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  • Namaskar ! Bharat Mera Mahan ! (Paperback)
    Manohar Shyam Joshi
    90

    Item Code: #KGP-7030

    Availability: In stock

    नमस्कार! भारत मेरा महान!
    अमृतलाल नागर और सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का शिष्य कहने में मनोहर श्याम जोशी बहुत गौरव का अनुभव करते थे। जोशी जी के निजी जीवन, साहित्य, पत्राकारिता और सिनेमा के पन्नों में उक्त दोनों आचार्यों की छाप देखी जा सकती है। 
    भारतीय राजनीति और समाज पर मनोहर श्याम जोशी की बेबाक टिप्पणियाँ हिंदी पत्रकारिता और साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं। राजेंद्र माथुर की तरह उनके पत्रकारीय लेखन से लोग चकित और कुछ भ्रमित हो जाते थे, क्योंकि किसी टिप्पणी में वह मार्क्सवादी-समाजवादी, किसी लेख में हिंदूवादी, किसी विश्लेषण में कांग्रेसी विचारों से ओतप्रोत लगते थे। प्रगतिशील होने के बावजूद अटल बिहारी वाजपेयी या इंदिरा गांधी या डॉ. कर्णसिंह से अच्छे संवाद और संबंध की क्षमता उनमें थी। 
    अमृतलाल नागर की तरह उनके व्यंग्य और कहानी- उपन्यास में सामाजिक कुप्रथाओं, बंधनों पर पैना प्रहार पढ़ने को मिलता है। इसी तरह पत्र-पत्रिकाओं के स्तंभ-लेखन में जोशी जी देश-विदेश के किसी नेता, पूँजीपति या बड़ी हस्ती की कमियों पर सीधे प्रहार करने में नहीं चूके। शरद जोशी की तरह मनोहर श्याम जोशी प्रतिदिन स्तंभ लिखने की क्षमता रखते थे। इसीलिए ‘नवभारत टाइम्स’ के प्रधान संपादक राजेंद्र माथुर ने जोशी जी को एक नियमित स्तंभ लिखने का निमंत्रण दिया। सत्ता और प्रबंधन का भय इन संपादकों को कभी नहीं रहा। इसलिए जोशी जी ने भारत की सामाजिक-राजनीतिक दशा पर ‘मेरा भारत महान’ स्तंभ लिखना शुरू किया। 
    ‘मेरा भारत महान’ स्तंभ की विशेषता यह थी कि इस स्तंभ की टिप्पणियों पर पत्र आमंत्रित किए जाते थे और सैकड़ों पत्रों में से चुनिंदा छाँटकर अगली किस्त में स्तंभ के साथ छपते थे। यह स्तंभ बहुत लोकप्रिय हुआ। जोशी जी ने जीवन की अंतिम साँस तक यह स्तंभ लिखा, जिसकी रचनाएँ दशकों तक कई पीढ़ियों को प्रेरणा देती रहेंगी।
  • Kavi Ne Kaha : Ibbar Rabbi (Paperback)
    Ibaar Rabbi
    90

    Item Code: #KGP-1406

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : इब्बार रब्बी
    बचपन में महाभारत और प्रेमचंद होने का भ्रम, किशोर अवस्था में छंदों की कुंज गली में भटकने का भ्रम, फिर व्यक्तिवाद की दलदल में डुबकियां । लगातार भ्रमों और कल्पना-लोक में जीने का स्वभाव । क्या आज भी किसी स्वप्न-लोक के नए मायालोक में ही खड़ा हूं? यह मेरा नया भ्रम है या विचार और रचनात्मकता की विकास-यात्रा? क्या  पता । कितनी बार बदलूं।
    नया सपना है शमशेर और नागार्जुन दोनों  महाकवियों का महामिलन । इनकी काव्यदृष्टि और रचनात्मकता एक ही जगह संभव कर पाऊं । जटिल और सरल का समन्वय, कला और इतिवृत्तात्पकता एक साथ । ध्वनि का अभिधा के साथ पाणिग्रहण ।  नीम की छांह में उगे पीले गुलाबों की खुशबू से नाए रसायन, नए रंग और नई गंध जन्म लें । गुलाबों की शफ्फाक नभ-सी क्यारी में बीजों-सी दबी निबोलियां । इस नई मिट्टी और खाद से उगने वाले फूल, लताएं और वनस्पतियां बनें मेरी कविता ।
  • NATOHAM (Paperback)
    Meenakshi Swamy
    250

    Item Code: #KGP-1555

    Availability: In stock

    लब्धप्रतिष्ठ रचनाकार मीनाक्षी स्वामी का बहुचर्चित उपन्यास 'नतोअहं ' भारतभूमि के वैभवशाली अतीत और वर्तमान गौरव के सम्मुख विश्व के नतमस्तक होने का साक्षी है। यह भारतीय संस्कृति की बाह्म जगत् से आंतरिक जगत् की विस्मयकारी यात्रा करवाने की सामर्थ्य के अनावरण का अद्भुत परिणाम है।
    भारतीय संस्कृति के विराटू वैभव का दर्शन होता है—संस्कृतिक नगरी उज्जयिनी में बारह वर्षों में होने वाले सिंहस्थ के विश्वस्तरीय आयोजन में। उज्जयिनी का केंद्र शिप्रा है। इसके किनारे होने वाले सिंहस्थ में देश भर के आध्यात्मिक रहस्य और सिद्धियां एकजुट हो जाती हैं। इन्हें देखने, जानने को विश्व भर के जिज्ञासु अपना दृष्टिकोण लिए यहां एकत्र हो जाते हैं। तब इस पवित्र धरती पर मन-प्राण में उपजने वाले सूक्ष्मतम भावों की सशक्त  अभिव्यक्ति है यह उपन्यास ।
    इसमें मंत्रमुग्ध करने वाली भारतीय संस्कृति व सनातन धर्म के सभी पहलुओं पर वैज्ञानिक चिंतन  है, भारतीय अध्यात्म के विभिन्न पहलुओं को खरेपन के साथ उकेरा गया है।
    उज्जयिनी अनवरत सांस्कृतिक प्रवाह की साही है। यह केवल धर्म नहीं, समूची संस्कृति है, जिसमें कलाएं हैं, साहित्य है, ज्ञान है, विज्ञान है, आस्था है,  परंपरा है और भी बहुत कुछ है। यात्रा वृत्तांत शैली के इस उपन्यास में उज्जयिनी के बहाने भारतीय दर्शन, परंपराओं और संस्कृति की खोज है जो सुदूर विदेशियों को भी आकर्षित करती है। उज्जयिनी के लोक जीवन को झांकी के साथ भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं का सतत आख्यान है जो पुरा मनीषियों की मेधा का महकता प्रतीक है।
    उपन्यास के विलक्षण कथा संसार को कुशल लेखिका ने अपनी लेखनी के संस्पर्श से अनन्य बना दिया है। नायक एल्विस के साथ पाठक शिप्रा के प्रवाह में प्रवाहित होता है, डुबकी लगाता है।
    'भूभल' जैसे सशक्त उपन्यास से कीर्ति पाने के बाद बहुचर्चित रचनाकार मीनाक्षी स्वामी का नवीनतम उपन्यास 'नतोअहं ' तथाकथित आधुनिकता से आक्रांत भारतीय जनमानस की अपनी जडों की ओर आकृष्ट करता है। भारतीय संस्कृति व अध्यात्म की खोज में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए अप्रतिम उपहार है।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Vijay Dan Detha (Paperback)
    Vijaydan Detha
    90

    Item Code: #KGP-7012

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : विजयदान देथा
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार विजयदान देथा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'लजवन्ती', 'दूजौ कबीर', 'फितरती चोर', 'बडा कौन', 'दूरि, 'सिकन्दर और कौआ', 'राजीनामा', रैनादे का रूसना', 'अनेकों हिटलर' तथा 'हाथी-कांड' । 
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक विजयदान देथा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Gazal : Ek Safar (Paperback)
    Noornabi Abbasi
    200

    Item Code: #KGP-465

    Availability: In stock

    ग़ज़ल: एक सफ़र
    उर्दू कविता की सबसे अधिक लोकप्रिय विधा ग़ज़ल है। भारत में इसकी परंपरा लगभग पाँच सदियों से चली आ रही है। ‘वली’ दकनी इसका जनक माना जाता है। ग़ज़ल की जब शुरुआत हुई तो वह सौंदर्य और प्रेम (हुस्न-ओ-इश्क़) तक ही सीमित थी, लेकिन समय के साथ-साथ इसका दामन भी विस्तृत होता गया। फलस्वरूप, आज जीवन का कोई ऐसा विषय नहीं, जो ग़ज़ल में सफलतापूर्वक पेश न किया जा सकता हो, बल्कि पेश न कर दिया गया हो।
    उर्दू में ग़ज़ल की लोकप्रियता के बावजूद इस विधा का अनेक कवियों और आलोचकों ने विरोध किया। किसी को इसमें ‘संडास की बदबू’ महसूस हुई तो दूसरे ने इसे ‘अर्ध- सभ्य काव्यांग’ की संज्ञा दी और तीसरे ने तो इसकी ‘गर्दन उड़ाए जाने’ का फ़तवा भी सुना दिया। लेकिन इन प्रहारों से ग़ज़ल का पौधा न कुम्हलाया और न ही सूख पाया, बल्कि इसकी महक यथावत् बनी रही और आज भी फैली हुई है।
    कुल मिलाकर प्रस्तुत संकलन का ऐतिहासिक दृष्टि से अपना महत्त्व तो है ही। आशा है, उर्दू कविता के प्रेमियों में हमारे इस प्रयास का स्वागत होगा।
    ग़ज़ल की लोकप्रियता का एक कारण इसका विशिष्ट विषय प्रेम या इश्क़ रहा है और प्रेम-भाव वह है, जिससे कोई दिल ख़ाली नहीं। दूसरा यह कि ग़ज़ल के शे’र आसानी से याद हो जाते हैं और समयानुसार उनको पेश किया जा सकता है, ठीक उसी तरह, जैसे हिंदी में दोहे उद्धृत किए जाते हैं। वैसे तो उर्दू में क़सीदा, मर्सिया और मसनवी भी हैं, रुबाइयाँ और नज़्में भी लिखी जाती हैं, लेकिनग़ज़ल का अपना स्थान है।
    प्रस्तुत संकलन में सत्रहवीं सदी से अब तक यानी चार सदियों के लंबे समय में हुए लगभग डेढ़ सौ शायरों की ग़ज़लें प्रस्तुत की गई हैं। आशा है, उर्दू-प्रेमी हिंदी पाठकों में इसका यथेष्ट स्वागत होगा।
  • Sangharsh Ki Pratimurti : Aang Saan Su Ki (Paperback)
    M.A. Sameer
    120

    Item Code: #KGP-7078

    Availability: In stock

    आग सान सू की यह नाम एक ऐसी महिला का है, जिसने अपने असाधारण धैर्य और असीमित देशप्रेम को भावना से अपने देश बर्मा को 70 वर्ष की तानाशाही सैन्य सरकार से मुक्ति दिलाकर लोकतंत्र की स्थापना करके विश्च भर को नारी-शक्ति से परिचित कराया हैं। इस महान् महिला सू की का जीवन कठिन संघर्षों, विपरीत परिस्थितियों में भी अविचल रहने के गुण और तानाशाहों की कुटिल प्रताड़नाओँ से भरा रहा है।
    प्रस्तुत पुस्तक 'संघर्ष की प्रतिमूर्ति -- आंग सान सू की : जीवन दर्शन' में आंग सान सू की के जीवन से जुडी घटनाओँ व तथ्यों को सरस, सरल और रोचक भाषाशैली में कलमबद्ध करने का प्रयास किया गया है। अहिंसा को अपना प्रमुख अस्त्र मानने वाली आग सान सू की के जीवन पर आधारित यह पुस्तक प्रत्येक वर्ग के पाठक को अवश्य रुचिकर लगेगी।
  • Parineeta (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    80

    Item Code: #KGP-1353

    Availability: In stock

    इस पुस्तक में शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के दो उपन्यास हैं, एक है परिणीता और दूसरा है मझली दीदी।
  • Mera Jamak Vapas Do (Paperback)
    Vidya Sagar Nautiyal
    150

    Item Code: #KGP-7073

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Amrita Pritam (Paperback)
    Amrita Pritam
    80

    Item Code: #KGP-1518

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : अमृता प्रीतम
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार अमृता प्रीतम ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'बृहस्पतिवार का व्रत', 'उधड़ी हुई कहानियाँ', 'शाह की कंजरी', 'जंगली बूटी', 'गौ का मालिक', 'यह कहानी नहीं', 'नीचे के कपड़े', 'पाँच बरस लम्बी सड़क', 'और नदी बहती रही' तथा 'फैज की कहानी'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार अमृता प्रीतम की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Ai Ganga Tum Bahati Ho Kyoon (Paperback)
    Vivek Mishra
    100

    Item Code: #KGP-7036

    Availability: In stock

    ‘ऐ गंगा तुम बहती हो क्यूँ’ युवा कथाकार विवेक मिश्र का तीसरा कहानी-संग्रह है। ‘हनियाँ तथा अन्य कहानियाँ’ और ‘पार उतरना धीरे से’ कहानी संग्रहों से विवेक ने पाठकों के बीच प्रियता व प्रामाणिकता अर्जित की है। उन्होंने बहुत शाइस्तगी और रचनात्मक विनम्रता के साथ यह सिद्ध किया है कि आसपास पसरा यथार्थ हर रचनाकार के लिए समान नहीं होता। यह रचनाकार पर है कि वह ‘दिखते’ के पीछे छिपे जीवन सत्य और ‘दिखते’ में वास्तविक को कितना देख-समझ पाता है। विवेक वास्तविक और प्रायोजित का अंतर समझने वाले समर्थ कहानीकार हैं। यही कारण है कि आज जब संपादकों, संगठनों, प्रायोजकों के कंधें पर बेतालवत् सवार कुछ कहानीकार ठस व ठूँठ हो रहे हैं तब विवेक मिश्र की कहानियाँ अपना महत्त्व असंदिग्ध रूप से प्रकाशित कर रही हैं।
    विवेक मिश्र सुस्पष्ट सामाजिक सरोकारों से लैस लेखक हैं। प्रस्तुत संग्रह की कहानियाँ साबित करती हैं कि परिवार में बद्धमूल अप्रासंगिक धारणाओं से लेकर सामाजिक परंपराओं में घुसपैठ करती अमानवीय प्रवृत्तियों तक लेखक की पैनी नजर है। परिवेश विवेक के यहाँ एक पात्र सरीखा है। मैत्रेयी पुष्पा के बाद बुंदेलखंड का जीवन-जगत् उनके यहाँ सर्जनात्मक संदर्भ प्राप्त करता है। साथ ही, वे महानगरों की संधियाँ-दुरभिसंधियाँ भी परखते हैं।
    संग्रह में शामिल ‘घड़ा’, ‘चोरजेब’, ‘निर्भया नहीं मिली’ तथा ‘और गिलहरियाँ बैठ गईं’ सरीखी कहानियाँ रेखांकित करती हैं कि लेखक मन के अतल में व्याप्त ध्वनियों को सुनने की अद्भुत क्षमता रखता है। उसके पास अर्थ को अनेक स्तरों पर वहन करने वाली भाषा है, जैसे--‘पनरबा कस्बे के किसी कागज को माचिस की तीली से जलाकर देखिएगा। शायद उससे उठती लपटों में आपको विश्रांत अनल की कुछ कहानियाँ मिलें।’ यह कहानी संग्रह वर्तमान हिंदी कहानी में मूल्यवान उपस्थिति की तरह स्वागत योग्य है।
  • 23 Lekhikayen Aur Rajendra Yadav (Paperback)
    Geeta Shree
    195

    Item Code: #KGP-262

    Availability: In stock

    23 लेखिकाएँ और राजेन्द्र यादव
    अपने ढंग की अद्भुत पुस्तक है यह '23 लेखिकाएं और  राजेन्द्र यादव' । शायद किसी भी भारतीय भाषा में अकेली । इसे गीताश्री के पत्रकार-जीवन की एक उपलब्धि भी कह सकते  हैं । यहाँ गीता ने समय-समय पर लिखे गए समकालीन महिला-रचनाकारों के इम्प्रैशन (प्रभाव-चित्रों) का संयोजन किया है । कहीं ये साक्षात्कार हैं तो कहीं संस्मरण, कहीं राजेन्द्र जी के रचनाकार को समझने की कोशिश है तो कहीँ 'हंस' के संपादकीय, को लेकर उन पर बाकायदा मुकदमे । यहाँ अगर मन्नू भंडारी, मृदुता गर्ग, चित्रा मुद्गल, सुधा अरोडा, ममता कालिया, प्रभा खेतान, मैत्रेयी पुष्पा, अनामिका तथा कविता हैं तो निर्मला जैन, जयंती  रंगनाथन, पुष्पा सक्सेना, वीना उनियाल और रचना यादव भी अपने वक्तव्यों के साथ उपस्थित है । राजेन्द्र यादव अपने समय के सबसे महत्त्वपूर्ण कथाकार, नई कहानी आंदोलन के प्रमुख प्रवर्तक और कथा-समीक्षा के विलक्षण व्याख्याकार हैं । इधर चौबीस वर्षों में तो 'हंस' के तूफानी विचारों ने हंगामा ही खड़ा कर दिया हैं--राजेन्द्र जी को खलनायक और माफिया डॉन या पता नहीं और क्या-क्या बना दिया । विवादास्पद होना  जैसे उनकी स्थायी नियति है--'हंस' के माध्यम से उन्होंने स्त्री-दलित और अल्पसंख्यकों के पक्ष में जो जेहादी मुहिम चलाई है उसने निश्चय ही हिंदी के यथास्थितिवादी परंपरा-पोषकों की नींद हराम कर दी है । वे तर्क से नहीं, गालियों और आक्षेपों से राजेन्द्र जी के प्रश्नों का उत्तर देते हैं । मठाधीशों के लिए यह सचमुच बैचेन कर देने वाला सत्य है कि उनके देखते-देखते दलित और स्त्री-विमर्श आज साहित्य की केंद्रीय मुख्य धाराएँ हैं ।
    राजेन्द्र यादव के इस विकट और अपने समय के सबसे जटिल व्यक्तित्व के विविध आयामों को समेटने की कोशिश करती हैं ये लेखिकाएँ गीताश्री के मंच से ।
    किताबघर प्रकाशन की एक भव्य प्रस्तुति ।
  • Dwidhaa (Paperback)
    Bhairppa
    275

    Item Code: #KGP-502

    Availability: In stock

    कन्नड़ भाषा के यशस्वी उपन्यासकार भैरप्पा की रचनाएं पाठकों के मन में एक विशेष स्थान बना चुकी हैं। उनके उपन्यास कथानक की दृष्टि से उल्लेखनीय होते हैं। वे सामाजिक संदर्भों से प्रेरित हों अथवा प्राचीन प्रसंगों को पुनः परिभाषित करते हों—अपने पाठकों को भाव व विचार की एक नई दुनिया में ले जाते हैं। भैरप्पा का नया उपन्यास ‘द्विधा’ को पढ़कर कुछ इसी प्रकार की अनुभूति होती है।
    प्रस्तुत उपन्यास स्त्री-पुरुष के मध्य मौजूद प्रश्नों व प्रसंगों से उद्वेलित है। देह, प्रेम, सहवास, गर्भ, गर्भपात, अधिकार, पत्नी, प्रेमिका, रखैल आदि जाने कितने ऐसे प्रश्न जिनको अनेक बार भिन्न-भिन्न तरीकों से कथा-साहित्य में प्रस्तुत किया जा चुका है। ...किंतु जिस सामाजिक धरातल पर भैरप्पा ने इन्हें ‘द्विधा’ में विस्तार दिया है वह अनूठा है। शारीरिक संपर्क और स्त्री-पुरुष प्रेम के विषय में उपन्यास का एक पात्र कहता है, 
    ‘...जिन्होंने शारीरिक संबंध की मृदुता का अनुभव किया हो, वे शारीरिक संबंध को तजकर, केवल मानसिक रूप से स्नेह-संबंध बनाए रखने का प्रयत्न करेंगे, तब भी स्नेह शुष्क हो जाता है।’ उपन्यास में ऐसे उन्मुक्त विवरण एक नई बहस छेड़ते हैं।
    यह उपन्यास ‘स्त्री मुक्ति’ की जटिल व सूक्ष्म व्याख्याओं में भी ले जाता है। क्या ‘स्त्री मुक्ति’ के आधार पर प्राप्त अधिकारों का दुरुपयोग नहीं होता, क्या इससे परिवार नाम की संस्था को कोई खतरा नहीं प्रतीत होता; ऐसे बहुत से ज्वलंत मुद्दे हैं जिनको भैरप्पा ने उपन्यास में शामिल किया है। मानवीय दुर्बलताओं और उनसे उत्पन्न संकटों/विसंगतियों/दुष्परिणामों को भलीभांति चित्रित किया है। कथानक विस्तृत है। लेखक ने विभिन्न चरित्रों के द्वारा समकालीन समाज की प्रवृत्तियों को रेखांकित किया है। समग्रतः एक ऐसा उपन्यास जो हमारे समय की सच्चाइयों व समस्याओं का आईना है।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Suryabala (Paperback)
    Suryabala
    130

    Item Code: #KGP-417

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : सूर्यबाला
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार सूर्यबाला  ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'रेस', 'बिन रोई लड़की', 'बाऊजी और बंदर', 'होगी जय, होगी जय...हे पुरुषोत्तम नवीन !', 'न किन्नी  न', 'दादी और रिमोट', 'शहर की सबसे दर्दनाक खबर, 'सुमिन्तरा की बेटियां', 'माय नेम इश ताता' तथा 'सप्ताहांत का ब्रेकफास्ट'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक सूर्यबाला की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Maitreyi Pushpa (Paperback)
    Maitreyi Pushpa
    180

    Item Code: #KGP-431

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ  : मैत्रेयी पुष्पा
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार मैत्रेयी पुष्पा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'फैसला', 'तुम किसकी हो बिन्नी', 'उज्रदारी', 'छुटकारा', 'गोमा हँसती है', 'बिछुड़े हुए', 'पगला गई है भागवती', 'ताला खुला है पापा', 'रिजक' तथा 'राय प्रवीण' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक मैत्रेयी पुष्पा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Malti Joshi (Paperback)
    Malti Joshi
    100

    Item Code: #KGP-1346

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ: मालती जोशी
    हिंदी की प्रख्यात लेखिका मालती जोशी के प्रतिनिधि कथा-संसार में नारी-विमर्श और उसकी अस्मिता के नाम पर लिखी जा रही तथाकथित आधुनिक नायिकाओं के चटपटे नारी-पात्र नहीं हैं, वरंच वहाँ निरूपण है ऐसी नारियों का, जो सचमुच हमारे परिवार, समाज और देश की स्त्री की रूपरेखाओं का चित्रण और निर्धारण करती है । दैनंदिन स्तर पर आज मध्यवर्गीय नारी सुबह-दोपहर-शाम जिन भभूकों में फंसी है, वहाँ अनिवार्यतः मानसिक उद्वेलन तथा वैचारिक उत्तेजन के दृश्य-परिदृश्य निर्मित होते हैं और इन्हीं की संतुलित सृजन-विसर्जन की प्रक्रिया मालती जोशी की कहानियों का प्रमुख बढ़ा-तत्त्व है ।
    इक्लीसवीं सदी के इस सदिच्छा काल में जब पारिवारिक भारतीय नारी अपनी इच्छा, क्रिया और ज्ञान-शक्ति के माध्यम से अपने स्वभाव की प्रवृत्ति को अक्षुण्ण रखते हुए, एक विकासशील परिपक्वता की ओर अग्रसर है, ऐसे में आवश्यक है कि जीवन की मनोहरता को बचाने से परिवार की यह प्रमुखतम इकाई सुदृढ़ रहे । पर रहे तो कैसे? इसी आधार को बुनती ये कहानियां पाठक-समाज की आश्वस्ति हैं  और संदेश भी ।
    मालती जोशी द्वारा स्वयं चुनी गई 'दस प्रतिनिधि कहानियां' हैँ-'बेटे की मां', 'सांस-सांस पर पहरा बैठा', 'प्रतिदान', 'कोख का दर्प', 'मोह-भंग', 'आउट साइडर', 'प्रॉब्लम चाइल्ड', 'उसने नहीं कहा', 'आस्था के आयाम’ तथा 'प्यार के दो पल बहुत है'।
  • Manu Ko Banaati Manaii (Paperback)
    Gyanendrapati
    160

    Item Code: #KGP-415

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Leela Dhar Jaguri (Paperback)
    Leeladhar Jaguri
    80

    Item Code: #KGP-1442

    Availability: In stock

    कवि ने कहा: लीलाधर जगूड़ी
    अपनी कविताओं का चुनना आज़ादी है और आज़ादी का पहला लक्षण है चुनाव की स्वतंत्रता जो कि लिखने की स्वतंत्रता से कतई कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। कोई अपने लिए क्या और क्यों चुनता है, इसके सामाजिक और व्यक्तिगत कारण हो सकते हैं लेकिन अपने में से अपने को चुनने के लिए ज्ञानात्मक समीक्षा दृष्टि और संयम आवश्यक है जिसका अभाव इस मौके पर भी मुझे काफी परेशान किए रहा। क्या अपनी ये चुनी हुई कविताएँ ही मेरा सम्यक् अभीष्ट हैं? शायद हाँ, शायद नहीं। क्योंकि इस चयन को इस चयन में से अभी पाठकों द्वारा भी चुना जाना है। चुने हुए में से चुनना और बढ़िया विचारपरक हो सकेगा। निर्दोष चयन तो काफी कठिन काम है फिर भी चुनने के स्वार्जित अधिकार से पैदा हुई व्याख्या का अपना स्थान है। वह स्थान तभी दिख सकता है और समझ में आ सकता है जब विवेचन दोष रहित दूषण सहित हो। इन कविताओं में कितना पैनापन है, कितनी प्रखरता है यह तभी समझा जा सकेगा जब सुकोमल और सुंदर पक्षों को उन पात्रों की घटनाओं के माध्यम से चिद्दित किया जा सके। यह अनुभव की महिमा और अनुभूति के विन्यास को खुद अपने अस्तित्व के अनुरूप कारणों से चुनवा सकेगा।
  • Sharat Ka Katha Sahitya (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    320 288

    Item Code: #KGP-205

    Availability: In stock


  • Kahani Ka Abhaav (Paperback)
    Narendra Kohli
    60

    Item Code: #KGP-7095

    Availability: In stock


  • Saadat Hasan Manto Ki Kahaniyan (Paperback)
    Narendra Mohan
    395 300

    Item Code: #KGP-04

    Availability: In stock

    सआदत हसल मंटो उर्दू के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण, चर्चित और विवादास्पद लेखक हैं। इस एक लेखक को लेकर जितनी चर्चाएं उठी हैं, उतनी अन्य किसी लेखक को लेकर नहीं। मंटो की खासियत है कि उसने नये विषयों पर ही नहीं लिखा, नये अन्दाजेबयां और नजरिये से भी लिखा। इस एक बात ने उन्हें अपने समय का ही नहीं, आज के समय का भी एक बड़ा कहानीकार बना दिया है।
    मंटो की कहानियां पाठकों की अन्तश्चेतना को बुरी तरह झकझोरने वाली, तिलमिला देने वाले विचारों तक ले जाने वाली हैं। यह बेचैनी महज व्यक्तिगत नहीं है, मुल्क और कौम की बेचैनी से जुड़ी हुई है जो कहानियों की मार्फत पाठकों तक सीधे पहुंचती है। उनकी कहानियों में गहरी मानवीय दृष्टि के साथ-साथ तीव्र आक्रोश और प्रतिकार भी है। हरारत और रोशनी, स्वप्न और दुःस्वप्न उनकी सृजनात्मक प्रेरणा के हिस्से हैं। इन कहानियों के जरिये मंटो हमें विसंगति-भरी जिन्दगी में जीने की शर्त का गहरा एहसास कराते हैं।
    सआदत हसन मंटो की कहानियां पुस्तक में मंटो के कथा-संसार में झांकने का, उनकी कहानियों को चुनकर, एक परिप्रेक्ष्य देकर हमारे सामने पेश करने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है हिन्दी के जाने-माने कवि, नाटककार और आलोचक डाॅ. नरेन्द्र मोहन ने। मंटो की सृजनात्मक प्रेरणा और संपादकीय दृष्टि में आश्चर्यजनक साम्य है-एक-दूसरी में खुलती गई हैं और उन्हें अलगाया नहीं जा सकता। इससे यह पुस्तक कहानियों का संकलन-भर नहीं रही है, एक दस्तावेज बन गई है।

  • Das Pranidhini Kahaniyan : Akhilesh (Paperback)
    Sushil Sidharth
    250 213

    Item Code: #KGP-7191

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां : अखिलेश 
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार अखिलेश ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: चिट्ठी, शापग्रस्त, बायोडाटा, ऊसर, पाताल, मुहब्बत, जलडमरूमध्य, वजूद, श्रृंखला तथा अँधेरा।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक अखिलेश   की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Mahatma Gandhi : Mere Pitamah : 2 (Paperback)
    Sumitra Gandhi Kulkarni
    270

    Item Code: #KGP-304

    Availability: In stock

    महात्मा गांधी : मेरे पितामह (2)
    (आजादी के नीतिकार)
    आँखों देखे ये वृत्तांत स्मृतियों के जीवत कालखंड भी है । इनमें राजनीतिक हलचलें हैं तो आत्मीयता यानी अपनेपन में पगी अविस्मरणीय, दुर्लभ घटनाएँ भी ।
    सूमित्रा जी साक्षी रहीं उस परिवर्तन के दौर की, इसलिए उनकी दृष्टि व्यापक एवं विस्तृत रही । उन्होंने सीमित दायरे के बावजूद असीमित परिधि को छुआ है । इसलिए गांधी जी को समझने में यह कृति हर अर्थ में सहायक सिद्ध होगी ।
    उस दौर में विश्व में क्या-क्या हुआ, उसका सहज आकलन भी इनमें दीखता है । 'जलियाँवाला बाग़' नरसंहार के दिल को दहला देने वाले दृश्य ! डेढ़ हजार से अधिक निर्दोष लोग भून दिए गए । जनरल डायर की इस दानवीय लीला ने सारे देश को स्तब्ध कर दिया था ।
    'साबरमती आश्रम' गांधीवादी विचारों की प्रयोगशाला बना । चंद्रभागा और साबरमती नदी के बीच, बबूल की कँटीली झाडियों कै पार्श्व में एक नए संसार की साधना हुई-खुले आसमान के नीचे ।
    यह आश्रम कब तीर्थ बना, पता ही नहीं चला । 
    'चंपारण', 'खेड़ा सत्याग्रह', 'साइमन कमीशन’, 'नोआखली', 'बिहार को कौमी आग' अनेक प्रसंग हैं, जो अनेक अर्थों से उल्लेखनीय है ।
    सुमित्रा जी ने गांधी जी के उन पक्षों पर भी प्रकाश डाला, जो महत्त्वपूर्ण है, जिनके बारे में लोग अधिक नहीं जानते । क्योंकि उन्होंने यह सब स्वयं घटित होते देखा है, इसलिए प्रामाणिक भी कम नहीं ।
    हैदराबाद रियासत का भारत में विलय-प्रसंग भी कम रोचक नहीं । कासिम रिजवी का दिल्ली के लाल किले पर अपना झंडा फहराने का सपना सपना ही रह गया । हैदराबाद मुक्ति के पश्चात सरदार पटेल ने कासिम रिजवी को गिरफ्तार कर दिल्ली बुलाया । लाल किले पर तो कासिम अपनी ध्वजा नहीं फहरा पाए, हाँ, लाल किले के तहखाने में कैद कर उसे अवश्य रखा गया । उन पर मुकदमा चला और आजीवन कैद की सजा मिली ।
    ऐसे अनेक प्रसंग, विचारोत्तेजक ।
    --हिमाशु जोशी
    15 अगस्त, 2009
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Mridula Garg (Paperback)
    Mridula Garg
    120

    Item Code: #KGP-7015

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : मृदुला गर्ग
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार मृदुला गर्ग  ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'ग्लेशियर से', 'टोपी' , 'शहर के नाम', 'उधार की हवा', 'वह मैं ही थी', 'उर्फ सैम', 'मंजूर-नामंजूर', 'इक्कीसवीं सदी का पेड़', 'वो दूसरी' तथा 'जूते का जोड़', 'गोभी का तोड़' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक मृदुला गर्ग की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Kashmkash (Paperback)
    Manoj Singh
    250 225

    Item Code: #KGP-378

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Shriprakash Shukla (Paperback)
    Shri Prakash Shukla
    140

    Item Code: #KGP-7017

    Availability: In stock

    रीप्रकाश शुक्ल हिंदी कविता के प्रतिष्ठित कवि हैं। इनके पहले कविता संग्रह ‘अपनी तरह के लोग’ (1999) से लेकर पाँचवें कविता संग्रह ‘ओरहन और अन्य कविताएँ’ (2014) तक की कविताओं से गुजरकर कविता प्रेमियों को काव्य स्वाद का सुखद अहसास होता है। अपनी कविताओं में ये बिना किसी नारेबाजी व आयातित विमर्श का हौवा खड़ा किए सधे हुए स्वर में सामाजिक  विसंगतियों, क्रूरताओं, धार्मिक ढकोसलों, आर्थिक पराभवों और सांस्कृतिक क्षरण पर सीधे वार करते हैं। इनकी कविता की दुनिया में राजनीति व विचारधारा की एक पक्षधर दुनिया गुँथी हुई होती है जिसमें गरीब, पीड़ित व उपेक्षित वर्ग के प्रति गहरी रागात्मक चेतना मौजूद है।
    लेकिन उपर्युक्त बातों के साथ-साथ जिस वैशिष्ट्य के कारण श्रीप्रकाश शुक्ल हिंदी कविता में ज्यादा चर्चित हैं वह हैं इनकी विषयगत वैविध्यता और गहरी लोकोन्मुखता। अपनी कविताओं में वे महज लोक का चित्रण नहीं करते बल्कि लोक के क्षरण के कारणों की शिनाख्त भी करते हैं। नवउदारवाद और पूँजीवादी शक्तियों के आक्रमण, दमन, शोषण और चालाकियों का प्रतिरोध करने वाली इनकी कविता जनोन्मुखी व लोकोन्मुखी तो है ही, इसमें स्थानीयता के साथ वैश्विकता के तत्त्व भी समाहित हैं जहाँ पुराने के साथ परंपरा से रिश्ते रखने वाला नया समाज तो है ही, एक आधुनिक चेतना भी मौजूद है।
    इसी के साथ गौरतलब है कि प्रकृति, प्रेम और सौंदर्य के चित्रों से भरपूर कवि का कविता संसार विविध वर्णों से युक्त है जहाँ कविता की धार अपनी भाषिक व्यंजना के रेडिकल भावभूमि पर विकसित होती है। यहाँ कहते हुए ख़ुशी होती है कि इस कवि ने अपने को कहीं रिपीट नहीं किया है और इसी कारण इनकी कविता बहुवस्तुस्पर्शी उध्र्वमुखी चेतना से संपन्न है जो एक समर्थ कवि का लक्षण है। भाषा की सादगी और बिंबों की निजता इनके कवि- स्वभाव की विलक्षण विशेषता है। कह सकते हैं कि भाषा के लोक स्वीकृत विन्यास को चुनौती देती इनकी कविताओं में व्यंग्य व वक्रता का एक सघन संसार उपस्थित होता है जहाँ भाषायी मुखरता के साथ एक आत्मसंवादी स्वर का औदात्य भी मिलता है जो इनकी कविताओं को रेडिकल बनाता है।
    उम्मीद की जानी चाहिए कि कविता का यह संचयन कवि की काव्य संपदा और उनकी सामर्थ्य से अपने पाठकों को परिचित कराने में समर्थ होगा।
  • Rang Hawa Mein Phail Raha Hai (Paperback)
    Ubaid Siddqi
    200

    Item Code: #KGP-200

    Availability: In stock

    हक़ीक़त चाहे जो भी हो, शाइर और अदीब आज भी इस ख़ुशफ़हमी में मुबतिला हैं कि वो अपनी रचनात्मकता के द्वारा इस दुनिया को बदसूरत होने से बचा सकते हैं और समाज में पाई जाने वाली असमानताओं को दूर कर सकते हैं। उबैद सिद्दीक़ी की शाइरी का एक बड़ा हिस्सा इसी ख़ुशफ़हमी का नतीजा मालूम होता है:
    जाने किस दर्द से तकलीफ़ में हैं
    रात दिन शोर मचाने वाले
    ये सब हादसे तो यहां आम हैं
    ज़माने को सर पर उठाता है क्या
    आधुनिकता के जोश में हमारी शाइरी, ख़ास तौर पर ग़ज़ल ने समाजी सरोकारों से जो दूरी बना ली थी उबैद ने अपनी ग़ज़लों में इस रिश्ते को दोबारा बहाल करने का एक सराहनीय प्रयास किया है:
    धूल में रंगे-शफ़क़ तक खो गया है
    आस्मां तू कितना मैला हो गया है
    बहुत मकरूह लगती है ये दुनिया
    अगर नज़दीक जाकर देखते हैं
    सदाए-गिर्या जिसे एक मैं ही सुनता हूं
    हुजूमे-शहर  तेरे दरम्यां से आती है
    अपने विषयवस्तु और कथ्य से इतर उबैद की शाइरी अपनी मर्दाना शैली और अन्याय के खि़लाफ़ आत्मविश्वास से परिपूर्ण प्रतिरोध की भी एक उम्दा मिसाल है:
    शिकायत से अंधेरा कम न होगा
    ये सोचो रौशनी बीमार क्यों है
    मैं फ़र्दे-जुर्म तेरी तैयार कर रहा हूं
    ए आस्मान सुन ले हुशयार कर रहा हूं
    इस संग्रह के प्रकाशन से मैं बहुत ख़ुश हूं और उम्मीद करता हूं कि उबैद की शाइरी के रसास्वादन के बाद आप ख़ुद को भी इस ख़ुशी में मेरा शरीक पाएंगे।
    दशहरयार 
  • Shatal (Paperback)
    Narendra Kohli
    40

    Item Code: #KGP-7098

    Availability: In stock


  • Path Prajya (Paperback)
    Veena Sinha
    100

    Item Code: #KGP-7062

    Availability: In stock

    ‘पथ प्रज्ञा' श्रीमती वीणा सिन्हा की एक उल्लेखनीय औपन्यासिक कृति है। प्रागैतिहासिक काल की एक प्रचलित कथा का पुनर्पाठ करती लेखिका ने ‘पथ प्रज्ञा' माधवी के माध्यम से समाज के नियंताओं द्वारा नारी-शोषण की अद्यतन प्रवृत्ति का सूत्र पकड़ा है। वैदिक राजाओं के यहाँ और आश्रमों में व्याप्त नारी-शोषण की कथा इस उपन्यास के केन्द्र में है। यहाँ उदात्त कर्मों के लिए समर्पित दिखने वाले ऋषि आश्रमों के नियंता हैं। ययाति जैसे दानवीर एवं ऋषियों का सम्मान करने वाले धर्म-प्रवण यशस्वी राजा हैं। गालव अपने गुरु विश्वामित्र को गुरुदक्षिणा दे सके, इसके लिए अपनी पुत्री माधवी को देह के उपयोग का आदेश देने वाले ययाति हैं। राजा के इस मनमाने आदेश पर शास्त्र-सम्मति की मुहर लगाने वाली दरबारी व्यवस्था है। राजकन्या की देह को एक समयावधि तक भोग कर एक यशस्वी पुत्र एवं गुरुदक्षिणा का एक अंश वसूलने वाले स्वयं ऋषि विश्वामित्र भी हैं।
    इस उपन्यास की देह में भोग-विलास में डूबे रहने वाले हर्यश्व से लेकर एकपत्नीनिष्ठ दिवोदास और सच्चे प्रेमी तथा शास्त्र-सम्मत कर्म करने वाले उशीनर जैसे अयोध्या, काशी और भोजनगर राज्यों के राजा चित्रित हैं। मगर यह आश्चर्यजनक तथ्य है कि माधवी की देह का एक निश्चित अवधि तक शुल्क देकर भोग करना इन तीनों ही राज्यों में नियमविरुद्ध नहीं है। नारी-शोषण के इस सनातन रूप को लेखिका मानो आज की तिथि में शपथ-पत्र की तरह प्रस्तुत करती है। सत्य-संरक्षण की ऐसी विश्वसनीयता समकालीन लेखन में दुर्लभ है। इसीलिए इस उपन्यास को एक उल्लेखनीय कृति कहा गया है।
    इस उपन्यास में स्त्री-पुरुष के स्थूल और सूक्ष्म स्तर के परस्पर संबंधों, व्यष्टि-समष्टि तथा व्यक्ति और राज्य के रिश्तों एवं ज्योतिष और दर्शन जैसे गूढ़ विषयों पर सार्थक और पारिभाषिक वार्तालाप इस कृति का एक और महत्त्वपूर्ण पक्ष है।
    उपन्यास के अंत में माधवी द्वारा लिया गया निर्णय समाज द्वारा नारी के अपपाठ की एक प्रतिक्रिया है जहाँ माधवी सक्रिय नहीं, सार्थक होती है।
    और अंत में यह भी कि वैदिक काल के सूक्ष्म और गहन अध्ययन-विश्लेषण के कारण ही लेखिका ने भाषा में संस्कृतनिष्ठता तथा बाणभट्ट के जैसे भाषा-लालित्य का समावेश करके उसे युगानुरूप बनाने की चेष्टा की है।
  • Jangal Ke Jeev-Jantu (Paperback)
    Ramesh Bedi
    200

    Item Code: #KGP-178

    Availability: In stock

    अधिकांश जीवो की जानकारी देते हुए लेखक ने वन्य-जीवन के अपने अनुभवों का ही सहारा लिया है। पुस्तक को पढ़ते समय जंगल के रहस्य परत दर परत खुलते चले जाते हैं। जंगल के रहस्य-रोमांच का ऐसा जीवंत वर्णन इस पुस्तक में किया गया है कि जंगल की दुनिया का चित्र आंखों के सामने साकार हो जाता है। 
    जंगली जीवांे के बारे में लोक-मानस में प्रचलित कई अंधविश्वासों और धारणाओं का उन्होंने अपने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर खंडन कर सही तस्वीकर पाठकों के सामने रखी है। जंगल में स्वतंत्र रूप से विचरते जन्तुओं के जीवन पर आधारित यह पुस्तक पाठक को आद्योपांत अपनी विषय-वस्तु में रमाए रखती है। यह हमं वनों, वन्य-जीवों और पर्यावरण को संरक्षण प्रदान करने की प्रेरणा देती है।
  • Anton Chekhov Ki Kahaniyan (Paperback)
    Pramila Gupta
    160 152

    Item Code: #KGP-ACKK PB

    Availability: In stock

    अंतोन चेखव (1860-1904) की गणना न केवल रूसी साहित्य में अपितु विश्व साहित्य के शीर्ष कथाकारों में होती है। अपने छोटे से जीवन में उन्होंने रूसी भाषा में चार नाटक व अगणित कालजयी कहानियाँ लिखीं। उनकी कहानियाँ व नाटक साहित्य संपूर्ण विश्व के समालोचकों व समीक्षकों की दृष्टि में अप्रतिम हैं। वे पेशे से चिकित्सक थे। प्रारंभ में उन्होंने पढ़ाई का खर्चा निकालने के लिए लिखना शुरू किया। बाद में वे पूर्ण रूप से साहित्य को समर्पित हो गए। उनका  कहना था कि चिकित्सा उनकी धर्मपत्नी है तो साहित्य उनकी प्रेमिका। उनके साहित्य में तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था एवं आमजन की पीड़ा का सजीव चित्रण पाठकों को अभिभूत कर देता है। हिंदी साहित्यप्रेमी अंतोन चेखव के विपुल साहित्य का रसास्वादन करने के लिए सदैव लालायित रहते हैं। उनके साहित्य का हिंदी भाषा में आनंद लेने का एकमात्र विकल्प अनुवाद है। अनुवादक उनके साहित्य को हिंदी पाठकों तक पहुँचाने का यथासंभव प्रयास कर रहे हैं। अंतोन चेखव के समग्र साहित्य को भाषांतरित कर पाना दुष्कर कार्य है। चुनिंदा कहानियों का हिंदी अनुवाद करने का विनम्र प्रयास किया है। चेखव के विशद साहित्य में से कुछ कहानियों का चयन करना सरल नहीं। उनकी प्रत्येक कहानी विशिष्ट है। अतः स्वरुचि के आधार पर कहानियाँ चयनित की हैं। आशान्वित हूँ कि सुधी पाठकों को ये कहानियाँ पसंद आएँगी। - प्रमीला गुप्ता

  • Hindustan Aur Pakistan Ki Behatreen Urdu Haasya-Vyang Shaaeree (Paperback)
    T.N. Raj
    195

    Item Code: #KGP-7054

    Availability: In stock

    उर्दू ज़बान अपनी शीरीनी, लताफ़त और नज़ाकत के सबब सदियों से लोगों के दिलों पर राज कर रही है। उर्दू शायरी ख़ास तौर पर ग़ज़ल लिखने, पढ़ने, सुनाने या गाने वाला शख्स हमें कहीं न कहीं मिल ही जाता है । मीर, ग़ालिब, इकबाल, दाग, फ़ैज, फ़िराक़, जिगर और साहिर वग़ैरा की शायरी का जादू हमेशा बरकरार रहेगा । यह मानने में कोई हरज नहीं कि उर्दू की संजीदा शायरी के मुकाबले में अभी हास्य व्यंग्य कविता में बहुत-सी गुंजाइशें बाक़ी हैं । जहाँ तक उर्दू नस्र (गद्य) में हास्य-व्यंग्य का तआल्लुक है यह बात पूरे यकीन से कही जा सकती है कि इसमें अनमोल हीरों औरमोतियों की कोई कमी नहीं । 
  • Toro Kara Toro-6 (Paperback)
    Narendra Kohli
    370

    Item Code: #KGP-428

    Availability: In stock


  • Nanaji Deshmukh : Jeevan Darshan (Paperback)
    Gaurav Chauhan
    160

    Item Code: #KGP-481

    Availability: In stock

    इस जीवात्मा ने अपने व्यक्तित्व की कुछ ऐसी अमिट छाप समाज पर छोड़ी कि उनके विषय में समाज और देश को यह सोचने पर विवश कर दिया कि क्या साधारण मनुष्य भी दलित, शोषित, पीड़ित व वंचित के दुःखों को दूर कर उनके हृदय में एक ईश्वर, गुरु, प्रेरक, श्रद्धा का स्थान ले सकता है। ऐसी ही एक पवित्र जीवात्मा थे जिन्हें हम नानाजी देशमुख के नाम से जानते हैं। 
    "हम अपने लिए नहीं अपनों के लिए हैं। अपने वे हैं जो सदियों से पीड़ित, शोषित व उपेक्षित हैं।" यह कथन इन्हीं जीवात्मा का था जो आज नानाजी के नाम से इस संसार में याद किए जाते हैं। ऐसा ही कोई विरला व्यक्तित्व इस धरा पर जन्म लेकर इस धरा को पवित्र बनाता है।

  • Jeevanopayogi Jari-Bootiyan (Paperback)
    Dr. Rajiv Sharma
    180

    Item Code: #KGP-7069

    Availability: In stock

    जीवनोपयोगी जड़ी-बूटियाँ 
    जड़ी-बूटियाँ शब्द सुनते ही हमें लगना है कि सुदूर जंगल में पहुँचकर कुछ पेड़-पौधों की खोज करनी पडेगी, जबकि हमारे आसपास दैनिक उपयोग की इतनी वनस्पतियां  मौजूद है कि उनके द्वारा सामान्य रोगों का उपनार हम स्वयं घर पर ही आसानी से कर सकते है ।
    तुलसी, लहसुन, अश्वगंधा, अशोक, अर्जुन. हींग, बिल्व (बेल), कनेर, मुलहठी, त्रिफला, सौंठ, कुकरौंदा, शिलाजीत, आँवला नीम, महुआ, हुरहुर, अरण्ड, सर्पगंधा, अमलतास आदि सैकडों जड़ी-बूटियाँ हैं, जो हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत ही उपयोगी हैं और आसानी ये उपलब्ध भी ।
    प्रस्तुत पुस्तक में प्रख्यात चिकित्साविज्ञ ने लगभग ढाई सौ उपयोगी जड़ी-बूटियों के गुणों, उपयोग तथा उनकी प्रकृति आदि के बारे में विस्तार से बताया है । पुस्तक को संपूर्ण सूचनाप्रद बनाते हुए सैकड़ों जड़ी-बूटियाँ के चित्र भी पुस्तक में ममाहित किए गए है ।
    निस्संदेह, यह पुस्तक आम पाठक के लिए तो स्वास्थ्य-रक्षा व घरेलू नुस्खों को जानने की दृष्टि से उपयोगी है ही, जिज्ञासु पाठकों की ज्ञान-पिपासा को संतुष्ट करने में भी सक्षम है, क्योंकि इसमें ज़डी-बूटियों के बारे में अत्यंत  सरल भाषा में विस्तृत जानकारी दी गई है । कहना न होगा कि निजी एवं सार्वजनिक पुस्तकालयों के लिए तो यह अनिवार्य ग्रंथ है ।
  • Sachitra Yogasan (Paperback)
    Om Prakash Sharma
    190

    Item Code: #KGP-114

    Availability: In stock

    भारत सदा से ऋषि-मुनियों, योगियों और दार्शनिकों का देश रहा है। यहां के निवासी सदा ही ज्ञान की खोज में लगे रहे हैं। आज नाना प्रकार की नई-नई सुविधएं मौजूद हैं, फिर भी व्यक्ति अधूरा, अतृप्त और अशांत है। उसका मन आज भी दुविधा में पड़ा है। नई पीढ़ी दिशाहीन हो गई लगती है। आत्महत्या करने वालों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। अनेक भारतीय असफल रहकर पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति को अपनाते जा रहे हैं। वे भूल चुके हैं कि हम उन ऋषियों की संतान हैं, जिनके ज्ञान का डंका कभी पूरे विश्व में बजता था।
    इस ऋषि-परंपरा में महर्षि पतंजलि का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जिनके द्वारा प्रतिपादित योग-दर्शन के परिणामों को देखकर बड़े-बड़े वैज्ञानिक भी स्तब्ध रह गए हैं।
    महर्षि पतंजलि ने विश्व-भर के प्राणियों के जीवनकाल का अत्यंत सूक्ष्म अध्ययन करने के पश्चात् चैरासी लाख योगासनों का चुनाव किया और विकारों से बचकर सुखी एवं त्यागमयी जीवन जीने की विधि खोज निकाली।
    योगासन के धीरे-धीरे अभ्यास से आप गंभीर बीमारियों से भी बच सकते हैं और स्वस्थ रह सकते हैं।
    प्रस्तुत पुस्तक महर्षि पतंजलि द्वारा निरूपित सिद्धांतों को नए रूप में प्रस्तुत करने का एक प्रयास है।
  • Vyangya Samay : Hari Shankar Parsai (Paperback)
    Hari Shankar Parsai
    225

    Item Code: #KGP-7227

    Availability: In stock

    हरिशंकर परसाई हिंदी व्यंग्य के शीर्ष रचनाकार के रूप में व्यापक स्वीकृति प्राप्त कर चुके हैं। कथा साहित्य में जो स्थान मुंशी प्रेमचंद का है, व्यंग्य साहित्य में वही प्रतिष्ठा परसाई की है। व्यंग्य को उन्होंने ‘विधिवत विधा’ के रूप में अंगीकार किया। अन्यान्य विधाओं के  बीच व्यंग्य ने जो अकूत यश प्राप्त किया है उसके मूल में परसाई का बहुविधा लेखन ही है। व्यंग्य लेखन के लिए अनिवार्य विशेषताएं उनके व्यक्तित्व में सहज विद्यमान थीं, अपने अनुभव-अध्ययन और अपनी अंतर्दृष्टि से उन्होंने विशेषताओं को क्षमता में रूपांतरित किया। तमाम पत्र-पत्रिकाओं में स्तंभ लेखन करते हुए उन्होंने तात्कालिक मुद्दों पर भी व्यापक सोच के साथ लिखा। आज यह देखकर किसी को आश्चर्य हो सकता है परसाई ने तत्कालीन राजनीति का कितना सघन व तार्किक विश्लेषण अपने लेखन में किया है। राजनीति, समाज, धर्म, संस्कृति, अर्थ आदि के भीतरी स्याह- सफेद का जितना बोध परसाई को था वह बहुत कम लेखकों में संभव हुआ है। किसी लेखक में ‘साहस’ किस सीमा तक सक्रिय हो सकता है, इसके उदाहरण परसाई हैं। अपने मित्र मुक्तिबोध की बात उनके हृदय में सहज समाई थी कि अभिव्यक्ति वेफ खतरे उठाने ही होंगे। स्वातंत्रयोत्तर भारतीय समाज और उसके अंतर्विरोधों की पड़ताल करता परसाई का व्यंग्य लेखन हिंदी गद्य साहित्य की स्थायी निधि है। लेख, स्तंभ, कहानी, लघु उपन्यास आदि के रूप में उनकी रचनाएं एक जीवन दर्शन बनकर हमारे साथ चलती हैं।
  • Shakti Se Shanti (Paperback)
    Atal Bihari Vajpayee
    250

    Item Code: #KGP-459

    Availability: In stock

    शक्ति से शान्ति
    हम सब जानते है कि यह आजादी हमें सस्ते में नहीं मिली है । एक तरफ महात्मा गांधी जी के नेतृत्व में आजादी के अहिंसात्मक आन्दोलन में लाखों नर-नारियों ने कारावास में यातनाएँ सहन की, तो दूसरी ओर हजारों क्रान्तिकारियों ने हँसते-हँसते फाँसी का तख्ता चूमकर अपने प्राणों का बलिदान  दिया । हमारी आजादी इन सभी ज्ञात-अज्ञात शहीदों और स्वतंत्रता सेनानियों की देन है ।
    आइये, हम सब मिलकर इनको अपनी हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करें और प्रतिज्ञा करें कि हम इस आजादी की रक्षा करेंगे, भले ही इसके लिए सर्वस्व की आहुति क्यों न देनी पड़े ।
    हमारा देश विदेशी आक्रमणों का शिकार होता रहा है । पचास वर्षों के इस छोटे-से कालखंड में भी हम चार बार आक्रमण के शिकार हुए हैं। लेकिन हमने अपनी स्वतंत्रता और अखंडता अक्षुण्ण रखी । इसका सर्वाधिक श्रेय जाता है—हमारे सेना के जवानों को । अपने घर और प्रियजनों से दूर, अपना सर हथेली पर रखकर, ये रात-दिन हमारी सीमा की रखवाली करते है । इसलिए हम अपने घरों में चैन की नींद सो सकते है । सियाचिन की शून्य से 32 अंश कम बर्फीली वादियाँ हों  या पूर्वांचल का घना जंगल, कच्छ या जैसलमेर का रेगिस्तान का इलाका हो या हिंद महासागर का गहरा पानी, समी स्थानों पर हमारा जवान चौकस खडा है । इन सभी जवानों की जो थलसेना, वायुसेना और जलसेना के साथ-साथ अन्य सुरक्षा बलों से संबंधित है, मैं अपनी ओर से और आप सबकी ओर से बहुत-बहुत बधाइयाँ देता हूँ और इतना ही कहता हूँ कि हे भारत के वीर जवानों । हमें हुम पर नाज है, हमें हुम पर गर्व है । -[इसी पुस्तक से]
  • Rigved, Harappa-Sabhyata Aur Sanskritik Nirantarta (Paperback)
    Dr. Kripa Shanker Singh
    240

    Item Code: #KGP-7087

    Availability: In stock

    आज यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि ऋग्वेदिक संस्कृति हड़प्पा-सभ्यता के पूर्व की संस्कृति है । कितने वर्ष पूर्व की, यह कहना कठिन है; पर ऋग्वेद के वर्ण्य विषय को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि हड़प्पा-सभ्यता (3000 ई.पू.) से कम से कम डेढ़ सहस्त्र वर्ष पहले से यह अवश्य ही विद्यमान थी । हड़प्पा-सरस्वती-सभ्यता से संबंधित स्थलों की खुदाइयों में इस तरह के प्रभूत प्रमाण मिले हैं, जिन्हें ऋग्वेदिक समाज की मान्यताओं और विश्वासों के पुनर्कथन के रूप में देखा जा सकता है और वही सांस्कृतिक ऋक्थ वर्तमान हिन्दू समाज का भी मूल स्वर है । उस ऋक्थ को सही परिप्रेक्ष्य में देखने की जरुरत है । 
    ऋग्वेद विश्व की प्राचीनतम साहित्यिक कृति भी है । उसमें अधिकाधिक ऐसा ऋचाएँ हैं, जो सर्वोत्कृष्ट काव्य के रूप में रखी जा रही जा सकती हैं । ऐसा ऋचाएँ भी हैं, जो शुद्ध रूप से भावनात्मक दृष्टि से कही गयी हैं और बहुत बड़ी संख्या में ऐसी ऋचाएँ भी हैं, जो प्रकृति के रहस्यमय दृश्यों के ऐन्द्रजालिक लोक में ले जाती हैं । 
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Mohan Rakesh (Paperback)
    Mohan Rakesh
    90

    Item Code: #KGP-1359

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : मोहन राकेश
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार मोहन राकेश ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'सीमाएँ', 'मलबे का मालिक', 'उसकी रोटी’, 'अपरिचित', ‘क्लेम', 'आर्दा', 'रोज़गार', 'सुहागिनें', 'गुनाह बेलज्जत' तथा 'एक ठहरा हुआ चाकु' ।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार मोहन राकेश की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rita Shukla (Paperback)
    Rita Shukla
    180

    Item Code: #KGP-510

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : ऋता शुक्ल
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार ऋता शुक्ल ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'प्रतीक्षा', 'छुटकारा', 'देस बिराना', 'विकल्प', 'जीवितोअस्मि…!', 'रामो गति देहु सुमति...', 'निष्कृति', 'सलीब पर चढे सूरज का सच', 'उबिठा बनाम उभयनिष्ठा...' तथा 'हबे, प्रभात हबे' ।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक ऋता शुक्ल की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Path Ke Daavedaar (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    160

    Item Code: #KGP-157

    Availability: In stock


  • Akbar-Beerbal Ki Praamaanik Kahaniyan (Paperback)
    Hari Krishna Devsare
    150

    Item Code: #KGP-7064

    Availability: In stock

    अकबर-बीरबल की प्रामाणिक कहानियां 
    अकबर-बीरबल की इन कहानियों में केवल मनोरंजक, हाजिरजवाबी और चतुराई की घटनाएं नहीं हैं, बल्कि इनमें भारतीय इतिहास की दो महान् विभूतियों के व्यक्तित्व के विविध गुणों और विशेषताओं के भी दर्शन होते हैं । इन कहानियों में विद्वानों-गुणी  ज़नों का आदर है, कुशल प्रशासन है, न्याय की तराजू पर किए गए फैसले और सामान्य जनता के कल्याण हेतु कार्यों जैसे पहलू भी उजागर होते हैं ।
    यों तो अकबर-बीरबल के किस्सों में काफी मिलावट हुई है, फिर भी उससे बचकर कुछ ऐसी चुनिंदा कहानियां ही यहाँ प्रस्तुत हैं, जो इतिहास की इन दोनों महान् विभूतियों की गरिमामयी छवि प्रस्तुत कर सकें । आशा है, पाठक इन्हें रुचिकर पाएंगे ।
    –हरिकृष्ण देवसरे

  • Debt-Free-Forever (Paperback)
    Gail Vax-Oxlade
    245

    Item Code: #KGP-344

    Availability: In stock

    Imagine waking up in the morning and knowing that no matter what happens today, you can cope. Imagine that you’ve got enough money to take care of the expenses that need to be paid regularly and to have some fun too. Imagine the sense of peace that comes from knowing you’re in control of your life.
    If you’ve been frantically trying to cover your butt because there just never seems to be enough money, I can help you. If you’re up to your eyeballs in debt and can’t even imagine being debt-free, I can help you. If you’re at your wits’ end because you’ve made a huge mess and don’t have a clue how to fix it, I can help you.
    —from the book
    FIGURE OUT WHERE YOU STAND MAKE A PLAN CHANGE YOUR HABITS PREPARE FOR THE FUTURE STAY THE COURSE
  • Kavi Ne Kaha : Kunwar Narain (Paperback)
    Kunwar Narayan
    90

    Item Code: #KGP-1217

    Availability: In stock

    शीर्षस्थ कवि कुँवर नारायण की कुछ कविताओं का यह संचयन उनके विस्तृत काव्य-बोध को समझने में सहायक होगा। पिछले पचास-साठ वर्षों में होने वाली महत्त्वपूर्ण गतिविधियों की सूक्ष्म एवं संवेदनशील अभिव्यक्ति इन कविताओं में प्रतिबिंबित हुई है। इस संग्रह में किसी विभाजन के अंतर्गत कविताएँ नहीं चुनी गई हैं, कोशिश है कि ‘आत्मजयी’ एवं ‘वाजश्रवा के बहाने’ को छोड़कर बाकी सभी कविता-संग्रहों में से कुछ कविताएँ रहें।
    समय और स्थान की निरंतरता का बोध कराती उनकी कविताएँ दूर समयों, जगहों और लोगों के बीच हमें ले जाती हैं। कुँवर नारायण की कविताएँ लंबी और जटिल भारतीय अस्मिता को बहुत कुशलता से आधुनिकता के साथ जोड़कर दोनों को एक नई पहचान देती हैं। उनकी रचनाशीलता में हिंदी भाषा तथा विभिन्न विषय नई तरह सक्रिय दिखाई देते हैं। एक ओर जहाँ वह पारंपरिक भाषा में नई ऊर्जा डालते हैं वहीं बिलकुल आज की भाषा में एक बहुत बड़े विश्वबोध् को संप्रेषित करते हैं-कविता के लिए ज्यादा से ज्यादा जगह बनाते हुए। प्रस्तुत कविताओं का संकलन पाठकों को कई तरह से संतोष देगा।

  • Shyamji Krishna Verma : Jeevan Darshan (Paperback)
    Mukesh Parmar
    90

    Item Code: #KGP-1272

    Availability: In stock

    भारतभूमि पर बलिदानी क्रांतिकारियों की संख्या असंख्य है किंतु विदेश में जाकर भारत की स्वाधीनता के लिए संग्राम करने वालों में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस और महात्मा गांधी का नाम अग्रिम पंक्ति में लिखा जाता है। इसी क्रम में श्यामजी कृष्ण वर्मा का नाम भी उल्लेखनीय है। विचारों की भिन्नता और कार्यशैली में अंतर अवश्य हो सकता है किंतु नेताजी और श्यामजी कृष्ण वर्मा की परिस्थितियों और कार्यशैली में ज्यादा अंतर नहीं है। श्यामजी ने देश-विदेश में अपनी कार्यकुशलता, संगठनशक्ति और भारतीय स्वाधीनता का जो शंखनाद किया उसने भारत सहित समूचे यूरोप और विशेषकर ब्रिटिश साम्राज्य को कंपित कर दिया। ऐसी क्रांति के युद्धवीरों में श्यामजी कृष्ण वर्मा का नाम अग्रिम पंक्ति में रेखांकित करने योग्य है। 
  • Facebook Ke Janak : Mark Zuckerberg (Paperback)
    M.A. Sameer
    150

    Item Code: #KGP-7081

    Availability: In stock

    अमरीकी युवा मार्क जुकरबर्ग ने किस प्रकार अपनी विलक्षण प्रतिभा से आधुनिक जगत में लोगों को सरलता से आपस में जुड़ने का अवसर दिया, यह एक अत्यंत रोचक विषय है। प्रस्तुत पुस्तक ‘फेसबुक के जनक: मार्क जुकरबर्ग’ उनके विलक्षण मस्तिष्क के अद्भुत कारनामे को प्रेरक रूप में सामने लाने का प्रयास है। यह पुस्तक प्रत्येक वर्ग के पाठकों के लिए प्रेरणादायी सिद्ध होगी और उन्हें अनेक रोचक तथ्यों से अवगत भी कराएगी।
  • Toro Kara Toro-2 (Paperback)
    Narendra Kohli
    300

    Item Code: #KGP-513

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ramdarash Mishra (Paperback)
    Ramdarash Mishra
    90

    Item Code: #KGP-1584

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : रामदरश मिश्र
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार रामदरश मिश्र ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'सीमा', 'सड़क', 'एक औरत एक जिदगी', 'खँडहर की आवाज', 'मां, सन्नाटा और बजता हुआ रेडियो’, 'निर्णयों के बीच एक निर्णय', 'मुर्दा मैदान', 'अकेला मकान', 'शेष यात्रा' तथा 'दिन के साथ' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक रामदरश मिश्र की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Lauhpurush Sardar Vallabhbhai Patel-Jeevan Darshan (Paperback)
    M.A. Sameer
    100

    Item Code: #KGP-1410

    Availability: In stock

    सरदार वल्लभभाई पटेल
    सरदार वल्लभभाई पटेल को भारत के इतिहास में लौहपुरुष के रूप में जाना जाता है, जबकि विदेशी इतिहासकारों ने उनकी तुलना बिस्मार्क से की है। वे कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति थे और परिस्थिति फिर चाहे जैसी भी रही हो, अपने कर्तव्य का निर्वाह करने से नहीं चूके। इस संदर्भ में वह घटना याद आती है, जब वे अदालत में अपने मुवक्किल की पैरवी कर रहे थे कि तभी उन्हें उनकी पत्नी की मृत्यु से संबंधित तार मिला। उन्होंने वह तार पढ़ा और उसे अपनी जेब में रख लिया तथा मनोयोग से अपने कर्तव्यपालन में लगे रहे। उनका विचार था कि यदि वे अपने कर्तव्य का पालन नहीं करते तो एक बेगुनाह को सजा हो जाती।
    सरदार पटेल की सहनशक्ति बड़ी अद्भुत थी। जब उनकी आयु केवल 9 वर्ष थी तो उनकी बगल में एक फोड़ा निकल आया था। फोड़ा पक गया था, जिस कारण उसमें मवाद बन गयी था। इस फोड़े के कारण उन्हें असहनीय पीड़ा होने लगी थी। ऐसे में उन्होंने अदम्य साहस का परिचय देते हुए उस फोड़े को लोहे की गर्म सलाख से फोड़ दिया। इस आयु में इस तरह के साहस व सहनशक्ति के उदाहरण बहुत ही कम देखने को मिलते हैं।
    बाल्यावस्था से ही सरदार पटेल में निर्णय लेने की बड़ी अद्भुत क्षमता थी और उन्होंने जीवन में जो भी निर्णय लिए, उनमें सफलता भी प्राप्त की। पराधीन भारत में उन्होंने किसानों का नेतृत्व किया और उन्हें निडर, साहसी तथा वीर बनने का पाठ पढ़ाया, जबकि स्वतंत्रा भारत में उन्होंने देशी रियासतों को एकीकृत करने का जो गौरवशाली कार्य किया, वह हमारे सामने एकीकरण की आदर्श मिसाल है। 
    प्रस्तुत पुस्तक ‘लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल: जीवन दर्शन’ में सरदार पटेल के जीवन से जुड़ी घटनाओं एवं तथ्यों को सरस, सरल एवं रोचक भाषा में समाहित करने का प्रयास किया गया है।
  • Isro Ke Rocket Evam Unki Vikas Sanskriti (Paperback)
    Dr. Suresh Chandra Gupta
    250

    Item Code: #KGP-582

    Availability: In stock

    भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के जैसी उपलब्धि, देश में अन्य क्षेत्रों में कम ही दिखाई पड़ती है । ऐसा क्यों ?  प्रश्न स्वाभाविक है। वास्तव में, पूर्ण उत्तर लिए एक गंभीर खोज और अध्ययन की आवश्यकता है । लेखक का मानना है कि कार्य-संस्कृति की कमियां इसके प्रमुख कारण हैं । हमारे अंतरिक्ष कार्यक्रम ने इस तथ्य को समझा और उसके निराकरण का भरपूर प्रयत्न किया, और फलस्वरूप एक प्रभावी कार्य संस्कृति का आविर्भाव हुआ । लेखक के अनुसार, इस संस्कृति का विवरण देना उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना कि रॉकेट विज्ञानं की चर्चा करना, क्योंकि, देश की प्रगति के लिए सभी कार्यक्रमों की सफलता अत्यावश्यक है और उसके लिए एक प्रभावशाली कार्य संस्कृति को अपनाना होगा । ऐसी एक कार्य संस्कृति का विवरण देना भी इस पुस्तक का उद्देश्य है । संक्षेप में, मानव संसाधन को संजोना, सामर्थ्य प्रदायक वातावरण निर्माण करना, पुरे देश को भागीदार बनाना तथा गुणता एवं विश्वसनीयता पर पूरा ध्यान देना, इस कार्य संस्कृति के मुख्य अंग हैं । 
  • Kosh Vigyan (Paperback)
    150

    Item Code: #KGP-7076

    Availability: In stock


  • Ramlubhaya Haazir Hai (Paperback)
    Raj Kumar Gautam
    120

    Item Code: #KGP-1175

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Kamal Kumar (Paperback)
    Kamal Kumar
    130

    Item Code: #KGP-412

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : कमल कुमार
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार कमल कुमार ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'फॉसिल',  'के नाम है थारो', 'केटलिस्ट', 'वैलेन्टाइन डे', 'मंडी', 'खोखल', 'कीच', 'धारावी', 'चौराहा' तथा 'अपराजेय'। 
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक कमल कुमार की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Agyey (Paperback)
    Agyey
    120

    Item Code: #KGP-7014

    Availability: In stock


  • Meethi Neem (Paperback)
    Kusum Kumar
    240

    Item Code: #KGP-389

    Availability: In stock


  • Ghar Nikaasi (Paperback)
    Nilesh Raghuvanshi
    70

    Item Code: #KGP-1316

    Availability: In stock


  • Hindi Gazal Shatak (Paperback)
    Sher Jung Garg
    80

    Item Code: #KGP-1334

    Availability: In stock

    हिन्दी ग़ज़ल शतक
    उर्दू में ग़ज़ल कहने की परंपरा बहुत पुरानी है । मीर, गालिब, जौक, सौदा से लेकर जिगर, सजाना, फैज, साहिर और उनके बाद की अनेक पीढियों तक ग़ज़ल उर्दू शायरी का जरूरी हिस्सा रही है । इधर हिंदी में भी ग़ज़ल ने अपनी एक परंपरा बना ली है और निराला, प्रसाद, रामनरेश त्रिपाठी, हरिकृष्णा 'प्रेमी', शंभुनाथ शेष, विजित, त्रिलोचन, शमशेर, बलवीर सिंह रंग, दुश्यंत कुमार और उनके बाद छंदबद्ध लिखने वालों की लगभग पूरी की पूरी पीढ़ी  ग़ज़ल -लेखन से जुड़ गई है। कहना ही होगा कि हिंदी ग़ज़ल  के क्षेत्र में पूरे भारत में लगभग हजार से अधिक रचनाकार अपने ढंग से, अपने रंग में, अपनी शक्ति और सामर्थ्य के साथ ग़ज़लें कह रहे हैं । असलियत यह है कि आज काव्य-मंचों पर, पत्र-पत्रिकाओं में, पुस्तक प्रकाशन में ग़ज़ल का बोलबाला है ।
    इतने व्यापक रचना-संसार में निश्चय ही बहुत-सी ग़ज़लें ऐसी है, जिन्हें काव्यपेमी बार-बार पढ़ना और अपने पास सँजोकर रखना चाहेंगे । प्रस्तुत 'हिन्दी ग़ज़ल शतक' में ग़ज़ल को विविध शैलियों में लिखने वाले पच्चीस ग़ज़लकारों की चार-चार ग़ज़लें दी जा रही है, जो हिंदी ग़ज़ल  के वैविध्य को निश्चय ही प्रभावकारी अंदाज में पेश करती है ।
  • Jhansi Ki Rani (Paperback)
    Jaivardhan
    50

    Item Code: #KGP-7091

    Availability: In stock

    जयवर्धन का 'झाँसी की रानी' नाटक इसी क्रम की एक कड़ी है । यह सही है कि उन्होंने उस लडाई की सबसे ज्यादा परिचित और रेखांकित नायिका महारानी लक्ष्मीबाई को अपने नाटक के केंद्र में रखा है, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने उस अल्पज्ञात इतिहास को भी पुनर्रचना करने की कोशिश की हैं, जो लक्ष्मीबाई के बचपन से लेकर युवा होने तक का इतिहास है । नाटक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि रचनाकार ने गीत-संगीत  अथवा सूत्रधार जैसी किसी भी बार-बार आजमायी हुई नाटकीय युक्ति का प्रयोग नहीं किया, उन्होंने फॉर्म अथवा शैली के स्तर पर यथार्थवादी शैली का चुनाव किया है और उसमें बहुत ही सरल और सहज तरीके से कथा को विकसित करते चले गए हैं।
  • Aagaami Ateet (Paperback)
    Kamleshwar
    70

    Item Code: #KGP-7068

    Availability: In stock


  • Ek Vyakti Narendra Kohli (Paperback)
    Narendra Kohli
    80

    Item Code: #KGP-7100

    Availability: In stock


  • Pahiye Ki Vikaas Katha (Paperback)
    Chetan Kumar
    60

    Item Code: #KGP-7089

    Availability: In stock


  • Mere Jeevan Ka Prashasanik Kaal (Paperback)
    Indira Mishra
    180

    Item Code: #KGP-410

    Availability: In stock

    मेरे जीवन का प्रशासनिक काल
    श्रीमती इंदिरा मिश्र के प्रशासनिक जीवन की इन स्मृतियों में एक नई वैचारिक ऊर्जा का समावेश निहित है। इस कृति से तथाकथित बहुप्रचलित ‘स्त्री-विमर्श’ की अवधारणा को, फिकरेबाजी से अलग, एक नया आयाम हासिल होता है कि वह मात्रा दलित या शोषित स्त्री का दायरा नहीं है, वरन् समाज में स्थापित कुशाग्र, प्रबुद्ध एवं सक्रिय स्त्री के अंतर्द्वंद्वों का भी प्रतिबिंब बन सकता है।
    यूं डॉ. इंदिरा मिश्र रचनात्मक साहित्यिक लेखन में भी दखल रखती हैं, किंतु यहां अभिव्यक्ति के केंद्र में गहन मूल्यों की जगह प्रशासनिक तंत्र का ताना-बाना है--जो मुख्यतः सूचनात्मक एवं ज्ञानवर्धक है--पर कहीं-कहीं ऐसे मानवीय प्रसंग और आख्यान भी अनायास मुखर हुए हैं--जिनमें सशक्त कथा साहित्य के गुण मौजूद हैं। लगता है ऐसे ही अनेक प्रसंगों से प्रेरणा लेकर लेखिका ने अपनी कहानियां गढ़ी होंगी, और जो शेष रह गए, उन्हें इस संस्मरण माला में यथावत् शामिल कर लिया।
    प्रस्तुत पुस्तक में सिविल सेवा में प्रशिक्षणार्थी से लेकर राज्य के अपर मुख्य सचिव तक के अपने प्रशासनिक जीवन के जो कालखंड लेखिका ने शब्दस्थ किए हैं, उन्हें सुरुचिपूर्ण ढंग से क्रमबद्ध किया गया है।
    विविध रुचि के समस्त पाठकों में यह कृति विशेषतः उन युवाओं (विशेषकर लड़कियों) के लिए ज्यादा सटीक है जो प्रशासनिक सेवा में अपना कैरियर बनाने का ध्येय रखते हैं।
    --राजेश जैन
  • Mera Sangharsh : Hitler Ki Aatmkatha (Paperback)
    Ramchandra Verma Shastri
    380

    Item Code: #KGP-7033

    Availability: In stock

    मेरा संघर्ष : हिटलर की आत्मकथा
    हिटलर की आत्मकथा को हिन्दी में प्रकाशित करने का उद्देश्य उसके उन दोषों को प्रकाशित करना नहीं है, जिनके कारण वह काफी बदनाम हुआ ।  उसकी बदनामी के तीन मुख्य कारण थे--फासिस्टवादी विचारधारा, जातीयतावाद और युद्ध की मानसिकता । इन्हें तीन कारणों से उसे विश्व-मानवता का शत्रु समझा जाता है । किन्तु उसकी राष्ट्रवादी मनोवृति एक ऐसा तत्त्व या, जिसने उसके चरित्र को काफी ऊँचा उठाया।  इसी उम्र राष्ट्रवादी प्रवाह की लपेट में वह दूसरे दोषों का भी शिकार हो गया । यह आत्मकथा उसकी राष्ट्रवाद की इसी भावना को उजागर करती है।  राष्ट्रवाद से अभिप्राय जातीय संकीर्णता नहीं है, बल्कि मातृभूमि के प्रति अपार श्रद्धा और असीम गौरव का नाम ही सच्चा राष्ट्रवाद है ।
    अपने देश से प्रेम, उसके प्रति निष्ठा, देशवासी होने का स्वाभिमान, देश के लिए बलिदान की भावना तथा राष्ट्र के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने की चाह जैसे गुणों की हमारे देश को आज कितनी जरूरत है, यह कहने की आवश्यकता नहीं । इसका जीता-जागता उदाहरण हमें हिटलर की प्रस्तुत आत्मकथा में पढ़ने को मिलता है ।
    मेरा संघर्ष (हिटलर की आत्मकथा) को हिन्दी में प्रकाशित करने के पीछे हमारा परम उद्देश्य यही है कि इसके अध्ययन-मनन से देशवासियों में सच्चे राष्ट्रवाद की भावना का जन्म हो ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Usha Kiran Khan (Paperback)
    Usha Kiran Khan
    140

    Item Code: #KGP-504

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : उषाकिरण खान
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार उषाकिरण खान ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'मौसम का दर्द', 'दूब-धान', 'नीलकंठ', 'कौस्तुभ-स्तंभ', 'कुमुदिनी', 'जलकुंभी', 'तुअ बिनु अनुखन विकल मुरारि', 'नटयोगी', 'घर से घर तक' तथा 'हमके ओढ़ा  द चदरिया हो, चलने की बेरिया'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक उषाकिरण खान की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Bhrashta Samaaj (Paperback)
    Chandan Mitra
    90

    Item Code: #KGP-7048

    Availability: In stock


  • Dushyant Ke Jaane Par Doston Ki Yadein (Paperback)
    Kamleshwar
    90

    Item Code: #KGP-1381

    Availability: In stock


  • Gopal Krishna Gokhale : Jeevan Darshan (Paperback)
    Gaurav Chauhan
    120

    Item Code: #KGP-482

    Availability: In stock

    जिस समय हमारी यह भारतभूमि अंग्रेजों के अत्याचारों, प्रताड़नाओं की बेड़ियों में जकड़ी हुई थी उस समय देश के अनेक वीर सपूतों ने या तो अपने प्राणों की आहुति देकर इस देश के मान-प्रतिष्ठा और स्वाभिमान की रक्षा की या जीवन भर देश के लोगों को देश की आजादी के संघर्ष के लिए प्रेरित करते रहे। उन्हीं वीर सपूतों में से एक वीर सपूत थे—गोपालकृष्ण गोखले। गोखले जी ने उस समय न केवल इस देश के युवाओं को स्वतंत्रता के लिए प्रेरित किया बल्कि अपना संपूर्ण जीवन देश को आजादी दिलाने के प्रयासों में ही न्योछावर कर दिया।
  • Cement Nagar (Paperback)
    VIJAY
    130

    Item Code: #KGP-258

    Availability: In stock


  • Aakhiri Adhaai Din (Paperback)
    Madhup Sharma
    120 108

    Item Code: #KGP-161

    Availability: In stock


  • Yug Pravartak Swami Dayanand (Paperback)
    Lala Lajpat Rai
    80

    Item Code: #KGP-815

    Availability: In stock


  • Yatrayen (Paperback)
    Himanshu Joshi
    60

    Item Code: #KGP-7066

    Availability: In stock

    यात्राएँ
    कहानियों, उपन्यासों की तरह हिमांशु जोशी के यात्रा-वृत्तांतों  की भी अपनी विशेषता है। पढ़ते-पढ़ते पाठक को कहीं लगने लगता है कि इन यात्राओं में लेखक के साथ-साथ वह भी यात्रा कर रहा है । लेखक जिस तरह से इन सबको देख रहा है, जिस तरह की अनुभूति उसे हो रही है, कुछ-कुछ वैसी ही उसे भी होने लगती है । सरलता, सहजता, स्वाभाविकता हिमांशु जोशी की रचनाओं के सहज, स्वाभाविक गुण हैं । संभवत: ये ही मूल गुण किसी रचना को जीवंत बनाने में सफल होते है ।
    इन यात्राओं से कश्मीर के बर्फीले दुर्गम सीमा-क्षेत्र शामिल हैं तो पूर्व में बाँग्लादेश और भारत को विभाजित करती सुदूर हरित वंगा या इच्छामती के कूल-कगार भी । कहीं कन्याकुमारी तथा केरल की मनोरम हरित दुश्यावलियाँ हैं तो कुमाऊँ के पर्वतीय प्रदेश की अनेक अज्ञात, अछूती मनोरम झाँकियाँ भी। मॉरिशस का नीलवर्णी निर्मल स्वच्छ सागर है कहीं तो उत्तरी ध्रुव प्रदेश की हिमशीतल सफेद हवाएँ भी अपने अस्तित्व का अहसास जताने लगती है । हिमांशु जोशी संभवत: वह हिंदी के पहले लेखक है, जिन्होंने विश्वविख्यात नाटककार हैनरिक इब्सन के घर सीयन की साहित्यिक यात्रा की थी । उसी तरह नोबेल पुरस्कार से सम्मानित नार्वेजियन लेखक सीगरी उनसत तथा ब्यौर्नसन के घरों की तीर्थयात्राएँ भी।
    ये यात्रा-विवरण मात्र यात्रा के विवरण ही नहीं, कहीं इनमें  इतिहास भी है, भूगोल के साथ-साथ साहित्य भी । कला एवं संस्कृति की मार्मिक छुअन भी। इसीलिए ये वृतांत कहीं  दस्तावेज भी बन गए हैँ-जीए हुए अतीत के। पाठको को इनसे एक संपूर्ण जीवन का अहसास होने लगता है। एक साथ वह बहुत कुछ ग्रहण करने में सफल होता है-शायद यह भी इन वृत्तात्तों की एक सबसे बडी सफलता है ।
  • Antarmilan Ki Kahaniyan (Paperback)
    Rangey Raghav
    150

    Item Code: #KGP-498

    Availability: In stock

    अंतर्मिलन की कहानियाँ
    ऐसी उत्कृष्ट कहानियों का संग्रह, जिनमें भारतीय साहित्य के उन अमर पात्रों के चित्र उतारे गए हैं जिन्होंने सदियों से भारतीय आत्मा क्रो 'जियो और जीने दो' की प्रेरणा दी ।
  • Pracheen Brahman Kahaniyan (Paperback)
    Rangey Raghav
    150

    Item Code: #KGP-499

    Availability: In stock

    प्राचीन ब्राह्मण कहानियाँ
    आर्य संस्कृति के आदि संस्थापकों की जीवन-झाँकियाँ प्रस्तुत करने वाली ये कहानियाँ रोचक तो हैं ही, ज्ञानवर्धक भी हैं ।

  • Grameen Samaj(Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    290

    Item Code: #KGP-206

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Nanak Singh (Paperback)
    Nanak Singh
    80

    Item Code: #KGP-7003

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : नानक सिंह
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार नानक सिंह ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'कुचले हुए पुष्प', 'लक्ष्मी-पूजा', 'अंतर्ज्ञान', ‘अछूते आम', 'चक्षुहीन संत', 'जर्जर खपरैल की एक स्लेट', 'स्नोफॉल', 'इनसान-हैवान', 'लंबा सफ़र' तथा 'जब हम में 'इनसान' प्रकट होता है' । 
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक नानक सिंह की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Anuvad Vigyan : Siddhant Evam Pravidhi (Paperback)
    280 252

    Item Code: #KGP-230

    Availability: In stock

    अनुवाद विज्ञान : सिद्धांत एवं प्रविधि
    लंबे समय से अनुवाद पर एक ऐसी प्रामाणिक पुस्तक की कमी महसूस की जा रही थी जो सभी प्रकार के पाट्यक्रमों की ज़रूरत को तो पूरा करती ही हो, साथ ही शोधार्थियों, अनुवाद के शिक्षकों, प्राध्यापकों के लिए उपयोगी होने के साथ-साथ अनुवाद कार्य से जुडे अनुवादकों तया अनुवाद व्यवसाय से जुड़े सभी व्यक्तियों के लिए उपयोगी हो ।
    इस पुस्तक में अनुवाद विद्वान की समस्त प्रविधियों व सिद्धांतों का विवेचन-विशलेषण भी किया गया है तथा जुत्ताई, 2008 तक अनुवाद के क्षेत्र से हुए चिंतन एव शोधों को समाहित करते हुए इस अनुवाद पर अद्यतन एवं प्रामाणिक पुस्तक के रूप में तैयार किया गया है । इसलिए इसका पुराना नाम 'अनुवाद विज्ञान' न रखकर इसे अनुवाद विज्ञान : सिंद्धांत एवं प्रविधि' नाम दिया गया है, क्योंकि  यह पुस्तक नवीनतम उदभावनाओं व विचारों से युक्त है तथा  मेरे 30 वर्षों से भी अधिक के अनुवाद के अनुभवों को समेटे हुए है । मुझे विश्वास है कि यह पुस्तक अपने उद्देश्य में अवश्य ही सफल होगी तथा विद्यार्थियों, प्राध्यापकों, अनुवादकों व अनुवाद के गंभीर अध्येताओं के लिए भी समान रूप से उपादेय सिद्ध होगी ।
    -डों० जयन्तीप्रसाद नौटियाल
    (संपादक)
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rabindra Nath Thakur (Paperback)
    Rabindra Nath Thakur
    90

    Item Code: #KGP-7013

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार रवीन्द्रनाथ ठाकुर के प्रस्तुत संकलन में जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'अनधिकार प्रवेश', 'मास्टर साहब', 'पोस्टमास्टर', 'जीवित और मृत', 'काबुलीवाला', 'आधी रात में', 'क्षुधित पाषाण', 'अतिथि', 'दुराशा' तथा 'तोता-कहानी'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक रवीन्द्रनाथ ठाकुर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Usha Priyamvada (Paperback)
    Usha Priyamvda
    150

    Item Code: #KGP-7006

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : उषा प्रियंवदा
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार उषा प्रियंवदा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'जिंदगी और गुलाब के फूल', 'वापसी', 'छुट्टी का दिन', 'जाले', 'एक कोई दूसरा', 'झूठा दर्पण', 'सागर पार का संगीत', 'चांदनी में बर्फ पर', 'शून्य' तथा 'आधा शहर' । 
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक उषा प्रियंवदा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Shabdon Mein Rahti Hai Vah (Paperback)
    Pushpita Awasthi
    390 312

    Item Code: #KGP-438

    Availability: In stock

    वेद ने प्रकृति को देवता का काव्य कहा है--पश्य देवस्य काव्यम्। इस काव्य के प्रति सबसे ज्यादा लगाव कवियों में होता है। पुष्पिता के इस काव्य-परिसर में अनेक देशों, द्वीपों, पहाड़ों, नदियों, महासागरों, आदिवासी जातियों की स्मृति है जिसमें कैरेबियाई द्वीप, आस्ट्रिया का नाउदर गांव, रोम के भव्य भवन, आल्प्स की कोमो झील, सेंटलूशिया, अटलांटिक और हिंद महासागर तथा जाने क्या-क्या एक साथ उपस्थित है। विविध् देशों के प्राकृतिक परिवेश और कलात्मक उत्कर्ष के साथ कुछ विशिष्ट व्यक्तित्व भी हैं जैसे कवि वालकट या अलेक्सजेंडर महेंद्र आदि। पुष्पिता के मन में भारत की याद भी साथ-साथ चलती है जैसे नाउदर की गायों को देखकर मथुरा, वृंदावन, गोप, गोपी और श्रीकृष्ण की याद या लांगडाईक की नहरों को देखकर बनारस की गलियों की या भारतीय पर्वों, त्योहारों और तिथियों की याद। उसकी व्यापक संवेदनशीलता उसे अनंतरूपात्मक जगत से जोड़े हुए है। इसीलिए वह विश्वव्यापी हिंसा के विरुद्ध  है।
    स्त्रिायां और बच्चे पुष्पिता के खास सरोकार हैं। कवयित्री होने के नाते स्वाभाविक भी है कि वह सैनिकों की गर्भस्थ स्त्रियों की व्यथा तथा अजन्मे शिशुओं के प्रति मां के विछोह और वात्सल्य के मर्म को अधिक तीव्रता से महसूस कर सके। एक ओर स्त्री को नाखून की तरह कुतरते और जोंक की तरह चूसते पुरुष का क्रूर बिंब उसके मन में है तो दूसरी ओर देह ढलने के बाद स्वयं ही अपना ताबूत बनती स्त्री का मार्मिक चित्रा भी। लेकिन इसके साथ ही उसकी प्रेम संबंधी कविताओं में देह का सुगंधित स्वाद और उसका बखान भी है। समय की अपराजेयता में विश्वास करते हुए भी पुष्पिता शब्द की अमरता में भरोसा रखती हैं, जो कभी मरते नहीं, जो मनुष्य की अस्मिता को बचाए रखते हैं। कहना न होगा कि यही कवि में कविता को भी जिंदा रखते हैं। मुझे विश्वास है, काव्यप्रेमी इस संग्रह की कविताओं का स्वागत करेंगे।
  • Doobte Waqt (Paperback)
    Dixit Dankauri
    75

    Item Code: #KGP-7053

    Availability: In stock

    पिछले तीन-चार दशकों से देश में 'हिन्दी गजल'–'उर्दू ग़ज़ल'  की एक बहस सी चल रही है। श्री दीक्षित दनकौरी ने इस बहस को निरर्थक सिद्ध कर दिया है। गजल अपने मिजाज और विशिष्ट कहन के कारण ग़ज़ल होती है, न कि उसमें प्रयुक्त शब्दों प्रतीकों के आधार पर । और वैसे भी आज देश में हिन्दी-उर्दू परम्परा की साझा ज़बान ही प्रचलित है । अत: आम जबान में आम आदमी की संवेदनाओं को अभिव्यक्ति करने वाले अशआर ही पाठकों/श्रोताओं पर अपना असर छोडते है ।
    एक कष्टदायक तथ्य यह भी है कि भारत की आजादी के बाद से ही कुछ स्वार्थी तत्वों द्वारा हिन्दी और उर्दू को मजहब के नाम पर बांटने की फुत्सित चाल चली जा रही है और दुर्भाग्य से इसमें उन्हें आंशिक सफलता भी मिल रही है । आज संसार की कोई भाषा सिर्फ अपने शब्द भंडार तक ही सीमित नहीं है । ग्लोबलाइजेशन के इस युग में जहाँ पूरी दुनिया एक गांव भर होकर रह गई है, एक-दूसरे के शब्दों को अपनी भाषा में आत्मसात किए बगैर भला कैसे काम चलेगा ।
    -मोईन अख्तर अंसारी
  • Hausale Buland Hain (Paperback)
    Suraj Nagar
    100

    Item Code: #KGP-372

    Availability: In stock

    संसार में जो कुछ भी अनूठे, अद्वितीय, अविस्मरणीय, अतुलनीय एवं अद्भुत काम हुए हैं, वे चाहे किसी भी क्षेत्र में क्यों न हों, जैसे- स्थापत्यकला, मूर्तिकला, चित्रकला, संगीत, साहित्य-सृजन हो या कोई वैज्ञानिक आविष्कार, सब बुलंद हौसले का परिणाम है। हौसले की उड़ान से हर लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है, हर सपना साकार होता है। हौसले बुलंद होना जीवन में प्रसन्नता का सूर्योदय होने जैसा है और हौसले पस्त होना सूर्यास्त होने जैसा है। बचपन से ही मेरे मन में कविताओं की ऐसी पुस्तक लिखने की इच्छा थी, जो निराशा को आशा में बदल दे। गम के काँटों में खुशियों के फूल खिला दे। अमावस की काली रात को दीपावली की तरह जगमगा दे। देश के प्रतिष्ठित किताबघर प्रकाशन, दिल्ली ने मेरे गीतों को पुस्तक का आकार दिया है। जिसका नाम है-‘हौसले बुलंद हैं’।
    ‘हौसले बुलंद हैं’ पुस्तक के सार्वभौमिक, सार्वकालिक, सर्वजनहिताय, सर्वजनसुखाय गीतों को साहित्यकार एवं शिक्षाविद् डा. अलका तोमर ने अपनी अनूठी शैली में अंग्रेजी भाषा में रूपांतरित कर सार्वदेशिक बनाकर चार चाँद नहीं चालीस चाँद लगा दिए हैं। नई ऊर्जा, नया जोश, नई उमंग का संचार करने वाली इस पुस्तक के पहले गीत की रचना मंदोदरी का मायका, कालिदास द्वारा रचित मेघदूत में वर्णित दशपुर, शिवना तट पर स्थित पशुपतिनाथ की नगरी मंदसोर में हुई। रचना का यह क्रम क्षिप्रा तट स्थित ज्योतिर्लिंग मृत्युंजय महाकालेश्वर की नगरी उज्जैन, मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल, झारखंड की राजधानी राँची देश की राजधानी दिल्ली, शंकर के त्रिशूल पर बसी अविनाशी काशी, त्रिवेणी संगम प्रयागराज, यमुना तट स्थित मथुरा गोवर्धन, देवी अहल्या की नगरी इंदौर, नर्मदा तट स्थित ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर, सागर तट स्थित मायानगरी मुंबई से चलकर ऐतिहासिक एवं पुरातत्त्व संपदा से भरपूर सूर्य पुत्री ताप्ती तट स्थित बुरहानपुर में पूर्ण हुआ।
    ‘हौसले बुलंद हैं’ पुस्तक प्रेरणा का पथ पराक्रम का रथ प्रसन्नता की गंगा है। इस पुस्तक की रचना में मुझे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से प्रेरणा, सहयोग एवं मार्गदर्शन देने वाले सभी बुलंद हौसले वालों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ। ‘हौसले बुलंद हैं’ पुस्तक पढ़ने वालों के हौसले अवश्य बुलंद होंगे, ऐसा मुझे विश्वास है।
    -सूरज नागर
  • Sansar Ke Prasiddha Vyaktiyon Ke Prem-Patra (Paperback)
    Virendra Kumar Gupt
    350

    Item Code: #KGP-1424

    Availability: In stock

    स्त्रियों-पुरुषों के हृदयों में एक-दूसरे के प्रति उठते-बैठते ज्वारभाटों की सबसे सच्ची, ईमानदारी शाब्दिक अभिव्यक्ति प्रेम पत्रों में ही हो पाई है । इसका कारण स्पष्ट है । जब भी व्यक्ति ने, स्त्री या पुरुष ने प्रेम-पत्र लिखा है, वह अनायास ही धन-पद-विद्वत्ता या सामाजिक प्रतिष्ठा की ऊंचाइयों से नीचे उतर आया है और स्त्रीत्व-पुरुषत्व की यथार्थ धरती पर खड़े होकर ही उसने अपने प्रेमी या प्रेमिका को संबोधित किया है । तब शरीर की सभी साज-सज्जाएं और चेहरे के सभी मुख़ौटे उतर जाते हैं और धड़कता हृदय ही सामने होता है । इस स्तर पर लिंकन, बायरन, क्रामवेल, नेपोलियन, विस्मार्क,शॉ और गांधी एक ही सुर में बोलते दिखाई पड़ते हैं ।
  • Nirogyogsadhna (Paperback)
    Manoj Kumar Chaturvedi
    180

    Item Code: #KGP-7070

    Availability: In stock

    निरोगयोगसाधना
    आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम हर क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहते हैं और दिन-रात उसके लिए प्रयास करते रहते हैं। इस आपाधापी में व्यक्ति सबसे अहम चीज को जो नकार देता है वह है ‘स्वयं का स्वास्थ्य’। वह यह नहीं समझते कि इस संसार की प्रत्येक वस्तु तभी आपके लिए उपयोगी होगी जब आप उसका आनंद लेने के लिए तैयार होंगे। व्यक्ति यदि स्वस्थ नहीं तो संसार की कीमती से कीमती वस्तु भी उसके लिए बेकार है। स्वस्थ जीवन है तो जहान है। 
    योग द्वारा कैसे व्यक्ति मानसिक और शारीरिक रूप से संपूर्णतया स्वस्थ रह सकता है, इसका विस्तारपूर्वक वर्णन इस ‘निरोगयोगसाधना’ नामक पुस्तक के माध्यम से किया गया है।
    योग दर्शनशास्त्र में वर्णित सूत्र षड्दर्शन का ही छठा अंग है। ये षड्दर्शन वेदों के उपांग माने गए हैं। इसी कड़ी में आगे बढ़ते हुए शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निशक्त, छंद, ज्योतिष आदि वेदों के अंग कहलाते हैं जिनके द्वारा वेद मंत्रों के अर्थ का ज्ञान होता है।
    योग ऐसी कला है जो प्रकृति और मनुष्य के बीच के अंतर को स्पष्ट कर व्यक्ति के समक्ष प्रस्तुत करती है। अर्थात् व्यक्ति योग के माध्यम से इंद्रियों को अपने वश में करने लायक बन जाता है और माया के बंधन से भी स्वयं को तोड़कर मुक्त हो जाता है। योग अनादिकाल से चला आ रहा है और इसकी उपयोगिता व्यक्ति तभी समझ सकता है जब वह योग को स्वयं पर लागू करे, उसमें रम जाए। योग करने वाला व्यक्ति कभी बूढ़ा या बीमारी से ग्रसित नहीं होता।
    —भूमिका से
  • Aashcharya Ki Tarah Khula Hai Sansar (Paperback)
    Ashok Vajpayee
    190

    Item Code: #KGP-407

    Availability: In stock

    आश्चर्य की तरह खुला है संसार 
    आधुनिक कवियों में अशोक वाजपेयी अरसे से प्रेम के एकाधिकारी कवि बने हुए हैं और यह उत्सवता सत्तर पार की उनकी शब्दचर्या में भी उतना ही दखल रखती है जितना कभी उनके युवा समय में। सच कहें तो प्रेम का कवि कभी बूढ़ा नहीं होता। वे कभी यह नहीं भूलना चाहते कि जीवन राग-अनुराग, सौन्दर्यबोध और सौष्ठवता का प्रफुल्ल विस्तार है।
    अशोक वाजपेयी के यहाँ प्रेम का यूटोपियाई स्वप्न नहीं देखा गया है बल्कि वह उनके लेखे जीवन का अध्यात्म है। उसे भाषा में खोजना व्यर्थ है क्योंकि वह शब्दों के बीच की चुप्पियों में/चाहत के अर्धविरामों में/संकोच के विरामों में/प्रेम की असम्भव संस्कृत में बसता है। रति से उनकी कविता की अनुरक्ति पुरानी है। रतिमुक्त प्रेम के बारे में कविता लिखना आसान है जबकि रति के रूपक रचना कठिन। अशोक वाजपेयी ने रति के सुघर और शिष्ट विन्यास में सफलता पाई है। इसीलिए कविता की लम्बी पारी खेलने वाले वाजपेयी के प्रेम और रति के रूपकों को भाषा के नेपथ्य में कौंधती अन्तध्र्वनियों में ही महसूस किया जा सकता है।
    कविता व ललित कलाओं के भव्य भुवन में रमते हुए अशोक वाजपेयी को कोई अर्धशती से ऊपर होने को आए। सेंट स्टीफेंस कालेज में पढ़ने वाला वह युवा अब अपनी परिपक्व वयस् में है। उसकी कविता एक अकेले की सृष्टि लगती है जहाँ वह सदियों से कवि-परंपरा को गाता चला आ रहा है। यह कवि अज्ञेय की तरह सुरुचिवान है तो श्रीकांत वर्मा की तरह स्मृतिसंपन्न। मुक्तिबोध के प्रति उसमें अनन्य अनुराग और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता है। गोष्ठियों-सभाओं-अनुष्ठानों- महफिलों का यह निर्विकल्प नायक शब्दों का कुशल कारीगर है। वह देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण की तरह जैसे अनंत समय से आदि कवि का ऋण अदा कर रहा है।
    अशोक वाजपेयी की कविता की तहें वैसे ही खुलती हैं, जैसे आश्चर्य की तरह खुलता है संसार। उन्हें पढ़ते हुए अकसर लगता है कि हम कविता की किसी साफ-सुथरी कालोनी से होकर गुजर रहे हैं जहाँ की आबोहवा हमारे निर्मल चित्त को एक नई आनुभूतिक बयार से भर रही है। यह नया रचने की उत्कंठा है जो उनसे कहलवाती है: मैं उम्मीद को दूसरे नाम से पुकारना चाहता हूँ/मैं इस गहरी कामना को एक उपयुक्त संज्ञा देना चाहता हूँ/मैं पलटता हूँ कामना का कोश/एक नया शब्द पाने के लिए। जो कवि अपनी माँ को महसूस करते हुए लिख सकता है: तुम्हारी बाँहें ऋतुओं की तरह युवा हैं, तुम्हारे होठों पर नई बोली की पहली चुप्पी है, तुम्हारी उँगलियों के पास कुछ नए स्पर्श हैं-वह अपनी कविता को सदैव नई बोली, नए स्पर्श देने के लिए प्रतिश्रुत रहेगा, इसमें संशय नहीं। अशोक वाजपेयी की कविताएँ-प्रेम कविताएँ बार-बार एक नया शब्द पाने, रचने और गढ़ने का उद्यम हैं।
    यह संग्रह अशोक वाजपेयी की श्रेष्ठ प्रेम कविताओं का एक गुलदस्ता है।
  • Kavi Ne Kaha : Ekant Shrivastava (Paperback)
    Ekant Shrivastva
    140

    Item Code: #KGP-7021

    Availability: In stock

    एकान्त वस्तुतः छत्तीसगढ़ की ‘कन्हार’ के कवि हैं। एकान्त का काव्य-संसार एक ओर माँ-बाप, भाई-बहन का भरा-पूरा परिवार है तो दूसरी ओर अंधी लड़की, अपाहिज और बधिर जैसे असहाय लोगों का शरण्य भी और ‘कन्हार’ जैसी लंबी कविता तो एक तरह से नख-दर्पण में आज के भारत का छाया-चित्र ही है। ‘अन्न हैं मेरे शब्द’ से अपनी काव्य-यात्रा आरंभ करने वाले एकान्त उन थोड़े से कवियों में हैं जो ‘शब्द’ को अपनी कविताओं से एक नया अर्थ दे रहे हैं। निश्चय ही एकान्त का काव्य एक लंबी छलाँग है और ऊँची उड़ान भी--कवि के ही शब्दों में एक भयानक शून्य की भरपाई। ---नामवर सिंह
    काली मिट्टी से कपास की तरह उगने की आकांक्षा से उद्वेलित यह कवि अपनी हर अगली कविता में मानो पाठक को आश्वस्त करता है कि वह अपने भाव-लोक में चाहे जितनी भी दूर चला जाए, अंततः लौटकर वहीं आएगा जो उसके अनुभव की तपी हुई काली मिट्टी है। यह एक ऐसी दुनिया है जो एक किसानी परिवेश के चमकते हुए बिंबों और स्मृतियों से भरी है। एक अच्छी बात यह कि गहरे अर्थ में पर्यावरण-सजग इस कवि के पास एक ऐसी देखती-सुनती, छूती और चखती हुई भाषा है, जो पाठक की संवेदना से सीध संलाप करती है।   ---केदारनाथ सिंह
    एकान्त की कविता और कवि-कर्म की खूबी है कि उन्होंने अपने को औपनिवेशिक आधुनिकता के पश्चिमी कुप्रभाव से बचाया है। यही कारण है कि उनकी कविता कलावादी और रूपवादी प्रभाव से मुक्त है। ऐसा इसलिए कि एकान्त अपने जनपद, अपनी जड़ों और अपनी ज़मीन को कभी नहीं छोड़ते। उनकी कविता हमें भारतीय समृद्ध काव्य-परंपरा की याद दिलाती है जो आज की अधिकांश कविता से विलुप्तप्राय है। एकान्त, निराला, नागार्जुन, त्रिलोचन और केदारनाथ अग्रवाल की परंपरा के सशक्त कवि हैं। एकान्त की कविता में कोई ठहराव नहीं है। वे आज भी नित नवीन और सारगर्भित कविताएँ बिना किसी विचलन या दोहराव के रच रहे हैं। क्योंकि उनका गहरा रिश्ता भारतीय लोक और जनमानस से बना हुआ है। सही अर्थों में वे लोकधर्मी कवि हैं। ‘नागकेसर का देश यह’ हिंदी में एकान्त की सर्वाधिक लंबी कविता है जिसके कई अर्थ-ध्वनिस्तर हैं और बड़ी संश्लिष्टता है।      ---विजेन्द्र
  • Atharvaved : Yuvaon Ke Liye (Paperback)
    Dr. Pravesh Saxena
    160

    Item Code: #KGP-7110

    Availability: In stock


  • Postmortem (Paperback)
    Ajeet Kaur
    100

    Item Code: #KGP-1310

    Availability: In stock


  • BHARATRATNA SE SAMMANIT MAHAN VYAKTITVA (Paperback)
    Dr. Rashmi
    360

    Item Code: #KGP-519

    Availability: In stock

    भारतरत्न देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है। अति सम्माननीय एवं विशिष्ट व्यक्तियों को राष्ट्रीय सेवा हेतु प्रदान किया जाने वाला यह सम्मान संपूर्ण व्यक्तित्व व देश के प्रति समग्र समर्पण भावना का आदर करते हुए समर्पित किया जाता है। इस सम्मान से अलंकृत व्यक्ति ‘भारतीय नागरिकता की वरीयता सूची’ में सातवें स्थान पर सुशोभित होते हैं। यह आवश्यक है कि 2 जनवरी, 1954 को भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद द्वारा स्थापित ‘भारतरत्न’ सम्मान के विषय में प्रत्येक नागरिक सुपरिचित हो। कला, साहित्य, विज्ञान, राजनीति, विचार, उद्योग, लेखन, सार्वजनिक सेवा एवं खेल आदि के क्षेत्रों में ‘भारतरत्न’ से सम्मानित विभूतियों के जीवन तथा कृतित्व से प्रेरणा पाकर कोई भी अपने जीवन को सार्थक बना सकता है।
    अनेक प्रेरक रचनाओं की लेखिका डॉ. रश्मि ने परिश्रम व निष्ठापूर्वक ‘भारतरत्न से सम्मानित: महान् व्यक्तित्व’ पुस्तक का लेखन किया है। सम्मानित व्यक्तित्व के सभी आयामों का परिचय देते हुए उन्होंने महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों को रेखांकित किया है। प्रथम बार ‘भारतरत्न’ (1954) से अलंकृत चक्रवर्ती राजगोपालाचारी से लेकर 2015 में सम्मानित अटल बिहारी वाजपेयी एवं पं. मदन मोहन मालवीय तक सभी महान् व्यक्तित्वों के विषय में महत्त्वपूर्ण जानकारी इस पुस्तक में समाहित है।
    राष्ट्रप्रेम, जीवन मूल्य और समर्पित कृतित्व को परिभाषित करती पुस्तक ‘भारतरत्न से सम्मानित: महान् व्यक्तित्व’ पठनीय व संग्रहणीय है। सरल-सुगम भाषा तथा प्रवाहपूर्ण शैली इसे अत्यंत रोचक बना देती है।
  • Dainik Jeevan Mein Ayurveda (Paperback)
    Vinod Verma
    240

    Item Code: #KGP-26

    Availability: In stock

    दुर्भाग्य की बात है कि आयुर्वेद का असीमित ज्ञान इस देश की संचालन-व्यवस्था में समुचित प्रतिष्ठा नहीं पा सका। आयुर्वेद के विकास तथा प्रचार-प्रसार की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई। हमारी शासन-व्यवस्था भी इस ओर उदासीन रही। आयुर्वेद को ‘देशी’ कहकर उपेक्षित कर दिया गया। किंतु आज जिस नए युग का प्रारंभ हो रहा है उसमें हमारा पुनर्जागरण सुनिचित है जिसमें हमें आभास होगा कि जिसे हमारे देशवासियों ने ‘देशी’ कहकर त्याग दिया था उसी को विदेशी लोग अच्छे आवरण में डालकर हमें बेच रहे हैं। ‘दादी मां’ की परंपरा अर्थात् आयुर्वेद का सामान्य ज्ञान, जो हमारे जीवन से दूर होता जा रहा है, उसे हमारी शिक्षा-प्रणाली में सम्मिलित किया जाय। इस दृष्टि से स्कूलों तथा मेडिकल काॅलेजों के पाठ्यक्रमों में आयुर्वेद के कुछ महत्वपूर्ण अंश पढ़ाए तथा सिखाए जाने चाहिए। आयुर्वेद के जिज्ञासुओं और अनुसंधित्सुओं के लिए उपयोगी जानकारी देने और तत्संबंधी अज्ञान को दूर करने में सहायक प्रस्तुत ग्रंथ इस विषय की विदुषी सुश्री विनोद वर्मा की अनूठी कृति है।
  • Mahaan Yoddha Prithviraaj Chauhan : Jeevan Darshan (Paperback)
    M.A. Sameer
    90

    Item Code: #KGP-1319

    Availability: In stock

    भारतवर्ष के इतिहास में क्षत्रिय राजवंशों की गौरवगाथा इतनी लोमहर्षक है कि उन्हें बारंबार पढ़ने को मन करता है। पौराणिक काल से ही क्षत्रिय वंश ने राष्ट्र और समाज की रक्षा में अपनी तलवार उठाए रखी और अपने कर्तव्य का पालन किया।
    अजमेर चैहान वंश की राजधनी रहा है, जिसके प्रतापी राजा सोमेश्वर चैहान थे। सोमेश्वर चैहान के पुत्र पृथ्वीराज चैहान थे, जिनकी वीरता को आज भारतवर्ष में बड़े गर्व से याद किया जाता है। प्रस्तुत पुस्तक ‘महान् योद्धा पृथ्वीराज चैहान: जीवन दर्शन’ में पृथ्वीराज चैहान के जीवन से जुड़ी महत्त्वपूर्ण घटनाओं को सरल, सरस व सुबोध् शैली में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।
  • Grih Daah (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    100

    Item Code: #KGP-1370

    Availability: In stock


  • Ila (Paperback)
    Prabhakar Shrotiya
    35

    Item Code: #KGP-1093

    Availability: In stock


  • Toro Kara Toro-5 (Paperback)
    Narendra Kohli
    350 315

    Item Code: #KGP-505

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Amrit Lal Nagar (Paperback)
    Amritlal Nagar
    90

    Item Code: #KGP-7008

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : अमृतलाल नागर
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार अमृतलाल नागर ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'किस्सा बी सियासत भठियारिन और एडीटर बुल्लेशाह का', 'एक दिल हजार अफसाने', 'जंतरर्-मंतर', 'मन के संकेत', 'लंगूर का बच्चा', ‘शकीला की माँ', 'सती का दूसरा ब्याह', 'ओढ़री सरकार', 'सूखी नदियाँ' तथा 'पाँचवाँ दस्ता' । संपादक द्वारा लिखी गई पुस्तक की भूमिका के माध्यम ते अमृतलाल नागर की समग्र कथा-यात्रा और उसके महत्त्व से भी सहज ही परिचित हुआ जा सकता है ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक अमृतलाल नागर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Raakshas (Paperback)
    Shanker Shesh
    125

    Item Code: #KGP-48

    Availability: In stock

    राक्षस
    राक्षस एक जातिवाचक शब्द ही नहीं, मानसिकता द्योतक शब्द भी है। राक्षस वह है, जो सामान्य मानवीय स्वरूप के विरोध में रहता है ।
    इस नाटक में शंकर शेष ने मनुष्य की इसी वृत्ति को उभारा है । यहाँ रणछोड़दास, सुकालू और दुकालू ऐसे चरित्र हैं जो मनुष्य के भीतर छिपे प्रेम और द्वेष के संघर्ष को तीव्र करते है और फिर इस निर्णय पर पहुंचते हैं कि–
    अब नहीं रुकेगा कमल फूल
    अब नहीं गिरेगी
    आने वाले कल की आँखों में धूल
    अब गाँव हमारा नहीं रहेगा
    जड़ पत्थर की नाँव 
    राक्षस अपनी पूरी अमानवीय स्थिति के साथ हमें इस आशा की स्थिति तक एहुंचाता है ।
    शकर शेष द्वारा लिखा गया एक सशक्त नाटक ।

  • Kashmir : Raat Ke Baad (Paperback)
    Kamlesh Pandey
    80

    Item Code: #KGP-7027

    Availability: In stock

    कश्मीर : रात के बाद
    हिंदी के सुप्रसिद्ध कथाकार कमलेश्वर का कश्मीर से पुराना और गहरा लगाव रहा है । 'कश्मीर : रात के बाद' में लेखक के इस पुराने और गहरे कश्मीरी लगाव को शिद्दत से महसूस किया जा सकता है । एक गल्पकार की नक्काशी, एक पत्रकार की निर्भीकता, एक चेतस इतिहास-द्रष्टा की पैनी नज़र तथा इन सबके मूल में जन सामान्य से प्रतिश्रुत मानवीय सरोकारों से लैस यह यात्रा-वृत्तांत लेखक कमलेश्वर का एक और अप्रतिम योगदान है ।
    'कशमीर : रात के बाद' संभवत: हिंदी में पहला ऐसा मानक प्रयास भी है जो कैमरा और कलम को एक साथ इस अंदाज़ से प्रस्तुत करता है ताकि दोनों की अस्मिता पूर्णतः मुक्त भी रहे । शायद इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इस यात्रा-रिपोर्ताज में कश्मीर के बर्फीले तूफानों और चट्टानों के खिसकी का शाब्दिक 'रोमांच' मात्र नहीं है बल्कि यहाँ है-इतिहास और धर्म (युद्ध) को अपनी एकल परिभाषा देने के मंसूबों को तर्क  और विवेक के बल पर ध्वस्त कर सको की सहमतिजन्य प्रतिभा । कशमीर की राजनीति में, बल्कि कहे कि अराजक 'अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिज्' में यह लेखक मात्र पत्रकार का तटस्थ और निष्फल बाना धारण करके प्रवेश नहीं करता बल्कि वह एक ऐसे सच्चे और खरे इंसान के रूप में हस्तक्षेप करता है जो भारतीयता को जानता है और कश्मीरियत को पहचानता है । वह प्रकृति के नैसर्गिक सौंदर्य-पाशा में बँधा, प्रकृति के अप्रत्याशित रौद्र रूप को, जान की बाजी लगाकर देखता है, तो वह आतंकवादियों के विष-की ठिकानों को भी अपने कलम और कैमरे के माध्यम से उदघाटित करता है । वास्तव में यही साहस इस यात्रा-वृतांत को अविस्मरणीयता सौंपता है ।
    इस पुस्तक में कश्मीर की कुछ खंडित यात्राएँ भी हैं जिनमें जन सामान्य के प्रति लेखक की प्रतिबद्धता को शब्द-दर-शब्द पढ़ा  और महसूस किया जा सकता है । परवर्ती यात्रा के रूप में कमलेश्वर ने सुलगते कश्मीर की उस झुलसन को शब्द दिए है, जिसे तमाम तकनीकी विकास के बाबजूद कैमरा पकड नहीं पाता । यह किताब मुद्रित शब्द और कैमरे के आधुनिक युग की सामर्थ्य  और सीमा का भी संभवत: अनुपम दस्तावेज साबित होगी ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan Alpana Mishra (Paperback)
    Alpana Mishra
    225

    Item Code: #KGP-7223

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां अल्पना मिश्र

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिंदी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठकों, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियां भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी ‘कहानीकार’ होने का अहसास बना रहा हो। भूमिकास्वरूप लेखक का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। 
    इस सीरीज़ की अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार अल्पना मिश्र ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: ‘भीतर का वक्त’, ‘कथा के गैरजरूरी प्रदेश में’, ‘मिड डे मील’, ‘बेतरतीब’, ‘उनकी व्यस्तता’, ‘बेदखल’, ‘भय’, ‘उपस्थिति’, ‘मुक्ति-प्रसंग’ तथा ‘छावनी में बेघर’।

    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार अल्पना मिश्र की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद संतोष का अनुभव करेंगे।
  • Urgent Meeting (Paperback)
    Jaivardhan
    50

    Item Code: #KGP-7092

    Availability: In stock

    नाटक कैसा हो ? हमेशा चर्चा का विषय रहा है । आगे  भी इस पर चर्चा होगी । नाटक ऐसा हो, वैसा हो। कथानक ऐसा हो । ताना-बाना ऐसा हो । भाषा ऐसी हो। चरित्रों का विकास ऐसा हो। कभी-कभी सरे मापदंड, सारे व्याकरण फेल  हैं, जब किसी लंबी कविता, कहानी को मंच पर प्रदर्शित कर दिया जाता है अथवा किसी कथानक को एकल-नाटक के रूप में प्रस्तुत कर दिया  जाता है । 
    इस नाटक की पृष्ठभूमि दिल्ली की है । अधिकांश चरित्र भी दिल्ली के हैं । 
  • Kavi Ne Kaha : Ashok Vajpayee (Paperback)
    Ashok Vajpayee
    90

    Item Code: #KGP-1432

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Sanjiv (Paperback)
    Sanjeev
    80

    Item Code: #KGP-1271

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : संजीव
    कहानियों सें विषयों के व्यापक शोध, अनुभव के संदर्भ, समसामयिक प्रसंग और प्रश्न तथा पठनीय वृत्तांतों का संयुक्त एव सार्वजनिक संसार ही संजीव की कहानियाँ चुनता-बुनता है। इन कथाओं की सविस्तार प्रस्तुति से अभिव्यक्त समाहार का अवदान इस कथाकार को उल्लेख्य बनाता है। घटनाओं की क्रीड़ास्थली बनाकर कहानी को पठनीय बनाने में इस कहानीकार की विशेष रुचि नहीं होती बल्कि यह ऐसे सारपूर्ण कथानक की सुसज्जा में पाठक को ले जाता है, जहाँ समकालीन जीवन का जटिल और क्रूर यथार्थ है तथा पारंपरिक कथाभूमि की निरूपणता और अतिक्रमणता भी । यथार्थ के अमंगल ग्रह को, पढ़वा लेने की साहिबी इस कथाकार को सहज ही प्राप्त है, जिसे इस संग्रह की कहानियों में साक्षात् अनुभव किया जा सकता है ।
    प्रस्तुत कहानियों के कथानक सुप्त और सक्रिय ऐसे 'ज्वालामुखी' है, जो हमारे समय में सर्वत्र फैले हैं और समाचार तथा विचार के मध्य पिसते निम्नवर्गीय व्यक्ति के संघर्ष और जिजीविषा के लिए प्रेतबाघा बने हैँ। अनगिनत सुखों और सुविधाओं के बीच मनुष्य जाति का यह अधिकांश हिस्सा क्यों वंचित, शोषित छूट गया है- इस तथ्य की पड़ताल ये कहानियाँ पूर्णत: लेखकीय प्रतिबद्धता के साथ करती है ।
    सजीव द्वारा स्वयं चुनी गई ‘दस प्रतिनिधि कहानियाँ' हैं- 'अपराध', 'टीस', 'प्रेत-मुक्ति' 'पुन्नी माटी', 'ऑपरेशन जोनाकी', 'प्रेरणास्रोत', 'सागर सीमांत', 'आरोहण', 'नस्ल' तथा 'मानपत्र' ।
  • Chhota-Sa Break (Paperback)
    Vishnu Nagar
    140

    Item Code: #KGP-306

    Availability: In stock

    छोटा-सा ब्रेक
    विष्णु नागर अपनी कविताओं के लिए जितने जाने जाते हैं, अपने व्यंग्यों के लिए भी कम नहीं जाने जाते। ‘छोटा-सा ब्रेक’ में समसामयिक घटनाओं पर छोटे-छोटे व्यंग्य संकलित हैं, जो उन्होंने (दैनिक) ‘नई दुनिया’ में प्रतिदिन ‘गरमागरम’ स्तंभ के अंतर्गत लिखे थे और जिन्हें पाठकों द्वारा बहुत पसंद किया गया था। अधिकतर पाठक तो अखबार खोलकर पहले ‘गरमागरम’ स्तंभ ही पढ़ते थे। जैसा कि आप देखेंगे, ये व्यंग्य-आलेख भले ही समसामयिक घटनाओं- चरित्रों पर हों, मगर इनमें समय की सीमा में रहकर भी उस सीमा के पार जाया गया है। एक सच्चा रचनाकार यही करता है, इसलिए ये व्यंग्य हमारा खयाल है कि कभी पुराने नहीं पड़ेंगे। इसके अलावा ये व्यंग्य उस समय-विशेष का राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक दस्तावेज भी हैं, एक ऐसा दस्तावेज, जो सत्ताधीशों की तरफ से नहीं, बल्कि साधारण जनता की तरफ से लिखा गया है, जिसमें उसके तमाम दुःख-तकलीफ दर्ज हैं, उसका व्यंग्य-विनोद भाव अंकित है। ये व्यंग्य परसाई और शरद जोशी दोनों की परंपरा में हैं। उस परंपरा में हैं और अपनी एक अलग परंपरा भी ये बनाते हैं। इनमें शैलियों का अद्भुत वैविध्य है, भाषा की अनोखी सहजता और प्रवाह है। इन्हें पढ़कर नहीं लगता कि व्यंग्य करने के नाम पर शाब्दिक खिलवाड़ की गई है। ये असली चिंता से उपजे व्यंग्य-आलेख हैं। इन्हें पढ़कर समाज को देखने-परखने की एक नई—ऊर्जस्वित दृष्टि भी मिलती है, मात्रा हलका-फुलका मनोरंजन नहीं होता, जैसा कि सामान्यतः व्यंग्य आजकल करते पाए जाते हैं। कैसे गंभीर से गंभीर बात को, जटिल से जटिल विषय को, सहजता-सरलता और व्यंग्यात्मकता से उठाया जाए, इस बात का उदाहरण बनते हैं ये व्यंग्य। इन्हें पढ़कर लगेगा कि व्यंग्य की मौजूदा स्थिति से निराश होने की नहीं, फिर से उत्साहित होने की जरूरत है।
  • Kavi Ne Kaha : Jitendra Shrivastva (Paperback)
    Jitendra Shrivastva
    140

    Item Code: #KGP-7018

    Availability: In stock

    पिछली सदी के आखिरी दशक में एक धमक की तरह काव्य-परिदृश्य पर उपस्थित हुए कवि जितेन्द्र श्रीवास्तव आज नयी सदी की कविता के सर्वाधिक प्रशंसित और अनिवार्य कवि हैं। बाजारू प्रलोभनों से बचाकर हिंदी कविता को विश्वसनीय बनाए रखने के प्रति सर्जनात्मक सजगता जितेन्द्र को अपने समकालीनों में अलग पहचान दिलाती है। हमेशा करुणा, प्रेम और उम्मीद का पक्ष लेती हुई जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविता अपने आसपास पसरी हुई त्रासदी, अन्याय और दुःख के राजनीतिक तात्पर्यों का साहसिक उद्घाटन भी करती चलती है। जैसा कि होना चाहिए--गहन रूप से राजनीतिक होकर भी जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविता अपने स्वभाव में मानवीय, मार्मिक और भावनात्मक रूप से आर्द्र बनी रहती है।
    जितेन्द्र के लिए, कविता मनुष्य की नैसर्गिक संवेदनाओं को परिमार्जित करने का माध्यम है। मानवीय जिजीविषा के बहुविधि संस्तरों से साक्षात्कार के क्रम में उनकी कविता को कलात्मक मेयार की कठिनतर ऊँचाइयों तक पहुँचते हुए देखा जा सकता है। नयी सदी की कविता के भाषिक और संवेदनात्मक आचरण को उदाहरणीय बनाने में जिन थोड़े कवियों का योगदान है, उनमें जितेन्द्र श्रीवास्तव अलग से ध्यान खींचते हैं।
    स्त्री, दलित, उत्पीड़ित और मार्जिनलाइज्ड समाज के तमाम अंतरंग जीवन-प्रसंगों से निर्मित जितेन्द्र की कविता का वितान बहुआयामी तो है ही, इसकी हदें इतिहास से लेकर भविष्य के अनिश्चय भरे अँधेरों तक व्याप्त हैं। जहाँ तक विमर्शों का प्रश्न है कविता में कला का सौंदर्य बचाते हुए जितेन्द्र को पूरे काव्यात्मक संतुलन के साथ, विमर्शों में कारगर हस्तक्षेप करते हुए देखा जा सकता है।
    कविता के प्रति पाठकों की घटती हुई अभिरुचि के प्रतिकूल माहौल में भी जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविता अनेक तरह के सांस्कृतिक समूहों और आर्थिक-राजनीतिक रुझानों के पाठकों में समान प्रशंसा और प्रतिष्ठापूर्वक पढ़ी जाती है। उम्मीद की जाती है कि उनकी कविताओं का यह चयन पाठकों की संवेदना को स्पंदित करने में सफल रहेगा।
  • Prem Chand Ki Amar Kahaniyan (Paperback)
    Kamlesh Pandey
    70

    Item Code: #KGP-7049

    Availability: In stock

    साहित्य की सभी विधाओं में सर्वाधिक सशक्त एवं आकर्षक विधा के रूप में 'कथा' को स्वीकृति प्राप्त हैं । लघु कलेवर होने के कारण कहानी समय-साध्य तो है ही, उसने जीवन के आभिजात्य से भी संबंध स्थापित किया है ।
    प्रस्तुत पुस्तक कथाकार प्रेमचंद की कुछ महत्वपूर्ण कहानियों का संकलन है । इनकी कहानियों में मनोवैज्ञानिक अंत:स्पर्श, मानसिक अंतर्द्वद्व  की तीक्ष्ण एवं आकुल अभिव्यक्ति, भाषा की कथानुरूप प्रस्तुति, शिल्प की प्रांजल चेतना विद्यमान है । प्रेमचंद की कहानियाँ जीवन के मानसिक एवं सामाजिक यथार्थ का दस्तावेज है । उन्होंने अपनी रचनाओं में जहाँ एक ओर समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं विषमताओं पर करारा प्रहार किया वहीं दूसरी ओर भारतीय जनजीवन की अस्मिता की खोज भी की है तथा समाज के विभिन्न वर्गों की अनेक ज्वलंत समस्याओं को लेकर प्रगतिशील दृष्टिकोण का परिचय दिया है ।
    प्रेमचंद साहित्य को मानव-संसार का एक सशक्त माध्यम मानते थे। उनकी साहित्यिक दृष्टि अन्य कथाकारों से सर्वथा भिन्न थी । उन्होंने मानव-जीवन के दुःख - दर्द का स्वयं अनुभव किया और पूरी ईमानदारी से उसका वर्णन किया ।
    -कमलेश पाण्डेय
  • Vyangya Samay : Ravindranath Tyagi (Paperback)
    Ravindra Nath Tyagi
    225

    Item Code: #KGP-7218

    Availability: In stock

    रवीन्द्रनाथ त्यागी का रंग व्यंग्य में सबसे निराला है। उनका अध्ययन व्यापक था। स्मृति अच्छी होने से संदर्भ सामने रहते थे। संदर्भों को प्रसंग देकर रचने की विलक्षण योग्यता उनके पास थी। यही कारण है कि त्यागी के व्यंग्य पढ़ते हुए पाठक को आनंद के साथ ज्ञान भी उपलब्ध होता है। बतरस इतना है कि गांव की गोरी पर लिखते हुए प्राकृत से लेकर पेरिस तक अभिव्यक्ति का विस्तार हो सकता है। व्यंग्य में सहज हास्य के वे आचार्य हैं। दफ्रतरशाही,  शृंगार, प्रकृति और अद्भुत तथ्य–प्रायः इन क्षेत्रों से वे विषय चुनते हैं। संस्कृत और अन्य भाषाओं से उद्धरण देते हुए त्यागी व्यक्तिगत समस्याओं से लेकर राष्ट्रीय प्रश्नों तक बात करते हैं। कई बार लगता है कि उनके लेखन का उद्देश्य निर्मल हास्य की सृष्टि करना है। यह कठिन काम उन्होंने सरलता से किया है। हास्य में आ जाने वाली दुराग्रही वृत्ति उनके लेखन में नहीं है। वे सिद्धांतो से नहीं, आसपास के तथ्यों या व्यक्ति वैचित्रय से हास्य के क्षण निर्मित करते हैं। ‘व्यंग्य समय’ में रवीन्द्रनाथ त्यागी के चयनित व्यंग्य उनके विस्तृत व्यंग्य लेखन से कुछ उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। पाठकों को रचनाकार को समग्रता में पढ़ने और पुनः पाठ के लिए प्रेरित करने का उद्देश्य भी इस उपक्रम में निहित है।
  • Shesh Parichay (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    200

    Item Code: #KGP-155

    Availability: In stock


  • Ek Nirvasit Maharaja (Paperback)
    Navtej Sarna
    200 180

    Item Code: #KGP-311

    Availability: In stock

    एक निर्वासित महाराजा
    हिंदुस्तान के महानतम शासकों में से एक, पंजाब के महाराजा रंजीत सिंह का सन् 1839 में देहांत हो गया और उनका विस्तृत साम्राज्य अराजकता में डूब गया । अभी एक दशक भी नहीं हुआ था कि गृहकलहपूर्ण प्रतिद्वन्द्विता और षड़यंत्रों के चलते पंजाब अंग्रेजों के प्रतीक्षारत हाथों में चला गया । जिस शासक ने साम्राज्य के अधिग्रहण की शर्तों पर दस्तखत किए और मशहूर कोहिनूर हीरे सहित लाहौर का तोशकखाना अंग्रेजी को सौंपा, यह एक ग्यारह साल का बच्चा था, महाराजा रंजीत सिंह का सबसे छोटा पुत्र, दलीप सिंह ।
    इस सटीक और मर्मस्पर्शी उपन्यास में, जो सच्ची घटनाओं पर आधारित है, नवतेज सरना पंजाब के आखिरी महाराजा की असाधारण कहानी बखानते हैं । साम्राज्य के अधिग्रहण के साथ ही दलीप को उनकी माँ और प्रजा से अलग-थलग कर दिया जाता है । ब्रिटिश सरकार उन्हें अपने संरक्षण में  लेकर, उनका धर्मांतरण का उन्हें ईसाई बना देती है । सोलह साल की उम्र में उन्हें एक देशीय दरबारी का जीवन जीने के लिए इंग्लैड भेज दिया जाता है । यह एक ऐसा निर्वासन था, जिसके लिए उन्हें अभ्यस्त कराया गया था कि वे खुद इसकी मांग करें; लेकिन अपने साथ होने वाले व्यवहार के कारण जब उनका मोहभंग  हुआ और देर से ही सही, जब उन्हें अपनी सोई हुई विरासत का अहसास हुआ, तब वे विद्रोही वन गए । वे फिर से सिख बन गए और हिंदुस्तान वापस लौटने और अपने लोगों का नेतृत्व करने के लिए मचल उठे, लेकिन उनके इस प्रयास ने उन्हें उन्नीसवीं सदी के यूरोप की गंदी राजनीति से फँसा दिया, जिसने उन्हें रिक्त कर दिया । वे धोखे और उपहास क पात्र बन गए । अंतत: पेरिस के एक सस्ते होटल में वे एक अकेले और हारे हुए आदमी के रूप से मृत्यु को प्राप्त हुए ।
    दलीप सिंह के अपने ही स्वर में और उनकें पाँच समकालीनों की आवाज में कहा गया यह उपन्यास न सिर्फ सिख-इतिहास, वरन् पुरे हिंदुस्तान के इतिहास के एक वेहद कारुणिक व्यक्तित्व की रोचक और भीतर तक हिला देने वाली तस्वीर पेश करता से । साथ ही यह ब्रिटिशा साम्राज्यवाद छोर उसको बढावा देने वाले भारतीय राजा-महाराजाओं के लालच और अदूरदर्शिता की भी बेबाक पाताल है ।
  • Poorvi Uttar Pradesh Ka Sahityik Paridrishya (Paperback) (Two Volumes)
    Jagdish Narayan Shrivastva
    600

    Item Code: #KGP-912

    Availability: In stock

    पूर्वी उत्तर प्रदेश का साहित्यिक परिदृश्य (2 खंड)
    वरिष्ठ कवि व आलोचक जगदीश नारायण श्रीवास्तव ने ‘पूर्वी उत्तर प्रदेश का साहित्यिक परिदृश्य’ नाम से जो महाग्रंथ लिखा है, वह इतिहास से अधिक अनुसंधान है। एक विस्तृत देशकाल में अपने परिचित अंचल का इतिहास लिखना और साहित्य-संस्कृति को संश्लिष्ट करके देखना—जगदीश नारायण श्रीवास्तव ने इसे जिस तरह से संभव किया है, वह पूरे साहित्य-संसार को स्वागतयोग्य लगेगा। इतिहास-लेखकों में रामचंद्र शुक्ल, रामविलास शर्मा, नंददुलारे वाजपेयी और बच्चन सिंह जैसे लोग रहे हैं। हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ‘हिंदी साहित्य की भूमिका’ लिखी, नामवर सिंह ने ‘दूसरी परंपरा की खोज’ जैसी कृति लिखी। इनसे अलग जगदीश नारायण श्रीवास्तव ने उस पूर्वांचल का इतिहास लिखा, जिसे वे ‘पूर्वी उत्तर प्रदेश : विचारों के सूर्योदय की धरती’ जैसा बहुलार्थी नाम देते हैं।...
    कहना न होगा कि जगदीश नारायण श्रीवास्तव का यह महाग्रंथ एक ऐतिहासिक ग्रंथ के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त करेगा। इसके पीछे एक दशक से अधिक की खोज, श्रमसाध्य वृत्त-संकलन, साक्षात्कार, पत्र-पत्रिकाओं से संकलित ऐतिहासिक जानकारियाँ संयोजित हैं। ऐसे कार्य प्रायः अकेले संभव नहीं होते। जगदीश नारायण श्रीवास्तव ने अकेले यह श्रमसाध्य कार्य संपन्न करने का जोखिम उठाया है। इसके लिए उन्हें हार्दिक बधाई। आशा है, पाठक इस ग्रंथ को तत्काल प्रकाशित देखना चाहेंगे और अपने पुस्तकालय में अग्रणी स्थान देंगे।
    —परमानंद श्रीवास्तव (भूमिका से)
  • Kavi Ne Kaha : Kedar Nath Singh (Paperback)
    Kedarnath Singh
    90

    Item Code: #KGP-1307

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : केदारनाथ सिंह
    कवि केदारनाथ सिंह के अब तक प्रकाशित संपूर्ण कृतित्व से उनकी प्रतिनिधि कविताओं को छाँट निकालना एक कठिन काम है और चुनौती भरा भी। इस संकलन को तैयार करने में पहली कसौटी मेरी अपनी पसंद ही रही है। पचास वर्षों में फैले कृतित्व में से श्रेष्ठतर को छाँटकर यहाँ प्रस्तुत कर दिया है, ऐसा दावा मेरा बिलकुल नहीं है। हाँ, इतनी कोशिश अवश्य की है कि केदार जी की कविता के जितने रंग है, जितनी भगिमाएँ है उनकी थोडी-बहुत झलक और आस्वाद पाठक को मिल सके...यूँ चयन-दृष्टि का पता तो कविताएँ खुद देंगी ही।
    कविताओं को चुनने और उन्हें अनुक्रम देने में यह कोशिश जरूर रहीं है कि पाठकों को ऐसा न लगे कि कविताओं को यहाँ किसी विशिष्ट श्रेणीबद्ध क्रम में बाँटकर सजाया गया है। भिन्न भाव बोध, रंग और मूड्स की कविताओं को एक साथ रखकर बस घंघोल भर दिया है-एक निरायासज़न्य सहजता के साथ पाठकों को पढ़ते समय जिससे किसी क्रम विशेष में आबद्ध होकर पढने जैसी प्रतीति न हो, बल्कि तरतीब में बनावटी साज-सज्जा से दूर एक मुक्त विचरण जैसा प्रकृत आस्वाद मिल सके ।
  • Ardhavritt (Paperback)
    Mudra Rakshes
    340

    Item Code: #KGP-388

    Availability: In stock


  • Antarctica Abhiyan (Paperback)
    Hridya Nath Dutta
    195

    Item Code: #KGP-366

    Availability: In stock

    अंटार्कटिका अभियान
    हमारी पृथ्वी असंख्य रत्नों और अनेक रहस्यों से भरी हुई है । प्रकृति ने भी इसे सजाने-सँवारने के लिए अनुपम सौंदर्य लुटाया है । इंसान हमेशा से ही पृथ्वी के रहस्यों से पर्दा उठाने के लिए प्रयत्नशील रहा है । अपने ज्ञान में वृद्धि के साथ ही प्राकृतिक संसाधनों का अपने हित में अधिक से अधिक दोहन भी इसका मूल कारण है । बरक्स इसके पृथ्वी का एक बहुत बड़ा भाग अब भी इंसान के द्वारा पूरी तरह जाना-समझा नहीं गया है । अंटार्कटिका क्षेत्र भी उन्हीं भागों में से एक है ।
    कहने की ज़रूरत नहीं कि अंटार्कटिका एक ऐसा भूभाग है, जो अपने अद्भुत सौंदर्य, स्वच्छ वातावरण, शुद्ध जल के अकूत  भंडार की वजह से हमेशा से वैज्ञानिको और पर्यावरणविदों के आकर्षण का केंद्र रहा है । समय-समय पर पूरे विश्व से वैज्ञानिको के दल वहां जाकर शोध और अध्ययन करते रहते है । कई देशों ने वहाँ अपने स्टेशन भी स्थापित किए हैं । गर्व की बात है कि इस मुहिम से भारत भी किसी से पीछे नहीं है ।
    भारतीय वैज्ञानिकों के अनेक दल कई बार अंटार्कटिका जाकर यहीं के वातावरण पर शोध करते रहे है । ऐसे ही अंटार्कटिका अभियान दलों में तीन बार डॉ० हृदयनाथ दत्ता और दो बार डॉ० जसवंत सिंह भी शामिल होकर कई शोध-कार्यों में हिस्सा ले चुके है । लगभग दो वर्ष पूर्व उन्होंने अपनी उन अद्भुत यात्राओं के संस्मरणों को पुस्तकाकार में प्रकाशित करने की इच्छा जाहिर की; लेकिन उनका कहना था कि वैज्ञानिक दृष्टि से तथ्यों और वहाँ की विशेषताओं को उन्होंने लिपिबद्ध तो कर दिया है, लेकिन पुस्तक के रूप में आने से पहले इसके संपादन की आवश्यकता है । फलस्वरूप यह जिम्मेदारी उन्होंने मुझे सोप दी । पुस्तक के संपादन के दौरान मैंने इस बात का पूरा ध्यान रखा है कि इसमें वैज्ञानिकता के साथ ही रोचकता भी बनी रहे । इस प्रयत्न में मैं कहाँ तक सफल हुआ यह तो पाठक ही तय करेंगे, लेकिन इतना निश्चित है कि यह पुस्तक अंटार्कटिका को जानने-समझने और उससे जुडे असंख्य रोचक तथ्यों से परिचित कराएगी । साथ ही भविष्य में उत्पन्न होने वाले पर्यावरणीय खतरों के प्रति आगाह भी करेगी ।
    -विज्ञान भूषण
  • Hi ! Handsome (Paperback)
    Jaivardhan
    50

    Item Code: #KGP-7056

    Availability: In stock

    जयवर्धन
    जयवर्धन उपनाम। पूरा नाम जयप्रकाश सिंह (जे.पी. सिंह)। प्रतापगढ़ (उ० प्र०) ज़िले के मीरपुर गाँव में वर्ष 1960 में जन्म। अवध विश्वविद्यालय से स्नातक। 1984 में लखनऊ विश्वविद्यालय से विधि-स्नातक। लखनऊ दूरदर्शन में दो वर्षों तक आकस्मिक प्रस्तुति सहायक के रूप में कार्य। श्रीराम सेंटर, दिल्ली में एक वर्ष मंच प्रभारी। वर्ष 1988-94 तक साहित्य कला परिषद, दिल्ली में कार्यक्रम अधिकारी। भारतीय नाट्य संघ, नीपा एवं अन्य कई संस्थाओं के सदस्य व सांस्कृतिक सलाहकार।
    रंगमंच में विशेष रुचि। अभिनव नाट्य मंडल, बहराइच (उ० प्र०) और रंगभूमि, दिल्ली के संस्थापक। कभी दर्पण, दिल्ली के सक्रिय सदस्य। लगभग 40 नाटकों में अभिनय। 20 नाटकों का निर्देशन तथा 70 नाटकों की प्रकाश परिकल्पना।
    कविता, गीत, एकांकी, नाटक, आलेख, समीक्षा, नुक्कड़ नाटक एवं सीरियल आदि का लेखन।
    प्रमुख पूर्णकालिक नाटक: ‘मस्तमौला’, ‘हाय! हैंडसम’, ‘अर्जेंट मीटिंग’, ‘मायाराम की माया’, ‘मध्यांतर’, ‘अंततः’, ‘कविता का अंत’, ‘झाँसी की रानी’, ‘कर्मेव धर्मः’ (नौटंकी)।
    बाल नाटक: ‘जंगल में मंगल’, ‘घोंघा बसंत’, ‘चंगू-मंगू’, ‘हम बड़े काम की चीज़’।
    संप्रति: साहित्य कला परिषद, दिल्ली में सहायक सचिव (नाटक) के पद पर कार्यरत। 
  • Kavi Ne Kaha : Hemant Kukreti (Paperback)
    Hemant Kukreti
    140

    Item Code: #KGP-7019

    Availability: In stock

    अपनी पीढ़ी के शायद सबसे कलात्मक और उतने ही आसान कवि हेमन्त कुकरेती बीसवीं सदी के लॉन्ग नाइंटीज में उभरी कवि-पीढ़ी से ताल्लुक रखते हैं।
    बिना किसी शोरशराबे के अपनी भूमिका निभाने वाले मुक्तिबोध हों या त्रिलोचन--देर से आलोचकों की तवज्जो पाते हैं। ऐसे कुछ कवि हर दौर में होते हैं। हेमन्त कुकरेती भी ऐसे कवियों में हैं। उन्हें हिंदी पाठकों का जितना स्नेह मिला है; आलोचकों की कृपादृष्टि से वे उतना ही वंचित रहे हैं। शायद इसका कारण यह भी है कि हेमन्त कुकरेती कुपढ़ और कूढ़मगज़ आलोचकों के बने-बनाए खाँचों में फिट होना तो दूर; उनके लिए कठिनाइयाँ पैदा करते रहे हैं। हेमन्त कुकरेती ‘लोक के कवि’, ‘नगर के कवि’, ‘पहाड़ के कवि’, ‘पठार के कवि’, ‘समुद्र के कवि’ हों या प्रगतिशील कवि, जनकवि, भारतीय कवि--इन सब खानाब( कोष्ठकों से अलग और बेकै़द रहे हैं। झमेले उनके साथ ये रहे कि उन्होंने न बिहार में जन्म लिया, न बनारस में! यहाँ तक कि पठार या पहाड़ भी उन्हें जन्म लेने लायक नहीं लगे! दिल्ली में जन्म लेकर उन्होंने हिंदी कविता के पूर्वी घराना, भोपाल घराना, आई. टी. ओ. घराना, पहाड़ी घराना--किसी से भी गंडा-तावीज नहीं बँधवाया। ऐसे में उनके साथ और क्या सलूक किया जाता! फिर भी हिंदी कविता के आस्वादकों को हेमन्त कुकरेती की उपस्थिति आश्वस्ति से भरती है।
    सघन ऐंद्रिकता और सरल विन्यास को साधने वाले हेमन्त कुकरेती विचारों को बिंब में बदलने वाले हुनर में माहिर उन कवियों में हैं; जिन्हें अपने शब्दों पर भरोसा है इसलिए उनके शब्दों की अर्थव्याप्ति चकित करने में जाया नहीं होती बल्कि कविता के जादू और पहुँच को और गहराती है।
  • Chune Huye Nibandh (Paperback)
    Hazari Prasad Dwivedi
    60

    Item Code: #KGP-7067

    Availability: In stock

    चुने हुए निबंध 
    'चुने हुए निबंध' हज़ारीप्रसाद द्विवेदी के निबंधों का अद्वितीय संग्रह है। इस संग्रह में द्विवेदी जी के सभी प्रकार के निबंधों को संकलित किया गया है। इस संकलन में शोधपरक निबंध, ललित निबंध दोनों ही हैं। विशेषकर द्विवेदी जी के निबंधकार रूप का एक समग्र चित्र यह संकलन प्रस्तुत करता है। 
    संकलन  में सम्मिलित निबंध इस प्रकार हैं :
    अशोक के फूल / कुटज / देवदारु / आम फिर बौरा गए ! / नाख़ून क्यों बढ़ते हैं ? / मेरा कांचनार / ठाकुर जी की बटोर / व्योमकेश शाश्त्री उर्फ़ हज़ारीप्रसाद द्विवेदी / मेरी जन्मभूमि / घर जोड़ने की माया / हिमालय [1 ] / अंधकार से जूझना है /  भाषा, साहित्य और देश / मनुष्य ही साहित्य का लक्ष्य है / साहित्य की संप्रेषणीयता / क्या निराश हुआ जाय / कबीर के मूल वचन / भीष्म को क्षमा नहीं किया गया ! / रामचरितमानस / बरसो भी ।
  • Saarth (Paperback)
    Bhairppa
    300 285

    Item Code: #KGP-7042

    Availability: In stock

    सार्थ
    सार्थ अर्थात् व्यापारियों का काफिला । नागभट्ट नामक एक वैदिक अपने राजा द्वारा एक सार्थ के साथ उच्च अध्ययन के लिए भेजा जाता है । कथा के वाचक नागभट्ट द्वारा आठवीं शती के भारत का जीवंत चित्र प्रस्तुत किया गया है । उस समय वैदिक धर्म पतनोन्मुख था, भले ही शकरचार्य, कुमारिल भट्ट, मंडन मिश्र, भारती देवी आदि जैसी विभूतियां उसके प्रचार-प्रसार में लगी थीं। दूसरी ओर बौद्ध धर्म अपने उत्कर्ष पर था । उसके आचार्य धर्म-प्रचार के लिए स्तूपों, चैत्यों और विहारों के निर्माण में जुटे थे । साथ ही, योग साधना और तंत्र साधना में भी आकर्षण बना हुआ था । भारत के पूर्वी भाग में इस्लाम धर्म तलवार की नोक से अपने धर्म और संस्कृति की लकीर खींच रहा था। डॉ. भैरप्पा ने तत्कालीन समाज और धर्म का सजीव चित्रण अपनी पैनी लेखनी से अपनी विशिष्ट शैली में इस उपन्यास में किया है । संभवत: साधारण जन उस समय भी ऊहापोह की उसी स्थिति में था, जिसमें आज अपने को पा रहा है । इसी कारण पाठक इस उपन्यास को एक बार प्रारंभ करके छोड़ नहीं पाएगा, जब तक कि इसे समाप्त न कर ले ।
    डॉ. भैरप्पा की यह विशिष्ट ऐतिहासिक कृति 'सार्थ' अब आपके सन्मुख प्रस्तुत है ।

  • Vishwa Ke Mahaan Shikshavid (Paperback)
    M.A. Sameer
    250

    Item Code: #KGP-7209

    Availability: In stock

    जीवन में सफलता व अनुकूल परिणाम प्राप्त करने के लिए तीव्र इच्छा, आस्था और अपेक्षा–इन तीन शक्तियों को भलीभांति समझ लेना और उन पर प्रभुत्व स्थापित कर लेना चाहिए।
    यह विचार एक ऐसे शिक्षक का है, जिसके एक शिष्य ने इन विचारों को न केवल आयुध बनाकर अपने जीवनयुद्ध में प्रयोग किया, अपितु इनसे जीवनयुद्ध का विजेता बनकर संसार के सर्वश्रेष्ठ आयुध्-निर्माताओं में से एक बना। जी हां, यह विचार है इयादुराई सोलोमन नाम के दक्षिण भारतीय शिक्षक और उनका यह शिष्य भारत के ग्यारहवें राष्ट्रपति डाॅ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम का, जिन्होंने वैज्ञानिकी में स्वयं को समर्पित करके ‘मिसाइलमैन’ की उपाधि प्राप्त की।
    पं. जवाहरलाल नेहरू के बाद डाॅ. अब्दुल कलाम भारत के ऐसे पहले राजनेता थे, जिन्हें बच्चों का स्नेह प्राप्त था और ‘काका कलाम’ कहकर संबोधित किया जाता था। बच्चों को देश का भविष्य मानने वाले डाॅ. अब्दुल कलाम अकसर समय निकालकर छात्रों के बीच जाते और बच्चों के प्रश्नों के उत्तर बड़ी सहजता से देते और उन्हें भविष्य में कुछ करने के लिए प्रेरित करते। जीवन के मूल्य, आदर्श और सफलता के मंत्र बड़ी रोचक वाणी में बताते। उनके द्वारा लिखित आत्मकथा ‘विंग्स आॅफ फायर’ में उन्होंने भारतीय युवाओं को अपने विचारों और दृष्टिकोण से मार्ग दिखाया है। उनकी एक-एक बात प्रेरणादायी है। उनका समूचा जीवन ही प्रेरणादायी है।
    आज तकनीक के क्षेत्र में भारतीय युवाओं की बढ़ती संख्या का कारण डाॅ. अब्दुल कलाम की वह प्रेरणा ही है, जिसने देश को आधुनिक विश्व के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने में सक्षम किया है। डाॅ. कलाम भारतीय तकनीकी विकास को विज्ञान के हर क्षेत्र में लाने का समर्थन करते थे। उनका कहना था कि साॅफ्टवेयर का क्षेत्र सभी वर्जनाओं से मुक्त होना चाहिए, जिससे अधिक संख्या में लोग इसकी उपयोगिता का लाभ उठा सकें। इसी से सूचना तकनीक का विकास तीव्र गति से हो सकेगा। डाॅ. कलाम का राष्ट्रपति काल भारत के स्वर्णिम काल में से एक है। बिना किसी राजनीतिक विवाद के उन्होंने यूरोपीय देशों और पड़ोसी देशों से सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखे और देश की विकास गति को थमने नहीं दिया। 25 जुलाई, 2007 को उनका कार्यकाल समाप्त हुआ और वे फिर से वैज्ञानिकी एवं तकनीक के क्षेत्र में आ गए।
    ऐसा कहा जाता है कि जब डाॅ. कलाम राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति के रूप में प्रवेश कर रहे थे तो उनके एक हाथ में एक थैला था, जो पांच वर्ष बाद जब वे वहां से कार्यमुक्त हुए तो उनके साथ ही था। वे शाकाहारी थे और अनुशासित जीवन व्यतीत करते थे। समय का उनकी दृष्टि में बड़ा महत्त्व था और इसके सदुपयोग के लिए वे व्यवस्थित चर्या का पालन करते थे।
    –इसी पुस्तक से
  • Datta (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    150

    Item Code: #KGP-202

    Availability: In stock


  • Vajpayee Rachna-Sankalan (Set Of 7 Books)
    Atal Bihari Vajpayee
    1420 1278

    Item Code: #KGP-7235

    Availability: In stock

    वाजपेयी रचना-संकलन 
    7 चर्चित एवं प्रमुख वैचारिक पुस्तकें
  • Svadeshi Chikitsa Paddhati (Paperback)
    Om Prakash Sharma
    250 238

    Item Code: #KGP-7072

    Availability: In stock

    स्वदेशी चिकित्सा-पद्धति
    मनुष्य को परमेश्वर की सर्वश्रेष्ट रचना माना गया है । किसी समय वह भी पूर्ण स्वस्थ और सब प्रकार के सुखों से परिपूर्ण रहा होगा, लेकिन आज स्थिति सर्वथा विपरीत है । आज पूरे विश्व में एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिलेगा, जिसे कोई कष्ट न हो तथा जो शोक, सन्ताप और चिन्ता से मुक्त हो अथवा निराश न हो । इसका एकमात्र कारण है- प्रकृति की उपेक्षा ।  प्रकृति कभी अन्याय का पक्ष नहीं लेती । जो भी उसके नियमों को भंग करता है, वह उसे दपिडत करती है ।
    मनुष्य को हर प्रकार की व्याधि और रोग से मुक्त रहने का अधिकार प्राप्त है; लेकिन इसके लिए उसे प्रकृति के स्वभाव को समझना चाहिए । उसे अपने शरीर के स्वभाव के अनुकूल अपनी दिनचर्या का पालन करना चाहिए । बुहिमान् व्यक्ति वही होता है, जो किसी विपति में फंसने से पहले ही अपना बचाव कर ले । यदि फिर भी असावधानीवश अथवा किसी अन्य कारणवश वह बीमार हो जाये, तो प्रकृति-प्रदत्त पदार्थों के उपयोग से पुन : स्वस्थ व समान्य हो सकता है ।
    प्रकृति ने हमारे देश पर ऐसी कृपा की  है कि यहां अनेक प्रकार की उपयोगी ज़डी-बूटियां ( औषधियां) पैदा होती हैं, जो घर-घर में विभिन्न प्रकार से प्रयोग में लायी जाती हैं ।
    आज साधारण व्यक्ति डॉक्टरों की ऊंची फीस व महंगी दवाओ का प्रयोग करने में असमर्थता अनुभव कर रहा है तथा अंग्रेजी दवाइयों के दुष्प्रभाव से ग्रसित है। तब स्वदेशी चिकित्सा-पद्धति की उपयोगिता से कौन इनकार कर सकता है ? स्वदेशी चिकित्सा-पद्धति के सहारे आप दैनिक जीवन में काम आने वाली अनेक वस्तुओ से नाना प्रकार के जटिल रोगों की अचूक चिकित्सा कर सकते हैं।
    'स्वदेशी चिकित्सा-पद्धति' पुस्तक में प्रत्येक रोग के लिए अनेक अचूक इलाज बताये गये हैं, जिनकी सहायता से साधारण व्यक्ति भी कठिन से कठिन रोगों की चिकित्सा स्वय कर सकता है ।
    पुस्तक में रोगों के निदान और चिकित्सा के साथ ही उपयोगी योगासनों व प्राणायाम का भी समावेश किया गया है ।
  • Bhaasaa Vigyan Pravesh Evam Hindi Bhaasaa (Paperback)
    230

    Item Code: #KGP-7065

    Availability: In stock

    भाषा विज्ञान प्रवेश एवं हिंदी भाषा
    डॉ.  भोलानाथ तिवारी लब्धप्रतिष्ठ भाषाविज्ञानी हैं। प्रस्तुत पुस्तक में उन्होंने भाषा विज्ञान को सरल और सहज रूप में प्रस्तुत किया है। भाषा विज्ञान के पारंपरिक विषयों के साथ-साथ नए विषयों व भाषा विज्ञान के नए आयामों को शामिल करते हुए उन्होंने पुस्तक की उपादेयता बढ़ा दी है।
    यह पुस्तक भाषा विज्ञान हेतु भारत के सभी विश्वविद्यालयों के लिए तो उपयोगी होगी ही, साथ ही केंद्र सरकार, सार्वजनिक उपक्रमों व बैंकों के राजभाषा अनुभागों तथा उनमें कार्यरत हिंदी से जुड़े अधिकारियों, सहायकों, अनुवादकों व भाषा से जुड़े प्रौद्योगिकीविदों के लिए भी बहुत उपयोगी सिद्ध होगी, क्योंकि इसमें भाषा विज्ञान और हिंदी भाषा से जुड़े अद्यतन ज्ञान को सरल और संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत किया गया है। 
    यह पुस्तक भाषा से सरोकार रखने वाले प्रत्येक पाठक के लिए भी उपयोगी होगी, यह हमारा विश्वास है।
    इस पुस्तक में अद्यतन जानकारियाँ तथा जटिल संकल्पनाओं को भी इतने सरल ढंग से प्रस्तुत किया गया है कि भाषा विज्ञान में रुचि रखने वाले सामान्य पाठक के लिए भी यह उपादेय सिद्ध होगी।
  • Gharaunda (Paperback)
    Shanker Shesh
    20

    Item Code: #KGP-7096

    Availability: In stock


  • Shyama Prasad Mukharjee : Jeevan Darshan (Paperback)
    Mukesh Parmar
    90

    Item Code: #KGP-1306

    Availability: In stock

    डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी का नाम स्वतंत्र भारत के विस्तृत नवनिर्माण में एक महत्त्वपूर्ण आधरस्तंभ के रूप में उल्लेखनीय है। जिस प्रकार हैदराबाद को भारत में विलय के लिए पूरा श्रेय सरदार वल्लभभाई पटेल को जाता है, उसी प्रकार बंगाल, पंजाब और कश्मीर के अधिकतर भागों को भारत का अभिन्न अंग सुरक्षित करा पाने के दृष्टिकोण से डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के उल्लेखनीय प्रयास हमेशा अविस्मरणीय रहेंगे। उन्होंने किसी दल या सर्वोच्च नेतृत्वकर्ताओं के दबाव में आकर राष्ट्रहित को नजरअंदाज करते हुए कोई समझौता नहीं किया, न ही किसी दल की सीमा में बंधकर रहे। उनके लिए राष्ट्रहित ही सर्वोपरि था।
    उन्होंने जो भी निर्णय लिए राष्ट्रहित और हिंदुत्व की सुरक्षा की दृष्टि से लिए। यहां तक कि अपनी इसी विचारधारा के चलते अपना बलिदान तक दे दिया।
  • Rang De Basanti Chola (Paperback)
    Bhishm Sahni
    30

    Item Code: #KGP-1027

    Availability: In stock

    रंग दे बसन्ती चोला
    [जलियाँवाला बाघ रतनदेवी आती है । हाथ में पानी का लोटा है ।]
    रतनदेवी : ले मेरे लाल । मैं तेरे लिए पानी लाई हूँ। (किश्ना के होंठों से पानी डालती है ।) तू बोलता क्यों नहीं किश्ना बेटे । (माथे को छुकर) चला गया, यह भी चला गया । इसकी भी प्यास बुझ गई । मैं कर्मजली तेरे होंठों में दो बूँट पानी भी नहीं डाल पाई । तू भगवान् को प्यारा हो गया है। (रो पड़ती है, फिर धीरे से उठकर अपने पति के शव के पास पहुंचती है। ) तू भी भगवान् के पास जा रहा है । मैं रोऊँगी नहीं । मैं तेरा सफर खराब नहीं करूँगी । हँसता-हँसता जा। भगवन् तुझे गले लगाएंगे ।
    तेरे सैकडों संगी-साथी मौत की नींद सोए पडे हैं । वे भी तेरे साथ भगवान् के दरबार में जाएँगे। उनके घरवाले अभी भी उनकी राह देख रहे हैं। 
    तूने अपने लिए कभी कुछ नहीं माँगा । तू अपनी जान निछावर कर गया । मैं पापिन तुझे सारा वक्त उलाहने देती रही । तेरे साथ झगड़ती रही, पर मुझे क्या मालूम था, तू सचमुच चला जाएगा । (उसका माथा सहलाती हुई) मैं कहाँ लुट-पुट गई ? मैं तो चिर सुहागिन हूँ । जिसका घरवाला ऐसा शूरवीर हो । तू तो मेरा सूरमा पति है । तू तो नाचता-गाता हुआ घर आया करता था : मेरा रंग दे, मेरा रंग देबसन्ती चोला ।
  • Triya Hath (Paperback)
    Maitreyi Pushpa
    100

    Item Code: #KGP-7046

    Availability: In stock


  • Arya Samaj Ki Paanch Vibhutiyan (Paperback)
    Ashok Kaushik
    50

    Item Code: #KGP-7047

    Availability: In stock

    देश के निर्माण एवं उत्थान में आर्यसमाज के आरंभ से लेकर अब तक शतशः आत्माएं अपना सर्वस्व त्याग चुकी हैं। वे महात्मा धन्य हैं जो परिवार, जाति, देश, धर्म तथा संस्कृति के लिए आत्मत्याग करते हैं। जाति अथवा समाज ऐसे त्यागी-तपस्वी पूर्वजों का स्मरण एवं अनुसरण कर ही आगे बढ़ते हैं। महापुरुषों की जीवनियां भावी पीढ़ी को सदा ही प्रेरित करते आए हैं, उनमें महर्षि दयानंद, स्वामी श्रद्धानन्द, धर्मवीर पं. लेखराम, पं. गुरुदत्त विद्यार्थी तथा महात्मा हंसराज वर्तमान शती एवं पीढ़ी के लिए विशेष उल्लेखनीय हैं।
    ‘आर्यसमाज की पांच विभूतियां’ में इन्हीं पांच महापुरुषों की संक्षिप्त जीवनी संकलित की गई है। प्रस्तुत पुस्तक आर्य किशोरों की शिक्षा को ध्यान में रखकर विशेष रूप से लिखी गई है। उन्नीसवीं शती के अंत में आर्यसमाज की स्थापना तथा सत्यार्थप्रकाश की रचना से युगपुरुष दयानन्द ने जो जागृति देशवासियों में उत्पन्न की है, ‘स्त्री शूद्रौ नाधीयाताम्’ का प्रत्याख्यान जिस सरलता एवं आधिकारिक रूप में स्वामी जी ने अपनी रचनाओं में किया है, वर्ण-व्यवस्था एवं मूर्तिपूजा के विषय में स्वामी जी ने जो विचार व्यक्त किए हैं, उन सबका समावेश इस जीवनी में बड़े सुंदर ढंग से किया गया है।
  • Parinti (Paperback)
    Narendra Kohli
    50

    Item Code: #KGP-7101

    Availability: In stock


  • Pranaam Kapila (Paperback)
    Devendra Deepak
    250

    Item Code: #KGP-1547

    Availability: In stock

    खंड 'अ' के कवि 
    डॉ. अब्दुल ज़ब्बार, अयोध्या प्रसाद ‘हरिऔध’, अरविंद कुमार तिवारी, अशोक जमनानी, आशाराम त्रिपाठी, इस्माइल मेरठी, कमलेश मौर्य ‘मृदु’, काका हाथरसी, कुंकुम गुप्ता, डॉ. कृष्ण गोपाल मिश्र, कृष्ण गोपाल रस्तोगी, डॉ. कृष्ण मुरारी शर्मा, गणेशदत्त सारस्वत, पं. गांगेय नरोत्तम शास्त्री, पं. गिरिमोहन गुरु, गिरीश ‘पंकज’, चकबस्त, छीत स्वामी, जगदीश किंजल्क, डॉ. जयकुमार ‘जलज’, जयकुमार जैन ‘प्रवीण’, आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री, तुलसीदास, दिनेश ‘प्रभात’, दिवाकर वर्मा, डॉ. दुर्गेश दीक्षित, आचार्य धर्मेन्द्र, नरहरि, नरेन्द्र गोयल, नारायणदास चतुर्वेदी, परमानंद, डॉ. परशुराम शुक्ल, डॉ. परशुराम शुक्ल ‘विरही’, प्रकाश वैश्य, प्रताप नारायण मिश्र, प्रद्युम्ननाथ तिवारी ‘करुणेश’, संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी, प्रेमनारायण त्रिपाठी ‘प्रेम’ , आचार्य भगवत प्रसाद दुबे, भोजराज पटेल, डॉ. मनोहरलाल गोयल, महावीर प्रसाद ‘मधुप’, मुंशीराम शर्मा ‘सोम’, मुक्ति कुमार मिश्र, मैथिलीशरण गुप्त, डॉ. योगेश्वर प्रसाद सिंह ‘योगेश’, रघुनंदन शर्मा, रमेश कुमार शर्मा, रमेशचंद्र खरे, पं. राजेन्द्र तिवारी, डॉ. रानी कमलेश अग्रवाल, महात्मा रामचंद्रवीर महाराज, रामदास मालवीय, आचार्य रामनाथ ‘सुमन’, डॉ. रामप्रकाश अग्रवाल, रामस्वरूप दास, डॉ. राष्ट्रबंधु, लाला भगवानदीन, लक्ष्मीनारायण गुप्त ‘विश्वबंधु’, लक्ष्मी प्रसाद गुप्त ‘किंकर’, लेखराम चिले ‘नि:शंक’, वागीश ‘दिनकर’, विजय लक्ष्मी ‘विभा’, डॉ. विमल कुमार पाठक, विमला अग्रवाल, वियोगी हरि, डॉ. शरद नारायण खरे, शिवदीप ‘कनक’, श्याम नारायण पांडेय, श्रीकृष्ण मित्र, श्रीकृष्ण शर्मा, श्रीकृष्ण ‘सरल’, डॉ. श्रीराम परिहार, सुदर्शन ‘चक्र’, सुधेश जैन, डॉ. सुशीला आर्य, सूरदास, हनुमान प्रसाद पोद्दार,  पद्मश्री डॉ. हरिशंकर शर्मा, हरिश्चंद्र टाँटिया, हरीश दुबे
  • Shubhada (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    150 135

    Item Code: #KGP-204

    Availability: In stock

    इस पुस्तक में शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के दो उपन्यास हैं, एक है शुभदा और दूसरा है बड़ी दीदी।
  • Mera Paigaam Muhabbat Hai Jahan Tak Pahunche (Paperback)
    Jigar Muradabadi
    150

    Item Code: #KGP-7111

    Availability: In stock

    मेरा पैगाम मुहब्बत है जहाँ तक पहुँचे
    'जिगर' साहब इंसानियत और शेरियत दोनों का पैकर थे । उनकी शायराना अजमत का बडा राज उनकी मखसूस सज-धज, तर्जेअदा और तरन्नुम था । उनकी मासूम जोर दिलकश शखसियत ने उन्हें अपने दौर का महबूब-तरीन शायर बना दिया था । उनकी बड़ाई को इस पैमाने से भी नापा जा सकता है कि दौरे जदीद में कितनों ने जिगर बनने की कोशिश की, इसलिए कि शेर की दुनिया के वह एक तर्ज थे। असलूब थे, एक स्टाइल थे ।
    'जिगर' ने गजल को एक नई जिंदगी बख्शी । उनकी गजले मदहोशी व रंगीनी के छलकते हुए सागर  हैं, जिससे तरह-तरह के रंग मौजूद है और किस्म-किस्म के जजबात जलवागर हैं,
    जिनका मुताअला जिंदगी के नशे को गहरा कर देता है, कायनात के हुस्न में इज़ाफ़ा हो जाता है और हयात नये रूप में जलवागर होकर दिल की धड़कन में जज्ब हो जाती है । खून को रवानी तेज हो जाती है और शायरी के तारों से आहंग हो जाती है। ये इंतेखाबे गजल के अशआर ऐसे है जिनमें नई जिंदगी और वक्त की धड़कनों की आवाजें सुनाई देती हैं। आने वाली नस्लें और तारीख 'जिगर' को कभी भुला नहीं सकेंगी ।
  • Aavaran (Paperback)
    Bhairppa
    300 270

    Item Code: #KGP-525

    Availability: In stock

    यह मेरा दूसरा ऐतिहासिक उपन्यास है। आठवीं शताब्दी के संधिकाल के अंतस्सत्त्व को ‘सार्थ’ में, उपन्यास के रूप में, आविष्कृत करने का और अब ‘सार्थ’ के समय के बाद के सत्य को ‘आवरण’ द्धउपन्यासऋ में चित्रित करने का मैंने प्रयास किया है। भारत के इतिहास के अत्यंत संकीर्ण इस अवधि के बारे में विपुल प्रमाण में सामग्री उपलब्ध होती है, लेकिन आवरण की शक्ति इस विपुलता के ऊपर विजृंभित हो रही है। ‘सार्थ’ की अवधि का इतिहास ज्यादातर आवरण-शक्ति के लिए आहुति बन नहीं पाया है। उनके बारे में निर्भीक रूप से सत्य को अंकित किया जा सकता है। लेकिन ‘आवरण’ की अवधि के इतिहास के बारे में यही बात नहीं कही जा सकती है। प्रत्येक सोपान में आवरण की शक्ति को बेधते हुए आगे बढ़ने की अपरिहार्यता सामने आती है। इसीलिए इस उपन्यास के स्वरूप और तंत्रें को उसके अनुकूल समायोजित कर लेना पड़ा।
       इस उपन्यास की ऐतिहासिकता के विषय में मेरा अपना कुछ भी नहीं है। प्रत्येक अंश या पग के लिए जो ऐतिहासिक आधार हैं उनको साहित्य की कलात्मकता जहाँ तक सँभाल पाती है वहाँ तक मैंने उपन्यास के अंदर ही शामिल कर लिया है। उपन्यास के तंत्र के विन्यास में यह अंश किस प्रकार प्रधान रूप में कार्यान्वित हुआ है, इसको सर्जनशील लेखक और दर्शनशील पाठक, दोनों पहचान सकते हैं। शेष आधारों को उपन्यास के अंदर के उपन्यास को रच डालने वाले चरित्र ने ही, अपनी क्रिया की आवश्यकता के रूप में, प्रस्तुत कर दिया है, न कि मैंने। इस पूरी वस्तु को जो अद्यतन रूप प्रदान किया है, उसमें ही मेरी मौलिकता है। इतिहास की सच्चाई में कला का भाव यदि चुआ है, तो वहाँ तक साहित्य के रूप में यह सफ़ल हुआ है, ऐसा मैं मानता हूँ।
    -भैरप्पा

  • Yoon Banee Mahabharat (Paperback)
    Pratap Sehgal
    60

    Item Code: #KGP-1417

    Availability: In stock

    प्रताप सहगल
    कवि, नाटककार, कथाकार, आलोचक
    जन्म : 10 मई, 1945, झंग, पश्चिमी पंजाब (अब पाकिस्तान में)
    प्रकाशित रचनाएँ 
    कविता-संग्रह : 'सवाल अब भी मौजूद है', 'आदिम आग', 'अँधेरे में देखना', 'इस तरह से', 'नचिकेतास ओडिसी', 'छवियाँ और छवियाँ' 
    नाटक : 'अन्वेषक',  'चार रूपांत',  'रंग बसंती', 'मौत क्यों रात- भर नहीं आती', 'नौ लघु नाटक', 'नहीं कोई अंत', 'अपनी-अपनी भूमिका', 'पाँच रंग नाटक', 
    तथा 'छू मंतर' और 'दस बाल नाटक'
    उपन्यास : 'अनहद नाद', 'प्रियकांत' 
    कहानी-संग्रह : 'अब तक', 'मछली-मछली  कितना पानी'
    आलोचना : 'रंग चिंतन', 'समय के निशान', 'समय के सवाल', 
    विविध : 'अंशतः' (चुनिंदा रचनाओं का संग्रह)
    सम्मान एवं पुरस्कार : ० मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार ० 'रंग बसंती' पर साहित्य कला परिषद द्वारा सर्वश्रेष्ठ नाट्यालेख पुरस्कार ० 'अपनी-अपनी भूमिका' शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा पुरस्कृत  ० 'आदिम आग' व 'अनहद नाद' हिंदी अकादमी, दिल्ली द्वारा पुरस्कृत ० सौहार्द सम्मान, उत्तरप्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ ० राजभाषा सम्मान, भारत सरकार ० साहित्यकार सम्मान, हिंदी अकादमी, दिल्ली और अन्य पुरस्कार । 
    संपर्क : एफ- 101, राजौरी गार्डन, नई दिल्ली- 110027
    फोन : 25100565, मो० : 9910638563
    ई-मेल : partapsehgal@gmail.com 

  • Vish Vansh (Paperback)
    Rajesh Jain
    25

    Item Code: #KGP-1503

    Availability: In stock

    विष वंश
    कोई भी सफल नाटक अपने समय वा महाज्योति होता है, जिसके आलोक में राजसत्ता, जनसत्ता और मनुष्य की सामाजिक स्तरीयता आदि दीप्त होते हैं । नाटकों की रंग-परंपरा में राजा और राज्याश्रित कथा-परंपरा का सार्वकालिक योगदान संभवत: इसीलिए रहा है, क्योंकि राजा और प्रजा की कहानी इस धरनी से न कभी समाप्त होती है और न ही पुरानी पड़ती है । राजा- प्रजा की कहानी में मनुष्य के साथ जुडे तमाम आयाम- भेद-अभेद, नर-मादा, नेकी-बदी, योगी-भोगी, शिखर-घाटी अर्थात् सम्यक कथा-तत्त्वों एवं नाटकीय आरोह-अवरोहों का अवलोकन-परीक्षण। संभव हो पाता है ।
    हिंदी के सुप्रतिष्ठित साहित्यकार राजेश जैन के इस प्रस्तुत नाटक 'विष वंश' में राजा की यह कथा हमारे आसपास के भ्रष्टाचार के जिस गहन सचिंतन से नंगा करती है, उसमें प्रतिपक्ष के लिए कोई अवकाश नहीं है । राजा अटपटसिंह और महामंत्री चंटप्रताप सिंह के माध्यम से तंत्र के भ्रष्टीकरण को, आज की नारी की अस्मिता क्या राजनीति में पनप राही वंशवाद को प्रवृति के साथ जोड़कर नाटककार ने इस नाट्यकथा को समकालीन समय का एक टकसाली पाठ बना दिया है । प्रजातंत्र ये प्रजा ही सर्वाधिक शक्तिशाली और सत्ताधीश हो-अत्यंत रोचक ढंग का यह सत्यान्वेषण इस नाटक के सुलझी हुई पहेली है ।
    छठे 'आर्य स्मृति साहित्य समान' के निर्णायक मंडल- राम गोपाल बजाज, कन्हैयालाल नंदन तथा असग़र वजाहत जैसे नाट्यविदों के मूल्यांकन के आधार पर सम्मानित इस नाट्यकृति का प्रकाशन, नाटकों की दुनिया में एक सदाबहार खुशबू का आह्वान है, ऐसा विश्वास है ।
  • Rangey Ghazal (Paperback)
    Om Prakash Sharma
    80

    Item Code: #KGP-7050

    Availability: In stock

    रंगे ग़ज़ल
    यह एक अनूठा दस्तावेज है, जिसे एक प्रयोग के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।  इस संकलन की कुछ गज़लें जहां अपनी परम्पराओं के साथ नजर आयेंगी, वहीं कुछ ग़ज़लों का रूप रूढियों और परम्पराओं से हटकर जमाने के नयेपन को छूता नजर आयेगा ।
    इस संकलन में पुराने शाइरों की ग़ज़लों के साथ ही कुछ नये शाइरों की ग़ज़लें भी सम्मिलित की गयी हैं, जो आज लोगों के दिलों में अपनी जगह बना रहे हैं तथा ग़ज़ल के प्रगतिवादी स्वरूप को नयी दिशा ध्यान कर रहे हैं । इन शाइरों में प्रमुख हैं-डा० बशीर 'बद्र', निदा फाजली, अख्तर शीरानी, ताहिर अली 'ताहिर', यूसुफ हसन, मुनीर नियाजी, मुजफ्फर हनफी, परवीन 'शाकिर', शोहरत बुखारी, शह्रयार, महकूर ‘खिजां', जिगर श्योपुरी, तस्नीम सिद्दीकी, अहमद 'कमाल', जफर 'इक्बाल', खालिद अहमद, जावेद शाहीँ, कतील शिफ़ाई, कर्रार 'नूरी', 'जोश' मलीहाबादी, साहिर होशियारपुरी, निश्तर खानकाही, मजीद अमजद, कुमार 'पाशी' और गुलशन मदान आदि ।

  • Meri Ekyavan Kavitayen (Paperback)
    Atal Bihari Vajpayee
    160 139

    Item Code: #KGP-1026

    Availability: In stock


  • Saryu Se Ganga (Novel) (Paperback)
    Kamlakant Tripathi
    650 585

    Item Code: #KGP-SSG PB

    Availability: In stock

    अठारहवीं शती का उत्तरार्द्ध ऐसा कालखंड है जिसमें देश की सत्ता-संरचना में ईस्ट इंडिया कंपनी का उत्तरोत्तर हस्तक्षेप एक जटिबहुआयामी राजनीतिक-सांस्कृति संक्रमण को जन्म देता है। उसकी व्याप्ति की धमक हमें आज तक सुनाई पड़ती है। सरयू से गंगा उस कालखंड के अंतर्द्वंद्वों का एक बेलौस आईना है। सामान्य नजीवन की अमूर्त हलचलों और ऐतिहासिक घटित के बीच की आवाजाही से प्रचलित विधाओं की परिधि का अतिक्रमण कर एक विशिष्ट विधा की रचना बनाती है।अकारण नहीं कि समें इतिहास स्वयं एक पात्र है और सामान्य एवं विशिष्टमूर्त एवं अमूर्त के तानेबाने को जोड़ता बीच-बीच में स्वयं अपना पक्ष रखता है। इस दृष्टि से ‘सरयू से गंगा  एक कथाकृति के रूप में उस कालखंड के इतिहास की सृजनात्मक पुनर्रचना का उपक्रम भी है।

    सरयू से गंगा’ की कथात्मक उपजीव्य ध्वंस और निर्माण का वह चक् है जो परिवर्तनकामी मानव-चेतना का सहजसामाजिक व्यापार है कथाकृति के रूप में यह संप्रति प्रचलित वैचारिकी के कुहासे को भेदकर चेतना के सामाजिक उन्मेष को मानव-स्वभाव के अंतर्निहित में खोजती है और समय के दुरूह यथार्थ से टकराकर असंभव को संभव बनानेवाली एक महाकाव्यात्मक  गाथा का सृजन करती है।

    फ़ॉर्मूलाबद्ध लेखन से इतरजीवन जैसा है उसे उसी रूप में लेते हुएउसके बीहड़ के बीच से अपनी प्रतनु डंडी बनानेवाले रचनाकार को स्वीकृति और प्रशस्ति से निरपेक्ष होनापड़ता है। लेकिन तभी वह अपने स्वायत्त औज़ारों से सत्य के नूतन आयामों के प्रस्फुटन को संभव बना पाता है। तभी वह वैचारिक यांत्रिकता के बासीपन से मुक्त होकर सही अर्थों में ‘सृजन’ कर पाता है।  सरयू से गंगा   ऐसे ही मुक्त सृजन की ताज़गी से लबरेज़ है। लेखीपतिमामासावित्रीपुरखिन अइयामतईनाई काकाशेख़ चाचाजमीलरज़्ज़ाक औरजहीर जैसे पात्र मनुष्य की जिस जैविक और भावात्मक निष्ठा को अर्घ्य देकर जेय बनाते हैंवह अपने नैरंतर् में कालतीत है। मानवता के नए बिहान की नई किरण भी शायद वहीं कहीं से फूटे।

  • Vipradas (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    90

    Item Code: #KGP-1404

    Availability: In stock


  • Suno Shefali (Paperback)
    Kusum Kumar
    40

    Item Code: #KGP-7083

    Availability: In stock


  • Manav Adhikar Aur Ham (Paperback)
    Urmila Jain
    140

    Item Code: #KGP-285

    Availability: In stock

    मानव अधिकार और हम
    हिंदी में प्रति वर्ष एक हज़ार से अधिक पुस्तकें छपती  हैं, पर अभी तक कोई ऐसी पुस्तक मेरे देखने में नहीं  आई है जिससे जन-सामान्य को सहज-सरल भाषा में मानव अधिकार संबंधी जानकारी प्राप्त हो सके। हिंदी की इस कमी का ध्यान में रखते हुए इस पुस्तक में मानव अधिकार की धारणा सहित अन्य विषयों के संबंध में भी चर्चा की गई है । 
    मानव अधिकार का उल्लंघन कब, कैसे और क्यों  होता है और हो सकना है—इसके कुछ उदाहरण देते हुए यह भी बतलाया गया है कि अधिकांश देश किस प्रकार सैद्धांतिक रूप से तो मानव अधिकार की सार्वभौमिक घोषणा का समर्थन करते हैं और इसी के आधार पर उन्होंने अपने-अपने देश में तरह-तरह के कानून भी बनाए हैं, पर जहाँ नक उन पर अमल  करने की बात है-इस संबंध में अधिकांश, देशों का रिकॉर्ड बहून ही निराशाजनक है ।
    प्रस्तूत पुस्तक में बाल अधिकार उल्लंघन और बालकों के यौन शोषण का उल्लेख करते हुए बतलाया गया है कि किस प्रकार अपराधियों का दोष सिद्ध होने के बावजूद उनके विरुद्ध कोई ऐसी कार्यवाई नहीं की जाती, उन्हें ऐसा दंड नहीं दिया जाता कि इस प्रकार के अपराधों पर रोक लगे ।
    -उर्मिला जैन

  • Mahasagar (Paperback)
    Himanshu Joshi
    25

    Item Code: #KGP-1212

    Availability: In stock


  • Dushyant Kumar Rachanavali (Paperback)
    Vijay Bahadur Singh
    1250

    Item Code: #KGP-77

    Availability: In stock


  • Jeevan Hamara (Paperback)
    Bebi Kambley
    60

    Item Code: #KGP-1509

    Availability: In stock

    जीवन हमारा
    मराठी लेखिका बेबी कांबले दलित साहित्य की प्रतिनिधि हस्ताक्षर हैं । दलित लोगों के विपन्न, दयनीय और दलित जीवन को आधार बनाकर लिखे गए इस आत्मकथात्मक उपन्यास ने मराठी साहित्य में तहलका मचा दिया था। महाराष्ट्र के पिछडे इलाके के सुदूर गाँवों में अस्मृश्य माने जाने वाले आदिवासी समाज ने जो नारकीय, अमानवीय और लगभग घृणित जीवन का जहर घूँट-घूँट पिया उसका मर्मांतक  आख्यान है यह उपन्यास । शुरु से अंत तक लगभग सम्मोहन की तरह बाँधे रखने वाले इस उपन्यास में दलितो के जीवन में जड़ें जमा चुके अंधविश्वास पर तो प्रहार किया ही गया है, उस अंधविश्वास को सचेत रूप से उनके जीवन में प्रवेश दिलाने और सतत पनपाने वाले सवर्णो की साजिश का भी पर्दाफाश किया गया है । इस उपन्यास को पढ़ना महाराष्ट्र के डोम समाज ही नहीं वरन् समस्त पददलित जातियों के हाहाकार और विलाप को अपने रक्त में बजता अनुभव करना है । शोषण, दमन और रुदन का जीवंत दस्तावेज है यह उपन्यास, जो बेबी कांबले ने आत्मकथात्मक लहजे में रचा है ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Hari Shankar Parsai (Paperback)
    Hari Shankar Parsai
    100

    Item Code: #KGP-7196

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां
    हरिशंकर परसाई

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिंदी कथा-जगत् के शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित दिवंगत कथाकारों की कहानियों के चयन के लिए उनके कथा-साहित्य के प्रतिनिधि एवं अधिकारी विद्वानों तथा मर्मज्ञों को संपादन-प्रस्तुति हेतु आमंत्रित किया गया है। यह हर्ष का विषय है कि उन्होंने अपने प्रिय कथाकार की दस प्रतिनिधि कहानियों को चुनने का दायित्व गंभीरता से निबाहा है।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के 
    लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार हरिशंकर परसाई की जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: ‘भोलाराम का जीव’, ‘सुदामा के चावल’, ‘तट की खोज’, ‘इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर’, ‘आमरण अनशन’, ‘बैताल की छब्बीसवीं कथा’, ‘एक लड़की, पांच दीवाने’, ‘चूहा और मैं’, ‘अकाल उत्सव’ तथा ‘वैष्णव की फिसलन’।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार हरिशंकर परसाई की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद संतोष का अनुभव करेंगे।
  • Mahatma Gandhi : Mere Pitamah : 1 (Paperback)
    Sumitra Gandhi Kulkarni
    195

    Item Code: #KGP-295

    Availability: In stock

    महात्मा गांधी : मेरे पितामह (1)
    (व्यक्तित्व और परिवार)
    एक नहीं अनेक गांधी हैं--गांधी के  अकेले एक व्यक्तित्व से समाए हुए ।
    गत पूरी एक शताब्दी गांधी की शताब्दी थी । इतना महान् व्यक्तित्व संभवत: विश्व में कोई दूसरा नहीँ था । उनके अवसान के पश्चात उनका विशाल स्वरूप धुँधलाया नहीं, बल्कि और प्रखर, और अधिक प्रासंगिक होकर उभरा । अतीत के गांधी की अपेक्षा आज का गांधी अधिक व्यापक एव विराट, है ।  हिंसा की आग में झुलसते, आज के इस भयाक्रांत वानावरण में गांधी की आवश्यकता अधिक गहराई से अनुभव की जा रही है ।
    यों तो अब तक बहुत कुछ लिखा जा चुका है गांधी जी पर, उनके जीवन-दर्शन पर, परंतु बहन सुमित्रा जी ने अपने पितामह का जिस रूप में रेखांकित किया है, वह उन सबसे भिन्न है । बापू के जीवन की पारदर्शिता उसमें झलके बिना नहीं रहती । सुपित्रा जी ने नि:स्पृह एवं निष्पक्ष भाव स सारी स्थितियों का गहन विवेचन किया है । अपने पितामह को भी क्षमा नहीं किया ।
    इस संपूर्ण कृति में हरिलाल भाई वाला प्रसंग सबसे करुण एवं दारुण है--दिल की दहला देने वाला । तब बापू मात्र बापू न रहकर एक संवेदनशून्य पिता की भूमिका में दीखते हैं । हरिलाल भाई सारा गरल चुपचाप पी जाते हैं, पर किसी से कोई शिकायत नहीं । इतना प्रखर, मेधावी, आज्ञाकारी सुपुत्र पिता की उपेक्षा का शिकार बनकर अपनी आहुति दे टेना है । तब गांधी से बडा गांधी लगता है वह--एक निपट मानव के रूप में । अपनी परदादी माँ 'पुतली माँ' पर भी सुपित्रा जी न विस्तार स लिखकर 'गांधी-परिवार' की इस पुण्य-गाथा को एक युग-गाथा का नया आयाम प्रदान किया है । संयुक्त परिवार में पद्म-पत्रवत् रहने की उनकी तपश्चर्या कितनी प्रेरक थी ! इस कृति में ऐसा बहुत कुछ  जो गंभीरता के साथ सोचने के लिए विवश करता है ।  सुमित्रा जी की यह रचना इसलिए अनेक अर्थों में अद्वितीय बन गई है ।
    --हिमाशु जोशी
    13 अगस्त, 2009
  • Ghalib : Sangeet Ke Saanche Mein Dhali Gazalen
    T.N. Raj
    150

    Item Code: #KGP-84

    Availability: In stock

    गालिब के कलाम का भारत और बाहर के देशों की बहुत-सी भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। लेकिन कलामे-गालिब की खूबी यह हे कि डेढ़ शताब्दी से कुछ ज्यादा अर्सा गुजर जाने के बाद भी वह हमारे ही युग का कलाम मालूम होता है और मुझे तो ऐसा महसूस होता है कि हर आने वाले युग में इसका नयापन बरकरार रहेगा। दरअस्ल बड़े शायर होते ही वही हैं जिनका कलाम हर युग, हर सत्ह और जिंदगी के हर मौजू ‘विषय’ का अहाता कर ले। 
    -डाॅ. शम्स बदायंूनी

  • Anandmay Jeevan Kaise Payen (Paperback)
    Swed Marten
    120

    Item Code: #KGP-282

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Vishwanath Prasad Tiwari (Paperback)
    Vishwanath Prasad Tiwari
    90

    Item Code: #KGP-1361

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : विश्वनाथ प्रसाद तिवारी
    मेरी कविताओं में ऐसे शब्द, बिंब या प्रतीक अधिक हैं जो भोगते हुए या जूझते हुए मनुष्य से संबंधित है । मैं गरीब देहाती दुनिया से जाया हुं और मेरे शुरू के बीस वर्ष उस अनाथ साधनहीन मनुष्य के बीच गुजरे जिसे बार-बार अपमानित होते, यातनाएं सहते देखा है । मेरी कविताओं में 'हत्या' और उससे मिलती-जुलती शब्दावली में जो आतंक है, वह मेरे बालमन पर पडे प्रभावों की ही प्रतिक्रिया है । मेरी कविताओं में 'अंधकार' और 'रात' के बिंब भी अधिक हैं जो एक अनार मेरे अकेलेपन की अतृप्ति को व्यक्त करते है तो दूसरी खार उस अंधकारमय दबाव को जिसे आज का साधनहीन मनुष्य भोग रहा है । मेरी कविताओं में पहाडी परिवेश अधिक मिलेगा । पहाड़ के प्रति मेरा गहरा आकर्षण है और मृत्यु-भय से आतंकित होते हुए भी मैंने पहाडी यात्राएं बहुत की हैं । हिमालय का परिवेश मेरी प्रेम कविताओं में कहीँ-कहीं प्रेमिका के साथ एकाकार हो गया है । कुछ शब्दों के सदंर्भ से प्रयोक्ता और ग्रहीता के अर्थों में अंतर स्वाभाविक है । अपनी कविताओं के प्रसंग में कहूं तो उनमें 'इतिहास', 'धारा', 'अंधकार', 'घाटी', 'जंगल', 'पहाड़' आदि अनेक शब्द अपना विशिष्ट अर्थ रखते है ।
    'बेहतर दुनिया के लिए' और 'आखर अनंत' नामक संग्रहों की बहुत-सी समीक्षाएं प्रकाशित हो चुकी है । इन संग्रहों के बारे में अपनी ओर से सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि इनमें मेरी रचनात्मक भाषा  परित्कृत हुई है और कविताओं को एक व्यापक परिप्रेक्ष्य मिला है । आत्मीय  का भी और लोक जा भी ।

  • Nasha Jeevan Ka Saar Nahin
    Jagat Ram Arya
    50

    Item Code: #KGP-1228

    Availability: In stock

    नशा करने वाला अपना मनुष्यत्व खो बैठता है, स्वास्थ्य व पैसे की बरबादी कर गृह-कलह को जन्म देता है और समाज में अपनी प्रतिष्ठा भी गंवा बैठता है। जिस दिन से व्यक्ति नशा करने लगता है, समझिए कि उसी दिन से वह अपने विनाश का मार्ग प्रशस्त कर लेता है। अगर बीच ही में समय रहते संभलकर वह नशे से किनारा कर लेता है तब तो ठीक है वरना यह मार्ग अंततः उसे दुर्दशा और दुर्गति के कंटीले रास्तों पर घसीटता हुआ मौत के अंधेरे गहरे गर्त में धकेल देता है। इस पुस्तक में नशाखोरी के दुष्परिणामों को उजागर करने और उनसे बचने से संबंधित एक प्रेरणादायी, शिक्षाप्रद कथा है।
    —जगतराम आर्य
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Shrilal Shukla (Paperback)
    Shree Lal Shukla
    120

    Item Code: #KGP-44

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : श्रीलाल शुक्ल
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार श्रीलाल शुक्ल ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'इस उम्र में', ‘सुखांत', "सँपोला', 'दि ग्रैंड मोटर ड्राइविंग स्कूल', 'शिष्टाचार', 'दंगा', 'सुरक्षा', 'छुट्टियाँ', 'यह घर मेरा नहीं' तथा 'अपनी पहचान' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक श्रीलाल शुक्ल की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Manvadhikar Ki Aseemit Sarhadein (Paperback)
    Pushpa Sinha
    150

    Item Code: #KGP-477

    Availability: In stock

    इक्कीसवीं सदी को मानवाधिकर एवं टेक्नोलोजी की सदी माना जा रहा है। मानवाधिकर प्रकृति द्वारा दी गई जीवन की जरूरी शर्तें हैं जिसमें मानव अपना जीवन स्वेच्छा से मर्यादापूर्वक जी सके। हर धर्म  एवं शास्त्रों में यह माना गया है कि प्रत्येक मानव जन्म से समान एवं स्वतंत्र है।
    लेकिन हमारी दुनिया की सामाजिक व्यवस्था ऐसी है जो एक मानव को दूसरे मानव से विभिन्न आधारों पर, जैसे—लिंग, धर्म, जाति, स्थान विशेष, भाषा आदि के द्वारा ऊंच या नीच समझता है। तब ऐसी स्थिति में मानव के जीवन एवं मर्यादा की रक्षा के लिए मानवाधिकार शब्द का आविष्कार किया गया। अतः सही मायने में मानवाधिकार एक सभ्य समाज के जीवन-शैली की रूपरेखा है जिसमें सभी अधिकार सभी को मिल सकें।
    मानव के अपने मूल-अधिकारों के हनन से ही समाज में असंतोष फैलता है, जो धीरे-धीरे उग्र होकर हिंसा का रूप लेता है, जिसके फलस्वरूप आतंकवाद, नक्सलवाद जैसी भयानक सामाजिक परिस्थितियों का जन्म होता है।
    अतः मानवाधिकार का मूल-मंत्र है ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’। समाज में अधिकार और कर्तव्य का ताना-बाना बहुत सूक्ष्म है, यानी कि प्रत्येक मानव द्वारा हर पल सही कर्म करने की गति हो तभी ‘मानवाधिकार की असीमित सरहदें’ पार की जा सकती हैं।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Bhisham Sahni (Paperback)
    Bhishm Sahni
    120

    Item Code: #KGP-10

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : भीष्म साहनी
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार भीष्म साहनी ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'वाङ्चू',  'साग-मीट', 'पाली', 'समाधि भाई रामसिंह', 'फूलां', 'सँभल के बार', 'आवाजें', 'तेंदुआ', 'ढोलक' तथा 'साये'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार भीष्म साहनी की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।

  • Haitrik (Paperback)
    Rajesh Ahuja
    140

    Item Code: #KGP-1471

    Availability: In stock

    हर रात सोने से पहले कहानी सुनना ‘तारक’ का नियम था। सच कहूं तो कहानी सुनाए बिना मुझे भी चैन नहीं पड़ता था। कहानी सुनते हुए जितना मजा उसे आता था, उसके चेहरे के हाव-भाव और कौतूहल-भरी आंखें देखकर उससे भी अधिक सुख मुझे मिलता था। उस दिन कोई नई कहानी याद नहीं आ रही थी, सो मैंने उससे कहा, ‘कोई पुरानी कहानी सुना दूं?’ मैं कभी-कीाी ऐसी कहानियां सुनाकर उसे बहला दिया करता था, जो मैं उसे पहले कभी सुना चुका था। अकसर वह सुनी हुई कहानी दोबारा सुनने के लिए राजी हो जाता था; पर उस दिन वह नहीं माना। ‘एक ही कहानी को बार-बार सुनने में कोई मजा आता है?’ वह मुंह सुजाकर बैठ गया। मैंने बहुतसमझाया पर वह जिद पर अड़ा रहा। मेरा बड़ा बेटा ‘आकाश’ भी वहां बैठा था। उसने कहा, ‘आप इसे वही कहानी सुना दो न, जो आपने एक बार मुझे सुनाई थी ‘क्रिकेट वाली’।’
    इस कहानी अर्थात् उपन्यास में एक स्थान पर मैंने लिखा है, ‘कोई भी नया काम शुरू करते हुए मन में आशा, डर, संकोच आदि भाव एक साथ जागृत होते हैं।’ उपन्यास को लिखते समय यही स्थिति मेरी भी थी, किंतु उपन्यास के आगे बढ़ने के साथ-साथ, आशा का भाव आगे बढ़ता गया तथा डर और संकोच के भाव पीछे छूट गए।
    -लेखक
  • Ek Aur Lal Tikon (Paperback)
    Narendra Kohli
    50

    Item Code: #KGP-7099

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Mamta Kaliya (Paperback)
    Mamta Kalia
    80

    Item Code: #KGP-7002

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : ममता कालिया
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार ममता कालिया ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'आपकी छोटी लड़की', 'वसंत-सिर्फ एक तारीख', 'लड़के', 'दल्ली', 'लैला-मजनू', 'जितना तुम्हारा हूँ', 'सुलेमान', 'छुटकारा', 'पीठ' तथा 'बोहनी' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक ममता कालिया की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।

  • Keral Ka Krantikari (Paperback)
    Vishnu Prabhakar
    40

    Item Code: #KGP-1122

    Availability: In stock


  • Jeet Ki Raah (Paperback)
    Swed Marten
    100

    Item Code: #KGP-1312

    Availability: In stock

    पुस्तक में स्वेट मार्डन जैसे महान् व्यक्तित्व के आधुनिक विचारों के साथ भारतीय संस्कृति एवं परंपराओं से प्रेरित विचारों का मिला-जुला संगम है, ठीक गंगा-यमुना की भाँति पावन व पवित्र । एक जोर से विद्धान् स्वेट मार्डेन की विचाररूपी गंगा एवं दूसरी ओर से भारतीय विचारों की सरिता यमुना का जल आकर मिल गया है इस 'जीत की राह' में।
    इस पुस्तक का वास्तविक शीर्षक है 'जीत की राह', परंतु इससे अधिक आकर्षक है 'स्वेट मार्डन : सूक्तियाँ व प्रेरक विचार'।  इस पुस्तक में स्वेट मार्डन की तीन पुस्तकों क्रमश 'The Conquest of Worry', 'He can who think he can', 'To succeed in Life' में से उनकी सूक्तियाँ व प्रेरक विचार संगृहीत किए गए हैं।
  • Doosara Gazal Shatak (Paperback)
    Sher Jung Garg
    100

    Item Code: #KGP-1203

    Availability: In stock

    दूसरा ग़ज़ल  शतक
    इस श्रृंखला की शुरुआत 'हिन्दी गजल शतक' से हुई थी । दुष्यन्त, बलबीर सिंह रंग, चिरंजीत, रामावतार लागी, सूर्यभानु गुल, बालस्वरूप राही, शलभ श्रीराम सिंह, मृदुता अरुण आदि-आदि पच्चीस उल्लेखनीय गज़लकारों की ग़ज़लें इस संकलन में समाविष्ट की गई थीं। इस बार शिवबहादुर सिंह भदौरिया, ओमप्रकाश चतुर्वेदी 'पराग' से लेकर युवा ज्योति शेखर और हरिओम तक 'दूसरा ग़ज़ल शतक' में आए है । कवयित्रियों में रंजना अग्रवाल, सरोज व्यास और विनीता गुप्ता है; लोकप्रिय गीतकारों में कुँअर बेचैन, उर्मिलेश, श्रवण राही हैँ । मानव, उपेन्द्र कुमार, कमलेश भट्ट 'कमल', कमल किशोर भावुक, प्रभात शंकर, योगेन्द्र दत्त शर्मा और लक्ष्मण आदि है । तात्पर्य यह कि 'दूसरा ग़ज़ल शतक में ग़ज़ल से जुडे विभिन्न मूडों, मान्यताओं, संवेदनाओं, सरोकारों, शिल्पों, कथ्यों वाले रचनाकारों का यह संगम हिंदी में लिखी जा रही ग़ज़लों का एक गुलदस्ता है ।
  • Do Naatak (Paperback)
    Jaivardhan
    100

    Item Code: #KGP-1323

    Availability: In stock

    जयवर्धन
    जयवर्धन उपनाम। पूरा नाम जयप्रकाश सिंह (जे.पी. सिंह)। प्रतापगढ़ (उ० प्र०) ज़िले के मीरपुर गाँव में वर्ष 1960 में जन्म। अवध विश्वविद्यालय से स्नातक। 1984 में लखनऊ विश्वविद्यालय से विधि-स्नातक। लखनऊ दूरदर्शन में दो वर्षों तक आकस्मिक प्रस्तुति सहायक के रूप में कार्य। श्रीराम सेंटर, दिल्ली में एक वर्ष मंच प्रभ