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travelogue

  • grid
  • Kranti Abhi Adhoori Hai
    Shanta Kumar
    300 240

    Item Code: #KGP-256

    Availability: In stock

    देश की राजनीति को आज लोकप्रिय नारों की इस अव्यावहारिक जकड़न से बाहर निकालने की आवश्यकता है। गरीबों को बांटते रहने से गरीबी दूर नहीं होगी, लोगों को भिखरी बनाकर और सरकार की खैरात पर जीवित रहने की शिक्षा देकर राष्ट्रीय स्वाभिमान नहीं जागेगा। देश के राजनीतिक चिंतक में क्रांतिकारी परिवर्तन की आवश्यकता है।
    क्रांतिकारी परिवर्तन की आवश्यकता केवल गरीबी मिटाने से संबंधित नहीं है। इसमंे अनेक प्रश्न और मुद्दे ऐसे हैं, जिनमें आमूल परिवर्तन अपेक्षित है। इसी प्रकार जटिल समस्याओं से जूझने हेतु अभी देश में क्रांतिकारी कदम उठाने शेष हैं।
    प्रस्तुत पुस्तक के लेखों में अधूरी क्रांति को कैसे पूर्ण किया जा सकता है, इस पर विस्तार से बताया गया है। 
  • Har Baar Musaphir Hota Hoon
    Pratap Sehgal
    280 238

    Item Code: #KGP-611

    Availability: In stock

    हर बार मुसाफिर होता हूं' के यात्रा-वृत्तांत निरे वृतांत नहीं हैं। निरे वृतांत कभी भी यात्रा-साहित्य का हिस्सा नहीं बन सकते। यह यात्रा-वृतांत कभी इतिहास की गलियों से गुज़रते हुए आपको अतीत के किसी पन्ने से जोड़ देते हैं तो कभी भूगोल में प्रवेश करते हुए आपको उसी जगह ले जाकर खड़ा कर देते हैं, जिस जगह का जिक्र लेखक कर रहा है। कभी आप उस जगह के लोक के रीति-रिवाजों से रू-ब-रू होते हैं, कभी वहां के सांस्कृतिक घटकों का तो कभी वहीं की प्राकृतिक संपदा और सौंदर्य का हिस्सा बन जाते हैं।
    विविध विधाओं में लेखन करने वाले लेखक प्रताप सहगल एक घुमंतू जीव भी हैं, यह जानकारी इन यात्रा-वृतांतों को पढ़कर पुख्ता होती है। वन वृत्तातों में कहीं कविता, कहीं नाटक और कहीं कथा का रंग मिलने लगना कोई अजूबा नहीं बल्कि इसे लेखक का शैल्पिक वैशिष्टय ही मानना चाहिए।
    ये यात्रा-वृत्तात इसलिए भी विशिष्ट हो जाते है कि लेखक वर्णित स्थान, समय और वहीं समाहित सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश का रूपांकन किनारे या किसी सिरे पर खडा होकर नहीं करता। यह सीधे-सीधे स्थान, समय और परिवेश में दाखिल होकर उसका हिस्सा बनकर जीता है और खुद की भी वहीं शामिल कर लेता है। अपने इन्हीं अनुभवों को पाठक के साथ साझा करने की इच्छा ही लेखक को शब्द का सहारा लेने के लिए विवश करती है। और इसी बहाने और तमाम सार्थक यात्रा-वृत्तांतों की तरह से यह यात्रा-वृत्तांत भी हिंदी के वृहद यात्रा-साहित्य के द्वार पर दस्तक देते हुए आपके हाथ में है।
  • Ek Rang Hota Hai Neela
    Meera Sikri
    180

    Item Code: #KGP-496

    Availability: In stock

    यात्राएं मनुष्यता का विस्तार करती है। सभ्यता और संस्कृति के जाने कितने सूत्र यात्राओं से जुड़े है। अनुभव, बोध और वैविध्य का सहज समावेश जीवन को प्रशस्त बनाता है; यात्राएं यह अवसर भी देती हैं। 'एक रग होता है नीला' मीरा सीकरी का यात्रा संस्मरण है।
    मीरा सीकरी एक संवेदनशील रचनाकार के रूप में जानी जाती है। स्वाभाविक है कि जब एक रचनात्मक व्यक्ति यात्रा करता है तो केवल भूगोल में प्रवेश या पदार्पण नहीं करता। वह जीवन के न जाने कितने व्यक्त अकथनीय आयामों में यात्रा कर आता है। इस यात्रा संस्मरण में केन्या, अमेरिका, मलेशिया, मॉरीशास के साथ पोर्ट ब्लेयर, लेह-लद्दाख, केरल, अमरकंटक, पांडिचेरी, बनारस आदि से जुड़ी बातें हैं। इन देशी-विदेशी स्थलों पर घूमते हुए वहीं के तमाम प्रसिद्ध प्राकृतिक वैभव का साक्षात्कार करते हुए और समय के कई सिरों को एक जगह मिलते देखते हुए लेखिका एक अनिर्वचनीय आनंद में खो जाती है। लेखिका का विचारशील मन जाने कहां-कहां घुम आता है। वह आलोचनात्मक मन भी है और सौंदर्य-प्रेमी भी। एक जगह मीरा सीकरी लिखती है, 'पोर्ट ब्लेयर की भूमि अपने जख्मों को लाख छिपाने की कोशिश करे, वे छिप नहीं पाते। यद्यपि वे जख्म सूख गए हैं, पर उनके दाग यह बता रहे हैं कि यहां को सांस तो सामान्य हो चुकी है, पर उसके साथ निकलती टीस की ध्वनि को सुने बिना आप रह नहीं सकते।' ये ध्वनियां  वही व्यक्ति सुन सकता है जिसके भीतर इतिहासबोध हो। कहना जरूरी है कि मीरा सीकरी ने देश और काल का तार्किक साक्षात्कार किया है।
    यह पुस्तक उस तरह की डायरी नहीं जिसमें अव्यर्थ और व्यर्थ सब टंका रहता है। इसमें वे अंश है जो भावनात्मक तीव्रता के कारणा स्मृति का हिस्सा बन गए हैँ।
  • Rangon Ki Gandh-2
    Govind Mishra
    595 446

    Item Code: #KGP-9161

    Availability: In stock

    रंगों की गंध-2

    यात्रा जीवन के दूसरे अनुभवों से थोड़े अलग किस्म का अनुभव है। जहां दूसरे अनुभव हमें साफ-साफ जोड़ते-तोड़ते हैं, अपनी अंतरंगता में चरमरा डालते हैं या फिर सूखा-सूखा और दूर-दूर रखते हैं...वहां यात्रा दूसरी रखते हुए भी पास लाती हे, हम अपने खोल से बाहर निकलकर संसार की व्यापकता को छूते होते हैं। व्यापकता की यह छांह दुखी व्यक्ति को टूटने से बचाती है। स्वयं से थोड़ा वैराग्य और बाहर से जुड़ना दोनों एक साथ होता चलता है। मेरे लिए जो इससे बड़ी बात है, वह यह कि यात्रा में हम चलते हैं, हर हाल में चलते रहना-यह मेरी जिद दृढ़तर करती है यात्रा।
    -गोविन्द मिश्र
  • Jyotipunj Himalaya
    Vishnu Prabhakar
    400 300

    Item Code: #KGP-568

    Availability: In stock

    ज्योतिपुंज हिमालय
    किन्हीं के लिए हिमालय प्रणव की भूमि है, किन्हीं के लिए प्रणय की रम्यस्थली, कोई यहाँ प्रेरणा पाता है तो किसी के लिए यह पलायन का स्थान है। ये सब तो मानव की सीमित कल्पना की सीमा-रेखा के रूप हैं। अपने आप में तो यह मूक तपस्वी सौंदर्य और साधना में कोई अंतर नहीं मानता। इसीलिए किसी भी कारण से हो, सर-सरिताओं, वृक्ष-पादपों, पशु- पक्षियों और औषधियों के समान ही मानव को भी उसने सदा शरण दी है। शरण के वे स्थान आज भी वर्ष में आठ मास तक मानवीय क्रीड़ा से गूँजते रहते हैं। उसकी छोटी-छोटी चोटियों पर तो वर्ष-भर बस्तियाँ बसी रहती हैं, परंतु सर्वोच्च शिखरों पर भी मनुष्य के चरण-चिह्न अंकित हो गए हैं। 
    हिमालय आयु की दृष्टि से संभवतः सबसे तरुण गिरिमाला है, परंतु प्राकृतिक सौंदर्य की दृष्टि से कदाचित् यह सर्वोच्च पर्वत संसार में सर्वश्रेष्ठ है।
    इसकी विशिष्टता अर्थात् झीलों और नदियों की प्रमुखता, प्राकृतिक वैभव की संपन्नता, अनुपम सुंदरता और सुषमा के कारण ही न केवल भारतवासी, बल्कि दूसरी जातियों के लोग भी इसे देवताओं का आवासगृह मानते रहे हैं।
    प्रस्तुत पुस्तक में उत्तरकाशी, गंगोत्री, गोमुख और तपोवन की यात्राएँ इसके महत्त्व को और भी बढ़ा देती हैं।
  • Rangon Ki Gandh-1
    Govind Mishra
    530 398

    Item Code: #KGP-9160

    Availability: In stock

    रंगों की गंध-1

    यात्रा जीवन के दूसरे अनुभवों से थोड़े अलग किस्म का अनुभव है। जहां दूसरे अनुभव हमें साफ-साफ जोड़ते-तोड़ते हैं, अपनी अंतरंगता में चरमरा डालते हैं या फिर सूखा-सूखा और दूर-दूर रखते हैं...वहां यात्रा दूसरी रखते हुए भी पास लाती हे, हम अपने खोल से बाहर निकलकर संसार की व्यापकता को छूते होते हैं। व्यापकता की यह छांह दुखी व्यक्ति को टूटने से बचाती है। स्वयं से थोड़ा वैराग्य और बाहर से जुड़ना दोनों एक साथ होता चलता है। मेरे लिए जो इससे बड़ी बात है, वह यह कि यात्रा में हम चलते हैं, हर हाल में चलते रहना-यह मेरी जिद दृढ़तर करती है यात्रा।
    -गोविन्द मिश्र
  • Hanste Nirjhar Dahakti Bhatthi
    Vishnu Prabhakar
    190

    Item Code: #KGP-697

    Availability: In stock

    हँसते निर्झर, दहकती भट्ठी
    देश-विदेश में, नगरों में और प्रकृति के प्रांगण में जब-जब भी और जहाँ-जहाँ भी मुझे की यात्रा करने का अवसर मिला है, उस सबकी चर्चा मैंने प्रस्तुत पुस्तक में की है । इसमें जानकारी देने का प्रयत्न इतना नहीं है, जितना अनुभूति  का वह चित्र प्रस्तुत करने का है, जो मेरे मन पर अंकित हो गया है । इन अर्थों में ये सब चित्र मेरे अपने है । कहीं मैं कवि हो उठा लगता हूँ, कहीं दार्शनिक, कहीं आलोचक, कहीं मात्र एक दर्शक । मैं जानता हूँ कि हुआ मैं कुछ नहीं हूँ ।  मुझे मात्र दर्शक रहना चाहिए था, लेकिन मन की दुर्बलता कभी-कभी इतनी भारी हो उठती है कि उससे मुक्त होना असंभव हो जाता है । शायद यही किसी लेखक की असफलता है । मेरी भी है । लेकिन एक बात निश्चय ही कही जा सकती है कि इस पुस्तक में विविधता की कमी पाठकों को नहीं मिलेगी । कहीं विहँसते निर्झर, मुस्कराते उद्यान उनका स्वागत करेंगे तो कहीं विगत के खंडहर उनकी ज्ञानपिपासा को शांत करेंगे, कहीं उन्हें भीड के अंतर में झाँकने की दृष्टि मिलेगी तो कहीं नई सभ्यता का संगीत भी वे सुनेंगे। वे पाएंगे कि कहीं वे मेरे साथ कंटकाकीर्ण दुर्गम पथों पर चलते-चलते सुरम्य उद्यानों से पहुँच गए हैं, कहीं विस्तृत जलराशि पर नावों में तैर रहे हैं, कहीं पृथ्वी के नीचे तीव्रगामी रेलों से दौड रहे हैं तो कहीं वायु के पंखों पर सवार होकर विद्युत् और मेघों द्धारा निर्मित तूफान को झेल रहे है । मुझे विश्वास है कि इससे जो अनुभूति उन्हें प्राप्त होगी, वह निरी निराशाजनक ही न होगी ।

    —विष्णु प्रभाकर
  • Baadalon Mein Barood
    Madhu Kankria
    300 249

    Item Code: #KGP-474

    Availability: In stock

    हिंदी में यात्रा-वृत्तांत लिखने की उल्लेखनीय परंपरा रही है। कथाकार मधु कांकरिया ने ‘बादलों में बारूद’ के द्वारा इस परंपरा को एक सार्थक समकालीनता प्रदान की है। यह कहना मुनासिब होगा कि अपने को खोजते हुए लेखिका ने भूगोल, इतिहास, संस्कृति, पुरातत्त्व, आदिजीवन, पुरातन प्रकृति, अलक्षित लोकमन और अदम्य अस्तित्व के कई कोने-अंतरे झांक लिए हैं। मधु कांकरिया ने परिवर्तन की पदचाप भी सुनी है। उन्होंने ‘अभावों के लोकतंत्र’ को भी देखा है और इस प्रक्रिया में जो वृत्तांत रचा है वह इस पुस्तक के प्रत्येक पृष्ठ पर जीवंत है। 
    लोहरदगा और गुमला के आदिवासी अंचल, धरधरी की चढ़ाई और पलामू, यूमथांग और हिमालय-प्रांतर, नेपाल, शिलांग, सुंदरवन और सजनारवाली टापू, चेन्नई, लद्दाख और पैनगोंग, कालडी--इन जगहों पर घूमते हुए मधु कांकरिया ने अनुभवों का एक ख़ज़ाना एकत्रा किया है। अपने अनुभवों को पारदर्शी बनाकर बेहद रचनात्मक भाषा में उन्होंने पाठकों तक पहुंचाया है। इस यायावरी में कहीं कोई पूर्वाग्रह नहीं है। यथार्थ को उसके अधिकाधिक आयामों में देखने, परखने व सहेजने की ईमानदार कोशिश है।
    लेखिका ने रूप और विरूप दोनों को देखा है; शब्दांकित किया है। यात्रा करते हुए ज़रूरी विमर्शों पर ठहरकर उन्होंने ‘सभ्यताओं’ के सच पर भी रोशनी डाली है। असम, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश जैसी जगहों पर कई तरह की नाइंसाफियां देखकर वे लिखती हैं, ‘सभ्यता की इन महायात्राओं की नींव में हमारी उदासियां भरी हुई हैं। हर सभ्यता वहां के मूल निवासियों...वहां के आदिवासियों को कुरूप बनाकर ही इतना आगे बढ़ी है। आज हम जाग रहे हैं और चाहते हैं ऐसी व्यवस्था कि इतिहास के वे काले पृष्ठ फिर दोबारा न खुलें।’ इस पुस्तक की ऐसी अनेक विशेषताएं इसे अन्य यात्रा-वृत्तांतों में विशेष बनाती हैं।
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