ अनायास और निश्चित, एक लय-ताल में बद्ध । कहीं छोटी भी ही सांस में देह में दीप्ति है तो कहीं दीर्घ श्वास ने पूरी काया को कंपित कर दिया है।
    जैसे श्यास ही जीवन का सूचक है, वैसे ही कहानी की रोचक वस्तु ही प्राणधार है। सेक्स की लंतरानी को जगह प्रेम की फुहार हैं। यहां रंगरलियां नहीं हैं, अंगरलियां हैं और उसकी स्वनिर्मित सैंद्धन्तिकी भी हैं। पठनीयता इस कदर कि हाथ से कहानी रखते न बने; गालिब की भाषा में 'बुझाए न बने ' सी हालत.. बस संग्रह की हर कहानी ऐसी ही आतिश है जिस पर कांई जोर नहीं चलता।
    इन कहानियों का कैनवास बहुत बड़ा है। सभी वर्गों की जिंदगियां यहां हाथ उठाए खडी हैं कि पहले हमारी तरफ देखो । पाठक विस्मय से इन सबकी ओर उत्सुक भाव से देखता है । वह जिसका हाथ पकड़ लेता है, वही उसे एक ऐसे अनुभव संसार में ल जाती है जो उसके लिए अपरिचित भले न हो परंतु परिचित भी नहीं था; जैसे कोई किमी मुहल्ले के मुहाने तक तो पहुंचा हो, परंतु भीतर कभी न जा सका हो।
    ये कहानियां, मन और ममाज के ऐसे ही अल्प-परिचित मुइल्लों में पाठक को खींच ले आती हैं। श्याम सखा 'श्याम' एक समर्थ कथाकार है, कहना चाहिए कि इंसानी जिंदगी के कुशल लेखा-जोखाकार हैं। इनकी नाप-जोख, ऐसी जानी पहचानी और अपनत्व वाली भाषा में है जी पल भर का भी पराई नहीं लगती।
    एक ओर किशोर प्रेम की कोमलांगी कहानी रसभरी पाठक को उसकी अपनी किशोर अवस्था के स्नेह कणों से भिगो देती है तो दूसरी ओर प्रेमिका की मजबूरी व एनकाउंटर- ए-लव स्टोरी प्रेम के भयावह यथार्थ को उकेरती सफल कहानियां हैं। एनकाउंटर शब्द प्रेम के साथ अजीब लगते हुए भी कहानी शीर्षक की सार्थकता को सिद्ध करने में सफल है ।
  • Pracheen Tutan Kahaniyan
    Rangey Raghav
    250 225

    Item Code: #KGP-07

    Availability: In stock

    प्राचीन ट्यूटन कहानियाँ
    अभी तक इतिहास के आधार पर जिन कहानियों का सृजन हुआ हैं, उनमें कहीं भी ऐसी सहज प्रेषणीयता नहीं मिलती, जितनी इस पुस्तक की अलौकिक चमत्कारों से भरी कहानियाँ पढ़कर मिलती है ।
  • Kasturigandh Tatha Anya Kahaniyan
    Poonam Singh
    180 162

    Item Code: #KGP-302

    Availability: In stock

    कस्तूरीगंध तथा अन्य कहानियाँ
    ‘कस्तूरीगंध तथा अन्य कहानियाँ’ पूनम सिंह का दूसरा कहानी-संग्रह है। इस संग्रह की कहानियों में व्यक्ति भी है, परिवार भी और समाज भी। विस्तार, गहराई और संपूर्णता के साथ। इसलिए ये कहानियाँ स्त्री द्वारा रचित होने पर भी सिर्फ स्त्री-समस्याओं तक सीमित नहीं हैं। इनमें स्त्रीवादी लेखन की शक्ति का स्वीकार भी है और उसकी सीमाओं का अतिक्रमण भी। इस तरह हिंदी में हो रहे स्त्री-कथा-लेखन को ये कहानियाँ नया आयाम देती हैं।
    प्रस्तुत संग्रह की कहानियाँ परंपरा और आधुनिकता के द्वंद्व की उपज हैं। इनमें परंपरा के जीवित तत्त्वों का स्वीकार आधुनिकता के दायरे में किया गया है। ‘कस्तूरीगंध’, ‘उससे पूछो सोमनाथ’ तथा ‘पालूशन मानिटरिंग’ जैसी कहानियाँ इस कथन के सर्वोत्तम उदाहरण के रूप में देखी जा सकती हैं। इनमें परंपरा के उस पक्ष का अस्वीकार है, जो आधुनिक सोच के विरुद्ध है। इन कहानियों की आधुनिकता नई जीवन स्थितियों के बेहतर रूप का सृजनधर्मी आयाम है, जिसे कहानी-लेखिका ने सीधे, पर सधे शिल्प में उपलब्ध किया है।
    पूनम सिंह की कथा-चेतना बृहत्तर मानवीय और सामाजिक सरोकारों से आत्मीय जुड़ाव का प्रतिफल है, जिसके कारण उनकी कहानियाँ घर-आँगन और सेक्स के भूगोल तक सीमित नहीं हैं। इसके साथ इनमें सादगी से भरा प्यारा घरेलूपन भी है, जो उनकी निजता के संस्पर्श के साथ आंतरिक लहर-सा मंद-मंद प्रवाहित होता रहता है। उनकी कथा-चेतना सामान्यीकृत होकर अपने समय के साथ है तो विशिष्टीकृत होकर अलग से रेखांकित करने लायक भी है। इसका उदाहरण इस संग्रह की लगभग सभी कहानियाँ प्रस्तुत करती हैं।
    कहा जा सकता है कि ‘कस्तूरीगंध तथा अन्य कहानियाँ’ समकालीन हिंदी कहानी में नए सृजन का सुंदर और श्रेष्ठ उदाहरण है।
  • Kaale Kuyen
    Ajeet Kaur
    225

    Item Code: #KGP-18

    Availability: In stock

    काले कुएँ
    इस संग्रह की कहानी 'बाजीगरनी' से-
    वह औरत जो तमाम उम्र एक कसी हुई रस्सी पर बाजीगरनी की तरह अपने बोझ का संतुलन कायम रखने की कोशिश में सारी ताकत और समूची एकाग्रता खर्च करती हुई चलती रही थी, आज ज़मीन पर खडी थी । रस्सी के दोनों सिरे कभी उनके सास-ससुर और खाविंद के दरम्यान तने रहे थे, कभी उनके खाविंद और बच्चों के दरम्यान । बहुत बरसों से एक सिरा भाइया जी के वजूद से बँधा था और दूसरा सिरा बड़े मामा जी के साथ । भाइया जी नहीं रहे तो रस्सी कड़क करके टूट गई । भाभी जी चक्कर खाकर ज़मीन पर आ गिरी । ज़मीन पर खडे होना तो वह भूल ही गई थीं ।  लडखड़ाती, काँपती, चकराती, हिचकोले खाती वह नए सिरे से छोटे बच्चे की तरह ज़मीन पर खडी होना सीखेंगी । शायद छोटे मामा जी का हाथ पकड़कर यह पैर बढाना सीखेंगी । पर फिलहाल तो वह चारों खाने चित गिरी पडी थीं ।
    भाइया जी नहीं रहे, तो बड़े मामा जी भी चले जाएँ-चले जाएँ..
    और उन्होंने दो-दो पुरानी सोने की चूडियों अपने हाथों से उतारी । उठीं और वे चारों चूडियाँ मामा जी के कोट की जेब में डाल दी, "बस, यही है मेरे पास । इसे ले ले और चला जा । पैंशनों वाले चले गए । रोटी खत्म । चूल्हा बुझ गया । तोड़ दिया है मैंने चूल्हा । तोड़ दिया है । तूने सुना ? चूल्हा तोड़ दिया है मैंने । चला जा । ”
    हिंदी और पंजाबी में समान रूप से रचनारत, साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित कथाकार की मानव-मन के सच को उकेरती कहानियों का नया संग्रह ।

  • Hanfata Huaa Shor
    Nesar Naaz
    200

    Item Code: #KGP-9350

    Availability: In stock

    हांफता हुआ शोर नेसार नाज़ की बेहद पठनीय कहानियों का संग्रह है। आज के दौर में जब कहानी से कहानीपन गायब होता जा रहा है तब नेसार नाज़ की कहानियां पढ़ना अलग प्रकार का अनुभव देता है। नेसार की कहानी कला इतनी पुरकशिश है कि पाठक या श्रोता कहानी के पहले वाक्य से कथाकार के साथ जुड़ जाता है। नेसार नाज़ समाज की मूल इकाई लोग यानी मनुष्य और उसकी फितरत के साथ तारतम्य बिठाकर अद्भुत किस्सागो की तरह कहानी सुनाने लगते हैं। उनकी चिंताएं हमें मुंशी प्रेमचंद के समय से जोड़ती हैं। तब भी इनसानी बिरादरी के बीच असमानता, विद्वेष, घृणा और अपमान से बचाने की मुहिम थी और आज भी ये हमारी सबसे पहली प्राथमिकता है। नाज़ की लड़ाई इनसानियत को बचाए रखने की लड़ाई है और उनके सामाजिक सरोकार सिर्फ इनसान की बेहतरी के लिए हैं। 
    नेसार नाज़ की कहानियों का परिवेश हमारा-आपका कस्बाई संसार है जहां लोग एक-दूसरे से ऐसे परिचित रहते हैं, एक बहुत बड़े परिवार के सदस्य लगते हैं। उनकी कहानियां सन् 1992 से पूर्व की कहानियां हैं जब इन कस्बों की संरचना उतनी जटिल नहीं थी जितनी कि आज है। इन कहानियों में गजब की रवानी है। आंचलिक भाषा में पात्र और परिवेश जैसे चहक-चहक कर बोलता है। यह एक सिद्धहस्त किस्सागो के लक्षण हैं। इन कहानियां की विशेषता है कि इनमें परिवेश और पात्र अपनी जुबान बोलते हैं। विद्वत्ता के आतंक से परहेज करतीं ये कहानियां सहज-सरल और प्रभावी हैं। हर कहानी नए मुहावरे गढ़ती है और कहीं से आयातित विचारों की खेप नहीं लगती। एक संग्रहणीय कहानी संग्रह।
  • Mera Mobile Tatha Anya Kahaniyan
    Ansuya Tyagi
    225

    Item Code: #KGP-601

    Availability: In stock

    दक्षिण अफ्रीका में रेल यात्रा के समय गांधी जी रस्किन का उपन्यास ‘अनटू द लास्ट’ पढ़ रहे थे। अंगूर के बाग में काम करने वाले मजदूरों के एक छोटे से कथा प्रसंग की चर्चा ‘सर्मन ऑफ़ द माउंट’ के आधार पर रस्किन ने अपने उपन्यास में की है। इस प्रसंग ने बापू को द्रवित किया। किस्सा यह है कि अंगूर के बाग में कुछ मजदूर काम के लिए बुलाए गए थे, कुछ मजदूरों को सुबह ही काम पर रख लिया गया व कुछ को तीन घंटे बाद बुलाया गया। लेकिन शाम को जब बाग के मालिक ने मजदूरी बांटी तो सबको एक बराबर पैसे दिए। पहले काम पर लगे मजदूरों को यह बात खटकी तब मालिक ने समझाया कि भले ही ये मजदूर देर से काम पर लगे, किंतु मजदूरी की आशा में ये सुबह से ही खड़े थे, मैंने इन्हें देर से काम पर लगाया, पर आखिर इनका हक तो बराबर का है।
    पारुल को यह प्रसंग याद आ गया और उसने सोचा, जब चंद्रकला मेरे यहां काम करती है तब इसके दुःख में मुझे भी भागीदार बनना चाहिए। यदि मैं अपने एक महीने की ट्यूशन की आधी कमाई इसे देकर इसके नुकसान की भरपाई कर देती हूं तब यह कितनी प्रसन्न हो जाएगी। मुझे तो अधिक अंतर नहीं पड़ेगा, क्योंकि जिम्मेदारियां तो सब समाप्त हो गई हैं, वैसे भी आशीष और उसे कितना चाहिए, उनका तो अब थोड़े में ही गुजारा चल जाता है। 
    -(इसी संग्रह की कहानी ‘थोड़ी सी खुशी’ से)
  • Nobel Puraskaar Vijetaaon Ki 51 Kahaniyan
    Surendra Tiwari
    595 476

    Item Code: #KGP-1985

    Availability: In stock

    नोबेल पुरस्कार विजेताओं की 51 कहानियाँ
    साहित्य के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार की महत्ता सर्व-स्वीकृत है, क्योंकि यह किसी एक व्यक्ति का नहीं, एक राष्ट्र का सम्मान होता है। साहित्य के क्षेत्र में सन् 1901 से 2005 तक 98 पुरस्कार दिए जा चुके हैं और पुरस्कृत साहित्यकारों में कवि भी हैं, कथाकार भी, दार्शनिक भी हैं और इतिहासकार भी। लेकिन मेरी यह निश्चित धारणा है कि इन रचनाकारों में जो कथाकार रहे हैं, उन्होंने पूरे विश्व पर अपना एक अलग प्रभाव छोड़ा है और उनकी कथाकृतियाँ सर्वाधिक चर्चित, प्रशंसित होती रही हैं। इस पुस्तक में यह प्रयास है कि इन कथाकारों की कुछ श्रेष्ठ कहानियाँ एक साथ उपलब्ध हो सकें।
    इन कहानियों को पढ़ने के बाद सहज ही यह अनुमान लगाया जा सकता है कि विश्व के इन श्रेष्ठ और समर्थ रचनाकारों के पास कैसी वैचारिक दृष्टि या रचना-शैली थी या है। और यह भी अनोखी बात इन कहानियों के माध्यम से हमारे सामने आती है कि अलग-अलग देशों के अलग-अलग रचनाकारों की वैचारिक दृष्टि भले ही अलग हो, किंतु मानवीय संवेदनाओं के, मूल्यों के, जीवन के प्रति गहरी आस्था और विकास के वे एक जैसे पक्षधर हैं और शायद यही इनकी श्रेष्ठता का कारण है, मापदंड है।
    इस पुस्तक की अनिवार्यता और महत्ता को मैं इसी दृष्टि से स्वीकारता हूँ और शायद आप भी स्वीकारेंगे।
  • Sabeena Ke Chaalees Chor
    Nasera Sharma
    295 266

    Item Code: #KGP-31

    Availability: In stock

    सबीना के चालीस चोर
    'सबीना के चालीस चोर' इस संग्रह की बाकी कहानियों के कथा-सूत्रों का बुनियादी विचार है । सबीना एक छोटी लड़की है, जो बडों जैसी दृष्टि और समझ रखती है । उसका मानना है कि फसाद कराने वाले, दूसरों का हक मारने वाले ही चालीस चोर है, जो हमेशा कमजोर वर्ग को दबाते हैं । इसी सबके बीच बार-बार अपने होने का अहसास दिलाती छोटी-छोटी मगर समझदार लड़कियां समूचे संघर्ष का हिस्सा है, अलग-अलग कहानियों से अलग-अलग किरदार निभाती सबीना से लेकर गुल्लो, सायरा, चम्पा, मुन्नी जैसी लड़कियों में नासिरा शर्मा खुद को ही 'प्लांट' करती हैं।
    दर्द की बस्तियों की ये कहानियाँ जिस भारतीय आबादी का प्रतिनिधित्व करती है वही इस देश की बुनियाद हैं ।  दरअसल ये ही कहानियां हिंदुस्तान की सच्ची तस्वीर हैं, जिनका अंतर्संगीत  इनके कथानकों के तारों में छिपा है, जिन्हें जरा-सा छेड़ो तो मानवीय करुणा का अधाह सागर ठाठें मारने लगता है । कहानियों का कैनवास और लेखक के सरोकार में जहाँ विस्तार एव गहराई है वहाँ घनीभूत और चौतरफा व्यथा है ।
    इन कहानियों की भाषा जिंदा भाषा है, जिसमें निजता और लोक-गंध की मिठास है। एक वरिष्ट कथाकार की ये कहानियां सचमुच उसके संपूर्ण कथा-संसार का प्रतिनिधित्व करती हैं ।
  • Neend Se Pahale
    Soma Bharti
    195 176

    Item Code: #KGP-373

    Availability: In stock

    नींद से पहले
    सोमा भारती की कहानियां हमें उस जानी-पहचानी निम्न- मध्यमवर्गीय दुनिया में ले चलती हैं, जिनसे हम जानकर भी अनजान बने रहते हैं, जिन्हें हम देखकर भी अनदेखा किए रहते हैं।
    इनके पात्र, चाहे वह ‘जस्सो मासी मर गई’ की जस्सो मासी हों या ‘नींद से पहले’ के रमापति, ‘किराये के मकान’ की पेइंग गेस्ट हो या कोई अन्य, मोमबत्तियों की तरह हवाओं में जूझते, जलते-गलते रहते हैं। वे आपसे दया की भीख नहीं मांगते, लेकिन समय, संयोग और नियति ने उन्हें जिस मुकाम पर ला खड़ा किया है, उसका दीदार जरूर कराती हैं कि देखो, यह मैं हूं, यह तुम भी हो सकते थे।
    सोमा ने अभिनय और एंकरिंग आदि अभिव्यक्ति के जिन मंचों पर काम किया है, उसका लाभ उनकी भाषा-भंगिमा, भाव और बोध को मिला है। कहानियों के रचाव-रसाव के लिए सोमा को किसी सायासता की जरूरत नहीं पड़ती, भाषा-शिल्प के दरवाजे नहीं खटखटाने पड़ते, न ही चैंकाने वाले चमत्कारों के टोने-टोटके टटोलने की आवश्यकता होती है। कहानियों की सहज संवेदना ही उनकी शक्ति है, जिनकी तासीर खुद-ब-खुद आपको पढ़ने के लिए आमंत्रित करती है।
    सोमा की कहानियां फास्ट ट्रैक की कहानियां नहीं हैं। जिंदगी की पहेलियां और अनिर्णय की धुंध, ठहरी- ठहरी-सी गति, ऊंघते-ऊंघते-से कस्बाई परिवेश और रिसते-रिसते-से यथार्थ! सोमा ने दूसरी कहानियां न भी लिखी होतीं, उनकी अकेली कहानी ‘जस्सो मासी मर गई’ ही उन्हें अमर बना सकती है।
    --संजीव
  • Gunjan Sharma Beemar Hai
    Vivekanand
    200 180

    Item Code: #KGP-586

    Availability: In stock

    गुंजन शर्मा बीमार है
    विवेकानंद का भाषा पर अच्छा अधिकार है। पात्रों के अनुकूल भाषा का चुनाव और उसे अर्थवत्ता प्रदान करना साहित्यिक विधा के रूप में कहानी की अनिवार्य शर्त है। विवेकानंद इस अनिवार्यता के बारे में सचेत हैं, यह अच्छी बात है। इनमें बहुत कम स्थल ऐसे हैं जहां विचारों को सीधे-सीधे भाषणमाला की तरह इस्तेमाल किया गया हो जैसे कि सत्तरोत्तरी बरसों में हिंदी की ‘क्रांतिकामी’ कहानियों में देखने को मिलता था। विवेकानंद ने यदि ‘महुआ छाया’ में नत्थीराम धोबी से भोजपुरी में संवाद बुलवाए हैं तो महानगर में पली आधुनिकता कुंज से अंग्रेजी में भी। 
    गुंजन शर्मा बीमार है की भाषा में सांकेतिकता और बिंबात्मकता के प्रयोग द्वारा अर्थवत्ता प्रदान करने की कोशिश की है। उसमें ‘सांप’ की घटना और बाद में उसके बिंब का सांकेतिक प्रयोग फ्रायडीय मनोविश्लेषण के आधार पर भी व्याख्यायित होने की संभावनाएं रखता है और गुंजन शर्मा की बीमारी भी ‘लिबिडो’ की ही देन मानी जा सकती है। जिससे निम्नमध्यवर्गीय किशोरमन पीड़ित है। इस तरह की अर्थवत्ता की संभावनाओं से युक्त भाषा का इन कहानियों में प्रयोग यह दर्शाता है कि विवेकानंद में कलात्मक कहानियों की रचना क्षमता है।
  • Rahiman Dhaaga Prem Ka
    Malti Joshi
    150 128

    Item Code: #KGP-1992

    Availability: In stock

    रहिमन धागा प्रेम का
    "पापा, अगर आप सोच रहे है कि जल्दी ही मुझसे पीछा छुडा लेंगे तो आप गलत सोच रहे है । मैं अभी दस-बीस साल शादी करने के मूड में नहीं हूँ। मैं आपके साथ आपके घर में रहूंगी । इसलिए यह घर हमारे लिए बहुत छोटा है । प्लीज़, कोई दूसरा बड़ा-सा देखिए।"
    "तुम शादी भी करोगी और मेरे घर में भी रहोगी, उसके लिए मैं आजकल एक बड़ा-सा घर और एक अच्छा सा घर-जमाई खोज रहा हूँ। रही इस घर की, तो यह तुम्हारी माँ के लिए है । यह जब चाहे यहीं शिफ्ट हो सकती है । शर्त एक ही है-कविराज इस घर में नहीं आएंगे और तुम्हारी माँ के बाद इस घर पर तुम्हारा अधिकार होगा ।"
    अंजू का मन कृतज्ञता स भर उठा । उसने पुलकित स्वर में पूछा, "तो पापा, आपने माँ को माफ कर दिया ?"
    "इसमें माफ करने का सवाल कहाँ आता है ? अग्नि को साक्षी मानकर चार भले आदमियों के सामने मैंने उसका हाथ थामा था, उसके सुख-दुःख का जिम्मा लिया था । जब उसने अपना सुख बाहर तलाशना चाहा, मैंने उसे मनचाही आज़ादी दे दी । अब तुम कह रही हो कि वह दुखी है तो उसके लौटने का मार्ग भी प्रशस्त कर दिया । उसके भरण-पोषण का भार मुझ पर था । गुजारा-भत्ता तो दे ही रहा हूँ अब सिर पर यह छत भी दे दी।"
    -[इसी संग्रह की कहानी "रहिमन धागा प्रेम का' से]
  • Qasaaibaaraa
    Ajeet Kaur
    240 216

    Item Code: #KGP-43

    Availability: In stock

    कसाईबाड़ा
    नोनी बुझ-सा गया । निढाल-सा हो गया । मरी हुई आवाज़ में कहने लगा, “न्यूरमबर्ग में क्या रखा है जी ! कुछ भी तो देखने लायक नहीं है । वह भी शहरों में से एक शहर है । बस, एक पुराना जेलखाना है । बैरकों जैसा। जहाँ नाजियों पर मुकदमे चले थे । जब लडाई ख़त्म हुई तो जुल्म करने वाले नाजियों को उन्होंने धर दबोचा।  हिटलर ने तो आत्महत्या करके मुक्ति पा ली।  बाद में जिनके पास धन-दौलत थी, वे सोने से लदी गाडियों देकर  भाग-भूग गए । सुना है, अभी तक कई नाजी अमेरिका में और दूसरे मुल्कों में नाम बदलकर रह रहे है । लेकिन जो पकडे गए, उनको उन्होंने न्यूरमबर्ग की जेल में कैद कर दिया।  उसे फाँसी पर लटकाया गया । बस, यहीं है न्यूरमबर्ग ।  जेलखाने, और फाँसी देने वाला शहर ।"
    “पर नोनी, साठ लाख यहूदियों को जिन्होंने वहशी दरिंदों की तरह ख़त्म  कर दिया था, उन्हें फाँसी तो होनी ही थी।"
    "बडे दरिंदे हमेशा बच जाते है छोटे ही फँसते है ।"
    "ठीक कहते हो।"
    "पर लाखों यहूदियों को मौत के घाट उतारने वाले नाजियों के लिए जो जेलें बनी थीं, उनमें आजकल उन्होंने मासूम मेमने रखे हुए है ।"
    "कौन से मेमने ?”
    “बस, गंदुमी रंग के मेमने । उनके बीच कभी-कभी कोई गोरा या पीला मेमना भी आ फँसता है । . . वह देखिए, वह सामने जो जेल-सी बिल्डिंग नज़र आ रही है । "
    अजीब इमारत थी, जिसकी एकमात्र लंबी मोटी दीवार जमीन से उठी हुई थी । ऊ …पर तक ।  पुराने किले की तरह ।
    लेकिन किलों में कोई धोखा  नहीं होता । वे दूर से ही एलान कर देते है कि हम किले है ।  पुराने वक्तों के । अपनी फौजों को, अपने आपको, अपनी रानियों को, अफसरों. दरबारियों, कर्मचारियों को, और राज्य का अन्न-भंडार सुरक्षित रखने के लिए तथा आक्रमणों से बचने के लिए राजे-महाराजे किलों का निर्माण करवाते थे ।  अब इनके भीतर केवल पुरानी हवाएँ बाल खोले घूमती है । चमगादड़ बसेरा करते हैं, घोंसले बनाते है क्योंकि उन्हें अभी भी इन दीवारों में हुए छेद सुरक्षित नजर आते है । [इसी संग्रह से]
  • Chinhaar
    Maitreyi Pushpa
    350 280

    Item Code: #KGP-110

    Availability: In stock

    चिन्हार 
    "माँ, लगाओ अँगूठा !" मँझले ने अँगूठे पर स्याही लगाने की तैयारी कर ली, लेकिन उन्होंने चीकू से पैन माँगकर टेढ़े-मेढे अक्षरों में बडे मनोयोग से लिख दिया-'कैलाशो  देवी"।  उन्हें क्या पता था कि यह लिखावट उनके नाम चढ़ी दस बीघे जमीन को भी छीन ले जाएगी और आज से उनका बुढापा रेहन चढ जाएगा ।
    रेहन में चढा बुढापा, बिकी हुई आस्थाएँ, कुचले हुए सपने, धुंधलाता भविष्य-इन्हीं दुख-दर्द की घटनाओं के ताने-बाने ने चुनी ये कहानियाँ इक्कीसवीं शताब्दी की देहरी पर दस्तक देते भारत के ग्रामीण समाज का आईना हैं । एक ओर आर्थिक प्रगति, दूसरी ओर शोषण का यह सनातन स्वरुप! चाहे 'अपना-अपना आकाश' की अम्मा हो, 'चिन्हार' की सरजू या 'आक्षेप' की रमिया, या 'भंवर' की विरमा-सबकी अपनी-अपनी व्यथाएँ हैं, अपनी-अपनी सीमाएँ ।
    इन्हीं सीमाओं से बँधी, इन मरणोन्मुखी मानव-प्रतिमाओं का स्पंदन सहज ही सर्वत्र अनुभव होता है--प्राय: हर कहानी में ।
    लेखिका ने अपने जिए हुए परिवेश को जिस सहजता से प्रस्तुत किया है, जिस स्वाभाविकता से, उससे अनेक रचनाएँ, मात्र रचनाएं न बनकर, अपने समय का, अपने समाज का एक दस्तावेज बन गई हैं।
  • Badalate Ahsaas
    Birsen Jain Saral
    225 180

    Item Code: #KGP-9384

    Availability: In stock

    बदलते अहसास

    जीवन की कहानियों की भूमि प्रायः परिवार होता है। इस अर्थ में बीरसेन जैन पारिवारिक परिवेश की कहानियों के कहानीकार हैं। परिवार के भीतर के जीवंत दृश्य, स्थितियाँ, तनाव, अलगाव और अकेले रह जाने की पीड़ा से भरे पात्रों को उन्होंने बहुत करीब से देखा है। वह प्रकारांतर से अपनी कहानियों के माध्यम से यह संदेश देना चाहते हैं कि दूसरों के जीवन से प्रेरणा लेकर हम चाहें तो अपना जीवन सफल, संतोषमय व सुखी बना सकते हैं। 
    प्रस्तुत पुस्तक बदलते अहसास की सातों कहानियाँ अपने आसपास के परिवेश से निकली हैं। यहाँ हम परिवार और समाज के परिवर्तित होते स्वरूप के बीच कथा-चरित्रों पर पड़ते प्रभाव को अनुभव कर सकते हैं। सच पूछें, तो ये कहानियाँ एक नया जीवन बनाने की प्रेरणा देती हैं। इन्हें पढ़ते हुए आप अनुभव करेंगे कि इनकी आवाज कहीं आपके भीतर भी दबी पड़ी है। कारण यह है कि यहाँ मनुष्य के अनेक रूपों के मध्य दरकते संबंध ही नहीं, पश्चात्ताप के आँसू भी नजर आएँगे। कहानीकार की यह विशेषता है कि वह उन स्थितियों को भी उजागर करता है जो समाज का स्याह चेहरा सामने रखती हैं।
  • Shatabdi Ki Kaaljayi Kahaniyan (Vol.-1)
    Kamleshwar
    625 500

    Item Code: #KGP-1576

    Availability: In stock


  • Chor Darvaazaa
    Jiten Thakur
    225 203

    Item Code: #KGP-292

    Availability: In stock

    जितेन ठाकुर की कहानियां यह स्थापित करती हैं कि कहानी एक निरंतर बदलने वाली विधा है जो किसी परंपरा की मोहताज नहीं होती क्योंकि कहानी अपने समय को यदि रूपायित नहीं करती और अपने काल की त्रसदी को नहीं पहचानती, तो उस समय और उस दौर का पाठक भी कहानी को पहचानने से इनकार कर देता है।
    जितेन ठाकुर ने परंपरापूरक यथार्थवाद को नकार कर अपने अंदर और बाहर के यथार्थ को समेटा है। वे पाठक को उसी तरह परेशान करते हैं जैसे उसका समय उसे त्रस्त करता है और उसी तरह निष्कर्षवाद को नकारते हुए जितेन की कहानियां उस अन्विति पर पहुंचती हैं, जिन्हें पाठक महसूस तो करता है पर शब्द नहीं दे पाता। शायद इसीलिए ये कहानियां एक लेखक की कहानियां न होकर अपने समय के जीवंत और अपने समय को विश्लेषित करने वाले समय के मित्र रचनाकार की कहानियां हैं।
    लेखकों की, लेखकों द्वारा, लेखकों के लिए लिखी गई ये झूठे साहित्यिक प्रजातंत्र की कहानियां न होकर, उस मानसतंत्र की कहानियां हैं जो आज के भयावह यथार्थ को केवल उजागर ही नहीं करतीं बल्कि पाठकविहीन एकरसतावादी कहानियों की जड़ता को तोड़ते हुए यह साबित करती हैं कि कहानी अपने समय के मनुष्य की तमाम बेचैनियों और भयावहता को वहन करते हुए उसी मनुष्य को अपने समय को समझने और उसके संत्रस्त अस्तित्व को एक नई दृष्टि देने की भूमिका अदा करती हैं।
    क्या इतना बहुत नहीं है कि अपने समय के इस मित्र रचनाकार ने कहानी की विगलित और परंपरापूरक अपेक्षाओं से हटकर, अपने समय के मनुष्य का साथ दिया है?
  • Chhote-Chhote Bade Yuddh
    Ramdhari Singh Diwakar
    225

    Item Code: #KGP-9343

    Availability: In stock

    ग्रामीण जीवन के सुप्रसिद्ध  कथाशिल्पी रामधारी सिंह दिवाकर ने मुख्यतः बदलते हुए गांव को अपने उपन्यासों और कहानियों का उपजीव्य बनाया है। इनकी रचनाओं में गांव को लेकर कोई अतीत-राग नहीं, अपितु लोकतांत्रिक अधिकार-चेतना से दीप्त प्रवंचितों, दलितों और सीमांत की जिंदगी जीने वाले चरित्रों के चेहरे हैं। गांव की सामंती व्यवस्था के टूटने के बरक्स हाशिये पर पडे़ लोगों के उभार के शुभ-अशुभ पक्षों को दिवाकर ने अपने कथा-साहित्य में पूरी संलग्नता के साथ उकेरा है।
    प्रस्तुत संग्रह छोटे छोटे बड़े युद्ध की शीर्षक कहानी में दिवाकर की लेखकीय विशिष्टता का आभास मिलता है। सड़ांध भरे गांव के विरूपित चेहरे की कहानी ‘माहुर पानी’ आज के दारुण यथार्थ की साक्षी है कि किसी स्वप्नदर्शी बुद्धिजीवी का शहर से अपने गांव लौटना और सुकून भरी जिंदगी जी सकना कितनी प्राणांतक आपदाओं से घिरा है। अपनी कहानियों में रामधरी सिंह दिवाकर संकीर्ण होती मनुष्यता को भी रेखांकित करते हैं।
    विषय की दृष्टि से संग्रह की कहानियां बहून्मुखी हैं। कहानियों में न शिल्प का चमत्कार है, न भाषा का ‘मैनरिज्म’! सहज-सरल भाषा में लिखी गई इन कहानियों में विलक्षण आत्मीयता है जो पाठक को प्रभावित करती है।
  • Parda Beparda
    Yogendra Dutt Sharma
    180 162

    Item Code: #KGP-1561

    Availability: In stock

    पर्दा-बेपर्दा
    कहाँ है सभ्यता ? किधर है प्रगति ? कैसा है विकास ? इतिहास की लंबी यात्रा करने के बाद भी हम मानसिक रूप से शायद अब भी वहीं के वहीं हैं जहाँ से शुरू हुई थी हमारी यात्रा। सच पूछें, तो हम आज भी किसी आदिम अवस्था में ही जी रहे हैं। क्या सभ्यता का कोई विकास-क्रम हमारी बर्बरता को मिटा पाया है ?
    विश्व-मंच पर ही नहीं, देशीय परिवेश में भी सभ्य, सुसंस्कृत और विकसित होने का हमारा दंभ निरर्थक और खोखला ही सिद्ध होता है।
    योगेन्द्र दत्त शर्मा की ये कहानियाँ बताती हैं कि कैसे हम आज अनेक विपरीत धु्रवों पर एक साथ जी रहे हैं। कहना ज़रूरी है कि ‘पर्दा-बेपर्दा’ की ये कहानियाँ फैशनपरस्त कहानियों की दुनिया से अलग मानवीय संवेदनाओं को जगाने वाली ऐसी सार्थक रचनाएँ हैं जो लंबे समय तक अपनी प्रासंगिकता बनाए रखेंगी।
  • Tal-Ghar
    Deepak Sharma
    175 158

    Item Code: #KGP-1835

    Availability: In stock

    रात में मेरी पत्नी दूसरे कमरे में सोया करती और बेटी तीसरे में। नौकर की संभावित शैतानी के भय से रात में हम तीनों ही के कमरों के दरवाजे अपने-अपने ऑटोमेटिक ताले के अंतर्गत अंदर से बंद रहा करते। लेकिन हमारे पास एक-दूसरे के कमरे की चाभी जरूर रहा करती। जिस किसी को दूसरे के पास जाना रहता, बिना दरवाजा खटखटाए ताले में चाभी लगा दी जाती और कमरे में प्रवेश हो जाता।
    पत्नी के कमरे का दरवाजा पूरा खुला था और वह अपने बिस्तर पर निश्चल पड़ी थी।
    ”क्या हुआ?“ मैं उसके पास जा खड़ा हुआ।
    उत्तर में उसने अपनी आँखें छलका दीं। यह उसकी पुरानी आदत थी। जब भी मुझे खूब बुरा-भला बोलती, उसके कुछ ही घंटे बाद अपने आप को रुग्णावस्था में ले जाया करती।
    उस दिन शाम को उसने मुझसे खूब झगड़ा किया था। बेटी के साथ मिलकर। मेरी दूसरी बहन इंदु की टिकान को लेकर। इधर कुछ वर्षों से जब भी मेरी बहनें या उनके परिवारों के सदस्य मेरे शहर आया करते, मैं उन्हें अपने घर लाने की बजाय अपने क्लब के गेस्ट हाउस में ठहरा दिया करता।
    ”आज इंदु जीजी को बाजार में देखा!“ पत्नी गुस्से से लाल-पीली हुई जा रही थी-”तुम्हारे ड्राइवर के साथ।“
     -(इसी संग्रह की 'मुरदा दिल' कहानी से) 
  • Prachin Unani Kahaniyan
    Rangey Raghav
    340 282

    Item Code: #KGP-06

    Availability: In stock

    प्राचीन यूनानी कहानियाँ
    यूनानी संस्कृति का दिग्दर्शन कराने वाली ऐसी कहानियों का संग्रह, जो वहाँ के अतीत जीवन की अत्यंत रोचक झाँकी प्रस्तुत करती हैं ।
  • Pracheen Brahman Kahaniyan
    Rangey Raghav
    350 291

    Item Code: #KGP-169

    Availability: In stock

    प्राचीन ब्राह्मण कहानियाँ
    आर्य संस्कृति के आदि संस्थापकों की जीवन-झाँकियाँ प्रस्तुत करने वाली ये कहानियाँ रोचक तो हैं ही, ज्ञानवर्धक भी हैं ।

  • Aazaadi Mubarak
    Kamleshwar
    290 247

    Item Code: #KGP-41

    Availability: In stock

    आजादी मुबारक
    मैंने देखा है कि कमलेश्वर ने कभी भी किसी 'डॉग्मा' से चालित होकर लिखना स्वीकार नहीं किया । कमलेश्वर की हर कहानी उसके जीवनानुभवों से निकली है । कमलेश्वर ने पढ़-पढ़कर संक्रांति के नहीं झेला है, बल्कि स्वय जिया है... उसकी शायद ही कोई ऐसी कहानी हो, जिसके सूत्र जिंदगी में न हों, क्योंकि वह बहुत खूबी से अपने समय के अंतर्विरोधों को पकड़ता है...  मुझे बहुत-सी वे घटनाएँ, लोग, स्थितियाँ, विचार, संदर्भ आदि याद है, जिन्होंने उसकी सशक्त  कहानियों को जन्म दिया है । कमलेश्वर इस मामले में एक बंजारा है, क्योंकि वह अनवरत यात्रा पर रहता है उसकी कहानियाँ मध्यवर्गीय जीवन की सादगी है शुरू होकर आधुनिकतम संचेतनाओँ और संश्लिष्टताओं का प्रतिनिधित्व करती है...  उसका स्टैमिना परिवर्तन की तेज से तेज रफ्तार में उसका सहायक होता है, इसीलिए वह कभी पिछड़ता नहीं और न प्रयत्न-शिथिल होता है...  और मैं कहना चाहूँगा कि यह कोई साधारण बात नहीं कि एक कलाकार अपनी भावभूमियों पर परिश्रमपूर्वक तैयार की गई अपनी निर्मितियों को इतनी निर्ममता से तोड़कर अलग हो जाए और नए सफल प्रयोग करने लगे । -दुष्यंत कुमार (सन् 1 966)

    कमलेश्वर की कहानियों का यहीं सच है । तमाम क्था आंदोलन  आए और गए, उनके साथ और उनके बाद भी कमलेश्वर ने अपनी निर्मिंतियों को विलक्षण रचनात्मक निर्ममता से तोड़ा से । उसी प्रयोगधर्मिता का उदाहरण हैँ-'आजादी मुबारक' संकलन की यह कहानियां
  • Manikin Aur Anya Kahaniyan
    Gouri Shankar Raina
    200 160

    Item Code: #KGP-MKAAK

    Availability: In stock

    आधुनिक संवेदना की अलग-अलग मिज़ाज की इन कहानियों में मानवीय स्थिति की सच्चाइयों को विषय-भूमि बनाकर जीवन की विभिन्न स्थितियों में व्यक्ति की संवेदनात्मक प्रतिक्रियाओं की प्रस्तुति की गई है। मानवीय संबंधों के संक्रमित यथार्थ को पकड़ने की कोशिश भी इन कथाओं में नज़र आती है। कहीं-कहीं ये तीखे रंगों के साथ उपस्थित होती हैं और कथा-दृष्टि के नए धरातल उभरते दिखाई देते हैं।

    कथाकार ने कहानी-लेखन की अपनी यात्रा में सभी मंज़िलें खुद चलकर तय की हैं और अपनी कुछ कहानियों को अन्य भाषाओं में विशेषकर जर्मन (यू टर्न), स्पानी (हाइवे), तेगु मराठी, गुजराती, पंजाबी, राजस्थानी तथा उर्दू में अनूदित होकर मुख़्तलिफ़ समाजों के विभिन्न पाठकों तक जाने दी है।

    आलोचकों का मानना है कि गौरीशंकर रैणा आधुनिक जीवन का एक प्रामाणिक परिदृश्य प्रस्तुत करते हैं और एक किस्सागो का रचना-व्यक्तित्व उनकी कहानियों से उभरता है।

  • Peeth Peechhe Ki Duniya
    Neelam Chaturvedi
    200 180

    Item Code: #KGP-1833

    Availability: In stock

    पीठ पीछे की दुनिया
    कहानियां अब भावहीन हो जाना चाहती हैं। बहुत सारी आशाओं, सपनों और कसमों से जरा अलग हटकर। सांस लेना चाहती हैं। सीमाओं के परे पढ़ने वाले के अंतर्मन में पैठने वाली। नीलम की कहानियां सहजता से यह सब करती हैं। उन्होंने बातचीत की भाषा को इसके लिए चुना है। बोलने वाली भाषा। जैसा बोलते हैं वैसा ही लिखें। हू ब हू।
    नीलम की कहानियां व्यंग्य का सहारा लेकर किसी चरित्र को उधेड़ती नहीं हैं। वे संबंधों को अनेक स्तरों तक ले जाने के लिए हैं। उनका ताप दफ्तरों में धीमे-धीमे सांस ले रहे लोगों को उकसाता है। बहुरंगी और मानवीय चरित्र अपने आप को कितना विचित्र बना डालने के लिए आतुर है। कहानियां यह इंगित करती हैं। पीठ पीछे की निस्संग दुनिया को देख पाना नीलम ने संभव किया है।
    संबंध जब बोझ बन जाते हैं तब नैतिकता घुलने लगती है। नीलम ने बहुत साहस से, अनेक कहानियों से इसे हम तक पहुंचाया है। यहां मध्यम संगीत की अनुगूंजें हैं। जैसे जीने का विश्वास। अदम्य। अचूक। प्रेम की टूटती डोर में, अवसाद में भी यह कला, आकर्षण की ओर ले जाती है।
    यह कहानी-संग्रह नए कथा क्षेत्र में सादगी, विस्तार और अनुपम अनुभवों से हमें संपन्न बनाता है।
  • Bhartiya Bhaashaaon Ki Shreshtha Kahaniyan
    Himanshu Joshi
    260 221

    Item Code: #KGP-73

    Availability: In stock

    भारतीय भाषाओं की श्रेष्ठ कहानियां 
    प्रस्तुत संकलन में भारत की सोलह प्रमुख भाषाओं की सोलह प्रतिनिधि कहानियां समाविष्ट की गई हैं । कश्मीर से कन्याकुमारी तक का परिवेश किसी हद तक इनमें प्रतिबिंबित हुआ है । ये कहानियां हमें मात्र छूती-छेड़ती ही नहीं, बल्कि हँसाती, गुदगुदाती और कहीं-कहीं रुलाती भी हैं । साथ ही बहुत कुछ सोचने के लिए विवश भी करती हैं ।
    इनमें भारत के स्थूल स्वरूप का प्रतिबिंबन ही नहीँ, भारत की अंतश्वेतना का स्पंदन भी मिलेगा और भारत की माटी की गंध भी ।
    क्या है भारत ? क्या है उसकी अस्मिता की पहचान ? क्या हैं उसकी खूबियाँ ? खूबियों के साथ-साथ खामियां भी। यथार्थ के धरातल पर अंकित ऐसे अनेक ज्वलंत प्रश्नों के उत्तर इन जीती-जागती, बोलती-बतियाती कालजयी कृतियों में अनायास उपलब्ध हुए बिना नहीं रहेंगे ।
    इनमें अतीत या वर्तमान ही नहीं, भविष्य का अंधकार से उबरता उजास भी है । अपने समग्र रूप में एक बृहुत् समाज, जो कहीं एक देश का ही नहीं, महादेश की पर्याय  भी बन जाता है। ये साधारण-सी कहानियां अपने में  अनेक असाधारण संसार सहेजे हैं ।
  • Faaltu Aurat
    Ajeet Kaur
    320 262

    Item Code: #KGP-9373

    Availability: In stock

    पंजाबी की प्रख्यात लेखिका अजीत कौर फेमिनिज्म में यकीन रखती हैं पर वह हर बात में पुरुषों का विरोध करने वाली फेमिनिस्ट नहीं हैं, वह ख़ुद को विचारों से फेमिनिस्ट मानती हैं। वह जब-जब स्त्री पर लिखती हैं, अपनी इस बात को पुख्ता भी करती हैं। फालतू औरत कहानी संग्रह में स्त्री  केंद्रित कहानियों की बहुलता है।
    प्रस्तुत कहानियाँ भारतीय समाज में जिस स्त्री का प्रतिनिधित्व करती हैं, वह पत्नी, प्रेमिका, बेटी, माँ तो है ही, पर पुरुषवादी समाज में वह ‘फालतू औरत’ होने का अभिशाप भी झेल रही है। न वह पूरी तरह पत्नी है, न प्रेमिका, न माँ, न बेटी। वह है महज एक ‘फालतू औरत’। इसी ‘फालतू औरत’ के दर्द, उसकी पीड़ा, उसके संघर्ष को अजीत कौर संवेदना के स्तर पर बड़ी शिद्दत से रेखांकित करते हुए हमें समाज का वह चेहरा दिखाने की ईमानदार कोशिश करती हैं जो अपने स्वार्थ की खातिर इस औरत को कभी उसका पूरा ‘स्पेस’ नहीं देना चाहता। ‘फालतू औरत’ की गीता, ‘एक मरा हुआ पल’ की शालिनी, ‘कमरा नंबर आठ’ की दो स्त्रियाँ, ‘हाॅट वाॅटर बोतल’ की मंजरी, ‘बुतशिकन’ की मिसेज़ चौधरी और ‘महक की मौत’ की मोनिका, ‘माँ-पुत्र’ की शांता, ‘एक पोट्र्रेट’ की तारा दीदी ऐसी ही स्त्रियाँ हैं जो प्रेम की दुनिया में, परिवार में, समाज में, देश में अपने लिए एक मुकम्मल स्पेस की चाहत रखती हैं।
    अजीत कौर की प्रस्तुत कहानियाँ सतत प्रवाहमय नदी की तरह हैं जो पाठक को अपने संग बहा ले जाने की पूरी ताकत और सामर्थ्य रखती हैं।
  • Mrityuraag
    Kamlakant Tripathi
    400 340

    Item Code: #KGP-MR HB

    Availability: In stock

    बारह कहानियों के इस संकलन मृत्युराग में लेखक की कुछ कहानियाँ पूर्व-प्रकाशित संग्रह ‘जानकी बुआ’ की हैं, जो अब उपलब्ध नहीं है; इन कहानियों का पुनर्लेखन किया गया है। अन्य कहानियाँ पहले के संग्रहों में प्रकाशित नहीं हैं।
    ये कहानियाँ छीज चुके या तेज़ी से छीज रहे भारतीय ग्राम्य समाज के जीर्ण-जटिल यथार्थ में डुबकी लगाती हैं, उसमें संगर्भित शुभ को सँजोती हैं और परिवर्तन की दिशा के भटकाव और उसके कारणों पर क्षोभ दर्ज करती हैं। उस जीवन के अभ्यंतर की पड़ताल में यथार्थ के अंतिम रेशे से लड़ती, अखंड धूसर में दबे चटक रंगों के संघर्ष और उनकी संभावना का एक आत्मीय पाठ रचती हैं ये कहानियाँ।
    परिवेश और पात्रों के प्रति लेखक की सूक्ष्म संवेदना, उनके व्यापार में उसकी गहरी पैठ और मानवीय सरोकारों में उसकी अटूट आस्था कहानियों को आरोपण व वाग्जाल से मुक्त, एक सहज और प्रकृत कथारस से लबरेज़ करती हैं। बहुत मुखर न होने के बावजूद हर कहानी यात्रा के अवसान तक अपने अभिप्रेत से आप्यायित कर जाती है।
    अपनी स्वतंत्र पगडंडी की तलाश में ये कहानियाँ वर्तमान कहानी-जगत् की किसी रूढ़ धारा में बहने से सजग परहेज़ करती हैं।
    शीर्षक कहानी की प्रकृति थोड़ी भिन्न है। वह बहुशः आवृत के अनावरण की कथा है।
  • Boo Toon Raaji
    Padma Sachdev
    150

    Item Code: #KGP-60

    Availability: In stock

    बू तूँ राजी
    मैं मूलत: कवयित्री हूँ । जो बात कविता से बहुत बडी हो जाती है, वह कहानी बनकर मेरे हाथों में छोटे बच्चे की तरह कुलबुलाने लगती है । कहानी की यह मेरी दूसरी किताब है । कभी-कभी लिखती हूँ कहानियाँ, वह भी उस वक्त, जब कहानियों के पात्र मेरे आँचल का कोना पकडे-पकडे मेरी गरदन तक आकर मुझे दाब लेते है । और ये पात्र जब मेरे जीवन का हिस्सा हो जाते हैं तब में लफ्जों के दोने में इन्हें फूलों की तरह सजाकर अपने पाठकों की झोली में डाल देती हूँ फिर वे इसका हार बनाएँ, फूलों को मंदिर के आगे सजाएँ या अपनी आँखों की पतली काजल की लकीर से पिरोकर अपने गले में डालें-ये उनकी खुशी है । मेरी कहानियों के पात्र मेरे घर के सदस्यों की तरह हो जाते हैं । मैं चाहती हूँ, आप भी इन्हें अपनी बैठक में बैठने का स्वान दें ।
  • Munna Ro Raha Hai
    Prahlad Shree Mali
    280 238

    Item Code: #KGP-590

    Availability: In stock

    "सच कहूं तो इन नेता-अफसरों के चरित्र और आचरण ने मेरा मनोबल बढ़ाया है। जैसे औलाद नालायक निकल जाए तो समझदार मां-बाप खुद में नई ताकत पैदा कर लेते हैं अपनी सार-संभाल की। वैसे ही जब मैंने यह देखा कि इन नेता-मंत्रियों, सरकारी कर्मचारियों से देश-समाज और नागरिक का भला होना मुश्किल है, तो बस अपना मनोबल ऊंचा कर लिया। रही बात आशा-चिंता की तो यदि आप आशा-अपेक्षा रखेंगे तो चिंता होगी ही। साथ ही दुःख भी मिलेगा। मेरे खयाल से पति-पत्नी या संतान से हमेशा किसी को मनचाहा सुख नहीं मिलता। इसके लिए तो मन को मनाकर संतोष रखना पड़ता है। मेरे दादा की छह संतानें थीं। चार लड़के, दो लड़कियां। बेचारे उनके पीछे अपना पूरा जीवन घिसते रहे। न बेटों ने सुख दिया, न बेटियों ने चैन। पर इसमें उनका भी क्या दोष! वे सब भी तो अपनी-अपनी गृहस्थी की गाड़ी चलाने की खींचतान में लगे हुए थे। यही हाल मेरे पिताजी का रहा। उन्हें न तो मैं कोई सुख दे पाया, न मेरा भाई। और यह अकेले मेरी नहीं, लगभग हर घर की कहानी है। फिर भला मैं अपने बेटे से कोई सुख पाने की अपेक्षा रखने की नादानी क्यों करूं!"
    -इसी पुस्तक से  
  • Mohan Chopra Ki Shreshtha Kahaniyan
    Sunil Chopra
    195 176

    Item Code: #KGP-313

    Availability: In stock

    मोहन चोपड़ा की श्रेष्ठ कहानियाँ
    मोहन चोपड़ा का कथा-संसार मध्यवर्गीय सामाजिक जीवन की विडंबनाओं, अंतर्विरोधों और मूल्यों के विघटन के इस दौर में एक व्यक्ति के अंतःसंघर्ष की गाँठें खोलता है। पूँजीवादी संस्कृति और बाज़ार के दबावों के बीच मनुष्य के लगातार एक उपभोक्ता में बदलते चले जाने तथा भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों के क्षरित होने की पृष्ठभूमि से उपजी हताशा, मोहभंग, अनास्था और अकेलेपन के बीच कहानीकार संबंधों के सत्त्व और मानवीय ऊष्मा की गहन खोज में प्रवृत्त है तथा वह हमें उम्मीद की टिमटिमाती रोशनियों को सहेजने के लिए प्रेरित भी करता है।
    मोहन चोपड़ा की कहानियों में मध्यवर्ग अपनी तमाम विविधताओं के साथ उपस्थित होता है। मध्यवर्ग की उस दोहरी एवं टुच्ची मानसिकता को उन्होंने अपनी कहानियों में लक्षित किया है, जहाँ आर्थिक अथवा सामाजिक स्तर पर बदलाव आते ही इस वर्ग के लोगों के आचरण में भी बदलाव आ जाता है और वे पुरानी केंचुलें उतारकर नई केंचुलें धारण कर लेते हैं। मध्यवर्गीय जीवन की विडंबनाओं को जीने का लेखक का अपना अनुभव ही अनुभूति के स्तर पर उनकी कहानियों में प्रवाहित है, और इसीलिए वे इतनी प्रामाणिक लगती हैं।
    उनकी कहानियों का यह संचयन उनकी विविधरंगी- बहुआयामी सर्जनात्मकता से परिचय कराने का एक प्रयास है।
  • Guru-Dakshina
    Sanjiv Jaiswal
    300 249

    Item Code: #KGP-784

    Availability: In stock

    गुरु-दक्षिणा
    "सर, आप चाहते थे कि मैं केवल दो रातों के लिए आपके पास आ जाऊं लेकिन आपका बेटा पूरी जिंदगी के लिए मुझे यहाँ लाना चाहता है," दीपा ने एक-एक  शब्द पर जोर देते हुए कहा ।
    सड़ाक...सड़ाक...सड़ाक...जैसे नंगी पीठ पर चाबुक पड़ रहे हों। प्रो. कुमार का सर्वांग कांप उठा। उन्होंने कभी स्वप्न में भी ऐसी स्थिति की कल्पना नहीं की थी।  दीपा ने एक झटके में उनके चेहरे का नकाब नोच डाला था। अपने बेटे के सामने ही उन्हें नंगा कर दिया था। उनका चेहरा सफेद पड़ गया। ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने सारा रक्त चूस लिया है।
    अवाक तो प्रकाश भी रह गया था। चंद क्षणों तक तो उसकी समझ में ही नहीं आया कि क्या करें। फिर उसने दीपा की बाहों को पकड़ झिंझोड़ते हुए कहा, "दीपा, तुम होश में तो हो। तुम्हें मालूम है कि तुम क्या कह रही हो?"
    "अच्छी तरह मालूम है लेकिन शायद तुम्हें नहीं मालूम कि तुम्हारे डैडी रिसर्च पूरी कराने के लिए मुझसे क्या गुरु-दक्षिणा मांग रहे थे । यदि सत्य उजागर किए बिना मैं तुमसे शादी कर लेती तब तुम्हारे डैडी जिंदगी भर मुझसे आंखें न मिला पाते । वे भले ही गुरु का धर्म भूल गए हों लेकिन मैं शिष्या का धर्म नहीं भूली हूँ। इसलिए अपनी बहू के सामने आजीवन जलील होने की जलालत से मैं उन्हें मुक्ति देती हूँ। यही मेरी गुरु-दक्षिणा होगी ।"

    -इसी संग्रह से
  • Ai Ganga Tum Bahati Ho Kyoon
    Vivek Mishra
    180 162

    Item Code: #KGP-507

    Availability: In stock

    ‘ऐ गंगा तुम बहती हो क्यूँ’ युवा कथाकार विवेक मिश्र का तीसरा कहानी-संग्रह है। ‘हनियाँ तथा अन्य कहानियाँ’ और ‘पार उतरना धीरे से’ कहानी संग्रहों से विवेक ने पाठकों के बीच प्रियता व प्रामाणिकता अर्जित की है। उन्होंने बहुत शाइस्तगी और रचनात्मक विनम्रता के साथ यह सिद्ध किया है कि आसपास पसरा यथार्थ हर रचनाकार के लिए समान नहीं होता। यह रचनाकार पर है कि वह ‘दिखते’ के पीछे छिपे जीवन सत्य और ‘दिखते’ में वास्तविक को कितना देख-समझ पाता है। विवेक वास्तविक और प्रायोजित का अंतर समझने वाले समर्थ कहानीकार हैं। यही कारण है कि आज जब संपादकों, संगठनों, प्रायोजकों के कंधें पर बेतालवत् सवार कुछ कहानीकार ठस व ठूँठ हो रहे हैं तब विवेक मिश्र की कहानियाँ अपना महत्त्व असंदिग्ध रूप से प्रकाशित कर रही हैं।
    विवेक मिश्र सुस्पष्ट सामाजिक सरोकारों से लैस लेखक हैं। प्रस्तुत संग्रह की कहानियाँ साबित करती हैं कि परिवार में बद्धमूल अप्रासंगिक धारणाओं से लेकर सामाजिक परंपराओं में घुसपैठ करती अमानवीय प्रवृत्तियों तक लेखक की पैनी नजर है। परिवेश विवेक के यहाँ एक पात्र सरीखा है। मैत्रेयी पुष्पा के बाद बुंदेलखंड का जीवन-जगत् उनके यहाँ सर्जनात्मक संदर्भ प्राप्त करता है। साथ ही, वे महानगरों की संधियाँ-दुरभिसंधियाँ भी परखते हैं।
    संग्रह में शामिल ‘घड़ा’, ‘चोरजेब’, ‘निर्भया नहीं मिली’ तथा ‘और गिलहरियाँ बैठ गईं’ सरीखी कहानियाँ रेखांकित करती हैं कि लेखक मन के अतल में व्याप्त ध्वनियों को सुनने की अद्भुत क्षमता रखता है। उसके पास अर्थ को अनेक स्तरों पर वहन करने वाली भाषा है, जैसे--‘पनरबा कस्बे के किसी कागज को माचिस की तीली से जलाकर देखिएगा। शायद उससे उठती लपटों में आपको विश्रांत अनल की कुछ कहानियाँ मिलें।’ यह कहानी संग्रह वर्तमान हिंदी कहानी में मूल्यवान उपस्थिति की तरह स्वागत योग्य है।
  • Insaani Nasl
    Nasera Sharma
    250 225

    Item Code: #KGP-800

    Availability: In stock

    इनसानी नस्ल
    इस संग्रह की सभी कहानियाँ बड़ी सादगी से जीवन के यथार्थ को सामने रखती हैं। अंतर्धारा में एक आग्रह अवश्य महसूस होता है कि इनसान ने अपने ‘स्वयं’ को जीना छोड़ दिया है। वह अपने अंदर यात्रा करने की जगह बाहर की भौतिक दुनिया के कोलाहल में भटकता जा रहा है, जो उसकी सारी सहजता को ख़त्म कर उससे सुख के सारे क्षण छीनता जा रहा है। कभी-कभी ऐसा भी संकेत मिलता है कि वह पाषाण युग की प्रवृत्तियों की तरफ़ अकारण बढ़ रहा है, जो सारी उपलब्धियों के बावजूद उसको वह ‘चैन’ नहीं दे पा रही हैं, जिसका वह सही हक़दार है। आखि़र यह इनसानी नस्ल, जो एक-दूसरे की उत्पत्ति की सिलसिलेवार कड़ी है, वह वास्तव में चाहती क्या है ? एक-दूसरे से हाथ मिला मानव-शृंखला को मज़बूत बनाना या फिर एक-दूसरे के विरोध में खड़े होकर अलगाव की भूमिका निभाना ? यह अलगाव हमें सभ्यता के किस मोड़ पर ले जाएगा ? अलगाव की इस मानसिकता से मुक्त होकर इनसान एक नए युग का सूत्रपात क्यों नहीं कर सकता ? क्या वह आने वाली नस्ल की ख़ातिर जीवन से निरंतर ग़ायब होते जा रहे ‘चैन’ को पाने के लिए कुछ नहीं करेगा ? क्या वह अपने अंदर की यात्रा कर इनसानियत के आलोकित क्षितिजों को छूना नहीं चाहेगा ? इन्हीं सवालों से जूझती ये कहानियाँ आज के इनसान के दिल व दिमाग़ की टकराहट की साक्षी हैं, जो अनेक बुनियादी सवालों से साक्षात्कार करती नज़र आती हैं।
  • Sanetary Pad
    Sayed Javed Hasan
    250 225

    Item Code: #KGP-1885

    Availability: In stock

    बस्ती का खुदा उठा । मैदान की ओर देखकर मुस्कुराया और धीरे-धीरे चबूतरे की सीढी चढ़ने लगा ।
    दो चढ़ता रहा । तालियां बजनी रहीं।
    अचानक तालियां रुक गई ।
    लोगों ने बस्ती के खुदा को एकाएक बीच सीढी पर रुकते हुए देखा । '
    सबकी धडकने तेज हो गई । उसे अपने इस खुदा पर पूरा  विश्वास था । ताली बजाने वालों में अब मैदान के एक- आध हिस्से को छोडकर बाकी लोग भी शामिल हो गए थे । वे पहले के तीन खुदाओं की छवि से बुरी तरह निराश थे और चाहते थे कि कम से कम इस खुदा की छवि दुरुस्त रहे ।  बस्ती का यह खुदा औरों के मुकाबले अधिक सौम्य, संजींदा और भरोसेमंद था ।
    बस्ती के खुदा ने बस्ती के लोगों को मुड़ के देखा । मुस्कुराया । हाथ हिलाया और फिर सीढी चढने लगा ।
    तालियां फिर बजनी शुरू हुई ।
    तालियां बजती रहीं . . . . बजती रहीं ।
    और फिर . . . . पूरे मैदान में मरघट-सा सन्नाटा छा गया ।
    आईने के सामने बस्ती का खुदा खडा था और उसमें मुखौटों का अक्स उभर आया था ।
    बस्ती के लोग पागलों की तरह अपना सिर धुन रहे थे । उसे अपने जिस खुदा पर सबसे ज्यादा भरोसा था, वो  बहरूपिया बना उनके सामने खड़ा था ।
    - इसी पुस्तक से
  • Parakh
    Malti Joshi
    220

    Item Code: #KGP-1983

    Availability: In stock

    परख
    "तुमने अपने बचपन में मुझे एक सपना दिखाया था कि तुम पढ़-लिखकर बड़े आदमी बनोगे, तुम्हारा एक बड़ा-सा बँगला होगा, बँगले में मेरा भी एक कमरा होगा, कमरे से लगी बालकनी में एक झूला पड़ा होगा, उस झूले पर बैठकर मैं तुम्हारे बच्चों को कहानियाँ सुनाऊँगी, उनके लिए स्वेटर बुनूँगी।
    "अब तुम बड़े आदमी बन गए हो। तुम्हारे पास बड़ा-सा बँगला भी है, घर में बाल-गोपाल भी हैं, पर मेरा सपना तो अधूरा ही रह गया न ! अभी तुमने मेरे लिए इतने ठिकाने गिनाए, पर एक बार भी नहीं पूछा कि जिया, मेरे घर रह सकोगी ? देखो, मुझसे जैसा बना, मैंने तुम्हारा बचपन सँवारा था। अब तुम मेरा बुढ़ापा सुधार रहे हो। हिसाब बराबर हो गया।"
    "कैसी बात कर रही हो जिया !" वीरेश आवेश में एकदम उठकर खड़ा हो गया, "कसम ले लो जो आज तक मैंने कभी तुम्हें आया समझा हो।" उसका स्वर एकदम तरल हो आया, "अपनी जन्मदायिनी माँ को तो मैंने बस तस्वीर में ही देखा है। उनकी कोई याद मेरे मन में नहीं है। पर सच कहता हूँ, बाहर रहते हुए जब भी घर की याद आई है, माँ के रूप में तुम्हारी छवि मन में उभरी है। मुझे दुःख है तो इसी बात का कि इस रिश्ते को कोई वैधानिक दर्जा नहीं मिल सका, नहीं तो मैं वृद्धाश्रमों की खाक क्यों छानता ! तुम्हें साधिकार, ससम्मान सीधे अपने घर ले जाता।"
    "यह तुम्हारा वहम है बेटे ! इसे अपने मन से निकाल दो। वैधानिकता रिश्तों को गारंटी नहीं देती, नहीं तो तुम्हारे उस पाँचसितारा वृद्धाश्रम में इतने लोग आकर क्यों बसते !"           
    [इसी संग्रह की कहानी ‘अनिकेत’ से]
  • Antarmilan Ki Kahaniyan
    Rangey Raghav
    350 280

    Item Code: #KGP-754

    Availability: In stock

    अंतर्मिलन की कहानियाँ
    प्रस्तुत कहानियाँ मैंने विशाल भारतीय पौराणिक साहित्य में से चुनी हैं। इनको मैंने इसलिए लिखा कि इनमें मुझे इतिहास की बहुत-सी गुत्थियाँ सुलझती मिलीं। हमारी संस्कृति में एक ही स्रोत की प्रेरणा नहींहै। महाभारत युद्ध के बाद से गौतम बुद्ध तक, फिर गौतम बुद्ध से गुप्त सम्राटों के काल तक, निरंतर भारत में जातियों का अंतर्मिलन चला। इन दो दौरों में-
    पहली बार-आर्य, राक्षस, गंधर्व, यक्ष, किन्नर, नाग, गरुड़, पिशाच, असुर तथा अनेक जातियाँ परस्पर घुल-मिल गईं। इनके मिलन से इनके देवता भी परस्पर मिल गए। विष्णु, शिव, गरुड़, पार्वती, वासुकि, कुबेर, पुलस्त्य, वृत्र, शाक्त इत्यादि भी परस्पर मैत्री भाव से स्थित हुए।
    दूसरी बार-भारत में यवन, शक, कुषाण, पहलव इत्यादि जातियाँ आईं, जो भी भारत में घुल-मिल गईं।
    यहाँ मैंने पहले दौर के अंतर्मिलन को प्रकट करने वाली कथाएँ रखी हैं, जो प्रकट करती हैं कि हिंदू धर्म कितनी व्यापक भूमि पर बना था।
    -रांगेय राघव

  • Jauhar Ke Akshar
    Santosh Shelja
    250 225

    Item Code: #KGP-9075

    Availability: In stock


  • Jalte Huye Daine Tatha Anya Kahaniyan
    Himanshu Joshi
    225

    Item Code: #KGP-25

    Availability: In stock

    जलते हुए डैने तथा अन्य कहानियाँ
    'जलते हुए डैने' से 'इस बार' तक की कथा-यात्रा के ये अनेक पड़ाव है । अनुभव एवं अनुभूतियों के कई अक्स ! जीवन और जगत में जो हो रहा है, उसके कुछ धुँधले, कुछ उजले रेखा-चित्र ! पर रेखा-चित्रों में यथार्थ की मात्र रेखाएँ ही नहीं, कहीं-कहीं कुछ रंग भी है, जो मिट कर मिटते नहीं । घुलने के बावजूद भी घुलते नहीं । स्मृति-पटल पर ऐसे अंक्ति हो जाते है, जैसे पाषाण पर उकेरी गहरी रेखाएँ । रेखाओं की भी अपनी भाषा होती है । रेखाओं के भी अपने सुख-दु:ख, अपनी व्यथा-वेदना होती है ।  इस निखिल सृष्टि में ऐसा कुछ भी तो नहीं, जो अर्थपूर्ण न हो ! जिसकी अपनी कोई सार्थकता न हो !
    अनेक सत्यों को परिभाषित करती ये सरल, सहज, सपाट-सी कहानियाँ, कहीं कुछ न कह कर भी कितना कुछ नहीं कह जाती । असत्य का यथार्थ, सत्य के यथार्थ से सम्भवत: आज़ अधिक गहरा होता है । अधिक विस्तृत, अधिक प्रामाणिक । प्रासंगिक ही नहीं, अधिक आकर्षक भी । शायद इसलिए हर दौड़ में सत्य के पाँव, झूठ से पीछे रह जाते हैं ।  पर असत्य जीत कर भी हार क्यों जाता है ? जल में पड़ी परछाई पकड़ने की तरह आदमी कुछ चाहता है । परन्तु जो है, और जो होना चाहिए के बीच की संधि-रेखा इतनी धुँधली क्यों है ?

  • Yahin Kahin Hoti Thi Zindagi
    Ajeet Kaur
    300 249

    Item Code: #KGP-9218

    Availability: In stock

    अजीत कौर की अपनी एक खास ‘कहन’ है, जिसके कारण उनकी कहानियां बहुत सादगी के साथ व्यक्त होती हैं और पाठकों की संवेदना में स्थान बना लेती हैं। ‘यहीं कहीं होती थी जिंदगी’ उनका नया कहानी संग्रह है। पंजाबी से हिंदी में अनूदित ये कहानियां विषयवस्तु से नयापन लिए हैं और शिल्प के एतबार से पाठक को अजब सी राहत देती हैं। एक एक महत्त्वपूर्ण कहानी संग्रह है, न केवल पठनीयता से समृद्ध है बल्कि एक दार्शनिक वैचारिक संपदा से भी संपन्न है। अजीत कौर की रचनात्मक सुघड़ता तो सर्वोपरि है ही।
  • Haadase Aur Hausle
    Malti Joshi
    200

    Item Code: #KGP-8001

    Availability: In stock

    मालती जोशी पाठकों के बीच अत्यंत सम्मानित कहानीकार हैं । संभवत: वे इस बात पर भरोसा करती हैं कि कहानी पाठक को आईने के सामने ला खड़ा करती है। कहानी आखिरकार जीवन से ही उपजती है और अस्तित्व के ही किसी अंश को आलोकित कर जाती है। मालती जोशी परम रहस्यमय जीवन का मर्म बूझते हुए अपनी कहानियों को आकार देती हैं।
    'हादसे और हौसले' मालती जोशी का नवीनतम कहानी संग्रह है। इसमें मध्यवर्गीय भारतीय जीवन केंद्र में है। इसकी रचनाएं समाज की लक्षित-अलक्षित सच्चाइयों को शिददत से व्यक्त करती हैं। विशेषकर स्त्री चरित्रों का वर्णन जिस तरह लेखिका ने किया है वह मुग्ध कर देता है। बहुतेरे लेखक विचार को कथानक में सम्मिलित करते हुए उसे अति बौद्धिक बना डालते हैं। मालती जोशी सहज कथारस को अपनाती हैं। विचार कथा के भीतर से विकसित करती हैं। वे शिल्प और भाषा के अतिरिक्त मोह में नहीं उलझतीं ।
    प्रस्तुत कहानी संग्रह मालती जोशी की कथा कुशलता को रेखांकित करते हुए यह बताता है कि जीवन में कहां-कहां और कैसी-कैसी कहानियां छिपी हुई हैं। पठनीयता का प्रमाण देती महत्वपूर्ण कहानियां ।

  • Kharra Aur Anya Kahaniyan
    Subhash Sharma
    460 368

    Item Code: #KGP-9366

    Availability: In stock

    ‘आजादी! वह भी औरतों की! क्या होती है यह आजादी? इसका रंग क्या होता है? बू क्या होती है? स्वाद क्या होता है? काश, एक बार मिल जाती तो मैं उसे छूकर, सूंघकर, चखकर देखती। फिर उसे पकड़कर कलेजे से भींचकर रोती...।’—प्रस्तुत कहानी संग्रह खर्रा और अन्य कहानियां की कहानी ‘कुहुकि कुहुकि जिया जाय’ की इन पंक्तियों में जो प्रश्नाकुलता है, वह बहुत मूल्यवान है। कोई भी रचना यदि सलीके से सवाल उठाने में कामयाब हो जाए तो वह अपने सामाजिक दायित्व की पूर्ति कर लेती है। ‘खर्रा और अन्य कहानियां’ संग्रह की सभी कहानियां समकालीन जीवन के छोटे-छोटे संदर्भों को बड़े परिप्रेक्ष्य में व्याख्यायित करती हैं। इन कहानियों के लेखक सुभाष शर्मा यथार्थवादी लेखक हैं। कहानी में कथानक, सामाजिक सरोकार, विवरणधर्मिता और युक्तिसंगत समापन में उनका भरोसा है। यही कारण है कि सुभाष की कहानियां बेहद पठनीय हैं और पाठक की चेतना को झकझोरती हैं।
    इस संग्रह की लगभग सभी कहानियां व्यवस्था और सत्ता के भीतरी सच को बयान करती हैं। अनेक कहानियां शिक्षा तंत्र के तहखानों को रोशनी में लाती हैं। योग्यता, अवसर और दायित्व का उपहास करती स्थितियों व मनोवृत्तियों को पूरी संवेदनशीलता के साथ कहानीकार ने उजागर किया है। इस संग्रह में स्त्री के  संघर्षमय संसार को चित्रित किया गया है। बिना किसी विमर्श के जाल में उलझे हुए लेखक ने स्मरणीय कहानियां लिखी हैं।
    ‘खर्रा और अन्य कहानियां’ संग्रह की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह भी है कि बिना लाउड हुए या बिना प्रचारात्मक हुए सुभाष शर्मा ने वर्तमान राजनीति के बहुलांश चरित्र को कहानियों में उतार दिया है। इस चरित्र को चित्रित करने में लेखक की अर्थगर्भित भाषा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ‘दास्तान-ए-सुबूत’ में लेखक कहता है, ‘पहले कार्यकाल में वह जान गए थे कि खजाना कहां-कहां है। चुनाव, मुकदमा, राजनीतिक षड्यंत्र आदि में जितना खर्च हुआ था, उसकी भरपाई उन्होंने सुपरसोनिक गति से करना शुरू कर दिया।’ ऐसी व्यंजक भाषा में रची गईं ये कहानियां यथार्थ को पूरी प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत करती हैं। ‘खर्रा और अन्य कहानियां’ निश्चित रूप से एक पठनीय और उल्लेखनीय कहानी संग्रह है।
  • Badalte Rang
    Ram Swaroop Arora
    150

    Item Code: #KGP-1826

    Availability: In stock

    बदलते रंग
    समय परिवर्तनशील है। समयानुसार सभी प्राणियों में श्रेष्ठ मनुष्य जाति की जीवन शैली एवं संस्कृति भी इस बदलाव से अछूती नहीं रही है। जो जीवन पद्धति, सभ्यता-संस्कृति आज से कुछ ही वर्ष पूर्व तक थी, वह आज परिवर्तित होकर कहाँ की कहाँ पहुँच गई है। हमारा राष्ट्र कालचक्र के प्रवाह से एक नए युग की ओर बढ़ रहा है। कहा नहीं जा सकता कि परिवर्तन का यह रंग उसे किस प्रकार के विकास की ओर ले जाएगा अथवा पतन के गर्त में पहुँचा देगा। इक्कीसवीं शताब्दी का कालक्रम इसका साक्षी होगा।
    प्रस्तुत संग्रह में कुछ कहानियाँ भारतीय स्वतंत्रता के भूले-बिसरे क्रांतिकारियों के जीवन-वृत्त से, कुछ सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन, निजी अनुभव एवं राजस्थान के ग्रामीण कृषि संबंधी कार्यकलापों से तथा कतिपय कथागल्पों से संबंधित हैं, जो हमारे आसपास के जनजीवन पर गहन प्रभाव डालती हैं।
    विद्वान् पाठक इन्हें पढ़कर विचार करें कि हम, हमारा राष्ट्र व समाज तब कहाँ थे और आज कहाँ आ पहुँचे हैं ? क्या हमारा वास्तविक विकास हुआ है ? या अब तक विकास के नाम पर किया गया समस्त कार्य एक छलावा मात्र है तथा अनैतिक, भ्रष्ट एवं पतन की ओर ले जाने वाले कार्यों का एक पुलिंदा है ? मैं अपनी बुद्धि-कल्पना एवं भावनाओं के अनुरूप जो कुछ लिख सका, वह सब आपकी सेवा में समर्पित है।               
    --रामस्वरूप अरोड़ा
  • Paap-Punya Se Pare
    Rajendra Rao
    225 203

    Item Code: #KGP-1832

    Availability: In stock


  • Aur Ant Mein Ishu
    Madhu Kankria
    120

    Item Code: #KGP-160

    Availability: In stock

    ...और अंत में ईशु
    मधु कांकरिया के प्रस्तुत नव्य कथा-संग्रह की कहानियाँ समसामयिक भारतीय जीवन के ऐसे व्यक्तिव के कथामयी रेखाचित्र हैं, जो समाज के मरणासन्न और पुनरुज्जीवित होने की समांतर कथा कहते हैं । इनमें जीवन के विभिन्न क्षेत्रों के वैसे विरोधाभास और वैपरीत्य के दर्शन-दिग्दर्शन होते हैं, जिनसे उत्पन्न विसंगतियों के ही चलते 'दीये तले अँधेरे' वाला मुहावरा प्रामाणिक बना हुआ है।
    आज का जागरुक पाठक सर्जनात्मक कथा-साहित्य में वर्ण और नारी आदि के विमर्शों की अनंत बाढ़ की चपेट में है और ऐसे 'हवा महलों' के संभवत: खिलाफ भी, जो कि उसे ज्ञान जोर संज्ञान के स्तर पर कहीं शून्य में ले जाकर छोड़ देते है । इसके उलट प्रस्तुत कहानियों में जीवन की कालिमा और लालिमा, रति और यति, दीप्ति और दमन एवं प्रचार और संदेश को उनके सही-सही पदासन पर बैठाकर तोला, खोला और परखा गया है । अभिव्यक्ति के स्तर पर विचारों का कोरा रूखापन तारों न रहे, इसलिए लेखिका ने प्रकृति और मनोभावों की शब्दाकृतियों को भी लुभावने ढंग और दुश्यांकन से इन कहानियों में पिरोया है । धर्मांतरण  का विषय हो या कैरियर की सफलता के नाम पर पैसा कमाने की 'मशीन' बनते बच्चों के जीवन की प्रयोजनहीनता ...या फिर स्त्री के नए अवतार में उसके लक्ष्मी भाव और उर्वशीय वांछनाओं की दोहरी पौरुषिक लोलुपताएँ-कथाकार की भाषागत जुलाहागीरी एकदम टिच्च मिलती है। इसे इन कहानियों का महायोग भी कहा जा सकता है ।
    सृजन को जो कथाकार अपने कार्यस्थल के रूप में कायांतरित का देता है, वह अपने शीर्ष की ओर जा रहा सर्जक होता है । विश्वास है कि पाठक को भी यह कृति पढ़कर वेसा ही महसूस होगा। ऐसा अनुभव इसलिए अर्जित हो सका है, क्योंकि ये कहानियाँ जीवन के अभिनंदन पत्र नहीं, बल्कि माननीय अपमान और सम्मान की श्री श्री 1008 भी हैं।
  • Vishwa Ki 51 Chuninda Kahaniyan
    Surendra Tiwari
    995 647

    Item Code: #KGP-580

    Availability: In stock


  • Chhotoo Ustaad
    Swayam Prakash
    200 180

    Item Code: #KGP-728

    Availability: In stock

    इस पुस्तक में संकलित कथाकार स्वयं प्रकाश की कहानियां आकार में छोटी हैं लेकिन प्रभाव में ‘बड़ी’। ये लघुकथाएं नहीं हैं। लघुकथा अकसर एकायामी कथ्य की वाहक होती है और एक निश्चित बिंदु पर प्रहार करती है। जबकि ये कहानियां बहुपर्ती हैं और आपकी पूरी विचार प्रक्रिया को प्रभावित बल्कि परिवर्तित कर देती हैं। मसलन ‘हत्या’ एक ऐसे बच्चे की कहानी है जो जंगल के राजा शेर को सर्कस में रिंग मास्टर के इशारे पर भीत गुलामों की तरह व्यवहार करते देख रो पड़ता है तो ‘बिछुड़ने से पहले’ सड़क और पगडंडी की बातचीत के बहाने विकास के पूंजीवादी मॉडल को प्रश्नांकित करती है। रेटोरिक का इस्तेमाल जिन बहुत ही कम कहानीकारों ने हथियार की तरह किया है उनमें स्वयं प्रकाश एक हैं। ‘सुलझा हुआ आदमी’ में बहुत बोलने वाले और व्यवहार में इससे उलट आचरण करने वाले लोगों पर ‘कहता है’ के माध्यम से बड़ी तीखी गुम चोट की गई है।
    ये कहानियां किसी बड़े कलाकार--मसलन--यामिनी रॉय या मकबूल फिदा हुसैन के रेखाचित्रों की याद दिलाती हैं जिनमें न डिटेल्स की पेशकश होती है, न रंगों का पसारा, लेकिन फिर भी जिनमें कम से कम रेखाओं के माध्यम से एक अभिभूत कर डालने वाली माया का सृजन हो जाता है! और यही इन रचनाओं की सबसे बड़ी खूबी है। पाठकों को इन कहानियों को पढ़ते समय परसाई जी की या आचार्य अत्रो की या पु. ल. देशपांडे की याद आए तो इसे अपनी परंपरा में सुरभित पारिजात के नन्हे फूलों की पावन सुगंध् ही समझना चाहिए। कथाकार स्वयं प्रकाश की ये अद्भुत कहानियां पहली बार किसी संकलन में प्रकाशित हो रही हैं।
  • Brunch Tatha Anya Kahaniyan
    Shailendra Sagar
    225

    Item Code: #KGP-452

    Availability: In stock

    सुपरिचित वरिष्ठ कथाकार शैलेन्द्र सागर के इस संग्रह में आज की उपभोक्तावादी संस्कृति के चलते उभरती सामाजिक-सांस्कृतिक टूट-फूट के तहत जटिल विसंगतियों के दुष्चक्र में फंसे पात्रों की कहानियां दर्ज हैं। अधिकांश कहानियों में स्त्री-पुरुष की परंपरागत छवियों के बरक्स उपभोक्तावादी दौर में बुनते-घुनते संबंधें में दिनोदिन पसरते तनावों, अलगावों और नए पनपते रिश्तों की ऐसी अलक्षित सच्चाइयां पूरी प्रामाणिकता के साथ नजर आती हैं जहां पुराने समय की रूढ़ भूमिकाएं धूमिल हैं और बाजारवाद के बदलते दौर में रिश्ते पहले से ज्यादा जटिल, यथार्थपरक और अवसरवादी होते जा रहे हैं। घर-परिवार से लेकर बाहर की दुनिया में संघर्षरत पात्रों की उद्विग्नता, बेचैनी और संवेदना के क्षरित होने की दास्तां यहां पूरी बेबाकी से उकेरी गई है। सच तो यह है कि संक्रमण के इस संवेदनहीन समय में निष्प्रभ पड़ते संबंधें की बारीकी से पड़ताल करती ये कहानियां आश्वस्त करती हैं कि अचूक अवसरवाद की अंदरूनी चालों को समझने के लिए हमें संवेदना संसार में लौटना पड़ेगा जहां आपको दरारों के बीच दिखेगी मुस्कराहट, अनकही टकराहटों के बीच दिखेगी मनुष्यता और हताशा के बीच कहीं से खिल उठेंगी आशा-उल्लास की कोंपलें भी...।
    विडंबनापूर्ण स्थितियों से उबरने के लिए रिश्तों की कोमलता को बचाए रखने की मुहिम छेड़ती हैं ये कहानियां...
  • Sampurna Kahaniyan : Himanshu Joshi (3 Vol.)
    Himanshu Joshi
    2100 1575

    Item Code: #KGP-9345

    Availability: In stock

    संपूर्ण कहानियां: हिमांशु जोशी
    अपनी पीढ़ी के प्रतिनिधि रचनाकार हिमांशु जोशी की कहानियों  का वैविध्य देखते ही बनता है। उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल से आने वाले हिमांशु जी की कहानियां एक ओर अपनी जमीन से जुड़ने की ललक लिए हैं, तो दूसरी ओर विश्व के मनुष्य के दुःख-सुख और संवेदनात्मक पड़ताल की जरूरत के महत्त्व को रेखांकित करती हैं। छह दशक से भी अधिक के अपने कहानी लेखन में इस महत्त्वपूर्ण रचनाकार ने 167 कहानियां लिखीं। साहित्य प्रेमियों, शोधर्थियों और कहानी के अध्येताओं की सुविधा  के लिए इन कहानियों को क्रमशः तीन खंडों में प्रस्तुत किया गया है। इन्हें एक साथ पढ़ते हुए हिमांशु जोशी के कहानीकार के क्रमिक विकास की पहचान भी की जा सकती है।
    इसके पहले भाग में वर्ष 1956 से 1962 तक की कहानियां, दूसरे भाग में वर्ष 1963 से 1976 तक की कहानियां और तीसरे भाग में वर्ष 1980 से 2009 तक की कहानियां शामिल की गई हैं। उनकी इस कथा-यात्रा में अनेक कहानियां ऐसी हैं जिन्हें हिंदी कहानी के इतिहास में मील का पत्थर कहा जा सकता है। कहना अवश्य होगा कि इसीलिए आधुनिक  हिंदी कहानी के इतिहास में उनकी एक अनिवार्य उपस्थिति है। इस दृष्टि से यह एक संग्रहणीय ग्रंथ है जिसके अध्ययन से एक ईमानदार रचना-यात्रा की नई पड़ताल की जा सकती है। 
  • Hindustan Ki Diary
    Dirgha Narayan
    350 298

    Item Code: #KGP-HKD HB

    Availability: In stock

    'हिंदुस्तान की डायरी' में दीर्घ नारायण के कहानीकार का वह रूप सहज ही नजर आ जाता है जिसमें वह कहानी को अपने समय, समाज व बदलती संस्कृति की धड़कन बना देना चाहते हैं। यहाँ अनुभव जिंदगी से निकलकर चौदह कहानियों में इस तरह प्रविष्ट हो गए हैं कि विविध पक्षीय संबंधों-मूल्यों पर संजीदगी से विचार होता चलता है। वर्तमान को तो ये कहानियाँ गहराई से अंकित करती ही हैं, एक गंभीर व सकारात्मक भविष्य-दृष्टि भी सृजित करती हैं जिससे हमारे समाज को संचालित करने वाली शक्तियाँ सचेत हो सकेंगी। लेखक की यह एक वाजिब चिंता है कि भारत का हर नागरिक तो पाकिस्तान में अमन-चैन व तरक्की ही चाहता है किंतु दुर्भाग्य यह है कि पाकिस्तान की नजर में सबसे बड़ा शत्रु भारत बना हुआ है। भारत की ओर से दरअसल यह एक ईमानदार डायरी है जिससे दोनों ओर के हुक्मरानों को सही दिशा मिल सकती है। अपने यथार्थ में एक मुख्य अधिशासी अधिकारी की ये कहानियाँ बदलते समय में उन दस्तकों की शिनाख्त हैं। जो परिवार, शहर, देश और समाज के दरवाजों पर सुनाई पड़ रही हैं। यहाँ भाषा ऐसी दोस्ताना है कि कथा के पात्रों और स्थितियों का मूल भाव बड़ी सहजता से संप्रेषित हो जाता है। रूपवादी लटकों-झटकों से संघर्ष कर रही आज की हिंदी कहानी के लिए दीर्घ नारायण जी की ये कहानियाँ एक सार्थक मार्ग प्रशस्त कर सकती हैं क्योंकि यहाँ हर कहानी एक नया कथ्य खोजकर लाती है और यथार्थ से सीधी मुठभेड़ करती है 
  • Gyarah Shreshtha Kahaniyan
    Kamleshwar
    115

    Item Code: #KGP-804

    Availability: In stock

    ग्यारह श्रेष्ठ कहानियां
    हिंदी कहानी ने अपनी यात्रा में अनेक सुगम और दुर्गम मार्ग तय किए हैं । वैदिक साहित्य की आख्यायिकाओं तथा ब्राह्मण ग्रंथों में आए अनेक आख्यान हमारी कहानी-परंपरा के आदि स्रोत रहे हैं । सर्जना की सर्वथा लोकप्रिय विधा रहने के कारण कहानी, लेखकों की लेखनी की लाडली विधा भी बनी रही और संभवत: इसीलिए कहानी के अलंकरण और उपयोग निरंतर विकासमान रहे । प्रेमचंद और प्रसाद ने हिंदी कहानी को जिस श्रेष्ठ लोकहित में मर्यादित और निर्धारित किया, उसकी अनुगूँजें आज भी हिंदी के युवा कथाकारों की रचनाओं में प्रवहमान है ।
    जनप्रियता के कारण हिंदी कहानी की गति को खूब-खूब  उतार-चढाव भी देखने पड़े तथा कथा-आंदोलनों के शोर में विशिष्ट कहानियों के प्रभामंडल का पहचान पाना तक एक मुश्किल कार्य हो गया । कहीं अनुभूत यथार्थ के चित्रण  का शोर, तो यहीं कल्पनावृत्ति को तिलांजलि देने की जिद । ऐसे में कहानी की रचनाशीलता को समग्रता में हानि पहुंची। मगर इस गुलगपाड़े के बीच जो अच्छी कहानियाँ लिखी गई, वे ही अंतत: हमारी कथा-धरोहर भी बनती गई हैं।
    प्रस्तुत संकलन से संपादकद्वय ने हिंदी की ऐसी श्रेष्ठ कहानियों को प्रस्तुत किया है जो अपने पाठ के माध्यम से हमें लौकिक बनाती हैं तथा हमारे सामाजिक संज्ञान और सरोकारों को, समय की कसौटी पर कुशलता से स्थापित और उद्वेलित करती हैं। व्यक्ति भले ही न रहे, मगर पात्र का चित्रण उस व्यक्ति का शाश्चता सौंप सके-ऐसी क्षमता जिन कहानियों में समाहित है-उन्हें ही प्रस्तुत संग्रह में संकलित किया गया है । प्रेमचंद, जयशंकर पसार तथा विष्णु प्रभाकर आदि वरिष्ट कथाकारों की कालजयी कहानियों के साथ-साथ, अन्य सुप्रतिष्ठित कहानीकारों की कहानियाँ भी पाठक एवं साहित्य के छात्र इस एक ही जिल्द से पढ़कर लाभान्वित होंगे, इसी आशमा और अपेक्षा के साथ यह संग्रह आपको सौंपा जा रहा है ।
  • Daastan Ek Jangali Raat Ki
    Kamleshwar
    225 203

    Item Code: #KGP-803

    Availability: In stock

    दास्तान एक जंगली रात की
    सूरज जाने कितनी देर से अपने घर नहीं लौटा था, और अँधेरे की कालिख़ में पागल आवारा घूमती ठंड के कारण आम के सभी दरख़्तों का बौर झर गया था।
    अँधेरे काले पानी वाले दरिया के किनारों पर बेशुमार किश्तियाँ औंधी पड़ी हुई थीं, क्योंकि रात के अँधेरे में किश्तियाँ पानी पर नहीं तैरा करतीं। 
    अभी तो काली अँधेरी रात थी। गिद्ध के फैले हुए डैनों की तरह अपना स्याह चोले जैसा काला कुर्ता हिलाती, फहराती, अँधेरे के कीचड़ में आड़ा-तिरछा चलती। भयानक और हौलनाक !
    तभी शेर की दहाड़ से काली रात का जंगल काँप उठा।
    थरथराते हुए ख़रगोश के दोनों बच्चे अपनी माँ से चिपक गए।
    शेर की दहाड़ की प्रतिगूँज बहुत देर तक दाएँ-बाएँ, ऊपर-नीचे, चारों दिशाओं से, यहाँ तक कि धरती के पेट में से भी सुनाई देती रही।
    काफी समय बीत गया।
    एक छोटे ख़रगोश ने काँपते-काँपते माँ से पूछा, "माँ, ये शेर इस काली-स्याह रात में कैसे घूमता-फिरता है ?"
    माँ ने बहुत धीमी आवाज़ में अपने बच्चों को समझाया, "मेरे बच्चो, काली-स्याह रात शेर और चीतों की आँखों में ख़ून के रंग की सुखऱ् मशालें जला देती है। उसकी रोशनी में वे ख़ून और गोश्त की तलाश में घूमते रहते हैं। चुपचाप बैठो मेरे बच्चो, नहीं तो...," और उसका गला भर आया। वह चुप हो गई।
    [इसी संग्रह से]
  • Vaya Pandepur Chauraha
    A.M. Nayar
    350 291

    Item Code: #KGP-249

    Availability: In stock

    डा. नीरजा माधव हिंदी कथा-साहित्य का एक जाना- पहचाना नाम है। अनेक विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों तथा छोटी कक्षाओं में भी उनकी कहानियां, कविताएं और उपन्यास पढ़ाए जा रहे हैं। नित नई और अनछुई भूमि पर अपना कथानक रचने वाली डा. नीरजा माधव ‘वाया पांड़ेपुर चैराहा’ के माध्यम से ‘इम्पोटेंट इन्टेलीजेंसिया’ का एक भीतरी चेहरा बेनकाब करती हैं। किस तरह आज का बुद्धिजीवी मुखौटा लगाए सामाजिक सरोकारों की बात करता है, किस प्रकार शस्त्र बने शब्दों का मुंह स्वयं अपनी ओर घूम जाता है और हम तिलमिला उठते हैं अपना ही असली चेहरा देख। मानव मन की कृत्रिमता और विवशता को परत दर परत उधेड़ने वाली अलग ढंग की कहानियों का अनूठा संग्रह है--‘वाया पांड़ेपुर चैराहा’।
  • Udaanein Oonchi Oonchi
    Krishna Agnihotri
    350 280

    Item Code: #KGP-9377

    Availability: In stock

    कृष्णा अग्निहोत्री वरिष्ठ रचनाकार हैं उन्होंने कहानी, उपन्यास तथा आत्मकथा आदि विधाओं में अपने लेखन से पाठकों को प्रभावित किया हैं उनकी सर्वोपरि विशेषता है-स्पष्टता, पठनीयता और बेबाकी। यह कहानी संग्रह पढ़ते हुए पाठक अनुभव करेंगे कि जीवन के साथ रचना का भी एक लंबा अनुभव यहां आकार ले रहा है।
    इन कहानियों में जीवन के विविध आयाम व परिवेश हैं। आदिवासी भी कठिनाइयों से जूझ रहे हैं। उल्लेखनीय यह है कि प्रत्येक कहानी अपनी विशेष मौलिकता से पूर्ण है। भाषा सरल पर ग्राह्य एवं अर्थपूर्ण है। समस्त लेखन मनोरंजन के साथ सोद्देश्यपूर्ण सार्थकता से भरपूर व संवेदनाओं की कसौटी पर खरा है।
  • Kannu
    Ajeet Kaur
    240 216

    Item Code: #KGP-294

    Availability: In stock

    अजीत कौर का लेखन, जीवन की ऊहापोह को समझने और उसके यथार्थ को उकेरने की एक ईमानदार कोशिश है। उनकी रचनाओं में न केवल नारी का संघर्ष और उसके प्रति समाज का असंगत दृष्टिकोण रेखांकित होता है, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक विकृतियों और सत्ता के गलियारों में व्याप्त बेहया भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक ज़ोरदार मुहिम भी नज़र आती है।
    अजीत कौर ने विभाजन की त्रासदी को झेला है। लोगों को घर से बेघर होकर, आँधी में उड़ते सूखे पत्तों की तरह भटकते देखा है, जिनमें वह खुद भी शामिल थीं। 1984 में बेगुनाह सिखों का क़त्लेआम होते देखा है। गुजरात में निरंकुश हिंसा का तांडव देखा है। अफ़ग़ानिस्तान, इराक़, रवांडा, यूगोस्लाविया, फ़िलिस्तीन में लोगों की तबाही का दर्द महसूस  किया है। साठ लाख यहूदियों के क़त्ल की दास्तानें सुनते उनका बचपन गुज़रा है। फ़िलिस्तीनियों के पीढ़ी-दर-पीढ़ी बेघर होकर रहने, उनकी तबाही और बौखलाए गुस्से से उनकी आत्मा में ख़रोंचें आई हैं। उन्हें तीखा अहसास है व्यापक भूख का-भारत में, एशिया में, सूडान में, अफ्रीका में।
    उनकी कहानियों में न केवल बेक़सूर, निहत्थे लोगों के क़त्ल का दर्द है, बल्कि पेड़ों के कटने का, पंछियों के मरने का, चींटियों के बेघर होने का, नदियों के सूखने का और जंगलों की आखि़री पुकार का भी शिद्दत से अहसास है। 
    अजीत कौर के लेखन में यह संघर्ष और ये समस्याएँ पूरी संवेदन- शीलता, सजगता और आक्रोश के साथ प्रतिबिंबित हैं। इन सरोकारों के लिए वे सुप्रीम कोर्ट तक लड़ती भी हैं, ख़ासकर पर्यावरण और सांस्कृतिक विरासत को बचाने के लिए।
    इन सरोकारों के लिए ही उन्होंने अपनी समूची पैतृक संपत्ति बेचकर और बेटी अर्पणा की पेंटिंग्ज़ बेच-बेचकर एक महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक संस्था एकेडेमी ऑफ  फ़ाइन आर्ट्स एंड लिट्रेचर की स्थापना की, जो संस्कृति और कला का एक बहुआयामी केंद्र है।
    एकेडेमी का एक विशेष कार्यक्रम है समाज के आर्थिक रूप से कमज़ोर तथा पिछड़े वर्ग की बालिकाओं को शिक्षा देना और व्यावसायिक प्रशिक्षण द्वारा उनका आर्थिक सशक्तीकरण करना।
    अजीत कौर का लक्ष्य है सार्क देशों के सही सोच वाले लोगों को एकजुट करना। इसी इरादे से उन्होंने 1987 में फ़ाउंडेशन ऑफ सार्क राइटर्स एंड लिट्रेचर की स्थापना की और सार्क देशों के साहित्यकारों, कलाकारों और बुद्धिजीवियों को एक मंच पर इकट्ठा किया है। उद्देश्य: आपसी मतभेदों से ऊपर उठकर, सार्क देशों में भाईचारे और सहयोग की भावना का विकास करना।
  • Kasbe Ka Aadmi
    Kamleshwar
    180 162

    Item Code: #KGP1560

    Availability: In stock

    ‘नयी कहानी’ आंदोलन ने हिंदी साहित्य को जो बड़े रचनाकार दिए उनमें कमलेश्वर का नाम प्रमुख है। इस आंदोलन ने सहसा एक नई पीढ़ी की ऊर्जावान, क्षमताशील और नवताप्रिय रचनाशीलता को पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत किया। इसके प्रमुख रचनाकार व सिद्धांत-शिल्पी के रूप में कमलेश्वर का ऐतिहासिक योगदान सर्वस्वीकार्य है। कमलेश्वर ने अपनी कहानियों में किस्सागोई और आधुनिक जीवनदृष्टि का ऐसा सहमेल किया कि एक व्यापक पाठक वर्ग में उनको आदर प्राप्त हुआ। स्थानीयता के प्रति उनमें सहज प्रीति थी। इसलिए जब उन्हें और उनके समकालीन कुछ कहानीकारों को ‘कस्बे का कहानीकार’ कहा गया तो उन्हें कुछ खास एतराज न हुआ। कमलेश्वर तो बस सामान्य जनजीवन के कुछ अनछुए सत्य अपनी कहानियों में प्रकट करना चाहते थे।
    ‘कस्बे का आदमी’ कमलेश्वर की उन कहानियों का संग्रह है जिन्होंने उनके कहानीकार के सरोकार विस्तृत किए। एक सुसंपादित शिल्प, भाषा, संवाद, विवरण आदि के साथ सामने आई रचनाओं में नए युग का तेज था। कमलेश्वर जनसमुद्र में उठने-गिरने वाली लहरों पर लिखी इच्छाओं, हताशाओं, स्वप्नावलियों और कोशिशों को बखूबी पहचानते थे। वे परंपरा भंजक भी थे और नवीन प्रस्तावों के प्रेरक भी। यही कारण है कि प्रस्तुत संग्रह में शामिल कहानियां जीवन का नया आस्वाद देती हैं। हालांकि जीवन जाना-पहचाना है लेकिन जिस कोण से लेखक ने इसे देखा-परखा वह चैंकाता है। कहानियों में जीवन संवाद करता है। एक कहानी के वाक्य हैं, ‘व्यक्ति इत्र छिड़ककर फूल सूंघता हुआ इन फटेहालों के बीच से निरपेक्ष होकर गुजर सकता है, आदमी नहीं। व्यक्ति सुरक्षा चाहता है, आदमी स्वतंत्रता चाहता है। सुरक्षा और स्वतंत्रता में बड़ा अंतर है।’ यह संग्रह ‘नयी कहानी’ की आंदोलनधर्मी सक्रियताओं से उत्पन्न चेतना से ओतप्रोत है। कमलेश्वर की जादुई भाषा जैसे इनमें बोलती है। अपने समय के तमाम उद्वेलनों को व्यक्त करता एक महत्त्वपूर्ण कहानी संग्रह।
  • Saadat Hasan Manto Ki Kahaniyan
    Narendra Mohan
    600 450

    Item Code: #KGP-1953

    Availability: In stock

    सआदत हसल मंटो उर्दू के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण, चर्चित और विवादास्पद लेखक हैं। इस एक लेखक को लेकर जितनी चर्चाएं उठी हैं, उतनी अन्य किसी लेखक को लेकर नहीं। मंटो की खासियत है कि उसने नये विषयों पर ही नहीं लिखा, नये अन्दाजेबयां और नजरिये से भी लिखा। इस एक बात ने उन्हें अपने समय का ही नहीं, आज के समय का भी एक बड़ा कहानीकार बना दिया है।
    मंटो की कहानियां पाठकों की अन्तश्चेतना को बुरी तरह झकझोरने वाली, तिलमिला देने वाले विचारों तक ले जाने वाली हैं। यह बेचैनी महज व्यक्तिगत नहीं है, मुल्क और कौम की बेचैनी से जुड़ी हुई है जो कहानियों की मार्फत पाठकों तक सीधे पहुंचती है। उनकी कहानियों में गहरी मानवीय दृष्टि के साथ-साथ तीव्र आक्रोश और प्रतिकार भी है। हरारत और रोशनी, स्वप्न और दुःस्वप्न उनकी सृजनात्मक प्रेरणा के हिस्से हैं। इन कहानियों के जरिये मंटो हमें विसंगति-भरी जिन्दगी में जीने की शर्त का गहरा एहसास कराते हैं।
    सआदत हसन मंटो की कहानियां पुस्तक में मंटो के कथा-संसार में झांकने का, उनकी कहानियों को चुनकर, एक परिप्रेक्ष्य देकर हमारे सामने पेश करने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है हिन्दी के जाने-माने कवि, नाटककार और आलोचक डाॅ. नरेन्द्र मोहन ने। मंटो की सृजनात्मक प्रेरणा और संपादकीय दृष्टि में आश्चर्यजनक साम्य है-एक-दूसरी में खुलती गई हैं और उन्हें अलगाया नहीं जा सकता। इससे यह पुस्तक कहानियों का संकलन-भर नहीं रही है, एक दस्तावेज बन गई है।

  • Kab Tak Pukarun
    Shanta Kumar
    200

    Item Code: #KGP-9335

    Availability: In stock

    ‘कब तक पुकारूं’ शान्ता कुमार और संतोष शैलजा की कुछ महत्त्वपूर्ण कहानियों का संग्रह है। हिंदी साहित्य में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जहां पति व पत्नी दोनों लेखक के रूप में प्रतिष्ठित होते हैं। जैसे—धर्मवीर भारती-पुष्पा भारती, राजेन्द्र यादव-मन्नू भंडारी, रवीन्द्र कालिया-ममता कालिया। इसी क्रम में शान्ता कुमार और संतोष शैलजा का नाम भी लिया जाना चाहिए। दोनों अत्यंत संवेदनशील, विचारवान और अभिव्यक्ति-निपुण रचनाकार हैं। प्रस्तुत संग्रह की कहानियों को पढ़कर इस बात की तसदीक की जा सकती है।
    ये कहानियां विषयवस्तु की दृष्टि से पर्याप्त समृद्ध हैं। आधुनिक समाज की विसंगतियों से लेकर चंद्रगुप्त मौर्य-ध्रुवस्वामिनी व नेपोलियन के कथासूत्रों तक रचनाओं का विस्तार है। लेखकद्वय ने मानवता के दृष्टिकोण से कथा-स्थितियों और चरित्रों को विस्तार दिया है। उदाहरण के लिए ‘गोल दायरा’ में नेपोलियन विश्वमानवता एवं सृष्टि-सत्य को उपेक्षित करने के कारण ‘सेंट हेलना’ द्वीप में अंतिम सांस लेने के लिए विवश हुआ था। ‘समर्पण’ में ‘भामति टीकाकार’ वाचस्पति और भामति का अद्भुत दांपत्य मन को छू लेता है। ‘बेतवा की लहरें’, ‘कलाई’, ‘ज्योतिर्मयी’ और ‘जरी-पटका’ कहानियां इतिहास-रस से आप्लावित हैं। ‘कलाई’ की भाषा विशेषतः उल्लेखनीय है—‘प्रकाश की धीमी लौ में ध्रुवस्वामिनी की मानिनी आकृति दमक रही थी। इस साहस व दृढ़ता ने उसके सौंदर्य को सौ गुना बढ़ा दिया था।’
    लेखकद्वय मानव मनोविज्ञान के गहरे पारखी हैं। अपनी-अपनी कहानियों में उन्होंने यह सिद्ध भी किया है। ‘जब फूल खिल उठे’ कहानी वैसे तो एक मीठी प्रेम कहानी है, मगर इसमें घर के बच्चों का मनोविज्ञान सुंदर ढंग से व्यक्त किया गया है। इस संग्रह की कुछ रचनाएं अतीत को वर्तमान संदर्भों में देखते हुए विकसित हुई हैं। ‘न्यू सीता’ में स्त्राी जीवन का एक नया आयाम है जो पौराणिक सीता से जुदा है। ‘रज्जो काकी’ भी स्त्राी विमर्श का एक मार्मिक पक्ष है।
    समग्रतः यह कहानी संग्रह दो उत्कृष्ट रचनाकारों की रचनाओं से समृद्ध है। इसे पढ़ते हुए संवेदना, विचार और इतिहास के अनेक पक्ष झिलमिलाने लगते हैं।
  • Ek Koi Aur
    Amrik Singh 'Deep'
    250 225

    Item Code: #KGP-863

    Availability: In stock

    एक कोई और
    सुपरिचित कथाकार अमरीक सिंह दीप के अब तक पांच कहानी-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। एक वाक्य में कहा जाए तो दीप जी मानवीय समाज में पसरती पाशविकता और इंसानी रिश्तों में समाती संवेदनशून्यता के प्रति चिंतनशील रचनाकार हैं। उनकी कहानियां अधिकतर मनुष्यता के पक्ष में ही नहीं खड़ी दिखाई देतीं, बल्कि अमानवीय व्यवहार का मुखर विरोध भी करती हैं। उनके छठे कहानी-संग्रह ‘एक कोई और’ की कहानियां भी लेखक के इसी मनोभाव से उपजी हैं। भले ही इन कहानियों के कथानक, देशकाल, पात्र और कथोपकथन एक-दूसरे से भिन्न हैं, लेकिन इन सभी के मूल में आदर्श मानवीय मूल्यों को स्थापित करने का स्वर सुनाई पड़ता है।
    इस संग्रह की कहानियां कुछ मायनों में दीप जी की पूर्ववर्ती कहानियों से अलग नज़र आती हैं। यानी ये कहानियां, कहानी के बने-बनाए फॉर्मेट से अलग खुद अपना आकार-प्रकार, गति और दिशा तय करती हैं। कुछ कहानियां तो अपने अंतिम सोपान तक पहुंचते-पहुंचते चौंकाती भी हैं। मिसाल के तौर पर कहानी ‘बर्फ़’ में एक मां का अपनी बेटी के प्रेमी के पास जाकर उसे मां बनाने का आग्रह करना, रिश्तों की नई परिभाषा गढ़ती दिखती है। यहां पर याद आती है लेखक की एक और क्लासिक कहानी ‘देहदान’, जो पारंपरिक इंसानी रिश्तों को परिस्थितिवश नए ढंग से रचती है।
    इस संग्रह का आना इसलिए भी सुखद है, क्योंकि उम्र के सात दशक स्पर्श करने की दहलीज़ पर खड़े अमरीक सिंह पूरी ऊर्जा के साथ रचनारत हैं और धूल-धुएं और मेहनतकशों के शहर कानपुर की साहित्यिक रचनाशीलता में लगातार इज़ाफ़ा भी कर रहे हैं।
  • Antim Padaav
    Hari Yash Rai
    180 162

    Item Code: #KGP-1825

    Availability: In stock

    अंतिम पड़ाव
    आज हम समय के जिस दौर से गुज़र रहे हैं, उसमें दुनिया की बढ़ती समृद्धि और वैभव की सर्वभक्षी आकांक्षा सुकून देने के बजाय बेहद डराने वाली है। इस दौर में मनुष्यता का विघटन और क्षरण इतनी तेज़ी से हो रहा है कि सारा वैभव-प्रसार, पुरानी प्रतीकात्मक मिथकीय भाषा में कहूँ तो आसुरी लगता है। यह मात्र संयोग नहीं है, बल्कि योजनाबद्ध है कि ‘ताकतवर’ होते मध्यवर्ग की निगाह को पूँजी की ताकतों ने उन सवालों की ओर से फेर देने में लगभग ‘सफलता’ हासिल कर ली है, जो कभी मनुष्यता की तरफदारी में हर गली-चैराहे को अपनी आवाज़ से गुँजाते थे। गनीमत है कि ऐसे क्रूर दौर में भी कुछ लोग हैं जो साहित्य, संस्कृति, कला और राजनीति में एक ज़िद के साथ मनुष्यता, नैतिकता और न्याय के सरोकारों के पास से न हटने का हठ ठाने हुए हैं। कथाकारों की ऐसी पाँत में हरियश राय का नाम तेज़ी से उभर रहा है, जो कहानी- कला की बारीकियों की ज़्यादा परवाह न करके मनुष्यता के पक्ष में जी-जान से खड़ा है। 
    हरियश अपनी कहानियों के लिए कथा-सामग्री का चयन रोज़मर्रा की उस उपेक्षित-तिरस्कृत दुनिया के अनुभवों के बीच से करते हैं, जो अब सामान्यतया अघाए लोगों के लिए सोच-विचार तक की चीज भी नहीं रह गई है। वे लगातार कोशिश करते रहे हैं कि अपने मध्यवर्गीय जीवन की सँकरी-सिकुड़ी चैहद्दियों को छोड़कर उन किसानों की ज़िंदगी के विस्तृत मैदान में जाएँ, जहाँ आज भी सबसे बड़ा सहारा धरती, सूरज, चाँद और वर्षा का है। दुनिया के बदल जाने और एक विश्वग्राम बन जाने के कनफोड़ू शोर में कितना ठहराव है, यह उनकी कहानियाँ पढ़कर जाना जा सकता है। यह ठहराव एक वर्ग और जगह का नहीं है। यह जगह-जगह है। यह तेज़ गति से दौड़ते राजधानी-नगरों के आसपास मौजूद है। इसे वृंदावन जैसे उन तीर्थ-नगरों के भजनाश्रमों में अनुभव किया जा सकता है, जहाँ जिजीविषाओं और शवों में बहुत दूरी नहीं रह गई है। ज़रूरत है इसे देखने, जानने, शिद्दत से महसूस करने और बदलने की कोशिश में लग जाने की। कदाचित् ये कहानियाँ ऐसा कुछ कर जाने की आकांक्षा में जन्मी और बड़ी हुई हैं।    
  • Toba Teksingh Tatha Anya Kahaniyan
    Saadat Hasan Manto
    180 162

    Item Code: #KGP-1941

    Availability: In stock


  • Kahavaton Aur Muhavaron Ki Kahaniyan
    Vishv Nath Gupta
    200 180

    Item Code: #Kgp-kamkk

    Availability: In stock


  • Zanjeer Bol Uthi
    Jaidi Zafar Raza
    180 162

    Item Code: #KGP-1839

    Availability: In stock

    ज़ंजीर बोल उठी
    घटनाओं का कालक्रम में होना इतिहास नहीं बुनता। हाँ, घटनाएँ जब ठहरकर संवाद की स्थिति बनाती हैं और समय के भाल पर अपना निशान छोड़ जाती हैं तो इतिहास के अंकुर स्वतः फूट पड़ते हैं। डॉ जै़दी के कहानी-संग्रह ‘ज़ंजीर बोल उठी’ की चार-पाँच कहानियाँ शुद्ध ऐतिहासिक हैं। इनमें व्यथा भी है और आक्रोश भी। कारण यह है कि ये अपने समय की ज़मीनी सच्चाई और बुनियादी सवालों को उठाती हैं और तर्क एवं तथ्य की तलाश में वर्तमान से अतीत तक का सफ़र तय करती हैं। इनमें बौद्धिक संवादों की टकराहटों के बजाय समय की ओट में छुपी विसंगतियों को उधेड़ने की शक्ति है जो सियासी शतरंज की बिसात को उलटने का साहस रखती है। इन कहानियों के तेवर तीखे और तल्ख़ ज़रूर हैं, मगर साथ ही इन कहानियों में संवेदनारूपी सरिता का प्रवाह बड़ी सहज गति से बहता महसूस होता है, जो शब्दों पर विश्वास को बहाल और निराशा को आशा में बदलने में ख़ासा सक्षम है। ये कहानियाँ अपने ईमानदाराना प्रयास के चलते अरसे तक पढ़ने वालों की सोच में अटकी रहेंगी।
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